अगर आपको लगता है कि आपकी लाइफ के सारे खराब डिसीजन सिर्फ आपकी फूटी किस्मत का नतीजा हैं तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी के खुद जिम्मेदार हैं। दुनिया शतरंज खेल रही है और आप अभी भी लूडो वाली बुद्धि लेकर बैठे हैं। बिना गेम थ्योरी के आप बस दूसरों की चालों का शिकार बन रहे हैं।
लेकिन फिक्र मत कीजिये क्योंकि आज हम द आर्ट ऑफ स्ट्रेटजी बुक से गेम थ्योरी के वो धाकड़ सीक्रेट्स खोलेंगे जो आपकी सोच और लाइफ दोनों बदल देंगे। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपको विनर बनाएंगे।
लेसन १ : बैकवर्ड रीजनिंग यानी अंत से शुरुआत करना
सुनिए जनाब लाइफ कोई बॉलीवुड मूवी नहीं है जहाँ हीरो बस आँखें बंद करके चलता है और किस्मत उसे मंजिल तक पहुँचा देती है। असल जिंदगी में अगर आप बिना सोचे समझे कदम बढ़ा रहे हैं तो आप असल में गढ्ढे की तरफ भाग रहे हैं। द आर्ट ऑफ स्ट्रेटजी हमें सबसे पहला और सबसे कीमती लेसन सिखाती है बैकवर्ड रीजनिंग। इसका सीधा मतलब है कि पहले अपना फाइनल गोल फिक्स करो और फिर वहां से पीछे की तरफ मुड़कर देखो कि वहां तक पहुँचने के लिए आज आपको क्या करना होगा। लोग अक्सर गलती क्या करते हैं। वो बस आज का सोचते हैं। जैसे ऑफिस का वो कलीग जिसे लगता है कि आज बॉस की बुराई करके उसे बहुत सुकून मिलेगा। पर भाई साहब ने यह नहीं सोचा कि दो महीने बाद जब प्रमोशन की बात आएगी तब बॉस वही पुरानी बातें याद करके आपकी फाइल डस्टबिन में डाल देगा।
मान लीजिये आप किसी लड़की या लड़के को डेट पर ले जाना चाहते हैं। अब एक तरीका तो यह है कि आप सीधे जाकर आई लव यू बोल दें और थप्पड़ या रिजेक्शन खाकर वापस आ जाएँ। यह है फॉरवर्ड थिंकिंग यानी बिना अंजाम सोचे कूद पड़ना। अब जरा गेम थ्योरी लगाइये और बैकवर्ड रीजनिंग का इस्तेमाल कीजिये। आपका फाइनल गोल है एक सक्सेसफुल डेट। अब पीछे आइये। डेट पर जाने के लिए सामने वाले का आप पर भरोसा होना जरूरी है। भरोसा तब होगा जब आपकी बातचीत अच्छी होगी। बातचीत तब शुरू होगी जब आप एक अच्छे दोस्त बनेंगे। तो गेम थ्योरी कहती है कि आज आपको आई लव यू नहीं बल्कि एक अच्छा सा हेलो बोलना है। देखा कितना सिंपल है।
बिजनेस में भी यही होता है। मान लीजिये आप एक नया स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। अगर आप सिर्फ आज के प्रॉफिट के बारे में सोचेंगे तो आप शायद सड़े हुए प्रोडक्ट बेचकर एक बार तो पैसे कमा लेंगे पर लॉन्ग टर्म में आपकी दुकान बंद होना तय है। स्मार्ट प्लेयर वो है जो सोचता है कि पांच साल बाद मेरी कंपनी कहाँ होगी। अगर उसे एक बड़ा ब्रांड बनना है तो उसे आज कस्टमर का दिल जीतना होगा चाहे आज थोड़ा नुकसान ही क्यों न उठाना पड़े। यह वही बात है जैसे चेस के खेल में अपनी रानी बचाने के चक्कर में लोग अक्सर चेकमेट हो जाते हैं। असली खिलाड़ी वो है जो जानता है कि कभी कभी जीतने के लिए बड़े मोहरे कुर्बान करने पड़ते हैं।
ज्यादातर लोग अपनी लाइफ में बस सर्वाइवल मोड में जी रहे हैं। सुबह उठते हैं ऑफिस जाते हैं और शाम को थककर सो जाते हैं। उनसे पूछो कि भाई अगले दो साल का क्या प्लान है तो वो ऐसे देखते हैं जैसे आपने उनसे उनकी किडनी मांग ली हो। बिना बैकवर्ड रीजनिंग के आप बस एक ऐसी बस में बैठे हैं जिसका ड्राइवर अंधा है। गेम थ्योरी आपको वो चश्मा देती है जिससे आप भविष्य के धुंधलेपन को साफ देख सकते हैं। जब आप अंत से सोचना शुरू करते हैं तो रास्ते की रुकावटें डरावनी नहीं बल्कि एक पहेली जैसी लगने लगती हैं जिन्हें आप आसानी से सुलझा सकते हैं। तो अगली बार जब कोई बड़ा फैसला लेना हो तो खुद से पूछिये कि क्या मेरा यह कदम मुझे मेरे दस साल पुराने वर्जन के सामने शर्मिंदा तो नहीं करेगा।
