अगर आप अब भी बिना किसी प्लान के हवा में तीर चलाकर अपना बिजनेस बना रहे है तो बधाई हो। आप बहुत जल्द सड़क पर आने की तैयारी कर रहे है। आपका आइडिया शायद आपके मम्मी पापा को अच्छा लगे पर दुनिया को उसकी रत्ती भर परवाह नहीं है। आप अपना कीमती समय और पैसा एक ऐसे कचरे प्रोडक्ट पर बर्बाद कर रहे है जिसे कोई मुफ्त में भी नहीं खरीदेगा।
लेकिन फिक्र मत कीजिये। डैन ओल्सन की यह बुक आपको उस गड्ढे में गिरने से बचा लेगी। आज हम द लीन प्रोडक्ट प्लेबुक से ३ ऐसे जबरदस्त लेसन सीखेंगे जो आपके फेल होने के चांस खत्म कर देंगे।
लेसन १ : प्रोडक्ट मार्केट फिट का असली सच और आपकी गलतफहमी
ज्यादातर लोग जब नया बिजनेस शुरू करते है तो वो सीधे अपनी वर्कशॉप या लैपटॉप में घुस जाते है। उनके दिमाग में एक ऐसा क्रांतिकारी आइडिया होता है जिससे उन्हें लगता है कि वो रातोंरात एलन मस्क बन जाएंगे। वो महीनों तक कमरे में बंद होकर एक ऐसा प्रोडक्ट बनाते है जिसमे दुनिया भर के फीचर्स भरे होते है। फिर आता है वो बड़ा दिन जब वो अपना शानदार प्रोडक्ट दुनिया के सामने लाते है। और जानते है क्या होता है। सन्नाटा। लोग उसे देखते है और फिर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते है जैसे कि सड़क पर पड़ा हुआ कोई पत्थर हो। यह इसलिए होता है क्योंकि आपने वही गलती की जो ९० परसेंट लोग करते है। आपने प्रोडक्ट तो बनाया पर यह देखना भूल गए कि क्या मार्केट को वाकई उसकी जरूरत है। डैन ओल्सन कहते है कि प्रोडक्ट मार्केट फिट कोई जादुई शब्द नहीं है बल्कि एक कड़वा सच है।
सोचिये आप एक ऐसे शहर में जाकर छाते बेचने लगे जहाँ कभी बारिश ही नहीं होती। अब आपका छाता चाहे सोने का बना हो या उसमे ऐसी टेक्नोलॉजी हो जो आपको धूप से बचाए पर लोग उसे नहीं खरीदेंगे। क्यों। क्योंकि वहां समस्या ही नहीं है। इंडियन मार्केट में अक्सर लोग जोश में आकर ऐसी ऐप या सर्विस बना लेते है जो किसी की लाइफ की कोई प्रॉब्लम सॉल्व नहीं करती। आपने अपनी ईगो को सैटिस्फाई करने के लिए प्रोडक्ट बनाया है मार्केट की प्यास बुझाने के लिए नहीं। अगर मार्केट की डिमांड १० है और आप ८ लेवल की वैल्यू दे रहे है तो ही आप टिकेंगे। वरना आपकी दुकान का शटर गिरना तय है। लोग अपनी मेहनत की कमाई आपको तब तक नहीं देंगे जब तक उन्हें यह न लगे कि आपका प्रोडक्ट उनकी लाइफ थोड़ी आसान बना रहा है।
मान लीजिये आप एक ऐसी वाशिंग मशीन बनाते है जो कपड़े धोती है सुखाती है और उन्हें प्रेस भी कर देती है। सुनने में बड़ा कूल लगता है ना। पर उसकी कीमत आपने रख दी ५ लाख रूपये। अब इंडियन मिडिल क्लास आदमी इसे देखकर सिर्फ यही कहेगा कि भाई इतने में तो मैं पूरी जिंदगी के लिए एक धोबी रख लूंगा जो घर आकर काम करेगा। यहाँ आपने टेक्नोलॉजी तो दी पर मार्केट की जेब और जरूरत को नहीं समझा। प्रोडक्ट मार्केट फिट का मतलब है सही ताले के लिए सही चाबी ढूंढना। आप अपनी चाबी को चाहे जितना मर्जी घिस ले अगर ताला ही अलग है तो दरवाजा कभी नहीं खुलेगा।
अक्सर फाउंडर्स को लगता है कि अगर उन्होंने बहुत सारे फीचर्स डाल दिए तो लोग इम्प्रेस हो जाएंगे। भाई साहब लोग फीचर्स से नहीं अपनी सुविधा से इम्प्रेस होते है। डैन ओल्सन की यह प्लेबुक कहती है कि पहले यह पहचानो कि आपका टारगेट कस्टमर कौन है। क्या वो एक कॉलेज स्टूडेंट है जिसके पास पैसे कम है या वो एक कॉर्पोरेट एम्प्लॉई है जिसके पास समय कम है। जब तक आप उस इंसान के दिमाग में नहीं घुसेंगे आप एक ऐसा कचरा बनाएंगे जिसे बाद में आपको ही कबाड़ में बेचना पड़ेगा। प्रोडक्ट मार्केट फिट अचीव करने का मतलब है यह मानना कि आपका आइडिया गलत हो सकता है। पर ईगो इतनी बड़ी होती है कि लोग झुकने को तैयार नहीं होते। याद रखिये मार्केट आपसे बड़ा है। अगर आप मार्केट की नहीं सुनेंगे तो मार्केट आपकी चीखें भी नहीं सुनेगा।
