The Influentials (Hindi)


क्या आपको लगता है कि आप अपनी मर्जी से फोन खरीदते हैं या वोट देते हैं। भूल जाइये। आप बस उन दस परसेंट लोगों के कठपुतली हैं जो आपको नचा रहे हैं। जबकि आप भेड़ चाल में बिजी हैं, वो स्मार्ट लोग आपकी चॉइस कंट्रोल कर रहे हैं और आपको पता भी नहीं। कितने दुख की बात है ना।

आज हम एड केलर और जॉन बेरी की बुक दी इन्फ्लुएंशियल्स को डिकोड करेंगे। हम उन सीक्रेट्स को समझेंगे जिससे आप भी उन खास दस परसेंट लोगों में शामिल हो सकते हैं जो दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं।


लेसन १ : दी वन इन टेन रूल - आप लीडर हैं या सिर्फ एक नंबर

सोचिये आप एक रेस्टोरेंट में बैठे हैं और मेनू देख रहे हैं। आपको समझ नहीं आ रहा कि क्या ऑर्डर करें। तभी आपका एक दोस्त कहता है कि भाई यहां का पास्ता ट्राई कर एकदम कडक है। आप बिना सोचे पास्ता ऑर्डर कर देते हैं। मुबारक हो आप उन नब्बे परसेंट लोगों में से एक हैं जो अपनी अकल घर छोड़कर आते हैं। एड केलर और जॉन बेरी कहते हैं कि अमेरिका हो या इंडिया हर जगह दस में से एक बंदा ऐसा होता है जो बाकी नौ लोगों का दिमाग चलाता है। इसे कहते हैं दी इन्फ्लुएंशियल्स। ये वो लोग नहीं हैं जिनके इंस्टाग्राम पर मिलियंस में फॉलोअर्स हैं और जो सुबह उठकर मैंगो शेक की फोटो डालते हैं। असल इन्फ्लुएंशियल्स आपके पड़ोस वाले अंकल भी हो सकते हैं जिन्हें मोहल्ले का हर बच्चा पूछता है कि कौन सा लैपटॉप बेस्ट है। या वो ऑफिस वाला कलीग जिसकी बात बॉस भी चुपचाप सुनता है।

हैरानी की बात यह है कि ये लोग कोई सुपरहीरो नहीं होते। बस इनके पास वह पावर होती है जिसे हम ओपिनियन लीडरशिप कहते हैं। बाकी नौ लोग इनके पीछे ऐसे चलते हैं जैसे स्कूल में पीटी टीचर के पीछे बच्चे। आप खुद को देखिये। आप सुबह उठकर कौन सा टूथपेस्ट इस्तेमाल करेंगे से लेकर किस पार्टी को वोट देंगे यह सब आपके दिमाग की उपज नहीं है। यह उन दस परसेंट लोगों का कमाल है जो समाज में धीरे से एक आईडिया छोड़ देते हैं। और आप उसे अपना समझकर गले लगा लेते हैं। यह सुन कर थोड़ा बुरा लग सकता है पर सच यही है कि आप एक इंफोर्मेशन कंज्यूमर हैं और वो इंफोर्मेशन क्रिएटर हैं।

ये इन्फ्लुएंशियल लोग असल में जानकारी के भूखे होते हैं। जब आप नेटफ्लिक्स पर वेब सीरीज देखकर टाइम पास कर रहे होते हैं तब ये लोग मार्केट के ट्रेंड्स पढ़ रहे होते हैं। इनके पास हर चीज का एक नजरिया होता है। ये सिर्फ न्यूज नहीं पढ़ते बल्कि उस न्यूज का मतलब समझते हैं। लोग इनके पास इसलिए नहीं जाते कि ये अमीर हैं। लोग इनके पास इसलिए जाते हैं क्योंकि ये भरोसेमंद हैं। हमारे देश में तो यह और भी मजेदार है। यहाँ शादी के कार्ड से लेकर इंश्योरेंस पॉलिसी तक सब कुछ इसी वन इन टेन रूल पर चलता है। अगर खानदान के उस एक इन्फ्लुएंशियल ताऊ जी ने कह दिया कि लड़का अच्छा है तो समझो रिश्ता पक्का। बाकी नौ लोग तो बस पनीर के पकोड़े खाने आते हैं।