लेसन २ : प्रिजनर्स डिलेमा और कोओपरेशन का असली खेल
अब बात करते हैं उस सिचुएशन की जहाँ अक्सर लोग रायता फैला देते हैं। गेम थ्योरी में एक बहुत ही फेमस कॉन्सेप्ट है जिसे प्रिजनर्स डिलेमा कहते हैं। आसान भाषा में कहें तो यह वो मोमेंट है जब आपको चुनना होता है कि आप सिर्फ अपना भला चाहेंगे या सामने वाले के साथ मिलकर दोनों का फायदा करेंगे। अक्सर हमारे अंदर का स्वार्थी इंसान चीख चीख कर कहता है कि भाई अपना देख बाकी सब भाड़ में जाएँ। लेकिन आर्ट ऑफ स्ट्रेटजी हमें बताती है कि जो लोग सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं वो असल में लॉन्ग टर्म में अपनी कब्र खुद खोद रहे होते हैं। जिंदगी कोई वन डे मैच नहीं है यह एक टेस्ट सीरीज है जहाँ आपको बार बार उन्हीं लोगों के साथ खेलना पड़ता है।
मान लीजिये आप और आपका पड़ोसी दोनों अपनी अपनी कार बेचना चाहते हैं। अब अगर आप दोनों आपस में सेटिंग कर लें कि हम दोनों ही अपनी गाड़ी की कीमत कम नहीं करेंगे तो आप दोनों को अच्छा खासा पैसा मिल सकता है। लेकिन तभी आपके अंदर का छोटा शकीला जाग जाता है। आप सोचते हैं कि अगर मैं चुपके से कीमत थोड़ी कम कर दूँ तो मेरी गाड़ी पहले बिक जाएगी और पड़ोसी हाथ मलता रह जाएगा। उधर पड़ोसी भी यही घटिया सोच लेकर बैठा है। नतीजा क्या होता है। आप दोनों अपनी अपनी गाड़ियों की कीमत इतनी गिरा देते हैं कि अंत में आप दोनों को ही भारी नुकसान होता है। इसे कहते हैं अपनी कुल्हाड़ी पर खुद पैर मारना। अगर आप दोनों ने एक दूसरे पर भरोसा किया होता और कोओपरेट किया होता तो आज आप दोनों ही पार्टी कर रहे होते।
यही हाल ऑफिस की पॉलिटिक्स का भी है। कुछ लोग होते हैं जो सोचते हैं कि अगर वो अपने टीम मेट की बुराई बॉस के सामने करेंगे तो वो स्टार बन जाएंगे। उन्हें लगता है कि यह एक मास्टर स्ट्रोक है। पर भाई साहब असल में यह एक सुसाइड मिशन है। एक बार जब आपकी टीम को पता चल जाता है कि आप एक नंबर के धोखेबाज हैं तो वो आपके लिए गड्डा खोदना शुरू कर देते हैं। गेम थ्योरी हमें सिखाती है कि टिट फॉर टैट यानी जैसे को तैसा वाली स्ट्रेटजी सबसे बेस्ट है। पहले सामने वाले पर भरोसा करो और मिलकर काम करो। लेकिन अगर वो आपको डसने की कोशिश करे तो उसे उसकी औकात दिखाने में भी पीछे मत हटो। पर याद रहे शुरुआत हमेशा दोस्ती और कोओपरेशन से होनी चाहिए क्योंकि अकेले जंग जीतना सिर्फ फिल्मों में अच्छा लगता है असल जिंदगी में आपको सपोर्ट सिस्टम चाहिए होता है।
आजकल के कॉम्पिटिशन वाले दौर में लोग भूल गए हैं कि कभी कभी दूसरों को जिताने में ही आपकी असली जीत छुपी होती है। अगर आप एक दुकानदार हैं और आप सिर्फ कस्टमर को लूटने का सोचेंगे तो आप एक बार तो अमीर बन जाएंगे पर दोबारा वो कस्टमर आपकी शक्ल भी नहीं देखना चाहेगा। वहीँ अगर आप ईमानदारी दिखाते हैं तो वो कस्टमर आपके पास बार बार आएगा। यह कोई नैतिकता का पाठ नहीं है यह शुद्ध गेम थ्योरी है। कोओपरेशन का मतलब यह नहीं है कि आप महात्मा बन जाएँ इसका मतलब यह है कि आप इतने स्मार्ट बन जाएँ कि आप समझ सकें कि मिलकर शिकार करना अकेले भूखे मरने से कहीं ज्यादा बेहतर है। तो अगली बार जब किसी को धोखा देने का मन करे तो याद रखियेगा कि गेम अभी बाकी है मेरे दोस्त।
