क्या आप भी उसी चूहा दौड़ में फंसे हैं जहाँ हर महीने सैलरी का इंतज़ार करना पड़ता है? मुबारक हो! आप अपनी जिंदगी का कीमती समय और असली आजादी दोनों ही खो रहे हैं। जबकि स्मार्ट लोग सोते हुए भी पैसा छाप रहे हैं और आप बस गधों की तरह मेहनत करके थक रहे हैं। सच तो यह है कि बिना सही कैशफ्लो नॉलेज के आप कभी अमीर नहीं बन पाएंगे। चलिए जानते हैं कैसे द कैशफ्लो क्वाड्रेंट आपकी इस तंगहाली को खत्म करके आपको फाइनेंशियल फ्रीडम दिला सकता है। नीचे दिए गए ३ लेसन्स आपकी सोच बदल देंगे।
Lesson : दुनिया के चार कमरे और आपका सही पता
क्या आपने कभी सोचा है कि एक डॉक्टर जो दिन में २० ऑपरेशन करता है और एक किराना स्टोर चलाने वाले शर्मा जी में क्या समानता है। जवाब है कि दोनों ही अपनी गर्दन के नीचे वाले हिस्से से मेहनत कर रहे हैं और जिस दिन काम बंद उस दिन जेब खाली। रॉबर्ट कियोसाकी कहते हैं कि पैसा कमाने के मामले में दुनिया चार कमरों में बंटी है। ई यानी एम्प्लॉई, एस यानी सेल्फ एम्प्लॉई, बी यानी बिजनेस ओनर और आई यानी इन्वेस्टर। अब मजे की बात देखिए कि दुनिया के ९५ परसेंट लोग ई और एस वाले कमरों में ठुंसे हुए हैं। यहाँ लोग अपनी जिंदगी का सबसे कीमती एसेट यानी अपना समय बेचकर पैसा कमाते हैं।
सोचिए आप एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। बहुत बड़ी कंपनी में काम करते हैं और बढ़िया पैकेज है। लेकिन असलियत में आप एक एम्प्लॉई यानी ई क्वाड्रेंट के कैदी हैं। अगर आप कल ऑफिस न जाएं तो बॉस आपको सैलरी नहीं देगा। यहाँ आप दूसरे के सपने पूरे करने के लिए अपनी नींद कुर्बान कर रहे हैं। अब आते हैं हमारे शर्मा जी जो अपनी दुकान के मालिक हैं। वो सोचते हैं कि वो खुद के बॉस हैं। लेकिन भाई साहब सच तो यह है कि दुकान उनकी मालिक है। अगर वो दो दिन के लिए छुट्टी पर चले जाएं तो कस्टमर पड़ोस वाली दुकान पर चला जाएगा। इसे कहते हैं सेल्फ एम्प्लॉयड यानी एस क्वाड्रेंट। यहाँ आप खुद के लिए एक नौकरी पैदा करते हैं और उस नौकरी के सबसे बड़े गुलाम आप खुद ही होते हैं।
अब जरा उस ५ परसेंट आबादी की तरफ देखिए जो बी और आई क्वाड्रेंट में राज कर रहे हैं। ये लोग जानते हैं कि अकेले मेहनत करके कोई कभी अंबानी नहीं बना। बी क्वाड्रेंट वाले लोग सिस्टम बनाते हैं। वो लोगों को काम पर रखते हैं ताकि जब वो सो रहे हों तब भी उनका काम चलता रहे। जैसे धीरूभाई अंबानी ने किया। उन्होंने एक ऐसा जाल बुना जहाँ हजारों लोग उनके लिए काम करते हैं। अगर वो साल भर की छुट्टी पर भी चले जाएं तो भी उनकी तिजोरी में पैसे गिरना बंद नहीं होंगे। और सबसे टॉप पर आते हैं आई यानी इन्वेस्टर। ये वो लोग हैं जो पैसे से पैसा बनवाते हैं। इनका पैसा इनके लिए २४ घंटे मजदूरी करता है बिना किसी चाय ब्रेक के।