अगर आप इस भीड़ से निकलकर उस दस परसेंट क्लब में आना चाहते हैं तो आपको सिर्फ बोलना नहीं बल्कि सही बोलना सीखना होगा। इन्फ्लुएंशियल बनने का मतलब यह नहीं कि आप चीख चीख कर अपनी बात मनवाएं। इसका मतलब है कि जब आप बोलें तो सन्नाटा छा जाए क्योंकि लोगों को पता है कि आपकी रिसर्च तगड़ी है। आप जो कहते हैं उसमें दम है। क्या आप अब भी उन नौ लोगों में रहना चाहते हैं जो सिर्फ दूसरों के इशारों पर नाचते हैं। या फिर आप वो एक शख्स बनना चाहते हैं जिसकी एक आवाज पर नौ लोग अपना रास्ता बदल लें। चॉइस आपकी है पर याद रखिये कि दुनिया सिर्फ लीडर्स को याद रखती है नंबर्स को नहीं।


लेसन २ : एक्टिव इंगेजमेंट - मोहल्ले के ताऊ से लेकर ऑफिस के स्टार तक

पहले लेसन में हमने समझा कि दस में से एक बंदा ही असली बॉस होता है। लेकिन क्या वो बंदा घर में छुपकर बैठा रहता है। बिलकुल नहीं। एड केलर और जॉन बेरी बताते हैं कि इन्फ्लुएंशियल्स की सबसे बड़ी ताकत उनका एक्टिव इंगेजमेंट है। ये वो लोग हैं जो हर जगह टांग अड़ाते हैं पर स्मार्ट तरीके से। जब आप संडे को सोकर दोपहर के बारह बजा रहे होते हैं तब ये लोग किसी कम्युनिटी मीटिंग में बैठे होते हैं या फिर व्हाट्सएप ग्रुप पर किसी काम की चर्चा शुरू कर रहे होते हैं। ये लोग सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं बनते बल्कि भीड़ को रास्ता दिखाते हैं।

सोचिये आपके ऑफिस में एक ऐसा बंदा जरूर होगा जिसे कैंटीन के खाने से लेकर कंपनी की नई पॉलिसी तक सब कुछ पता होता है। लोग उसे इन्फॉर्मेशन का गूगल कहते हैं। क्यों। क्योंकि वो एक्टिव है। वो लोगों से मिलता है और उनसे बात करता है। हमारे समाज में भी कुछ ऐसे ही लोग होते हैं जिन्हें हम कनेक्टर्स कह सकते हैं। ये वो लोग हैं जो जानते हैं कि प्लम्बर कहाँ मिलेगा और लाइफ का सबसे अच्छा इन्वेस्टमेंट कहाँ होगा। इनकी असली पावर पैसा नहीं बल्कि इनका नेटवर्क है। अगर आप सोचते हैं कि घर में बैठकर सिर्फ किताबें पढ़कर आप दुनिया बदल देंगे तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। असली इन्फ्लुएंस तो लोगों के बीच जाकर उनके सुख दुख में शामिल होने से आता है।

ये इन्फ्लुएंशियल लोग असल में क्यूरियस होते हैं। इनका दिमाग हर वक्त एक जासूस की तरह काम करता है। ये टीवी पर ऐड देखते हैं तो सिर्फ मजे के लिए नहीं बल्कि यह समझने के लिए कि दुनिया किस तरफ जा रही है। इनका इंगेजमेंट इतना गहरा होता है कि लोग इन्हें एक्सपर्ट मानने लगते हैं। अब देखिये ना आपके ग्रुप में वो एक दोस्त जरूर होगा जिसे गाड़ियों का बहुत शौक होगा। उसे शायद कंपनी ने कोई मेडल नहीं दिया पर जब भी किसी को कार लेनी होती है तो वो उसी को फोन मिलाता है। क्यों। क्योंकि उसने खुद को उस फील्ड में इतना इंगेज कर लिया है कि उसकी राय अब पत्थर की लकीर बन गई है। इसे ही कहते हैं बिना सैलरी वाली अथॉरिटी।

