The Good Jobs Strategy (Hindi)


क्या आप भी उन महान बिजनेस ओनर्स में से हैं जो स्टाफ की सैलरी काटकर खुद को अंबानी समझ रहे हैं। मुबारक हो आप अपने बिजनेस की कब्र खुद ही खोद रहे हैं। जब तक आप कंजूसी को स्ट्रेटेजी समझेंगे तब तक आपके एम्प्लॉई और कस्टमर दोनों आपको छोड़कर भागते रहेंगे।

आज हम ज़ेनेप टोन की किताब द गुड जॉब्स स्ट्रैटेजी से सीखेंगे कि कैसे एम्प्लॉई पर पैसा खर्च करके आप असल में अपना बैंक बैलेंस बढ़ा सकते हैं। चलिए इन ३ लेसन्स के जरिए आपके बिजनेस करने के पुराने और घिसे पिटे तरीके को हमेशा के लिए बदलते हैं।


लेसन १ : एम्प्लॉई को इन्वेस्टमेंट समझना न कि बोझ

मान लीजिए आप एक ऐसी दुकान चलाते हैं जहाँ आप दुनिया का सबसे महंगा सामान बेचते हैं पर वहां काम करने वाले लड़के को आप चवन्नी की पगार देते हैं। अब वह लड़का वहां काम करने के बजाय दिन भर यही सोचता रहेगा कि कैसे आपकी दुकान से दो समोसे के पैसे चुराए जाएं या फिर कब वह नौकरी छोड़कर भागे। बहुत से इंडियन बिजनेस मालिक यही गलती करते हैं। उन्हें लगता है कि स्टाफ की सैलरी कम रखना ही असली प्रॉफिट है। पर ज़ेनेप टोन कहती हैं कि यह सोच वैसी ही है जैसे कोई इंसान अपना खून बेचकर जूस खरीदने की कोशिश करे। आप अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।

जब आप एम्प्लॉई को सिर्फ एक खर्च या लायबिलिटी मानते हैं तो आप असल में अपने कस्टमर को गाली दे रहे होते हैं। क्योंकि वह कम सैलरी वाला एम्प्लॉई कभी भी आपके कस्टमर को अच्छी सर्विस नहीं देगा। उसे फर्क ही नहीं पड़ता कि आपकी सेल बढ़ रही है या घट रही है। स्मार्ट कंपनियां जैसे कोस्टको या मरकाडोना अपने वर्कर्स को मार्केट से ज्यादा पैसा देती हैं। क्यों। क्या उन्हें पैसे ज्यादा होने की बीमारी है। बिल्कुल नहीं। वे जानते हैं कि एक खुश और ट्रेनिंग पाया हुआ स्टाफ कम गलतियां करता है। वह इन्वेंटरी का ध्यान रखता है। वह कस्टमर को मुस्कुराकर जवाब देता है।

असली लाइफ का उदाहरण देखिए। मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट में जाते हैं जहाँ वेटर को पिछले दो महीने से सैलरी नहीं मिली है। आप उससे प्यार से पूछेंगे कि भाई आज स्पेशल क्या है। वह शायद आपको ऐसा जवाब देगा जैसे आपने उसकी जायदाद मांग ली हो। अब सोचिए उस खराब सर्विस की वजह से आप वहां दोबारा कभी नहीं जाएंगे। मालिक ने वेटर की सैलरी में दो हजार बचा लिए पर आपसे मिलने वाला हजारों का लाइफटाइम प्रॉफिट खो दिया। यही है वह घटिया सोच जो अच्छे खासे बिजनेस को बर्बाद कर देती है।

गुड जॉब्स स्ट्रैटेजी कहती है कि जब आप लोगों में इन्वेस्ट करते हैं तो वे आपके काम को अपना समझने लगते हैं। वे सिर्फ अपनी ड्यूटी पूरी नहीं करते बल्कि वे बिजनेस की वैल्यू बढ़ाते हैं। कम सैलरी और खराब माहौल का मतलब है हाई टर्नओवर रेट। यानी हर महीने नया बंदा रखना और उसे फिर से जीरो से सिखाना। इसमें जो टाइम और पैसा बर्बाद होता है उसका हिसाब तो आप कभी लगाते ही नहीं। अपनी टीम को काबिल बनाइए और उन्हें उनकी मेहनत का पूरा हक दीजिए। तभी वे आपके गल्ले को नोटों से भरेंगे। वरना आप बस खर्चे बचाने के चक्कर में एक दिन खुद ही मार्केट से बाहर हो जाएंगे।


