अगर आपको लगता है कि सिर्फ चिल्लाने और सारी जिम्मेदारी सर पर लेने से आप बड़े लीडर बन जाएंगे तो मुबारक हो आप अपनी टीम को बर्बाद करने की राह पर हैं। बिना बैलेंस के आपकी मेहनत और लीडरशिप सिर्फ एक मजाक बनकर रह जाएगी जिसका खामियाजा सबको भुगतना होगा।
आज हम जोको विलिनक की किताब द डायकोटोमी ऑफ लीडरशिप के उन सीक्रेट्स को समझेंगे जो एक बॉस और एक असली लीडर के बीच का फर्क बताते हैं। चलिए देखते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपके काम करने के नजरिये को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : बैलेंसिंग एक्सट्रीम ओनरशिप
अगर आपको लगता है कि ऑफिस में हर छोटी फाइल का कलर चेक करना और हर ईमेल की स्पेलिंग सुधारना ही आपकी असली जिम्मेदारी है तो भाई साहब आप लीडर नहीं बल्कि अपनी टीम के लिए एक चलते फिरते सिरदर्द हैं। एक्सट्रीम ओनरशिप का मतलब यह कभी नहीं था कि आप अपनी टीम के ऑक्सीजन सिलेंडर बन जाएं जिसके बिना वो सांस भी न ले सकें। असली लीडरशिप का बैलेंस तब बिगड़ता है जब आप ओनरशिप के नाम पर माइक्रोमैनेजमेंट की दुकान खोल लेते हैं।
सोचिये आप एक मैनेजर हैं और आपकी टीम एक प्रेजेंटेशन तैयार कर रही है। अब आप इतने बड़े 'ओनर' बन गए कि आपने फॉन्ट साइज से लेकर स्लाइड के बैकग्राउंड म्यूजिक तक सब खुद ही डिसाइड कर लिया। नतीजा क्या हुआ? आपकी टीम ने अपना दिमाग चलाना बंद कर दिया क्योंकि उन्हें पता है कि आखिर में तो आप अपनी टांग अड़ाएंगे ही। जब आप हर चीज को कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं तो आप टीम को अपाहिज बना देते हैं। वो लोग बस आपकी दी हुई कमांड्स को फॉलो करने वाले रोबोट्स बन जाते हैं और फिर जब प्रोजेक्ट फेल होता है तो आप ही चिल्लाते हैं कि कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। अरे भाई साहब जब आपने जिम्मेदारी छोड़ी ही नहीं तो वो लेंगे कैसे?
यहाँ जोको विलिनक हमें सिखाते हैं कि ओनरशिप का एक दूसरा कोना भी है जिसे हमें पकड़ना है। आपको सब कुछ पता होना चाहिए पर हर चीज में उंगली नहीं करनी है। इसे एक क्रिकेट कैप्टन की तरह समझिये जो फील्डिंग सेट करता है और प्लान बताता है पर हर गेंद पर बॉलर का हाथ पकड़कर बॉल नहीं फिंकवाता। अगर आप बॉलर को ये नहीं बताएंगे कि उसे अपनी लेंथ खुद सेट करनी है तो वो कभी मैच जिताने वाला प्लेयर नहीं बन पाएगा।
ज्यादातर लोग यहीं फेल हो जाते हैं क्योंकि उनका ईगो उन्हें यह मानने ही नहीं देता कि उनकी टीम उनसे बेहतर कोई काम कर सकती है। आपको अपनी टीम को यह भरोसा दिलाना होगा कि अगर वो गलती करेंगे तो आप उनके पीछे खड़े हैं पर काम उन्हें खुद ही करना होगा। जब आप पीछे हटते हैं तभी आपकी टीम आगे बढ़ती है। अगर आप हमेशा फ्रंट लाइन पर खड़े होकर छोटे छोटे काम खुद करेंगे तो बड़े खतरे कौन देखेगा?
