क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो मार्केट की एक छोटी सी गिरावट देखकर ऐसे घबरा जाते हैं जैसे पड़ोस वाले शर्मा जी ने आपकी एफडी (FD) चुरा ली हो। मुबारक हो आप अपनी मेहनत की कमाई को धीरे धीरे आग लगाने की कला में मास्टर बन रहे हैं और आपको पता भी नहीं है।
आज के इस आर्टिकल में हम विलियम जे बर्नस्टीन की बुक द इन्वेस्टर्स मेनिफेस्टो से वेल्थ क्रिएशन के वो राज जानेंगे जो आपको कंगाली से बचाकर एक समझदार इन्वेस्टर बनाएंगे। चलिए इन ३ पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं।
लेसन १ : इन्वेस्टिंग को सिंपल रखें
आजकल के दौर में हर कोई खुद को शेयर मार्केट का जेम्स बॉन्ड समझता है। लोग सोचते हैं कि अगर उन्होंने टीवी पर दो न्यूज देख ली या किसी टेलीग्राम ग्रुप के 'टिप्स' को पढ़ लिया तो वो अगले राकेश झुनझुनवाला बन जाएंगे। लेकिन विलियम जे बर्नस्टीन कहते हैं कि इन्वेस्टिंग कोई रॉकेट साइंस नहीं है बल्कि यह एक बोरिंग प्रोसेस है जिसे लोग जानबूझकर कॉम्प्लिकेटेड बना देते हैं। इस बुक का सबसे पहला और सबसे कीमती लेसन यही है कि अपनी इन्वेस्टमेंट को जितना हो सके उतना सिंपल रखें।
इमेजिन करिए कि आप एक ऐसी शादी में गए हैं जहाँ खाने के ५०० अलग अलग काउंटर लगे हैं। अब आप कंफ्यूज हैं कि शाही पनीर खाएं या पास्ता। इसी कंफ्यूजन में आप सब कुछ थोड़ा थोड़ा चखने की कोशिश करते हैं और अगले दिन आपका पेट खराब हो जाता है। इन्वेस्टिंग की दुनिया भी बिलकुल ऐसी ही है। मार्केट में हजारों स्टॉक्स हैं और लाखों म्युचुअल फंड्स। इन्वेस्टर को लगता है कि अगर वो बहुत ज्यादा दिमाग लगाकर सबसे अलग और पेचीदा पोर्टफोलियो बनाएगा तो उसे ज्यादा रिटर्न मिलेगा। असलियत यह है कि जितना ज्यादा आप हाथ पैर मारते हैं उतना ही आप दलदल में फंसते जाते हैं। बर्नस्टीन कहते हैं कि आपको इंडेक्स फंड्स के साथ रहना चाहिए। इंडेक्स फंड्स मतलब मार्केट की वो थाली जिसमें सब कुछ पहले से बैलेंस्ड है।
लोग सिंपल रास्तों को इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि उसमें टशन नहीं है। किसी पार्टी में जाकर यह कहना कि मैंने इंडेक्स फंड में पैसे लगाए हैं सुनने में बहुत ही साधारण लगता है। लोग तो यह बताना चाहते हैं कि कैसे उन्होंने किसी ऐसी कंपनी का स्टॉक पकड़ा है जिसका नाम उनके अलावा किसी को नहीं पता। यह वैसी ही बात हुई जैसे कोई इंसान साइकिल चलाकर ऑफिस जाए तो लोग उसे गरीब समझते हैं भले ही उसकी हेल्थ और सेविंग्स शानदार हो। वहीं दूसरी तरफ भारी ईएमआई (EMI) पर महंगी कार लेकर ऑफिस जाने वाले को लोग सक्सेसफुल समझते हैं। शेयर मार्केट में भी लोग दिखावे के चक्कर में महंगे और घटिया फंड्स चुन लेते हैं जो सिर्फ फंड मैनेजर की जेब भरते हैं और आपके हाथ में मूंगफली के दाने छोड़ जाते हैं।