लेकिन यहाँ एक पेंच है। एक्टिव होने का मतलब यह नहीं कि आप हर जगह बिना बुलाए मेहमान की तरह घुस जाएँ। इन्फ्लुएंशियल्स बहुत ही सेलेक्टिव होते हैं। वे जानते हैं कि कहाँ अपनी एनर्जी लगानी है और कहाँ चुप रहना है। उनकी पर्सनालिटी में एक गजब का कॉन्फिडेंस होता है जो लोगों को अपनी तरफ खींचता है। वो सिर्फ ज्ञान नहीं देते बल्कि एक भरोसा देते हैं। इंडिया में तो यह और भी जरूरी है। यहाँ हम ब्रांड्स पर बाद में भरोसा करते हैं पहले उस बंदे पर करते हैं जो उस ब्रांड की तारीफ कर रहा है। अगर आपके पड़ोस वाली चाची ने कह दिया कि ये वाशिंग मशीन बेकार है तो समझो उस कंपनी की तो लग गई। चाहे वो कंपनी करोड़ों के विज्ञापन क्यों न दिखा दे।

तो लेसन साफ़ है कि अगर आप दुनिया पर असर डालना चाहते हैं तो आपको अपने सोफे से उठना होगा। आपको लोगों से जुड़ना होगा और अपनी बात को वजन देना होगा। ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है बस दूसरों की लाइफ में वैल्यू ऐड करने का नाम है। क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सिर्फ दूसरों के स्टेटस देखते हैं। या फिर आप वो हैं जिनका स्टेटस देखने के लिए लोग सुबह से इंतजार करते हैं। याद रखिये कि असली इन्फ्लुएंस का रास्ता सोशल मीडिया के कमेंट्स से नहीं बल्कि लोगों के दिल और दिमाग में जगह बनाने से शुरू होता है। आप जितना ज्यादा दुनिया में इंगेज होंगे दुनिया उतना ही ज्यादा आपसे इंगेज होगी।


लेसन ३ : वर्ड ऑफ माउथ - विज्ञापनों की छुट्टी और भरोसे की जीत

अभी तक आपने समझा कि दस में से एक बंदा कौन है और वो इतना एक्टिव क्यों रहता है। लेकिन अब सवाल यह है कि ये लोग असल में मार्केट और समाज को कैसे हिलाते हैं। इसका सीधा सा जवाब है वर्ड ऑफ माउथ। यानी एक के मुंह से निकली बात जो जंगल की आग की तरह फैलती है। एड केलर और जॉन बेरी कहते हैं कि दुनिया की बड़ी से बड़ी कंपनियां अरबों रुपये विज्ञापनों पर फूंक देती हैं पर एंड में जीत उसी की होती है जिसे एक इन्फ्लुएंशियल शख्स रिकमेंड करता है। आप खुद सोचिये कि आपने आखिरी बार कोई महंगी चीज कब टीवी का विज्ञापन देखकर खरीदी थी। शायद कभी नहीं। आपने वो फोन या गाड़ी इसलिए ली क्योंकि आपके उस 'ज्ञानी' दोस्त ने उसकी तारीफ की थी।