लेसन ३ : मिक्सड स्ट्रेटजी यानी अपनी चालों को अनप्रिडिक्टेबल रखना
अगर आप अपनी लाइफ में एक खुली किताब की तरह हैं जिसे कोई भी पढ़ सकता है तो यकीन मानिए आप बहुत जल्दी रद्दी के भाव बिकने वाले हैं। गेम थ्योरी का एक बहुत ही कूल हिस्सा है जिसे कहते हैं मिक्सड स्ट्रेटजी। इसका मतलब है कि कभी भी अपनी चालों का एक पैटर्न मत बनने दीजिये। अगर सबको पता है कि आप अगली बॉल यॉर्कर ही डालेंगे तो बच्चा भी उस पर छक्का मार देगा। जिंदगी के मैदान में अगर आप विनर बनना चाहते हैं तो आपको थोडा सा टेढ़ा बनना पड़ेगा। लोग आपको प्रिडिक्ट न कर पाएं यही आपकी सबसे बड़ी ताकत है। जो लोग हमेशा एक जैसा व्यवहार करते हैं दुनिया उन्हें ग्रांटेड लेने लगती है और फिर शुरू होता है उनके इस्तेमाल होने का सिलसिला।
मान लीजिये आपकी एक दुकान है और आप हर रविवार को डिस्काउंट देते हैं। शुरू में तो भीड़ आएगी पर धीरे धीरे लोग समझ जाएंगे कि भाई संडे को ही जाना है। बाकी छह दिन आपकी दुकान पर मक्खियाँ भिनभिनाएंगी। स्मार्ट दुकानदार क्या करता है। वो कभी मंगलवार को सेल लगाता है तो कभी अचानक शुक्रवार को बम्पर ऑफर निकाल देता है। कस्टमर को पता ही नहीं होता कि अगला धमाका कब होगा इसलिए वो आपकी दुकान पर नजर बनाए रखता है। यही हाल रिश्तों का भी है। अगर आप अपने पार्टनर या दोस्तों के लिए हर वक्त अवेलेबल रहेंगे तो आपकी वैल्यू उस फ्री वाले धनिया जैसी हो जाएगी जो सब्जी के साथ मुफ्त मिलता है। कभी कभी गायब होना भी जरूरी है ताकि लोगों को आपकी कमी का एहसास हो। इसे गेम थ्योरी में रैंडमाइजेशन कहते हैं।
मान लीजिये आप ऑफिस में बहुत मेहनती हैं और हर रोज रात को ९ बजे तक काम करते हैं। धीरे धीरे आपके बॉस को इसकी आदत हो जाएगी। एक दिन अगर आप ६ बजे घर जाने की सोचेंगे तो बॉस आपको ऐसे देखेगा जैसे आपने उसका बंगला अपने नाम करवा लिया हो। वहीं अगर आप कभी जल्दी जाते हैं कभी देर तक रुकते हैं और कभी अचानक कोई बड़ा प्रोजेक्ट खत्म कर देते हैं तो आपकी वैल्यू बनी रहती है। लोग आपकी मेहनत को आपकी मजबूरी नहीं बल्कि आपका चॉइस समझने लगते हैं। मिक्सड स्ट्रेटजी का मतलब झूठ बोलना या धोखा देना नहीं है बल्कि अपनी प्रिडिक्टेबिलिटी को कम करना है ताकि कोई आपका फायदा न उठा सके।
बिजनेस में भी बड़े प्लेयर्स यही करते हैं। एप्पल कभी नहीं बताता कि उसका अगला आईफोन कैसा होगा। वो सस्पेंस बनाकर रखते हैं। अगर वो साल की शुरुआत में ही सब बता दें तो साल के अंत तक हाइप खत्म हो जाएगी। गेम थ्योरी हमें सिखाती है कि जब आप अनप्रिडिक्टेबल होते हैं तो आपके कॉम्पिटिटर हमेशा डिफेंसिव मोड में रहते हैं। उन्हें डर रहता है कि पता नहीं आप अगला कदम क्या उठाएंगे। यही डर आपको पावर देता है। तो अपनी लाइफ में थोडा सस्पेंस लाइए। अपनी अगली चाल का ढिंढोरा पीटने की बजाय उसे एक सरप्राइज की तरह पेश कीजिये। याद रखिये शतरंज में वही खिलाड़ी मात खाता है जिसकी अगली चाल सामने वाले को पहले से पता होती है।
तो दोस्तों, गेम थ्योरी सिर्फ बड़ी बड़ी कंपनियों के लिए नहीं बल्कि आपके और हमारे जैसे आम लोगों के लिए भी है। अगर आप भी दूसरों की चालों का मोहरा बनकर थक चुके हैं तो आज ही अपनी स्ट्रेटजी बदलिए। लाइफ के इस खेल में खिलाड़ी बनिए दर्शक नहीं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा गलत डिसीजन लेता है और नीचे कमेंट में बताइये कि आप अपनी लाइफ में कौन सा लेसन आज से ही लागू करने वाले हैं।
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