इस लेसन को अपनी लाइफ में उतारने का सबसे आसान तरीका है कि आप 'व्हाट' (क्या करना है) बताएं और 'हाउ' (कैसे करना है) टीम पर छोड़ दें। इससे उन्हें लगता है कि काम उनका है और जब इंसान को लगता है कि ये मेरा प्रोजेक्ट है तो वो उसमें अपनी जान लगा देता है। लेकिन अगर आप उसे बताएंगे कि उसे सांस कैसे लेनी है तो वो सिर्फ घड़ी देखेगा और शिफ्ट खत्म होने का इंतजार करेगा।
तो अगली बार जब आपको लगे कि सब कुछ मैं ही कर लूँ तो जरा रुकिए और खुद से पूछिए कि क्या आप एक टीम बना रहे हैं या सिर्फ चेलों की फ़ौज? ओनरशिप लेना सीखिए पर दूसरों की ओनरशिप छीनना बंद कीजिये। यही वो बारीक लाइन है जो एक महान लीडर को एक थकाऊ बॉस से अलग करती है।
लेसन २ : व्हेन टू लीड एंड व्हेन टू फॉलो
दुनिया में दो तरह के लोग सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं। एक वो जो सोचते हैं कि उन्हें सब पता है और दूसरे वो जो ये मानते हैं कि लीडर का मतलब सिर्फ हुकुम चलाना है। अगर आपके अंदर भी यह गलतफहमी बैठी है कि लीडर की कुर्सी पर बैठते ही आपकी अक्ल अचानक से आइंस्टीन जैसी हो गई है तो भाई साहब आप बहुत बड़े धोखे में हैं। एक असली लीडर सिर्फ वो नहीं होता जो आगे बढ़कर रास्ता दिखाए बल्कि वो होता है जो वक्त आने पर पीछे हटकर अपने जूनियर की बात मानना भी जानता हो।
मान लीजिये आपकी कंपनी एक नया सॉफ्टवेयर लॉन्च करने वाली है। अब आप ठहरे सीनियर मैनेजर जिनके पास १० साल का एक्सपीरियंस है पर जो नया लड़का टीम में आया है उसे लेटेस्ट कोडिंग का ज्यादा पता है। अब यहाँ आपका ईगो बीच में आ जाता है। आपको लगता है कि अगर मैंने इस कल के आए लड़के की बात मान ली तो मेरी इज्जत का कचरा हो जाएगा। आप अपनी बात मनवाने के लिए टेबल पीटते हैं और अंत में क्या होता है? प्रोजेक्ट बुरी तरह पिट जाता है। इसे कहते हैं लीडरशिप का सबसे बड़ा फेलियर।
जोको विलिनक कहते हैं कि लीडरशिप का मतलब ईगो को पालना नहीं बल्कि मिशन को पूरा करना है। अगर आपकी टीम में कोई ऐसा इंसान है जिसके पास किसी खास सिचुएशन में आपसे बेहतर जानकारी या आइडिया है तो चुपचाप अपना मुंह बंद रखिये और उसे लीड करने दीजिये। इसे कहते हैं फॉलो करना सीखना। एक लीडर जो फॉलो करना नहीं जानता वो कभी एक अच्छी टीम नहीं बना सकता। क्योंकि जब आप दूसरों की बात सुनते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि उनकी वैल्यू है।
अक्सर ऑफिस में लोग अपनी पोजीशन के पीछे छुपते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वो झुक गए तो लोग उन्हें कमजोर समझेंगे। असलियत तो यह है कि जो इंसान अपनी गलती मानकर दूसरों के बेहतर प्लान को अपना लेता है उसकी इज्जत टीम की नजरों में दस गुना बढ़ जाती है। लेकिन हमारे यहाँ तो बॉस को लगता है कि उसे हर मीटिंग में सबसे ज्यादा बोलना जरूरी है चाहे उसकी बातों का कोई मतलब हो या न हो।
सोचिये आप एक जंगल में रास्ता भटक गए हैं। आपके साथ एक गाइड है जिसे उस इलाके का कोना कोना पता है। क्या आप वहां यह कहेंगे कि नहीं मैं तो ग्रुप का लीडर हूँ इसलिए रास्ता मैं ही चुनूंगा? बिल्कुल नहीं। वहां आप चुपचाप गाइड के पीछे चलेंगे क्योंकि आपकी जान उसके हाथों में है। बिजनेस और लाइफ में भी हर दिन ऐसे ही जंगल होते हैं। कभी सेल्स वाला बंदा आपसे बेहतर जानता है कि कस्टमर क्या चाहता है और कभी एचआर वाली मैडम को पता होता है कि टीम का मूड कैसा है।
एक बेहतर लीडर बनने का सबसे बड़ा लेसन यही है कि अपनी 'अथॉरिटी' को अपनी जेब में रखिये और 'एबिलिटी' को मौका दीजिये। जब आप अपनी टीम के किसी मेम्बर को लीड करने का मौका देते हैं तो आप असल में फ्यूचर के लीडर्स तैयार कर रहे होते हैं। और यकीन मानिए जब पूरी टीम को लगता है कि उनकी सुनी जा रही है तो वो आपके लिए उस दीवार को भी फांद जाएंगे जिसे आप अकेले कभी पार नहीं कर सकते थे।