लेसन २ : एमवीपी का जादू - परफ़ेक्शन के चक्कर में खुद को बर्बाद न करे
क्या आपको लगता है कि फेसबुक या अमेज़न पहले दिन ही ऐसे दिखते थे जैसे आज है। अगर हाँ तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे है। डैन ओल्सन कहते है कि सबसे बड़ी बेवकूफी है एक ही बार में परफ़ेक्ट प्रोडक्ट बनाने की कोशिश करना। आप अपनी पूरी जमा पूंजी और २ साल का समय लगाकर एक ऐसी कार बनाना चाहते है जो उड़ने भी लगे और पानी पर भी चले। पर जब आप उसे बाहर निकालते है तो पता चलता है कि लोगों को तो सिर्फ एक सस्ती साइकिल चाहिए थी। यहाँ काम आता है एमवीपी यानी मिनिमम वायेबल प्रोडक्ट। इसका मतलब है कि आप सिर्फ उतने ही फीचर्स के साथ मार्केट में उतरे जिससे कस्टमर की मुख्य समस्या हल हो सके। बाकी का तामझाम बाद के लिए छोड़ दीजिये।
मान लीजिये आप एक नया रेस्टोरेंट खोलना चाहते है। अब आप पहले दिन ही करोड़ों का लोन लेकर इटालियन मार्बल लगवाते है और विदेश से शेफ बुलाते है। पर आपको पता ही नहीं कि आपके मोहल्ले के लोगों को पास्ता पसंद भी है या नहीं। स्मार्ट तरीका क्या होगा। आप पहले एक छोटा सा स्टाल लगाए और वहां सिर्फ २ तरह के बेस्ट पास्ता बेचे। अगर लोगों को स्वाद पसंद आया और वो बार-बार आने लगे तब जाकर आप दुकान के पेंट और फर्नीचर पर पैसा खर्च करे। एमवीपी आपकी वही छोटी सी दुकान है। यह आपको अमीर नहीं बनाती बल्कि आपको यह बताती है कि आप गरीब तो नहीं होने वाले। अगर आपका बेसिक प्रोडक्ट फेल होता है तो आपको दुःख कम होगा क्योंकि आपने अपनी पूरी जायदाद दांव पर नहीं लगाई थी।
अक्सर लोग सोचते है कि एमवीपी का मतलब है कुछ भी आधा-अधूरा या खराब क्वालिटी का कचरा बना देना। भाई साहब ऐसा बिल्कुल नहीं है। एमवीपी का मतलब है काम की चीज पर कम चीज। अगर आप एक चैटिंग ऐप बना रहे है तो उसका मुख्य काम है मैसेज भेजना। अब आप उसमे पहले दिन ही एनिमेटेड स्टिकर्स और वीडियो कॉल का फीचर डालने के चक्कर में ६ महीने बर्बाद कर रहे है। जबकि आपकी ऐप का मैसेज बटन ही ठीक से काम नहीं कर रहा। लोग आपकी ऐप डिलीट करके व्हाट्सएप पर वापस चले जाएंगे और आप वहां बैठकर अपने सुंदर स्टिकर्स को निहारते रह जाएंगे। यह ऐसा ही है जैसे किसी को प्यास लगी है और आप उसे पानी देने के बजाय यह बता रहे है कि आपका गिलास किस ब्रांड का है।
इंडियन आंत्रप्रेन्योर्स में एक और बीमारी होती है जिसे कहते है फीचर क्रीप। उन्हें लगता है कि जितने ज्यादा बटन होंगे प्रोडक्ट उतना ही महंगा और अच्छा लगेगा। पर असलियत यह है कि जितने ज्यादा बटन होंगे यूजर उतना ही ज्यादा कन्फ्यूज होगा। डैन ओल्सन की यह बुक हमें सिखाती है कि हमें लीन होना पड़ेगा। लीन होने का मतलब है फालतू की चर्बी हटाना। अपने आइडिया को इतना सिंपल रखिये कि एक छोटा बच्चा भी उसे समझ सके। जब आप कम खर्च में अपना आईडिया टेस्ट करते है तो आपके पास बाद में सुधार करने के लिए पैसा और हिम्मत दोनों बचते है। याद रखिये परफ़ेक्शन एक धोखा है और एमवीपी उस धोखे से बचने का एकमात्र रास्ता।
लेसन ३ : कस्टमर फीडबैक का असली खेल - ईगो को डस्टबिन में डालिये