ज्यादातर लोग पूरी जिंदगी ई और एस क्वाड्रेंट में घिसते रह जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां सिक्योरिटी है। अरे भाई साहब कैसी सिक्योरिटी। वहां तो एक ई-मेल और आपकी नौकरी गायब। असली सिक्योरिटी तो राइट साइड यानी बी और आई में है जहाँ आपके पास समय और पैसा दोनों होता है। अगर आप आज भी लेफ्ट साइड में खड़े होकर अमीर बनने का सपना देख रहे हैं तो आप वही गलती कर रहे हैं जो एक मछली पेड़ पर चढ़ने की कोशिश में करती है। आपको अपनी लोकेशन बदलनी होगी। आपको उस तरफ जाना होगा जहाँ पैसा आपके पीछे भागे न कि आप पैसे के पीछे।
यह बदलाव रातों-रात नहीं होगा लेकिन अपनी सोच का चश्मा बदलना सबसे पहला कदम है। आप चाहे आज जो भी कर रहे हों आपको यह समझना होगा कि असली आजादी उस सिस्टम में है जो आपके बिना भी चले। क्या आप तैयार हैं अपने इस पुराने कमरे को छोड़कर अमीरों वाले बंगले में शिफ्ट होने के लिए। क्योंकि भाई साहब वक्त तो वैसे भी गुजर रहा है बस यह तय आपको करना है कि आप किसी और के लिए गधे की तरह काम करना चाहते हैं या खुद के लिए एक साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं।
Lesson : चूहा दौड़ बनाम पैसों की खेती
क्या आपने कभी किसी ऐसे इंसान को देखा है जो दिन में १८ घंटे काम करता है, बहुत सारा पैसा भी कमाता है, लेकिन उसके पास अपनी फैमिली के साथ एक कप चाय पीने का भी वक्त नहीं है? इसे कहते हैं अमीर दिखने वाला मजदूर। रॉबर्ट कियोसाकी हमें समझाते हैं कि असली दौलत वह नहीं है जो आप हर महीने सैलरी या फीस के रूप में कमाते हैं, बल्कि असली दौलत वह है जो तब भी आपके पास आए जब आप सो रहे हों या छुट्टियां मना रहे हों। इसे ही हम पैसिव इनकम कहते हैं। एक्टिव इनकम का मतलब है कि आप अपनी लाइफ का टाइम और एनर्जी सीधे पैसों के लिए एक्सचेंज कर रहे हैं। जिस दिन आपकी एनर्जी खत्म या टाइम खत्म, उसी दिन आपकी इनकम भी जीरो।
सोचिए एक गांव में दो लड़के हैं। एक लड़का रोज नदी से बाल्टी भर-भर कर पानी लाता है और गांव वालों को बेचता है। वह जितनी ज्यादा बाल्टियां लाएगा, उतना ज्यादा पैसा कमाएगा। यह है एक्टिव इनकम। अब दूसरा लड़का भी शुरू में बाल्टी ही उठाता है, लेकिन वह अपने खाली समय में एक पाइपलाइन बिछाने लगता है। गांव वाले उसका मजाक उड़ाते हैं कि भाई तू फालतू में खुदाई क्यों कर रहा है? लेकिन एक साल बाद जब पाइपलाइन तैयार हो जाती है, तो वह लड़का बस नल खोलता है और पानी अपने आप बहने लगता है। अब वह सो रहा हो या खा रहा हो, उसे पैसा मिल रहा है। इसे कहते हैं पैसिव इनकम का जादू।
ज्यादातर मिडिल क्लास लोग बाल्टी उठाने वाले ही होते हैं। वो अपनी डिग्री और मेहनत का इस्तेमाल करके अपनी बाल्टी का साइज बड़ा करने की कोशिश करते हैं। पहले ५ हजार की बाल्टी, फिर ५० हजार की और फिर ५ लाख की। लेकिन भाई साहब, बाल्टी चाहे कितनी भी बड़ी हो, उसे उठाना तो आपको ही पड़ेगा ना? अगर आपका कंधा झुक गया या आप बीमार पड़ गए, तो पानी आना बंद। कैशफ्लो क्वाड्रेंट हमें सिखाता है कि आपको बाल्टियां ढोना छोड़कर पाइपलाइन बिछाने पर ध्यान देना चाहिए। यह पाइपलाइन आपके बिजनेस सिस्टम हो सकते हैं, रेंटल प्रॉपर्टी हो सकती है या फिर शेयर मार्केट के अच्छे डिविडेंड्स।
