अगर आप अभी भी रोज १० घंटे गधों की तरह घिस रहे हैं और फिर भी प्रमोशन वाला बॉस आपको इग्नोर कर रहा है तो मुबारक हो आप अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं। बिना स्मार्टनेस के मेहनत करना सिर्फ थकान देता है रिजल्ट्स नहीं। क्या आप सच में अपनी पूरी लाइफ ऐसे ही बिना मतलब की भागदौड़ में बिताना चाहते हैं।
रिचर्ड कोच की बुक द ८०/२० इंडिविजुअल हमें सिखाती है कि कैसे कम काम करके भी आप ऑफिस के टॉप स्टार बन सकते हैं। चलिए जानते हैं वो ३ सीक्रेट लेसन्स जो आपकी प्रोफेशनल लाइफ को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : हाई वैल्यू एक्टिविटीज को पहचानना और गधा मजदूरी बंद करना
आज के दौर में हर कोई बिजी दिखने की रेस में लगा है। सुबह से शाम तक ईमेल का जवाब देना, बेकार की मीटिंग्स में सिर खपाना और फिर भी दिन के आखिर में यह सोचना कि आज किया क्या। अगर आपको लगता है कि ऑफिस में सबसे ज्यादा देर तक बैठने से आप सक्सेसफुल बन जाएंगे, तो शायद आप अपनी लाइफ के सबसे बड़े भ्रम में जी रहे हैं। रिचर्ड कोच अपनी बुक द ८०/२० इंडिविजुअल में साफ कहते हैं कि आपकी ८० परसेंट मेहनत असल में कचरा है। जी हां, आपने सही सुना। आपकी पूरी दिनचर्या का सिर्फ २० परसेंट हिस्सा ही ऐसा है जो आपको सच में तरक्की दिलाता है। बाकी का ८० परसेंट सिर्फ शोर है, जो आपको थकाने के अलावा और कुछ नहीं करता।
इसे एक रीयल लाइफ एक्जाम्पल से समझते हैं। मान लीजिए आप एक सेल्स प्रोफेशनल हैं। आप दिन भर में ५० लोगों को फोन करते हैं। इनमें से ४० लोग ऐसे होते हैं जो आपका टाइम वेस्ट करते हैं या फिर बस जानकारी लेकर गायब हो जाते हैं। लेकिन वो १० खास क्लाइंट्स होते हैं जो आपके महीने का पूरा टारगेट पूरा कर देते हैं। अब जरा सोचिए, अगर आप उन ४० टाइम वेस्ट करने वाले लोगों के पीछे भागना छोड़ दें और अपनी पूरी एनर्जी उन १० मलाई वाले क्लाइंट्स पर लगा दें, तो क्या होगा। आपकी मेहनत आधी हो जाएगी और रिजल्ट्स डबल। लेकिन दिक्कत यही है कि हमें बचपन से सिखाया गया है कि मेहनत का फल मीठा होता है। यह नहीं बताया गया कि गलत जगह मेहनत करने पर सिर्फ पसीना और सिरदर्द मिलता है।
अक्सर हम उन कामों को करने में घंटों लगा देते हैं जो दिखने में बहुत जरूरी लगते हैं पर असल में उनकी वैल्यू जीरो होती है। जैसे कि पीपीटी के फॉन्ट ठीक करना या फिर उन ग्रुप चैट्स में एक्टिव रहना जहाँ सिर्फ फालतू की बातें होती हैं। एक ८०/२० इंडिविजुअल कभी भी काम की क्वांटिटी नहीं देखता। वह यह देखता है कि कौन सा एक काम आज उसे सबसे ज्यादा इम्पैक्ट देगा। वह जानता है कि हर काम बराबर नहीं होता। कुछ काम सोने की खान होते हैं और कुछ सिर्फ धूल।
सफलता का राज ज्यादा काम करना नहीं है, बल्कि सही काम का चुनाव करना है। अगर आप अपने बॉस को इम्प्रेस करने के लिए हर फालतू प्रोजेक्ट के लिए हां कह देते हैं, तो आप खुद को बर्नआउट की तरफ धकेल रहे हैं। स्मार्ट लोग पहले रुकते हैं, सोचते हैं और फिर सिर्फ उन्हीं प्रोजेक्ट्स पर हाथ डालते हैं जहाँ उनकी स्किल्स का बेस्ट यूज हो सके। याद रखिए, अगर आप खुद अपनी प्रायोरिटी तय नहीं करेंगे, तो दुनिया आपको अपने हिसाब से नचाएगी। इसलिए आज ही अपनी टू-डू लिस्ट उठाइये और उन फालतू के ८० परसेंट कामों पर कांटा लगा दीजिये जो आपकी जिंदगी में कोई वैल्यू ऐड नहीं कर रहे हैं। जब आप कम लेकिन कीमती काम करना शुरू करते हैं, तो आपकी वैल्यू अपने आप बढ़ जाती है।
