The Exceptional Presenter (Hindi)


क्या आप भी स्टेज पर जाकर ऐसे खड़े हो जाते हैं जैसे किसी ने स्टेचू बोल दिया हो। बधाई हो। आप अपनी बोरिंग स्पीच से लोगों को गहरी नींद सुलाने में एक्सपर्ट हैं। अगर आपको लगता है कि बस स्लाइड पढ़ लेना ही प्रेजेंटेशन है तो आप अपनी इज़्ज़त और करियर दोनों का कबाड़ा कर रहे हैं।

लेकिन फ़िक्र मत कीजिये। आज मैं आपको बताऊंगा कि उस डर को डस्टबिन में कैसे फेंकना है। टिमोथी कोगेल की यह शानदार बुक आपको सिखाएगी कि कैसे आप किसी भी रूम के बॉस बन सकते हैं और अपनी बातों से आग लगा सकते हैं।


लेसन १ : प्रिपरेशन का असली मतलब रट्टा मारना नहीं है

ज़रा उस पल के बारे में सोचिये जब आप पहली बार स्टेज पर चढ़े थे। पैर कांप रहे थे। गला सूख रहा था। और ऐसा लग रहा था जैसे दिल सीने से बाहर निकलकर भाग जाएगा। हम में से ज़्यादातर लोग क्या करते हैं। हम एक रात पहले पीपीटी स्लाइड्स बनाते हैं। उसमें ढेर सारा टेक्स्ट भर देते हैं। और सोचते हैं कि हम तैयार हैं। सच तो यह है कि आप तैयार नहीं बल्कि अपनी बेइज्जती का सामान जमा कर रहे हैं। इस बुक में ऑथर कहते हैं कि एक एक्सेप्शनल प्रेज़ेंटर वह नहीं है जिसके पास बेस्ट कंटेंट है। बल्कि वह है जिसने अपनी परफॉरमेंस को मास्टर किया है।

इमेजिन कीजिये कि आपका एक दोस्त है जो अपनी शादी में डांस करने वाला है। वह यूट्यूब पर दस बार डांस स्टेप्स देख लेता है। और कहता है कि भाई मैं तो प्रो हूँ। फिर जब स्टेज पर गाना बजता है तो वह खम्बे की तरह खड़ा हो जाता है। क्यों। क्योंकि उसने देखा तो बहुत कुछ पर एक बार भी पैर नहीं हिलाया। आपकी प्रेज़ेंटेशन के साथ भी यही होता है। आप अपनी स्लाइड्स को देखते रहते हैं। लेकिन आप उन्हें बोलकर प्रैक्टिस नहीं करते। ऑथर कहते हैं कि आपको अपनी स्पीच को कम से कम तीन बार जोर से बोलकर रिकॉर्ड करना चाहिए। जब आप खुद को सुनते हैं तब आपको पता चलता है कि आप कहाँ अटक रहे हैं। और कहाँ आपकी आवाज़ किसी डरी हुई बिल्ली जैसी लग रही है।

मार्केट में आपने कई ऐसे लोग देखे होंगे जो बहुत ही कॉन्फिडेंस के साथ झूठ भी बोल देते हैं। और लोग मान भी लेते हैं। क्यों। क्योंकि उनका प्रेज़ेंटेशन दमदार होता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग बहुत कीमती बात कह रहे होते हैं। लेकिन उनकी आवाज़ में इतना डर होता है कि लोग उन्हें सीरियसली नहीं लेते। आपको अपनी तैयारी को एक वॉर की तरह लेना होगा। आपको पता होना चाहिए कि कब रुकना है और कब हमला करना है। बिना प्रैक्टिस के स्टेज पर जाना वैसा ही है जैसे बिना हेलमेट के बाइक रेस में उतरना। एक्सीडेंट तो होना ही है।

अगर आप चाहते हैं कि जब आप बोलें तो लोग अपने फोन छोड़कर आपकी तरफ देखें। तो आपको अपने कंटेंट को जीना होगा। अपनी स्लाइड्स के गुलाम मत बनिये। उन्हें अपना सहारा बनाइये। जब आप अपनी बात को बिना कागज में देखे बोल पाते हैं। तब आपकी आँखों में वह चमक आती है जिसे दुनिया कॉन्फिडेंस कहती है। याद रखिये। दुनिया में कोई भी पैदाइशी वक्ता नहीं होता। हर कोई गिरकर ही सीखता है। बस फर्क यह है कि कुछ लोग स्टेज पर गिरते हैं और कुछ लोग अपने घर के कमरे में प्रैक्टिस करते समय। आप कौन बनना चाहते हैं। यह आपकी मेहनत तय करेगी।


