अभी भी पुराने तेल और गैस के स्टॉक्स में अपना पैसा और समय बर्बाद कर रहे हैं। वाह। सच में आपकी दूरदर्शिता को सलाम है। जबकि पूरी दुनिया क्लीन टेक रिवोल्यूशन से अमीर बन रही है आप शायद अपनी बैलगाड़ी के पंक्चर होने का इंतज़ार कर रहे हैं। इस सुनहरे मौके को हाथ से जाने देना आपकी सबसे बड़ी बेवकूफी होगी।
रॉन परनिक और क्लिंट वाइल्डर की यह बुक हमें बताती है कि कैसे ग्रीन एनर्जी सिर्फ पेड़ लगाने का काम नहीं बल्कि करोड़ों का बिजनेस है। चलिए समझते हैं वो ३ लेसन जो आपको इस बदलाव का राजा बना सकते हैं।
लेसन १ : क्लीन टेक कोई एनजीओ नहीं बल्कि नोट छापने की मशीन है
अगर आप आज भी यह सोचते हैं कि क्लीन टेक्नोलॉजी का मतलब सिर्फ चिलचिलाती धूप में सोलर पैनल के पास खड़े होकर फोटो खिंचवाना या किसी सोशल मीडिया चैलेंज के लिए पेड़ लगाना है तो यकीन मानिए आप नींद में चल रहे हैं। रॉन परनिक और क्लिंट वाइल्डर अपनी बुक 'द क्लीन टेक रिवोल्यूशन' में पहला और सबसे कड़वा सच यही बताते हैं कि भाई साहब यह कोई समाज सेवा का प्रोजेक्ट नहीं है। यह आने वाले समय की सबसे बड़ी नोट छापने वाली मशीन है।
इसे ऐसे समझिए जैसे ९० के दशक में लोग कंप्यूटर और इंटरनेट को सिर्फ एक खिलौना समझते थे। तब भी कुछ ज्ञानी लोग कहते थे कि भाई चिट्ठी भेजना ही असली मजा है यह ईमेल ईमेल क्या लगा रखा है। फिर क्या हुआ। जिन्होंने उस समय इंटरनेट की ताकत को समझा वो आज दुनिया के सबसे अमीर लोग हैं और जो चिट्ठियों के भरोसे बैठे थे वो आज भी पोस्ट ऑफिस के बाहर लाइन में खड़े होकर सर्वर डाउन होने का दुख मना रहे हैं। क्लीन टेक का मामला भी बिल्कुल वैसा ही है।
लेखक कहते हैं कि अब वो दौर चला गया जब ग्रीन एनर्जी महंगी होती थी और सिर्फ सरकार की सब्सिडी पर चलती थी। आज के समय में सोलर और विंड एनर्जी की कीमत इतनी कम हो गई है कि कोयले और तेल की तो हवा ही निकल गई है। आपके पड़ोस वाले अंकल जो हर महीने बिजली के बिल को देखकर ऐसे रिएक्ट करते हैं जैसे उनकी किडनी का बिल आ गया हो उन्हें भी अब समझ आने लगा है कि छत पर सोलर पैनल लगवाना कोई फैशन नहीं बल्कि पैसे बचाने की एक जबरदस्त टेक्निक है।
सोचिए जरा अगर आप एक बिजनेसमैन हैं और आप एक ऐसी टेक्नोलॉजी में पैसा लगाते हैं जो न सिर्फ कचरा कम करती है बल्कि आपकी बिजली की कॉस्ट को भी आधा कर देती है। क्या आप उसे नहीं अपनाएंगे। बिल्कुल अपनाएंगे। लेखक इसे 'एफिशिएंसी' का नाम देते हैं। आज बड़ी बड़ी कंपनियां जैसे गूगल और एप्पल अपनी पूरी ताकत क्लीन टेक में झोंक रही हैं। क्यों। क्या उन्हें अचानक से धरती माता से बहुत ज्यादा प्यार हो गया है। शायद थोड़ा बहुत हो लेकिन असल कारण है प्रॉफिट।
जब आप कम रिसोर्स में ज्यादा आउटपुट निकालते हैं तो आपका मुनाफा बढ़ता है। यही क्लीन टेक का असली जादू है। इंडिया में भी देखिए अब टाटा और रिलायंस जैसी दिग्गज कंपनियां ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के पीछे हाथ धोकर पड़ गई हैं। उन्हें पता है कि जो आज इस रिवोल्यूशन की बस में चढ़ गया वो भविष्य का अंबानी बनेगा और जो किनारे खड़ा होकर सिर्फ धुंआ उड़ाता रह गया वो इतिहास बन जाएगा।
तो अगर आप एक इन्वेस्टर हैं या अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं तो यह भूल जाइये कि आप सिर्फ दुनिया बचा रहे हैं। आप दरअसल अपनी तिजोरी भरने का सबसे सॉलिड रास्ता ढूंढ रहे हैं। लेखक साफ कहते हैं कि क्लीन टेक अब एक मैच्योर मार्केट बन चुका है। यहाँ रिस्क कम है और रिवॉर्ड बहुत ज्यादा। बस आपको अपनी नजरें उस पुराने धुएं वाले कारखाने से हटाकर नई चमकती हुई सिलिकॉन सेल वाली खिड़की पर टिकानी होंगी। वरना इतिहास गवाह है कि जो समय के साथ नहीं बदला समय ने उसे बदल कर रद्दी के भाव बेच दिया।
