क्या आप भी उन महान लोगों में से हैं जो करोड़ों का ऑफिस और परफेक्ट लोगो बनाने के चक्कर में अपनी पुश्तैनी जायदाद फूंकने की तैयारी कर रहे हैं। मुबारक हो, आप फेलियर की रेस में सबसे आगे खड़े हैं। बिना मार्केट समझे अपना पैसा बर्बाद करना बंद कीजिये क्योंकि आपका आईडिया सिर्फ आपको ही बेस्ट लग रहा है।
एरिक रीस की द लीन स्टार्टअप हमें सिखाती है कि बिना फालतू खर्चे के एक सक्सेसफुल बिजनेस कैसे खड़ा किया जाता है। आइये जानते हैं वो ३ लेसन्स जो आपके डूबते हुए बिजनेस को बचा सकते हैं।
लेसन १ : एमवीपी का जादू - परफेक्शन के पीछे मत भागो
जरा सोचिये, आप एक शानदार रेस्टोरेंट खोलने का सपना देख रहे हैं। आप बैंक से लोन लेते हैं, सबसे महंगा इटैलियन फर्नीचर मंगाते हैं, शेफ को पेरिस से बुलाते हैं और मेन्यू में ५०० डिश रख देते हैं। ओपनिंग वाले दिन आपको पता चलता है कि आपके इलाके के लोगों को तो सिर्फ मसाला डोसा पसंद है। अब उस महंगे फर्नीचर पर बैठकर रोने के अलावा आपके पास कोई ऑप्शन नहीं बचा। एरिक रीस कहते हैं कि यही वो गलती है जो ज्यादातर स्टार्टअप्स को श्मशान घाट तक ले जाती है। लोग समझते हैं कि जब तक प्रोडक्ट एकदम चकाचक और परफेक्ट नहीं होगा, तब तक उसे लॉन्च नहीं करना चाहिए। भाई साहब, आप आईफोन नहीं बना रहे और अगर बना भी रहे होते, तो याद रखिये कि पहले आईफोन में कॉपी और पेस्ट तक का फीचर नहीं था।
यहीं एंट्री होती है एमवीपी यानी मिनिमम वायेबल प्रोडक्ट की। एमवीपी का मतलब है आपके आईडिया का वो सबसे छोटा और सस्ता रूप जो कस्टमर की असल प्रॉब्लम सॉल्व कर सके। यह कोई कचरा प्रोडक्ट नहीं है, बल्कि यह आपके आईडिया का वो बीज है जिसे आप जमीन में गाड़कर यह चेक करते हैं कि मिट्टी उपजाऊ है भी या नहीं। लोग अक्सर महीनों तक कोडिंग करते रहते हैं, ऑफिस की दीवारों का पेंट चुनते रहते हैं, और जब तक वो मार्केट में आते हैं, तब तक दुनिया बदल चुकी होती है या कोई और उनका आईडिया चुराकर सस्ता जुगाड़ बेच रहा होता है।
मान लीजिये आपको ऑनलाइन जूते बेचने का बिजनेस शुरू करना है। एक तरीका तो यह है कि आप १० लाख का स्टॉक खरीदें, वेबसाइट बनवाएं और वेयरहाउस किराए पर लें। दूसरा लीन तरीका यह है कि आप पड़ोस की जूते की दुकान पर जाएं, जूतों की फोटो खींचें, उन्हें एक बेसिक सी वेबसाइट पर डालें और फेसबुक पर विज्ञापन चला दें। जब कोई आर्डर आए, तो दुकान से जूता खरीदकर खुद पैक करके भेज दें। आपको स्टॉक रखने की जरूरत नहीं, गोदाम की जरूरत नहीं। अगर जूते बिक रहे हैं, तो मतलब आईडिया में दम है। अगर नहीं बिक रहे, तो कम से कम आपके १० लाख रुपये तो बच गए।
परफेक्शन एक ऐसी बीमारी है जो नए एंटरप्रेन्योर्स को लगती है। आप सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे अगर एप थोड़ी स्लो हुई या डिजाइन अच्छा नहीं हुआ। सच तो यह है कि शुरू में किसी को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता कि आपका लोगो कैसा है। कस्टमर को सिर्फ अपने फायदे से मतलब है। अगर आप उनकी प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हैं, तो वो आपके आधे अधूरे प्रोडक्ट के लिए भी पैसे देने को तैयार हो जाएंगे। एमवीपी आपको मार्केट की कड़वी सच्चाई से रूबरू कराता है। यह आपको बताता है कि आपका आईडिया सिर्फ आपके दिमाग की उपज है या सच में किसी की जरूरत है। इसलिए फालतू के तामझाम छोड़िये और सबसे छोटा वर्जन बनाकर कल ही लॉन्च कीजिये।