बर्नस्टीन का कहना है कि मार्केट को हराना आपके बस की बात नहीं है और न ही किसी तथाकथित एक्सपर्ट की। जो लोग दावा करते हैं कि उन्हें पता है कि कल मार्केट कहाँ जाएगा वो या तो झूठ बोल रहे हैं या फिर उन्हें खुद नहीं पता कि वो क्या कह रहे हैं। अगर आप अपनी वेल्थ बनाना चाहते हैं तो आपको कम खर्चे वाले इंडेक्स फंड्स में भरोसा करना होगा। यहाँ आपका दुश्मन मार्केट नहीं बल्कि वो चार्जेस हैं जो आप बार बार स्टॉक्स खरीदने और बेचने पर ब्रोकर को देते हैं। सोचिए आप एक टैक्सी में बैठे हैं जिसका मीटर आपकी मंजिल पर पहुँचने से पहले ही आपकी आधी जेब खाली कर दे तो आप कभी अमीर नहीं बन पाएंगे। इसलिए अपनी सवारी यानी अपना इन्वेस्टमेंट फंड ऐसा चुनिए जिसका मीटर यानी एक्सपेंस रेशियो सबसे कम हो।
सीधी सी बात है कि अगर आप शांति से सोना चाहते हैं और चाहते हैं कि आपका पैसा आपके लिए काम करे तो फालतू की होशियारी छोड़कर मार्केट के एवरेज रिटर्न को स्वीकार करें। एवरेज रिटर्न सुनने में बुरा लगता है लेकिन लॉन्ग टर्म में यही एवरेज रिटर्न आपको उन ९० परसेंट लोगों से आगे ले जाता है जो हर रोज नया स्टॉक ढूंढने के चक्कर में अपनी कैपिटल साफ कर बैठते हैं। तो लेसन नंबर १ बहुत क्लियर है कि अपने पोर्टफोलियो को उतना ही सादा रखें जितना संडे का लंच होता है। ज्यादा मसाले डालेंगे तो बाद में एसिडिटी ही होगी।
लेसन २ : अपने इमोशंस पर कंट्रोल रखें
दूसरे लेसन में विलियम जे बर्नस्टीन हमारे दिमाग के उस हिस्से पर वार करते हैं जो हमें बार-बार गलत फैसले लेने पर मजबूर करता है। वह कहते हैं कि मार्केट का सबसे बड़ा दुश्मन कोई क्रैश या मंदी नहीं है बल्कि आपके खुद के इमोशंस हैं। इंसान का दिमाग लाखों सालों से डर और लालच के हिसाब से डिजाइन हुआ है। जब जंगल में शेर दिखता था तो हमारा पूर्वज भागता था और जब फल दिखते थे तो वो उन पर टूट पड़ता था। आज शेयर मार्केट में शेर का मतलब है मार्केट क्रैश और फलों का मतलब है बुल रन। समस्या यह है कि जो सर्वाइवल स्किल्स जंगल में काम आती थीं वो स्टॉक मार्केट में आपका दिवाला निकाल देती हैं।
जब मार्केट नीचे गिरता है और न्यूज चैनल वाले ऐसे चिल्लाते हैं जैसे कल सुबह सूरज नहीं निकलेगा तो आम इन्वेस्टर का दिल बैठने लगता है। उसे लगता है कि अगर उसने अभी पैसे नहीं निकाले तो वो सड़क पर आ जाएगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई इंसान जिम ज्वाइन करे और दो दिन बाद मसल्स न दिखने पर दुखी होकर जिम छोड़ दे और उल्टा समोसे खाने लगे। मार्केट की गिरावट असल में एक सेल (Sale) की तरह होती है जहाँ अच्छी कंपनियां सस्ते दाम पर मिल रही होती हैं। लेकिन लोग इतने महान हैं कि वो दिवाली की सेल में तो शॉपिंग के लिए पागल हो जाते हैं पर शेयर मार्केट की सेल में अपना सामान बेचकर भागने लगते हैं। इसे कहते हैं डर का बिजनेस जिसमें नुकसान सिर्फ आपका होता है।