लेसन २ : द ६ सीज — वो ६ ताकतें जो दुनिया पलट रही हैं
अगर आपको लगता है कि क्लीन टेक का आना बस एक इत्तेफाक है, तो आप शायद उन्हीं लोगों में से हैं जो आज भी मानते हैं कि नोकिया का फोन सिर्फ इसलिए बंद हुआ क्योंकि लोगों को सांप वाला गेम पसंद आना बंद हो गया था। लेखक रॉन परनिक और क्लिंट वाइल्डर हमें ६ ऐसी ताकतों के बारे में बताते हैं जिन्हें वो 'द ६ सीज' कहते हैं। ये वो ६ विलेन या हीरो हैं जो पुराने सिस्टम की लंका लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
पहला 'सी' है कॉस्ट (Cost)। पुराने जमाने में सोलर पैनल लगाना मतलब अपनी पुश्तैनी जायदाद बेचने जैसा था। लेकिन आज। आज सोलर पैनल की कीमत इतनी गिर चुकी है कि यह आपके जिम की मेंबरशिप से भी सस्ती पड़ने लगी है। जब कोई चीज सस्ती और बेहतर होती है, तो उसे दुनिया का कोई भी बड़ा तेल माफिया नहीं रोक सकता।
दूसरा है कैपिटल (Capital)। पैसा अब धुएं वाले धंधों से भागकर चमकती हुई धूप वाली बिजली की तरफ जा रहा है। दुनिया के बड़े बड़े इन्वेस्टर्स अब अपनी जेबें खाली कर रहे हैं ताकी वो ग्रीन टेक्नोलॉजी में इन्वेस्ट कर सकें। अब तो बैंक भी लोन देते समय आपसे पूछते हैं कि भाई साहब, क्या आपका बिजनेस धरती को गर्म तो नहीं कर रहा। अगर कर रहा है, तो टाटा बाय बाय।
तीसरा 'सी' है कॉम्पिटिशन (Competition)। पहले सिर्फ कुछ ही कंपनियां थीं जो ये सब करती थीं। अब तो गली के नुक्कड़ से लेकर सिलिकॉन वैली तक हर कोई क्लीन टेक में घुसा हुआ है। जब कॉम्पिटिशन बढ़ता है, तो फायदा किसका होता है। आपका और मेरा। नई नई खोजें हो रही हैं और हर कोई एक दूसरे से बेहतर और सस्ती सर्विस देने की होड़ में लगा है।
चौथा 'सी' है चाइना (China)। लेखक ने इसे अलग से इसलिए रखा है क्योंकि चाइना इस रेस में ऐसे भाग रहा है जैसे उसे पीछे से किसी ने बहुत जोर का धक्का दिया हो। वो सोलर पैनल और बैटरी बनाने की दुनिया की फैक्ट्री बन चुका है। जब एक देश इतनी बड़ी स्केल पर काम करता है, तो पूरी दुनिया के लिए टेक्नोलॉजी सस्ती हो जाती है।
पांचवा है कंज्यूमर्स (Consumers)। यानी कि हम और आप। आज की जेनरेशन को वो कार चलाने में शर्म आती है जो पीछे से काला धुंआ छोड़कर पूरे मोहल्ले को खांसी का शिकार बना दे। अब लोग जागरूक हो गए हैं। उन्हें वो ब्रांड्स पसंद हैं जो पर्यावरण का ख्याल रखते हैं। अगर आपका बिजनेस कचरा फैला रहा है, तो आपकी रेटिंग भी कचरे जैसी ही होगी।
और आखिरी 'सी' है क्लाइमेट (Climate)। धरती अब बहुत ज्यादा गर्म हो रही है। अब तो एसी भी हार मान चुके हैं। यह मजबूरी है कि हमें क्लीन टेक की तरफ जाना ही होगा। लेखक बताते हैं कि ये ६ ताकतें मिलकर एक ऐसा चक्रवात बना रही हैं जिसमें पुरानी टेक्नोलॉजी ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी। अगर आप इन ६ 'सी' को समझ गए, तो आप समझ जाएंगे कि हवा का रुख किस तरफ है। वरना आप बस मौसम विभाग की तरह गलत अंदाजे लगाते रह जाएंगे और बाजी कोई और मार ले जाएगा।
लेसन ३ : स्मार्ट ग्रिड और गाड़ियों का नया अवतार
