The Management Myth (Hindi)


क्या आप अभी भी उन महंगे मैनेजमेंट गुरुस की फालतू थ्योरीज पढ़कर अपना टाइम और पैसा बर्बाद कर रहे हैं? बड़े दुःख की बात है कि आप अब भी उसी कॉर्पोरेट जाल में फंसे हैं जहाँ स्मार्ट दिखने के चक्कर में लोग गधों की तरह काम कर रहे हैं।

आज हम मैथ्यू स्टुअर्ट की बुक द मैनेजमेंट मिथ के जरिए उन झूठे दावों की पोल खोलेंगे जो आपकी तरक्की को रोक रहे हैं। आइये जानते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपको एक असली और समझदार लीडर बनाएंगे।


लेसन १ : मैनेजमेंट कोई साइंस नहीं बल्कि एक फिलोसॉफी है

अक्सर ऑफिस की गलियों में आपको ऐसे लोग मिलेंगे जो सूट बूट पहनकर ऐसी भाषा में बात करते हैं जैसे वो मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने का फार्मूला खोज रहे हों। वो आपको चार्ट्स दिखाएंगे। वो आपको ऐसे ग्राफ्स दिखाएंगे जिन्हें देखकर लगता है कि अगर ये लाइन ऊपर नहीं गई तो दुनिया खत्म हो जाएगी। मैथ्यू स्टुअर्ट बड़े प्यार से इस गुब्बारे में सुई चुभाते हैं। वो कहते हैं कि मैनेजमेंट कोई साइंस नहीं है। साइंस वो होती है जिसे लैब में टेस्ट किया जा सके और जिसका रिजल्ट हर बार एक जैसा आए। लेकिन ऑफिस में तो इंसान काम करते हैं। और इंसान? वो तो सुबह की चाय अच्छी न मिले तो पूरे दिन का प्लान बदल देते हैं।

सोचिये आप एक टीम लीडर हैं। आपने एक बहुत ही कॉम्प्लेक्स एक्सेल शीट बनाई है जो बताती है कि अगर हर कोई १० मिनट कम लंच ब्रेक लेगा तो कंपनी का प्रॉफिट ५ परसेंट बढ़ जाएगा। वाह। क्या थ्योरी है। लेकिन असलियत में क्या होता है? लोग उस १० मिनट की कसर वाशरूम में रील देखकर पूरी कर लेते हैं। यहाँ आपकी सारी साइंस धरी की धरी रह गई। मैनेजमेंट असल में फिलोसॉफी है। यह इस बारे में है कि आप लोगों को कैसे देखते हैं। क्या आप उन्हें सिर्फ एक नंबर समझते हैं या फिर जीता जागता इंसान?

कॉर्पोरेट दुनिया ने मैनेजमेंट को एक रहस्यमयी विद्या बना दिया है। जैसे कोई जादू टोना हो जिसे सिर्फ एमबीए की डिग्री वाले ही समझ सकते हैं। लेखक बताते हैं कि पुराने जमाने में फिलोसॉफर्स भी यही करते थे। वो ऐसी भारी भरकम बातें करते थे कि आम आदमी को लगे कि ये तो कोई बहुत बड़ी चीज है। आज के मैनेजमेंट गुरुस भी वही कर रहे हैं। वो सिंपल सी बात को इतना घुमा फिरा कर कहेंगे कि आप खुद को ही गधा समझने लगेंगे। मिसाल के तौर पर अगर उन्हें कहना हो कि अपने काम करने वालों से तमीज से बात करो तो वो कहेंगे कि हमें इंटरपर्सनल कम्युनिकेशन स्ट्रेटजी को सिनर्जी के साथ अलाइन करना होगा। भाई साहब कहना क्या चाहते हो? सीधा बोलो न कि इंसान बनो।

हम अक्सर उन लोगों के पीछे भागते हैं जो खुद को एक्सपर्ट कहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि ये एक्सपर्ट्स अपनी ही कंपनी ढंग से नहीं चला पाते? वो दूसरों को ज्ञान बांटते फिरते हैं क्योंकि ज्ञान बेचना आसान है और जिम्मेदारी लेना मुश्किल। असली मैनेजमेंट तो वो है जो आप अपने घर में या दोस्तों के साथ करते हैं। जब आप बिना किसी फॉर्मूले के सबको साथ लेकर चलते हैं। जब आप समझते हैं कि हर इंसान की अपनी एक कहानी है और उसकी अपनी परेशानियां हैं।