लेसन २ : खामोशी की ताकत और अपनी आवाज़ का रिमोट कंट्रोल

क्या आपने कभी किसी ऐसे इंसान को सुना है जो बिना रुके राजधानी एक्सप्रेस की तरह बोलता चला जाता है। उसकी बातें सुनकर ऐसा लगता है जैसे कोई आपके कान में हथौड़े मार रहा हो। ऑथर कहते हैं कि एक महान प्रेज़ेंटर वह नहीं है जो सबसे ज्यादा शब्द बोलता है। बल्कि वह है जिसे पता है कि कब चुप रहना है। इसे कहते हैं पॉवर ऑफ़ पॉज़। यानी बोलने के बीच में सही समय पर लिए गए छोटे छोटे ब्रेक। अगर आप बिना रुके बोलते रहेंगे तो आपकी ऑडियंस का दिमाग हैंग हो जाएगा। और फिर वह सोचने लगेंगे कि आज खाने में क्या बना है या उनका नेट पैक कब खत्म होगा।

सोचिये आप अपनी गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड को प्रपोज कर रहे हैं। और आप एक ही सांस में बोल देते हैं कि मुझे तुम पसंद हो क्या तुम मुझसे शादी करोगी मुझे कल ऑफिस जल्दी जाना है। क्या असर होगा। वह आपको शादी का कार्ड पकड़ाने के बजाय पागलखाने का पता दे देगी। हर बड़ी बात को हज़म करने के लिए समय चाहिए होता है। जब आप अपनी स्पीच में कोई बहुत इम्पोर्टेन्ट बात कहते हैं। तो उसके बाद दो सेकंड रुकिए। उस सन्नाटे को कमरे में फैलने दीजिये। वह सन्नाटा आपकी बात की वैल्यू बढ़ा देता है। जो लोग नर्वस होते हैं वह सन्नाटे से डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वह चुप हुए तो लोग समझेंगे कि वह भूल गए। लेकिन असलियत में वह चुप्पी आपको एक लीडर की तरह दिखाती है।

इसके साथ ही आती है आपकी आवाज़ की गति यानी पेसिंग। कुछ लोग इतना धीरे बोलते हैं कि ऐसा लगता है जैसे वह लोरी सुना रहे हों। लोग सो जाते हैं। और कुछ इतना तेज़ कि लगता है पीछे से पुलिस पड़ी है। आपको अपनी आवाज़ को एक म्यूजिक की तरह इस्तेमाल करना है। जहाँ जोश दिखाना हो वहां आवाज़ में तेज़ी लाइये। और जहाँ इमोशन दिखाना हो वहां आवाज़ को धीमा और गहरा कर दीजिये। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आप किसी को चटपटी खबर सुनाते समय अपनी आवाज़ को रहस्यमयी बना लेते हैं।

ज़रा उन अंकल के बारे में सोचिये जो व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स को सच मानकर पूरे मोहल्ले में चिल्ला चिल्ला कर ज्ञान देते हैं। उनकी बातों में लॉजिक नहीं होता पर उनकी आवाज़ में इतना दम होता है कि लोग रुककर सुनने लगते हैं। आपको अपनी आवाज़ के वॉल्यूम को भी कंट्रोल करना होगा। अगर आप पूरे समय चिल्लाएंगे तो लोग आपको शोर समझेंगे। और अगर बहुत धीमे बोलेंगे तो लोग आपको कमज़ोर समझेंगे। आपको अपनी आवाज़ को कमरे के आखिरी कोने तक पहुँचाना है। बिना चीखे चिल्लाए।

याद रखिये। आपकी आवाज़ एक हथियार है। और सन्नाटा उसकी धार। अगर आप इन दोनों का सही तालमेल बिठा लेते हैं। तो आपकी ऑडियंस आपकी बातों के जाल में ऐसे फंस जाएगी कि उन्हें समय का पता ही नहीं चलेगा। जब आप रुकते हैं तो आप ऑडियंस को सोचने का मौका देते हैं। और जब आप बोलते हैं तो आप उन्हें रास्ता दिखाते हैं। यही एक एक्सेप्शनल प्रेज़ेंटर की असली पहचान है।