अगर आपको लगता है कि क्लीन टेक का मतलब सिर्फ छत पर एक कांच का टुकड़ा लगा देना है तो आप अभी भी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के जमाने में जी रहे हैं। लेखक बताते हैं कि असली गेम तो अब शुरू होने वाला है। हमारी बिजली और हमारी गाड़ियां अब इतनी स्मार्ट होने वाली हैं कि शायद वो हमसे ज्यादा समझदार हो जाएं। और यकीन मानिए यह कोई साइंस फिक्शन फिल्म नहीं बल्कि हकीकत है जो आपके दरवाजे पर दस्तक दे रही है।
सबसे पहले बात करते हैं स्मार्ट ग्रिड की। अभी क्या होता है। बिजली कहीं दूर बनती है और तारों के जरिए आपके घर आती है। बीच में आधी बिजली तो वैसे ही चोरी हो जाती है या खराब तारों की वजह से खत्म हो जाती है। लेकिन स्मार्ट ग्रिड इस सिस्टम का 'आईफोन' है। यह बिजली का ऐसा नेटवर्क है जो खुद जानता है कि किस घर को कितनी बिजली चाहिए। सोचिए आपकी वाशिंग मशीन खुद तय करे कि उसे दोपहर में चलना है क्योंकि उस समय सोलर बिजली सस्ती है। यह सुनकर शायद आपको लगे कि मशीनें आप पर राज करेंगी लेकिन असल में यह आपकी मेहनत की कमाई को बिजली कंपनियों के पास जाने से बचाएंगी।
अब आते हैं उस चीज पर जो हम भारतीयों की जान है — हमारी गाड़ियां। लेखक कहते हैं कि पेट्रोल और डीजल की गाड़ियां अब अजायबघर की शोभा बढ़ाएंगी। इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs) अब सिर्फ अमीर लोगों का खिलौना नहीं रह गई हैं। यह तो बस शुरुआत है। लेखक बायोफ्यूल्स और हाइड्रोजन की भी बात करते हैं। आने वाले समय में हो सकता है कि आप अपनी गाड़ी में पेट्रोल नहीं बल्कि खेती का कचरा या पानी से बनी गैस डालें।
हंसी की बात तो यह है कि जो लोग आज भी कह रहे हैं कि 'भाई ईवी में वो आवाज नहीं आती' वो बिल्कुल वैसी ही बातें कर रहे हैं जैसे किसी जमाने में लोग कहते थे कि घोड़ा गाड़ी में जो फील है वो इन लोहे के डब्बों यानी कारों में कहाँ। भाई साहब आपको आवाज चाहिए या बैंक बैलेंस। जब आपकी गाड़ी धूप से चार्ज होगी और आपका पेट्रोल का खर्चा जीरो हो जाएगा तब आपको वो साइलेंस भी संगीत जैसा लगेगा।
लेखक समझाते हैं कि यह पूरा इकोसिस्टम एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। आपकी कार सिर्फ एक गाड़ी नहीं बल्कि एक चलती फिरती बैटरी होगी जो जरूरत पड़ने पर आपके घर को भी बिजली दे सकेगी। यह सुनकर शायद आपके होश उड़ जाएं लेकिन क्लीन टेक रिवोल्यूशन का यही असली चेहरा है। यह सब कुछ आपस में कनेक्टेड है। जो कंपनियां आज इन ग्रिड्स और बैटरी टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं वो भविष्य की सबसे बड़ी ताकतें होंगी।
अंत में लेखक बस एक ही बात कहते हैं — यह बदलाव रुकने वाला नहीं है। आप चाहे इसे पसंद करें या न करें यह हो रहा है। सवाल यह है कि क्या आप इस लहर पर सवार होकर भविष्य के लीडर बनेंगे या फिर किनारे खड़े होकर बस पुरानी यादों में खोए रहेंगे। याद रखिये इतिहास बहादुरों का नहीं बल्कि उन लोगों का होता है जो सही समय पर सही बदलाव को पहचान लेते हैं।
तो दोस्तों, "द क्लीन टेक रिवोल्यूशन" हमें यह सिखाती है कि दुनिया बदल रही है और पैसा भी अपना रास्ता बदल रहा है। अब आपकी बारी है। क्या आप अभी भी पुराने ढर्रे पर चलना चाहते हैं या इस ग्रीन गोल्ड रश का हिस्सा बनना चाहते हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपको क्या लगता है — क्या क्लीन टेक वाकई इंडिया को एक सुपरपावर बना सकता है। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो आज भी पेट्रोल के बढ़ते दामों का रोना रोते हैं लेकिन बदलाव से डरते हैं। जागने का वक्त आ गया है।
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