लेसन २ : कम वैरायटी और ज्यादा फोकस का जादू

अक्सर हमारे देसी बिजनेस मालिकों को लगता है कि अगर वे दुकान में सुई से लेकर हवाई जहाज तक सब कुछ भर लेंगे, तो वे बहुत बड़े बिजनेसमैन बन जाएंगे। उन्हें लगता है कि जितनी ज्यादा वैरायटी, उतने ज्यादा कस्टमर। पर सच तो यह है कि जब आप हर चीज बेचने की कोशिश करते हैं, तो आप असल में रायता फैला रहे होते हैं। जेनेप टोन इसे 'ऑपरेशनल कॉम्प्लेक्सिटी' कहती हैं। यानी जितना ज्यादा सामान, उतनी ज्यादा सिरदर्दी। और जब सिरदर्दी बढ़ती है, तो आपके एम्प्लॉई पागलों की तरह यहां-वहां भागते हैं और अंत में कुछ भी ढंग से नहीं कर पाते।

मान लीजिए आप एक ऐसी चाट की दुकान पर जाते हैं जिसके मेन्यू में ५०० आइटम्स लिखे हैं। आप वेटर से पूछते हैं कि भाई सबसे अच्छा क्या है। वह बेचारा खुद कन्फ्यूज है क्योंकि उसने खुद कभी आधे आइटम्स चखे ही नहीं। अब किचन में शेफ के पास दस तरह के अलग-अलग मसाले और सब्जियां रखने का प्रेशर है। नतीजा क्या होता है। आपको वही पुराना ठंडा समोसा मिलता है क्योंकि शेफ को तो पिज्जा बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। यही हाल बहुत से शोरूम्स और स्टोर्स का है। वे स्टॉक इतना भर लेते हैं कि एम्प्लॉई को पता ही नहीं होता कि कौन सा डिब्बा कहां रखा है।

स्मार्ट कंपनियां अपनी वैरायटी को कम रखती हैं ताकि वे अपनी सर्विस को परफेक्ट बना सकें। जब चॉइस कम होती है, तो एम्प्लॉई को अपना काम रट जाता है। उसे पता होता है कि कौन सा प्रोडक्ट बेस्ट है और उसे कैसे बेचना है। इससे गलतियां कम होती हैं और वेस्टेज भी नहीं होता। अगर आप १० चीजें बेच रहे हैं और दसों में बेस्ट हैं, तो आप राजा हैं। लेकिन अगर आप १०० चीजें बेच रहे हैं और उनमें से ९० कूड़ा हैं, तो आप बस अपना और अपने स्टाफ का टाइम बर्बाद कर रहे हैं।

आप किसी मोबाइल शॉप पर जाते हैं और दुकानदार आपको ५० अलग-अलग ब्रांड के फोन दिखाने लगता है। आप और भी ज्यादा कन्फ्यूज होकर बाहर आ जाते हैं। वहीं अगर वह सिर्फ ५ बेहतरीन मॉडल रखता और उनके बारे में आपको पूरी जानकारी देता, तो शायद आप फोन खरीद लेते। कम वैरायटी का मतलब कंजूसी नहीं, बल्कि फोकस है। जब आप फोकस करते हैं, तो आपका स्टाफ इन्वेंटरी को बेहतर मैनेज करता है और कस्टमर को भी वही मिलता है जो उसे चाहिए। फालतू का कचरा भरने से बेहतर है कि आप अपनी बेस्ट चीजों पर दांव लगाएं। तभी आपका बिजनेस एक स्मूद मशीन की तरह चलेगा, वरना आप बस भीड़ में खोए हुए एक और कन्फ्यूज दुकानदार बनकर रह जाएंगे।


लेसन ३ : क्रॉस ट्रेनिंग और एम्प्लॉई एम्पावरमेंट

अब बात करते हैं उस सबसे बड़ी गलती की जो हर दूसरा मैनेजर करता है। वे अपने एम्प्लॉई को एक रोबोट की तरह देखते हैं जिसे सिर्फ एक बटन दबाना आता है। अगर कैशियर के काउंटर पर भीड़ लगी है और फ्लोर साफ करने वाला लड़का खाली खड़ा है, तो मैनेजर उसे कैशियर की मदद करने नहीं भेजेगा। क्यों। क्योंकि 'यह उसका काम नहीं है'। यह सोच वैसी ही है जैसे क्रिकेट मैच में फील्डर कहे कि मैं कैच नहीं पकड़ूंगा क्योंकि मैं तो सिर्फ बॉलिंग करने आया हूँ। जेनेप टोन कहती हैं कि असली जादू तब होता है जब आप अपने स्टाफ को 'क्रॉस ट्रेनिंग' देते हैं। यानी हर किसी को थोड़ा-बहुत सब कुछ आना चाहिए।