आपने एमवीपी बना लिया और मार्केट में उतार भी दिया। अब क्या। अब असली परीक्षा शुरू होती है। डैन ओल्सन कहते है कि आपका प्रोडक्ट आपका बच्चा नहीं है जिसे आप हमेशा सही साबित करने की कोशिश करे। असल में आपका कस्टमर ही आपका सबसे बड़ा गुरु है। लेकिन यहाँ एक समस्या है। ज्यादातर लोग कस्टमर से फीडबैक मांगते तो है पर सुनना वही चाहते है जो उन्हें पसंद हो। अगर कस्टमर कहता है कि भाई तुम्हारी ऐप तो बहुत स्लो है तो फाउंडर का जवाब होता है कि नहीं भाई तेरा इंटरनेट खराब होगा। यह एटीट्यूड आपको सीधा बर्बादी के रास्ते पर ले जाएगा। फीडबैक का मतलब सिर्फ डेटा नहीं है बल्कि यह समझना है कि यूजर को तकलीफ कहाँ हो रही है।
मान लीजिये आपने एक ऐसा जूता बनाया जो दावा करता है कि उसे पहनकर आप कभी नहीं थकेंगे। आपने उसे मार्केट में उतारा और एक महीने बाद आपने कस्टमर से पूछा कि कैसा लगा। कस्टमर कहता है कि जूते तो बहुत आरामदायक है पर इनका रंग इतना अजीब है कि कोई मुझे पार्टी में नहीं बुलाता। अब यहाँ आप दो काम कर सकते है। या तो आप कस्टमर को फैशन सिखाने लगे या फिर शांति से काले और ब्राउन रंग के जूते बनाना शुरू कर दे। समझदार इंसान वही है जो अपनी ईगो को जेब में रखकर कस्टमर की जरूरत के हिसाब से बदल जाए। इसे ही डैन ओल्सन पिवट करना कहते है। यानी जब रास्ता बंद दिखे तो अपनी दिशा बदल लो पर मंजिल मत बदलो।
अक्सर बिजनेस इसलिए फेल हो जाते है क्योंकि वो बंद कमरों में मीटिंग करते रहते है। वो सोचते है कि उन्हें सब पता है। वो लाखों रूपये खर्च करके सर्वे करवाते है पर असल में एक भी असली कस्टमर से बात नहीं करते। डैन ओल्सन का तरीका बहुत सिंपल है। अपने प्रोडक्ट को यूजर के हाथ में दो और बस उसे चुपचाप देखो। वो कहाँ अटक रहा है। वो कौन सा बटन दबाने से डर रहा है। उसकी आंखों में झुंझलाहट है या चमक। यही असली फीडबैक है जो कोई मशीन आपको नहीं बता सकती। अगर आप कस्टमर की अनकही बातों को सुन सकते है तो आप मार्केट के राजा बन सकते है।
भारत में लोग अक्सर शर्म के मारे सच नहीं बोलते। अगर आप किसी दोस्त से पूछेंगे कि मेरा बिजनेस कैसा है तो वो बोलेगा बहुत बढ़िया भाई तू तो आग लगा देगा। पर वो आपका सामान कभी नहीं खरीदेगा। आपको ऐसे लोगों की जरूरत है जो आपके प्रोडक्ट की कमियां निकाल सके। जो आपको बता सके कि आपका प्रोडक्ट क्यों बेकार है। जितना जल्दी आपको अपनी गलतियां पता चलेगी उतना ही कम आपका पैसा बर्बाद होगा। लीन प्रोडक्ट प्लेबुक का पूरा सार यही है कि जल्दी फेल हो और जल्दी सीखो। फीडबैक लूप को इतना तेज बनाइये कि आपकी कमियां आपकी ताकत बन जाए।
दोस्तों, बिजनेस करना कोई रॉकेट साइंस नहीं है पर यह कोई बच्चों का खेल भी नहीं है। द लीन प्रोडक्ट प्लेबुक हमें सिखाती है कि बिना तैयारी के मैदान में उतरना बहादुरी नहीं बेवकूफी है। याद रखिये आपका आइडिया महान हो सकता है पर अगर वो किसी की समस्या हल नहीं कर रहा तो वो सिर्फ एक कचरा है। आज ही अपने बिजनेस आइडिया को इस लीन चश्मे से देखिये। क्या आप वाकई वो बना रहे है जिसकी जरूरत है या आप बस अपनी मर्जी चला रहे है। नीचे कमेंट में लिखिये कि आप अपने बिजनेस में कौन सा एक छोटा सा बदलाव आज ही करने वाले है। इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा नए आइडियाज की बातें तो करता है पर कभी शुरू नहीं करता। चलिए मिलकर इंडिया के बिजनेस कल्चर को और भी बेहतर बनाते है।
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