हैरानी की बात यह है कि लोग पैसिव इनकम बनाने के नाम पर डर जाते हैं। वो कहते हैं कि इसमें तो बहुत टाइम और पैसा लगेगा। अरे भाई, ३० साल तक किसी और की कंपनी में अपनी हड्डियां घिसने के लिए आपके पास टाइम है, लेकिन खुद के लिए ५ साल सिस्टम बनाने के लिए टाइम नहीं है? यह तो वही बात हुई कि आप एक ऐसे छेद वाली नाव में बैठे हैं जिसे आप चला तो रहे हैं पर पानी बाहर निकालने के लिए रुकना नहीं चाहते क्योंकि आप बहुत बिजी हैं। मजे की बात तो यह है कि जब तक आप पैसिव इनकम का सोर्स नहीं बनाते, तब तक आप आजाद नहीं हैं, बस एक बहुत अच्छे और महंगे गुलाम हैं।
असली मजा तब है जब आपका पैसा आपके लिए काम करे। सोचिए आपका बैंक बैलेंस हर सुबह पिछले दिन से ज्यादा हो, बिना आपके ऑफिस गए। यह कोई जादू नहीं है, यह सिर्फ राइट साइड वाले क्वाड्रेंट (बी और आई) की पावर है। अमीर लोग कभी भी पैसों के लिए काम नहीं करते, वो एसेट्स बनाने के लिए काम करते हैं। एसेट मतलब वह चीज जो आपकी जेब में पैसा डाले, और लायबिलिटी मतलब वह जो आपकी जेब से पैसा निकाले। आपकी महंगी गाड़ी जिसे आप रूतबा दिखाने के लिए लाए हैं, वो आपकी जेब से पेट्रोल और मेंटेनेंस के नाम पर पैसा निकाल रही है, वह एसेट नहीं है।
अगर आप आज भी अपनी बाल्टी के साइज पर ही गर्व कर रहे हैं, तो रुकिए और सोचिए कि अगर कल बाल्टी टूट गई तो क्या होगा? पाइपलाइन बिछाना शुरू कीजिए, चाहे वो छोटी ही क्यों न हो। शुरुआत में मेहनत लगेगी, शायद लोग हंसेंगे भी, लेकिन जब आपका नल चलने लगेगा, तब वही लोग आपसे पूछेंगे कि भाई तूने यह किया कैसे? याद रखिए, एक्टिव इनकम से आप अपना घर चला सकते हैं, लेकिन पैसिव इनकम से आप अपना साम्राज्य खड़ा कर सकते हैं। अब फैसला आपका है कि आपको जिंदगी भर बाल्टी ढोनी है या एक बार मेहनत करके पाइपलाइन सेट करनी है।
Lesson : रिस्क का असली खेल और दिमाग की तिजोरी
क्या आपको भी बचपन से यही सिखाया गया है कि बेटा खूब पढ़ो, अच्छी डिग्री लो और एक सुरक्षित नौकरी ढूंढ लो? अगर हां, तो मुबारक हो, आपको दुनिया के सबसे बड़े झूठ का हिस्सा बनाया गया है। रॉबर्ट कियोसाकी कहते हैं कि आज के दौर में सबसे बड़ा रिस्क वह है जो कोई रिस्क ही नहीं ले रहा। लोग कहते हैं कि स्टॉक मार्केट में पैसा लगाना रिस्क है, खुद का बिजनेस शुरू करना रिस्क है। लेकिन भाई साहब, एक ही कंपनी के भरोसे अपनी पूरी जिंदगी और ईएमआई छोड़ देना क्या रिस्क नहीं है? अगर कल आपके बॉस का मूड खराब हो गया और उसने आपको पिंक स्लिप थमा दी, तो उस रिस्क का क्या?