जब आप अपने स्टाफ को मल्टी टैलेंटेड बनाते हैं, तो आपका बिजनेस किसी भी तूफान को झेल सकता है। मान लीजिए आपकी दुकान पर अचानक से बहुत सारे कस्टमर आ गए। अगर आपका सफाई वाला स्टाफ भी बिलिंग करना जानता है, तो वह तुरंत काउंटर संभाल लेगा। इससे कस्टमर को लाइन में खड़ा होकर गाली देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन हमारे यहाँ क्या होता है। स्टाफ खाली बैठा मोबाइल चलाएगा पर दूसरे की मदद नहीं करेगा क्योंकि मालिक ने कभी उसे कुछ और सिखाया ही नहीं। आप खुद सोचिए, क्या आप ऐसे स्टाफ को पैसा देना चाहेंगे जो मुश्किल वक्त में आपके काम न आए।

एम्पावरमेंट का मतलब सिर्फ काम सिखाना नहीं है, बल्कि उन्हें फैसले लेने की ताकत देना भी है। मान लीजिए एक कस्टमर को आपका प्रोडक्ट खराब मिला। अगर एम्प्लॉई के पास उसे बदलने या छोटा डिस्काउंट देने की पावर है, तो वह मामला वहीं रफा-दफा कर देगा। पर नहीं, हमारे यहाँ तो एम्प्लॉई कहेगा कि साहब अभी बाहर गए हैं, कल आना। अब वह कस्टमर कल नहीं आएगा, वह सीधा आपके कॉम्पिटिटर के पास जाएगा। आपने अपने स्टाफ को इतना डरपोक बना रखा है कि वे बिना आपसे पूछे पानी का गिलास भी नहीं दे सकते। यह लीडरशिप नहीं, यह तानाशाही है जो आपके बिजनेस का गला घोंट रही है।

आप एक होटल में रुकते हैं और रात को नल खराब हो जाता है। आप रिसेप्शन पर फोन करते हैं। अगर वहां का स्टाफ एम्पावर्ड है, तो वह तुरंत प्लंबर बुलाएगा या आपका कमरा बदल देगा। लेकिन अगर वह लाचार है, तो वह कहेगा कि मैनेजर साहब सुबह ९ बजे आएंगे। अब आप पूरी रात बाल्टी भरकर पानी निकालेंगे और सुबह निकलते वक्त उस होटल को नरक घोषित कर देंगे। स्मार्ट कंपनियां अपने एम्प्लॉई पर भरोसा करती हैं। वे उन्हें सिखाती हैं कि कस्टमर की खुशी के लिए छोटे-मोटे फैसले खुद लें। जब एम्प्लॉई को लगता है कि उसकी बात की वैल्यू है, तो वह पूरी जान लगाकर काम करता है। वह सिर्फ सैलरी के लिए नहीं, बल्कि अपनी इज्जत के लिए आपका बिजनेस बढ़ाता है।


बिजनेस करना सिर्फ सामान बेचना नहीं है, बल्कि इंसानों के साथ मिलकर एक सिस्टम बनाना है। अगर आप अपने लोगों को निचोड़कर अमीर बनना चाहते हैं, तो याद रखिए कि सूखा हुआ नीबू रस नहीं देता। जेनेप टोन की 'गुड जॉब्स स्ट्रैटेजी' हमें सिखाती है कि जब हम अपने स्टाफ का ख्याल रखते हैं, तो वे हमारे सपनों का ख्याल रखते हैं। आज ही अपने बिजनेस करने के तरीके पर गौर कीजिए। क्या आप एक विजनरी लीडर हैं या बस एक कंजूस मुनीम।

अगर आपको यह लेसन काम के लगे हों, तो इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपना नया स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं। नीचे कमेंट में बताएं कि आप अपने एम्प्लॉई को इन्वेस्टमेंट मानते हैं या खर्च। चलिए, साथ मिलकर इंडिया के बिजनेस कल्चर को बेहतर बनाते हैं।

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