लेसन ३ : आपकी बॉडी लैंग्वेज और ऑथेंटिसिटी का जादू

क्या आपने कभी किसी ऐसे सेल्समैन को देखा है जो आपको बता रहा है कि उसका प्रोडक्ट दुनिया में बेस्ट है। लेकिन वह खुद ज़मीन की तरफ देख रहा है और अपने हाथ जेब में डाले खड़ा है। क्या आप उससे एक माचिस की डिब्बी भी खरीदेंगे। कभी नहीं। ऑथर कहते हैं कि आपकी बॉडी लैंग्वेज आपके शब्दों से दस गुना ज़्यादा तेज़ बोलती है। अगर आप कह रहे हैं कि आप बहुत एक्साइटेड हैं पर आपका चेहरा ऐसा है जैसे अभी अभी कब्ज़ की दवाई खाकर आए हों। तो कोई आप पर यकीन नहीं करेगा। लोग आपकी बातों को सुनने से पहले आपकी एनर्जी को महसूस करते हैं।

इमेजिन कीजिये आप किसी पार्टी में गए हैं। वहां एक बंदा कोने में खड़ा होकर बस अपना फोन चला रहा है। और दूसरा बंदा सीधे खड़े होकर मुस्कुराते हुए लोगों से हाथ मिला रहा है। आप किसके पास जाना चाहेंगे। ज़ाहिर है दूसरे वाले के पास। स्टेज पर भी यही लॉजिक काम करता है। आपको अपना सीना चौड़ा रखकर और सिर ऊंचा करके खड़ा होना चाहिए। इसे ऑथर ओपन पोस्चर कहते हैं। जब आप अपने हाथ बांध लेते हैं या पॉकेट में डाल लेते हैं। तो आप अनजाने में दुनिया को यह मैसेज दे रहे होते हैं कि आप डरे हुए हैं और खुद को बचा रहे हैं। अपने हाथों को इस्तेमाल कीजिये। जैसे आप किसी दोस्त को रास्ता समझा रहे हों। जब आपके हाथ चलते हैं तो आपकी बात में जान आती है।

और सबसे जरूरी बात है ऑथेंटिसिटी यानी आपका असली होना। आज के समय में हर कोई रोबोट की तरह परफेक्ट दिखना चाहता है। लेकिन लोग परफेक्शन से प्यार नहीं करते। लोग इंसानियत से प्यार करते हैं। अगर आप स्टेज पर थोड़े नर्वस भी हैं और उस पर एक छोटा सा मज़ाक कर देते हैं। तो लोग आपको ज़्यादा पसंद करेंगे। क्योंकि उन्हें दिखेगा कि आप भी उन्हीं की तरह एक इंसान हैं। बनावटी मत बनिए। किसी और की कॉपी मत कीजिये। अगर आप अपनी कमियों को मुस्कुराकर स्वीकार कर लेते हैं। तो वह कमियां ही आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती हैं।

ज़रा उस पड़ोस वाली आंटी के बारे में सोचिये जो हर बात पर अपनी आँखों को गोल गोल घुमाकर इमोशन डाल देती हैं। उनकी कहानी चाहे कितनी भी बोरिंग हो। पर उनके एक्सप्रेशन इतने गजब होते हैं कि आप पूरी बात सुने बिना नहीं हटते। आपको भी अपनी आँखों का इस्तेमाल करना होगा। जिसे आई कांटेक्ट कहते हैं। भीड़ की तरफ मत देखिये। भीड़ में मौजूद एक एक इंसान की आँखों में देखिये। जब आप किसी से नज़रें मिलाते हैं। तो आप उसे इम्पॉर्टेंट फील कराते हैं। और जब आपकी ऑडियंस इम्पॉर्टेंट फील करती है। तो वह आपको अपना लीडर मान लेती है।

स्टेज पर आग लगाने के लिए आपको किसी सुपरस्टार की बॉडी नहीं चाहिए। आपको बस एक सच्चा दिल और थोड़ा सा कॉन्फिडेंस चाहिए। अपनी बात पर खुद यकीन रखिये। तभी दुनिया आप पर यकीन करेगी। जब आप अपनी पूरी बॉडी और सोल के साथ प्रेजेंट करते हैं। तब आप सिर्फ एक स्पीकर नहीं रह जाते। आप एक लेजेंड बन जाते हैं।


दोस्तों, क्या आप भी अब स्टेज पर जाकर लोगों के होश उड़ाने के लिए तैयार हैं। कमेंट्स में बताइये कि आपकी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है। क्या वह डर है या नर्वसनेस। इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो प्रेजेंटेशन के नाम से ही कांपने लगता है। उठिए। प्रैक्टिस कीजिये। और दुनिया को दिखा दीजिये कि आप एक एक्सेप्शनल प्रेज़ेंटर हैं।

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