लेसन २ : मेंटल रिलैक्सेशन और खाली दिमाग की जादुई ताकत
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि अगर उनका दिमाग हर वक्त किसी न किसी टेंशन में नहीं है, तो वह काम ही नहीं कर रहे। हमारे समाज में तो 'खाली बैठना' एक पाप माना जाता है। लेकिन रिचर्ड कोच कहते हैं कि एक ८०/२० इंडिविजुअल बनने के लिए आपको थोड़ा 'आलसी' होना पड़ेगा। रुकिए, इसका मतलब यह नहीं कि आप सारा दिन रील देखते रहें। इसका मतलब है कि आप अपने दिमाग को उस फालतू की भागदौड़ से आजाद करें जो आपकी सोचने की शक्ति को खत्म कर रही है। जब आपका दिमाग शांत होता है, तभी वह उन २० परसेंट ब्रिलियंट आइडियाज को जन्म दे पाता है जो आपकी पूरी लाइफ बदल सकते हैं।
कल्पना कीजिये हमारे शर्मा जी को, जो अपनी डेस्क पर ऐसे बैठे रहते हैं जैसे देश की पूरी जीडीपी उन्हीं के कंधों पर टिकी हो। वह लंच भी कीबोर्ड पर गिरते हुए टुकड़ों के साथ करते हैं और टॉयलेट में भी ऑफिस के ईमेल चेक करते हैं। उन्हें लगता है कि वह बहुत बड़े कर्मयोगी हैं। पर सच तो यह है कि शर्मा जी का दिमाग एक पुराने इंजन की तरह गरम हो चुका है जो बस धुआं छोड़ रहा है, काम कुछ नहीं कर रहा। वहीं दूसरी तरफ आपका वो सहकर्मी है जो बीच-बीच में कॉफी ब्रेक लेता है, ऑफिस की छत पर टहलने जाता है और फिर अचानक एक ऐसा आइडिया लाता है कि पूरे ऑफिस में उसकी वाह-वाही हो जाती है। शर्मा जी को लगता है कि उसकी किस्मत अच्छी है, पर असल में उसने अपने दिमाग को सोचने का स्पेस दिया है।
रिचर्ड कोच के अनुसार, टॉप के १० परसेंट लोग अपनी ज्यादातर वैल्यू तब क्रिएट करते हैं जब वे 'काम' नहीं कर रहे होते। जब आप रिलैक्स करते हैं, तो आपका सबकॉन्शियस माइंड बैकग्राउंड में उन मुश्किल प्रॉब्लम्स को सॉल्व कर रहा होता है जिन्हें आप जबरदस्ती डेस्क पर बैठकर नहीं सुलझा पा रहे थे। अक्सर बेहतरीन आइडियाज शावर लेते वक्त या पार्क में टहलते वक्त आते हैं, एक्सेल शीट भरते वक्त नहीं। अगर आप खुद को हमेशा बिजी रखेंगे, तो आप कभी उन बड़े अवसरों को नहीं देख पाएंगे जो आपके ठीक सामने खड़े हैं।
गधों की तरह सर झुकाकर चलने से रास्ता तो कट जाता है, पर मंजिल नहीं दिखती। ८०/२० इंडिविजुअल बनने का मतलब है यह समझना कि आपका दिमाग कोई मशीन नहीं है जिसे २४ घंटे चलाया जा सके। इसे रिचार्ज की जरूरत होती है। जब आप अपने काम से थोड़ा पीछे हटकर चीजों को बड़े नजरिए से देखते हैं, तब आपको समझ आता है कि आप किन फालतू चीजों में उलझे हुए थे। इसलिए अगली बार जब आपको लगे कि काम बहुत ज्यादा है, तो पागलों की तरह उसमें डूबने के बजाय ५ मिनट के लिए गहरी सांस लीजिये और खुद से पूछिए, क्या यह काम वाकई जरूरी है या मैं बस अपनी बेचैनी मिटाने के लिए खुद को बिजी रख रहा हूँ।
लेसन ३ : अपनी नेचुरल स्ट्रेंथ पर दांव लगाना और मुश्किलों को आउटसोर्स करना