बर्नस्टीन मजाक में कहते हैं कि अगर आप एक सफल इन्वेस्टर बनना चाहते हैं तो आपको अपनी भावनाओं को फ्रीजर में रख देना चाहिए। मार्केट में पैसा वो नहीं बनाता जो बहुत स्मार्ट है बल्कि वो बनाता है जो बहुत ढीठ है। मान लीजिए आपने एक बहुत बड़ा बंगला बनवाया और अगले दिन पड़ोस का कोई लड़का आकर कहे कि आपका बंगला बेकार है और मैं इसके सिर्फ दस लाख दूंगा तो क्या आप उसे बेच देंगे। बिल्कुल नहीं। आप उसे पागल समझकर भगा देंगे। लेकिन शेयर मार्केट में जब स्क्रीन पर लाल रंग दिखता है और प्राइसेस नीचे गिरते हैं तो आप घबराकर अपना पोर्टफोलियो खाली कर देते हैं। आप उस वक्त भूल जाते हैं कि कंपनी की वैल्यू रातों रात खत्म नहीं हुई है बस कुछ लोगों का मूड खराब है।
लोग खुद को बहुत लॉजिकल समझते हैं पर उनकी हरकतों में कोई लॉजिक नहीं होता। जब मार्केट सातवें आसमान पर होता है और हर दूसरा इंसान करोड़पति बनने की बातें कर रहा होता है तब आम जनता अपनी जमा पूंजी लेकर मार्केट में घुसती है। यह बिल्कुल वैसा है जैसे किसी मूवी के सुपरहिट होने के बाद आप उसकी टिकट ब्लैक में खरीदें और फिर उम्मीद करें कि आपको डिस्काउंट मिलेगा। जब सब लोग लालची हो रहे हों तब आपको डरना चाहिए और जब सब डर के मारे कांप रहे हों तब आपको अपनी शॉपिंग लिस्ट तैयार रखनी चाहिए। बर्नस्टीन के अनुसार असल पैसा मार्केट की तेजी में नहीं बल्कि उन बुरे वक्त में बनता है जब आप हिम्मत नहीं हारते।
अगर आप वाकई वेल्थ बनाना चाहते हैं तो आपको एक रोबोट की तरह इन्वेस्ट करना होगा। बिना यह सोचे कि मार्केट ऊपर है या नीचे अपनी मंथली इन्वेस्टमेंट जारी रखें। जो लोग मार्केट को टाइम करने की कोशिश करते हैं कि मैं सबसे निचले स्तर पर खरीदूंगा वो अक्सर हाथ मलते रह जाते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई बस स्टॉप पर खड़ा होकर यह सोचे कि जब बस खाली आएगी तभी चढ़ूंगा। इस चक्कर में कई बसें निकल जाती हैं और वो इंसान वहीं खड़ा रह जाता है। इसलिए अपनी भावनाओं को साइड में रखें और अनुशासन के साथ इन्वेस्ट करते रहें। लेसन नंबर २ का सार यही है कि मार्केट की हरकतों पर नजर रखने से बेहतर है कि आप अपने खुद के रिएक्शन पर नजर रखें।
लेसन ३ : एसेट एलोकेशन का जादू
तीसरे लेसन में विलियम जे बर्नस्टीन एसेट एलोकेशन की बात करते हैं। आसान भाषा में कहें तो अपना सारा अंडा एक ही टोकरी में मत रखिए। लेकिन यहाँ ट्विस्ट यह है कि लोग डायवर्सिफिकेशन के नाम पर खिचड़ी बना देते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि उन्होंने दस अलग-अलग कंपनियों के स्टॉक ले लिए तो वो सेफ हैं। भाई साहब अगर वो दसों कंपनियां सिर्फ आईटी (IT) सेक्टर की हैं तो आप सेफ नहीं बल्कि एक ऐसे जहाज पर बैठे हैं जिसके सारे छेद एक ही तरफ हैं। बर्नस्टीन समझाते हैं कि असली जादू स्टॉक्स और बॉन्ड्स के सही मिक्स में है।
सोचिए आप एक क्रिकेट टीम बना रहे हैं। क्या आप टीम में सिर्फ ग्यारह ओपनिंग बैट्समैन रखेंगे। बिल्कुल नहीं। आपको विकेटकीपर भी चाहिए और बॉलर भी। बॉन्ड्स आपकी टीम के वो डिफेंसिव प्लेयर हैं जो तब काम आते हैं जब बैट्समैन यानी स्टॉक्स जीरो पर आउट हो रहे हों। जब मार्केट क्रैश होता है तो यही एसेट एलोकेशन आपको सुसाइडल थॉट्स से बचाता है। लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि भाई बेस्ट पोर्टफोलियो क्या है। इसका जवाब बर्नस्टीन बहुत सादगी से देते हैं कि ऐसा पोर्टफोलियो जो आपको रात को चैन की नींद सोने दे। अगर मार्केट के २ परसेंट गिरने पर आपकी रातों की नींद उड़ जाती है तो समझ लीजिए कि आपने अपनी औकात से ज्यादा रिस्क ले लिया है।