लेसन २ : बिल्ड मेजर लर्न - डेटा से दोस्ती करो, अपनी ईगो से नहीं
मान लीजिये आप जिम जाते हैं और पहले ही दिन ५० किलो का डंबल उठा लेते हैं। अगले दिन शरीर का जो हाल होगा, वो तो अलग बात है, लेकिन क्या आप सिर्फ एक दिन में बॉडी बना लेंगे। बिल्कुल नहीं। स्टार्टअप भी बिल्कुल वैसा ही है। लोग अक्सर एक बार बड़ा धमाका करने की कोशिश करते हैं और जब वो फुस्स हो जाता है, तो चादर तानकर सो जाते हैं। एरिक रीस कहते हैं कि स्टार्टअप कोई रॉकेट साइंस नहीं है जिसे एक बार छोड़ दिया तो वो सीधा चाँद पर जाएगा। यह तो एक पुरानी खटारा गाड़ी चलाने जैसा है जिसे बार-बार स्टियरिंग घुमाकर रास्ते पर लाना पड़ता है। इसी को कहते हैं बिल्ड मेजर लर्न फीडबैक लूप।
इसका सिंपल सा मतलब है: कुछ बनाओ (Build), देखो कि लोग उसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं (Measure), और फिर जो डेटा मिले उससे सीखो (Learn)। लेकिन हमारे यहाँ तो लोग अलग ही दुनिया में जीते हैं। वो कुछ ऐसा बना देते हैं जिसकी किसी को जरूरत ही नहीं होती, फिर जब कोई नहीं खरीदता तो कहते हैं कि शायद लोगों का टेस्ट ही खराब है। भाई साहब, अगर आप रेगिस्तान में गरम चाय बेच रहे हैं और कोई नहीं पी रहा, तो इसमें लोगों की गलती नहीं है, आपकी स्ट्रैटेजी की गलती है।
असली एंटरप्रेन्योर वो नहीं है जिसके पास सबसे अच्छा आईडिया है, बल्कि वो है जो सबसे जल्दी सीखता है। मान लीजिये आपने एक फूड डिलीवरी एप बनाई। आपने सोचा था कि लोग रात के खाने के लिए इसे खूब इस्तेमाल करेंगे। लेकिन डेटा कह रहा है कि लोग तो सिर्फ सुबह का नाश्ता आर्डर कर रहे हैं। अब यहाँ दो तरह के लोग होंगे। पहले वो जो अपनी ईगो पर ले लेंगे और रात के खाने के विज्ञापन पर और पैसा फूकेंगे। दूसरे वो जो समझदार हैं, वो समझ जाएंगे कि मार्केट को नाश्ता चाहिए। वो तुरंत अपनी सर्विस को ब्रेकफास्ट स्पेशल बना देंगे। इसे ही कहते हैं डेटा के हिसाब से खुद को ढालना।
ज्यादातर स्टार्टअप्स इसलिए फेल होते हैं क्योंकि वो उस चीज को 'परफेक्ट' करने में सालों लगा देते हैं जिसे कोई चाहता ही नहीं। वो मेजर (Measure) करना ही भूल जाते हैं। वो सोचते हैं कि जितने ज्यादा फीचर्स होंगे, उतना अच्छा होगा। लेकिन सच तो ये है कि ज्यादा फीचर्स सिर्फ कन्फ्यूजन पैदा करते हैं। आपको यह देखना है कि आपकी एप का कौन सा बटन सबसे ज्यादा दब रहा है और कौन सा हिस्सा लोग इग्नोर कर रहे हैं। अपनी भावनाओं को साइड में रखिये और नंबर्स पर ध्यान दीजिये। अगर डेटा कह रहा है कि आपका आईडिया फ्लॉप है, तो उसे मान लीजिये। यह लूप जितनी जल्दी घूमेगा, आप उतनी ही जल्दी सक्सेस के करीब पहुँचेंगे। याद रखिये, आप यहाँ अपनी पसंद का खिलौना बनाने नहीं आए हैं, आप यहाँ कस्टमर की प्रॉब्लम सॉल्व करने आए हैं।