हम में से ज्यादातर लोगों को यह सिखाया गया है कि अपनी कमजोरियों को सुधारो। अगर आपकी मैथ कमजोर है, तो ट्यूशन पढ़ो। अगर आपको कोडिंग नहीं आती, तो रात भर जागकर कोर्स करो। रिचर्ड कोच कहते हैं कि यह जिंदगी जीने का सबसे घटिया तरीका है। एक ८०/२० इंडिविजुअल कभी अपनी कमजोरियों को ठीक करने में वक्त बर्बाद नहीं करता। वह अपनी उन २० परसेंट नेचुरल स्ट्रेंथ को ढूंढता है जहाँ वह पहले से ही मास्टर है। अगर आप एक मछली हैं, तो दुनिया की बातों में आकर पेड़ पर चढ़ने की कोशिश मत कीजिये। आप बस पानी में तैरने की अपनी कला को इतना परफेक्ट बना लीजिये कि शार्क भी आपसे रास्ता मांगे।
इसे ऐसे देखिये कि हमारे एक दोस्त हैं वर्मा जी। वर्मा जी बोलने में बहुत माहिर हैं, वो मिट्टी को भी सोना बोलकर बेच सकते हैं। लेकिन उन्हें ऑफिस में डेटा एंट्री और एक्सेल शीट बनाने का काम दे दिया गया है। अब वर्मा जी दिन भर रोते-रोते फॉर्मूला लगाते हैं और फिर भी गलती कर देते हैं। बॉस उन्हें डांटता है और वर्मा जी को लगता है कि वो नालायक हैं। असल में गलती वर्मा जी की नहीं, बल्कि उनकी स्ट्रैटेजी की है। अगर वर्मा जी अपनी एक्सेल शीट किसी एक्सपर्ट को दे दें (आउटसोर्स कर दें) और अपना पूरा टाइम क्लाइंट्स से बात करने में लगाएं, तो वो कंपनी के नंबर वन सेल्समैन बन सकते हैं। इसे कहते हैं कम मेहनत में बड़ी जीत।
सफलता का रास्ता खुद को घिसने में नहीं, बल्कि अपने टैलेंट के सही इस्तेमाल में है। जो काम आपको बोझ लगते हैं, यकीन मानिए दुनिया में कोई न कोई ऐसा जरूर है जिसे वो काम करने में मजा आता है। ८०/२० इंडिविजुअल का काम यह है कि वह उन लोगों को ढूंढे और अपना बोझ उनके साथ शेयर करे। जब आप सिर्फ वही काम करते हैं जिसे करने में आपको खुशी मिलती है और जिसमें आप एक्सपर्ट हैं, तो वो काम आपके लिए खेल बन जाता है। और जब काम खेल बन जाए, तो जीत पक्की होती है।
जिंदगी बहुत छोटी है उन कामों को करने के लिए जो आपको पसंद नहीं हैं। अगर आप अपनी कमियों को सुधारने में लगे रहेंगे, तो आप बस एक 'एवरेज' इंसान बन पाएंगे। लेकिन अगर आप अपनी ताकत पर फोकस करेंगे, तो आप 'असाधारण' बनेंगे। अपने २० परसेंट टैलेंट को पहचानिये, उसे निखारिये और बाकी ८० परसेंट कचरा काम दूसरों के लिए छोड़ दीजिये। यही वो सीक्रेट है जो बड़े-बड़े बिजनेस लीडर्स और सक्सेसफुल लोग इस्तेमाल करते हैं। आप भी आज से ही अपनी ताकत पर फोकस करना शुरू कीजिये और देखिये कैसे आपकी मेहनत आधी और तरक्की चार गुना हो जाती है।
दोस्तों, ८०/२० रूल सिर्फ एक थ्योरी नहीं है, यह एक लाइफस्टाइल है। आप अपनी लाइफ के कीमती साल गधा मजदूरी में बिता सकते हैं या फिर स्मार्ट बनकर उन ऊंचाइयों को छू सकते हैं जिनका आपने सिर्फ सपना देखा है। आज ही बैठिये और उन २० परसेंट कामों की लिस्ट बनाइये जो आपको सच में खुशी और रिजल्ट देते हैं। कमेंट्स में हमें बताइये कि वो कौन सा एक काम है जिसे आप आज ही छोड़ने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो ऑफिस में पागलों की तरह काम तो करता है पर उसका प्रमोशन कभी नहीं होता।
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