असली फर्क रिस्क में नहीं, बल्कि आपकी फाइनेंशियल एजुकेशन में है। सोचिए आपको गाड़ी चलानी नहीं आती और आप फॉर्मूला वन रेस में घुस जाएं, तो एक्सीडेंट तो पक्का है ना? अब आप चिल्लाएंगे कि रेसिंग बहुत रिस्की है। लेकिन एक प्रोफेशनल ड्राइवर के लिए वही रेस उसका रोज का काम है। वैसे ही, पैसा कमाना भी एक हुनर है जो स्कूल में कभी नहीं सिखाया जाता। स्कूल हमें एक अच्छा नौकर बनना सिखाते हैं, एक अच्छा मालिक नहीं। अमीर लोग अपने दिमाग की तिजोरी को भरने में सबसे ज्यादा पैसा खर्च करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अगर जेब खाली भी हो गई, तो उनका दिमाग उन्हें वापस करोड़पति बना देगा।
ज्यादातर लोग डर के मारे राइट साइड वाले क्वाड्रेंट्स (बी और आई) में कदम ही नहीं रखते। वो कहते हैं कि वहां पैसा डूब गया तो? अरे भाई, आपने जो २० साल पढ़ाई में लगाए और लाखों की फीस भरी, क्या वहां से आपको अमीर बनने की गारंटी मिली? नहीं ना? वहां तो बस एक सर्टिफिकेट मिला जो आपको किसी और के केबिन के बाहर लाइन में खड़ा कर देता है। असली पढ़ाई तो तब शुरू होती है जब आप कैशफ्लो, एसेट्स, लायबिलिटीज और टैक्स के खेल को समझते हैं। जब आप अपनी सैलरी का एक हिस्सा खुद को पे करते हैं और उसे ऐसी जगह लगाते हैं जहाँ से वह बढ़कर वापस आए।
मजे की बात देखिए, मिडिल क्लास इंसान हमेशा सुरक्षित खेलता है और अंत में सबसे ज्यादा असुरक्षित हो जाता है। वह सेविंग्स अकाउंट में पैसा रखता है जिसे महंगाई हर साल खा जाती है। वहीं अमीर इंसान जानता है कि पैसा बचाना नहीं, बल्कि पैसे को काम पर लगाना असली समझदारी है। वह अपनी गलतियों से सीखता है और उसे इन्वेस्टमेंट मानता है, जबकि आम आदमी एक छोटी सी हार से डरकर वापस अपनी गुफा में छिप जाता है। डर सबको लगता है भाई साहब, गला सबका सूखता है, लेकिन जो उस डर को फाइनेंशियल नॉलेज से जीत लेता है, वही असली बाजीगर कहलाता है।
क्या आप अभी भी उसी पुरानी किताब के पन्ने पलट रहे हैं जो कहती है कि मेहनत करो और रिटायरमेंट का इंतज़ार करो? ६० की उम्र में जाकर दुनिया घूमने का क्या मजा जब आपके घुटने ही जवाब दे दें। असली आजादी तो तब है जब आप जवान हों, आपके पास एनर्जी हो और जेब में इतना पैसा कि आपको कभी प्राइस टैग न देखना पड़े। और यह तभी होगा जब आप अपने डर को टाटा-बाय-बाय कहेंगे और अपनी फाइनेंशियल साक्षरता पर काम करेंगे। याद रखिए, किस्मत के भरोसे सिर्फ सट्टेबाज बैठते हैं, एक समझदार इंसान तो अपने दिमाग के दम पर अपना रास्ता खुद बनाता है।
द कैशफ्लो क्वाड्रेंट सिर्फ एक किताब नहीं है, यह आपकी गरीबी की बेड़ियों को काटने का एक औजार है। आप आज चाहे ई हों या एस, आपका लक्ष्य हमेशा बी और आई की तरफ बढ़ने का होना चाहिए। जिंदगी छोटी है मेरे दोस्त, इसे सिर्फ बिल भरने और बॉस की चिक-चिक सुनने में जाया मत करो। उठो, सीखो और अपनी खुद की पाइपलाइन बिछाना शुरू करो।
तो अब आप मुझे कमेंट्स में बताइए, आप आज किस क्वाड्रेंट में हैं और अगले ५ साल में आप खुद को कहाँ देखना चाहते हैं? क्या आप आज ही से अपनी फाइनेंशियल आजादी की तरफ पहला कदम उठाएंगे? इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अभी भी चूहा दौड़ में फंसे हैं। शायद आपकी एक शेयरिंग किसी की जिंदगी बदल दे।
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