लेसन ३ : पिवट या परसीवियर - कब रास्ता बदलें और कब डटे रहें
इमेजिन कीजिये कि आप दिल्ली से मुंबई जाने के लिए गाड़ी चला रहे हैं। आधे रास्ते में आपको पता चलता है कि आगे का पुल टूट गया है और रास्ता पूरी तरह बंद है। अब आप क्या करेंगे। क्या आप अपनी गाड़ी को उस टूटे हुए पुल से नीचे कुदा देंगे क्योंकि आपने मुंबई जाने की कसम खाई थी। या फिर आप मैप चेक करेंगे, एक दूसरा रास्ता ढूंढेंगे और अपनी मंजिल की तरफ बढ़ेंगे। स्टार्टअप की दुनिया में इसी को 'पिवट' करना कहते हैं। पिवट का मतलब है अपनी स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदल देना, लेकिन अपने विजन को वही रखना।
एरिक रीस कहते हैं कि हर स्टार्टअप के जीवन में एक ऐसा पल आता है जब उसे यह मुश्किल फैसला लेना पड़ता है। पिवट करना हार मानना नहीं है, बल्कि अपनी पुरानी गलतियों से सीखकर एक नई और बेहतर शुरुआत करना है। दूसरी तरफ होता है 'परसीवियर' यानी जो कर रहे हैं उसे ही पूरी शिद्दत से करते रहना। मुसीबत तब आती है जब लोग इन दोनों के बीच का फर्क नहीं समझ पाते। कुछ लोग अपनी ईगो की वजह से गलत रास्ते पर भागते रहते हैं और तब तक नहीं रुकते जब तक पेट्रोल और पैसा दोनों खत्म न हो जाए। वहीं कुछ लोग थोड़े से स्ट्रगल से घबराकर हर हफ्ते अपना बिजनेस बदल देते हैं।
क्या आपको पता है कि 'इंस्टाग्राम' शुरू में एक ऐसी एप थी जहाँ लोग चेक-इन करते थे और फोटो डालते थे, जिसका नाम 'बर्बन' था। लेकिन उन्होंने नोटिस किया कि लोग चेक-इन तो कर ही नहीं रहे, वो तो सिर्फ फोटो और फिल्टर्स के दीवाने हैं। उन्होंने तुरंत 'पिवट' किया, फालतू के फीचर्स हटाए और बन गया वो इंस्टाग्राम जिसे आज आप रील्स देखने के लिए घंटों बर्बाद करने में इस्तेमाल करते हैं। अगर वो अपनी ईगो पर अड़े रहते कि नहीं हमें तो चेक-इन एप ही बनानी है, तो आज शायद उन्हें कोई नहीं जानता।
पिवट करने के लिए बहुत कलेजा चाहिए। यह स्वीकार करना कि आपकी महीनों की मेहनत अब काम की नहीं रही, कोई आसान बात नहीं है। लेकिन एक सफल एंटरप्रेन्योर वही है जो यह जान ले कि कब रास्ता बदलना है। अगर आपकी ग्रोथ रुक गई है, कस्टमर आपके प्रोडक्ट को घास नहीं डाल रहे, और आपके सारे एक्सपेरिमेंट्स फेल हो रहे हैं, तो यह पिवट करने का टाइम है। लेकिन अगर डेटा दिखा रहा है कि लोग जुड़ रहे हैं और बिजनेस मॉडल धीरे-धीरे ही सही पर काम कर रहा है, तो फिर परसीवियर कीजिये यानी डटे रहिये।
स्टार्टअप एक मैराथन है, स्प्रिंट नहीं। यह उन लोगों का खेल है जो गिरकर संभलना जानते हैं। द लीन स्टार्टअप हमें यही सिखाती है कि फेल होना कोई बुरी बात नहीं है, बशर्ते आप उस फेलियर से कुछ सीखें और उसे दोबारा न दोहराएं। तो क्या आप तैयार हैं अपने आईडिया को हकीकत में बदलने के लिए। फालतू के खर्चे और परफेक्शन का भूत उतारिए, मार्केट में उतरिए, सीखिए और तब तक मत रुकिए जब तक आप सफल न हो जाएं। याद रखिये, दुनिया आपके आईडिया की नहीं, आपके रिजल्ट्स की कद्र करती है। आज ही अपना पहला कदम उठाइये और कुछ ऐसा बनाइये जिस पर आपको और आपके देश को गर्व हो।
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