लोग अपनी शादी के मेन्यू पर छह महीने रिसर्च करते हैं पर अपनी लाइफ की सबसे बड़ी सेविंग्स को किसी रैंडम अंकल की सलाह पर एक ही जगह झोंक देते हैं। एसेट एलोकेशन का मतलब है कि आपको पता होना चाहिए कि आपका कितना पैसा रिस्की एसेट्स में है और कितना सेफ जगह पर। बर्नस्टीन एक और कमाल की बात कहते हैं जिसे रिबैलेंसिंग कहते हैं। मान लीजिए आपने तय किया कि ५० परसेंट स्टॉक और ५० परसेंट बॉन्ड रखेंगे। अब मार्केट बढ़ गया और स्टॉक्स की वैल्यू ७० परसेंट हो गई। आम आदमी खुश होकर और पैसा स्टॉक्स में डालता है। लेकिन एक समझदार इन्वेस्टर वहां से प्रॉफिट बुक करेगा और उसे वापस बॉन्ड्स में डालेगा ताकि बैलेंस बना रहे।
यह सुनने में बहुत आसान लगता है पर करने में नानी याद आ जाती है। क्योंकि जब मार्केट चढ़ रहा होता है तब सबको लगता है कि वो कभी नहीं गिरेगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी पार्टी में फ्री की ड्रिंक मिल रही हो और आप भूल जाएं कि कल सुबह ऑफिस भी जाना है। रिबैलेंसिंग आपको उस वक्त लालच से बचाती है और जब मार्केट गिरता है तब आपको डर से बचाती है। यह एक ऑटोमैटिक सिस्टम है जो आपसे कहता है कि जब सब महंगा है तब बेचो और जब सब सस्ता है तब खरीदो। लेकिन हमारा दिमाग उल्टा चलता है। हम महंगी चीजें शान से खरीदते हैं और सस्ती चीजों को कचरा समझकर छोड़ देते हैं।
लेसन नंबर ३ का सीधा सा मतलब है कि अपनी रिस्क कैपेसिटी को पहचानें। अगर आप २० साल के हैं तो आप ज्यादा रिस्क ले सकते हैं लेकिन अगर आप रिटायरमेंट के करीब हैं तो आपको संभलकर खेलना होगा। इन्वेस्टिंग कोई टी-२० मैच नहीं है जहाँ हर बॉल पर छक्का मारना जरूरी है। यह एक टेस्ट मैच है जहाँ क्रीज पर टिके रहना ज्यादा जरूरी है। अगर आप टिके रहे तो रन यानी पैसा तो अपने आप बन जाएगा। इसलिए अपने एसेट्स को इस तरह बांटें कि दुनिया इधर की उधर हो जाए पर आपका फाइनेंशियल घर सलामत रहे।
विलियम जे बर्नस्टीन की यह बुक हमें यह नहीं सिखाती कि अमीर कैसे बनें बल्कि यह सिखाती है कि अमीर बने कैसे रहें और कंगाली के गड्ढे में न गिरें। याद रखिए इन्वेस्टिंग एक मैराथन है कोई १०० मीटर की रेस नहीं। क्या आप आज भी उन गलतियों को दोहरा रहे हैं जो आपकी वेल्थ को दीमक की तरह चाट रही हैं। उठिए अपने पोर्टफोलियो को साफ करिए और सादगी को अपनाइए। अगर आपको यह आर्टिकल काम का लगा तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो हर रोज नया मल्टीबैगर स्टॉक ढूंढने के चक्कर में अपनी कैपिटल गँवा रहे हैं। नीचे कमेंट में बताएं कि आपका सबसे पसंदीदा एसेट कौन सा है। चलिए साथ मिलकर एक समझदार इन्वेस्टर बनते हैं।
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