इसलिए अगली बार जब कोई आपकी बात को चुनौती दे तो गुस्सा होने के बजाय मुस्कराइए और सोचिये कि क्या उसका रास्ता आपके रास्ते से बेहतर है? अगर हाँ तो लीडर की टोपी उतारिए और एक अच्छे फॉलोअर बन जाइये। मिशन जीतना जरूरी है आपका ईगो नहीं।
लेसन ३ : डिसिप्लिन वर्सेज फ्लेक्सिबिलिटी
दुनिया में कुछ लोग डिसिप्लिन के इतने बड़े दीवाने होते हैं कि अगर ऑफिस का टाइम ९ बजे का है और बाहर बाढ़ आई हुई है तब भी वो उम्मीद करेंगे कि आप ९ बजे अपनी डेस्क पर गीले होकर बैठे रहें। उन्हें लगता है कि रूल्स पत्थर की लकीर हैं और उन्हें तोड़ना पाप है। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इतने ज्यादा 'चिल' होते हैं कि उनका कोई सिस्टम ही नहीं होता। जोको विलिनक कहते हैं कि ये दोनों ही तरीके आपको डुबो देंगे। लीडरशिप की असली कला डिसिप्लिन और फ्लेक्सिबिलिटी के बीच की उस पतली रस्सी पर चलने में है।
मान लीजिये आपने अपनी टीम के लिए एक रूल बनाया है कि हर काम के लिए एक प्रॉपर 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' यानी SOP फॉलो करना होगा। यह अच्छी बात है क्योंकि डिसिप्लिन से काम में सफाई आती है। पर अचानक मार्केट में कोई बड़ा बदलाव आता है या कोई क्लाइंट एक ऐसी डिमांड लेकर आता है जो आपके पुराने रूल्स में फिट नहीं बैठती। अब अगर आप एक लकीर के फ़कीर लीडर हैं तो आप कहेंगे कि नहीं हम तो वही करेंगे जो बुक में लिखा है। बधाई हो आपने एक बड़ा मौका और शायद एक बड़ा क्लाइंट खो दिया है।
डिसिप्लिन आपको स्ट्रक्चर देता है पर फ्लेक्सिबिलिटी आपको जिंदा रखती है। जोको खुद एक नेवी सील रहे हैं और वहां डिसिप्लिन का मतलब मौत और जिंदगी का अंतर होता है। लेकिन वो भी कहते हैं कि अगर जंग के मैदान में दुश्मन ने आपकी उम्मीद से अलग चाल चल दी है और आप अपने पुराने प्लान पर ही अड़े रहे तो आप हार जाएंगे। आपको अपनी सोच को रबर की तरह लचीला रखना होगा।
कई बार लीडर्स को लगता है कि अगर वो एक बार अपना फैसला बदल लेंगे तो टीम उन्हें हल्का समझने लगेगी। भाई साहब सच तो ये है कि गधा अपनी बात पर अड़ा रहता है इंसान हालात देखकर रास्ता बदलता है। अगर आपको दिख रहा है कि आपकी टीम बहुत ज्यादा थकी हुई है तो वहां डिसिप्लिन का डंडा चलाने के बजाय उन्हें एक दिन का ब्रेक देना असली लीडरशिप है। इसे कमजोरी नहीं बल्कि लॉन्ग टर्म विजन कहते हैं।
सर्कस के उस कलाकार को देखिये जो ऊंचाइयों पर बैलेंस बनाता है। उसका शरीर एकदम टाइट और डिसिप्लिन में होता है पर हवा के झोंके के साथ वो थोड़ा झुकता भी है। अगर वो झुकने से मना कर दे तो वो नीचे गिर जाएगा। आपकी लीडरशिप भी ऐसी ही होनी चाहिए। रूल्स बनाइये ताकि सिस्टम चले पर उन रूल्स को जेल मत बनाइये। जब तक आप सिचुएशन के हिसाब से खुद को नहीं ढालेंगे तब तक आप बस एक मैनेजर रहेंगे लीडर कभी नहीं बन पाएंगे।
इंसानी दिमाग को गुलामी पसंद नहीं है उसे एक ऐसा फ्रेमवर्क चाहिए जहाँ वो सेफ भी महसूस करे और उसे अपनी क्रिएटिविटी दिखाने की आजादी भी मिले। इसलिए अपने डिसिप्लिन को इतना सख्त मत कीजिये कि वो टूट जाए और अपनी फ्लेक्सिबिलिटी को इतना ढीला मत छोड़िये कि सब कुछ बिखर जाए। बैलेंस ही सक्सेस की चाबी है।
तो दोस्तों, द डायकोटोमी ऑफ लीडरशिप हमें बस यही सिखाती है कि किसी भी दिशा में बहुत ज्यादा झुकना खतरनाक है। चाहे वो ओनरशिप हो लीडरशिप हो या डिसिप्लिन। एक महान लीडर वो है जो हर पल जागरूक रहता है और देखता है कि कब उसे ढील देनी है और कब लगाम खींचनी है।
क्या आप भी अपनी लाइफ या ऑफिस में माइक्रोमैनेजमेंट के शिकार हैं? या शायद आप खुद जरूरत से ज्यादा सख्त बन रहे हैं? आज ही रुकिए और सोचिये कि आप बैलेंस के किस तरफ खड़े हैं। नीचे कमेंट्स में जरूर बताएं कि आप अपनी लीडरशिप स्टाइल में क्या एक बदलाव करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जिसे बॉस बनने का बहुत शौक है पर बैलेंस का 'ब' भी नहीं पता।
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