इन्फ्लुएंशियल्स असल में 'फिल्टर' का काम करते हैं। आज के दौर में जानकारी का कचरा हर जगह फैला है। हर ऐप और हर वेबसाइट आपको कुछ न कुछ बेचने की कोशिश कर रही है। ऐसे में आम आदमी का दिमाग चकरा जाता है। तब वो मुड़कर देखता है उस दस परसेंट वाले बंदे की तरफ। वो शख्स उस कचरे में से काम की चीज निकालता है और कहता है कि भाई ये वाला ट्राई कर। और बस मार्केट में भूचाल आ जाता है। ये लोग किसी भी ब्रांड के लिए सबसे बड़े एसेट या सबसे बड़े दुश्मन हो सकते हैं। अगर इन दस परसेंट लोगों ने आपके प्रोडक्ट को रिजेक्ट कर दिया तो समझो आपकी दुकान बंद। चाहे आप सुपरस्टार्स से एड्स करवा लो या सड़कों पर पोस्टर चिपकवा लो। जनता तो अपने उस भरोसेमंद लीडर की ही सुनेगी।

मजेदार बात यह है कि ये वर्ड ऑफ माउथ मार्केटिंग फ्री होती है पर इसकी कीमत सबसे ज्यादा है। हमारे इंडिया में तो यह 'भरोसे' का धंधा है। यहाँ जब कोई डॉक्टर या सीए फेमस होता है तो वो अपनी होर्डिंग्स की वजह से नहीं बल्कि लोगों की सिफारिश की वजह से होता है। "अरे भाई उन डॉक्टर साहब के पास जाओ उनके हाथ में जादू है" - ये एक लाइन किसी भी मार्केटिंग एजेंसी के करोड़ों के बजट से ज्यादा भारी है। इन्फ्लुएंशियल्स की यही ताकत उन्हें समाज का अघोषित राजा बनाती है। वे सिर्फ सामान नहीं बिकवाते बल्कि वे चुनाव जितवाते हैं और विचारधाराएं बदलते हैं। वे जानते हैं कि लोगों का दिल कैसे जीतना है और उनकी जुबान पर अपनी बात कैसे चढ़ानी है।

अगर आप इस लेवल पर पहुंचना चाहते हैं तो आपको अपनी 'क्रेडिबिलिटी' यानी साख पर काम करना होगा। इन्फ्लुएंशियल लोग कभी झूठ नहीं बोलते क्योंकि उन्हें पता है कि उनका असली पावर उनका सच है। एक बार भरोसा टूटा तो वो दस परसेंट क्लब से बाहर होकर फिर से उन नौ परसेंट की भीड़ में मिल जाएंगे जो सिर्फ दूसरों की बातें दोहराते हैं। वे बहुत सोच समझकर अपनी राय देते हैं। उनकी राय में वजन होता है क्योंकि उसमें रिसर्च और एक्सपीरियंस का तड़का लगा होता है। वे जानते हैं कि कब चुप रहना है और कब धमाका करना है। उनकी चुप्पी भी कभी कभी बहुत कुछ कह जाती है।


तो दोस्तों, पूरी बात का सार यही है कि चाहे आप बिजनेस कर रहे हों या अपनी लाइफ में ग्रोथ चाहते हों आपको इन इन्फ्लुएंशियल्स के साइकोलॉजी को समझना ही होगा। या तो आप उनका हिस्सा बनिए या फिर उनके जरिए अपनी बात पहुंचाना सीखिए। भीड़ का हिस्सा बनकर रहना बहुत आसान है पर उस भीड़ को लीड करना असली चैलेंज है। क्या आप तैयार हैं अपनी बातों में वो वजन लाने के लिए। क्या आप तैयार हैं एक ऐसा इंसान बनने के लिए जिसकी सलाह के लिए लोग लाइन लगाकर खड़े हों। याद रखिये कि दुनिया के शोर में सिर्फ उसी की आवाज सुनी जाती है जिसकी बातों में सच्चाई और इरादों में दम होता है।

उठिए और अपनी पहचान बनाइये। उन दस परसेंट लोगों में शामिल होइये जो दुनिया को बेहतर बना रहे हैं और दूसरों की जिंदगी में बदलाव ला रहे हैं। आपकी एक सही सलाह किसी की जिंदगी बदल सकती है। तो फिर देर किस बात की। आज से ही अपनी नॉलेज बढ़ाना और लोगों से सच्चे दिल से जुड़ना शुरू कीजिये।

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