स्टुअर्ट हमें याद दिलाते हैं कि अगर आप सिर्फ डेटा और नंबर्स के भरोसे बैठे हैं तो आप एक मशीन चला रहे हैं न कि एक टीम। नंबर्स कभी पूरी कहानी नहीं बताते। वो सिर्फ वो हिस्सा दिखाते हैं जो आप देखना चाहते हैं। अगर आपका बॉस आपसे कहे कि इस साल हमें ४० परसेंट ग्रोथ चाहिए तो वो कोई साइंस नहीं बता रहा। वो बस अपना बोनस पक्का करना चाह रहा है। असली मैनेजमेंट तो वो है जहाँ आप ये समझें कि वो ४० परसेंट आएगा कहाँ से और उसे लाने वाले लोगों का मानसिक हाल क्या है। इसलिए उन भारी भरकम थ्योरीज से बाहर निकलिए और हकीकत की जमीन पर कदम रखिये।


लेसन २ : किताबी थ्योरी और असल जिंदगी का फासला

क्या आपने कभी उन मोटी किताबों को देखा है जो आपको सिखाती हैं कि कैसे एक सफल लीडर बनें? उन किताबों में सब कुछ इतना परफेक्ट होता है जैसे कि ऑफिस नहीं बल्कि स्वर्ग की कोई कंपनी हो। मैथ्यू स्टुअर्ट हमें बताते हैं कि ये सारी थ्योरीज अक्सर सिर्फ कागज पर ही अच्छी लगती हैं। हकीकत में ऑफिस का माहौल किसी जंग के मैदान से कम नहीं होता। जहाँ किताबी ज्ञान धुआं हो जाता है। आप चाहे कितनी भी बड़ी यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए हों। अगर आपको ये नहीं पता कि उस खड़ूस क्लाइंट को कैसे संभालना है जो बिना बात के चिल्लाता है तो आपकी डिग्री सिर्फ एक रद्दी का टुकड़ा है।

कल्पना कीजिये कि आप एक बहुत बड़ी कंसल्टिंग फर्म के मैनेजर हैं। आपने पूरी रात जागकर एक प्रेजेंटेशन तैयार की है। आपने उसमें ऐसी ऐसी टर्म्स डाली हैं जिन्हें सुनकर डिक्शनरी भी शर्मा जाए। आपका प्लान है कि कैसे कंपनी की एफिशिएंसी को बढ़ाया जाए। अगले दिन आप मीटिंग रूम में जाते हैं। सब आपकी तरफ ऐसे देखते हैं जैसे आप कोई मसीहा हों। लेकिन जैसे ही आप बोलना शुरू करते हैं। बिजली चली जाती है। प्रोजेक्टर खराब हो जाता है। और जिस डायरेक्टर को आपको इम्प्रेस करना था उसे अपनी बीवी का फोन आ जाता है। अब कहाँ गई आपकी वो थ्योरी? अब तो बस आपका जुगाड़ ही काम आएगा।

मैनेजमेंट के तथाकथित एक्सपर्ट्स आपको बताएंगे कि हर चीज के लिए एक सिस्टम होना चाहिए। वो कहेंगे कि अगर आप स्टेप ए के बाद स्टेप बी करेंगे तो सक्सेस पक्की है। लेकिन लाइफ तो सस्पेंस फिल्म की तरह है। यहाँ स्टेप ए के बाद सीधे जेड भी आ सकता है। लेखक बड़े मजे लेकर बताते हैं कि कैसे ये एक्सपर्ट्स अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए नए नए शब्द ईजाद करते हैं। अगर कोई प्लान फेल हो जाए तो वो ये नहीं कहेंगे कि हमने गलती की। वो कहेंगे कि मार्केट का डायनामिक्स शिफ्ट हो गया है। या फिर कहेंगे कि हमें अपने विजन को फिर से कैलिब्रेट करने की जरूरत है। सुनने में कितना कूल लगता है न? पर असल में ये सिर्फ अपनी इज्जत बचाने का एक तरीका है।

एक कंपनी ने अपने एम्प्लॉईज को मोटिवेट करने के लिए एक बड़ा सा बैनर लगाया। उस पर लिखा था कि हम सब एक परिवार हैं। अगले ही हफ्ते उन्होंने कॉस्ट कटिंग के नाम पर आधे परिवार को बाहर निकाल दिया। यही वो कड़वा सच है जिसे मैनेजमेंट की किताबें अक्सर छुपा जाती हैं। स्टुअर्ट कहते हैं कि मैनेजमेंट कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप किसी बंद कमरे में बैठकर प्लान कर सकें। ये तो वो है जो आप हर दिन की मुश्किलों के बीच करते हैं। जब आपके पास बजट कम हो और काम पहाड़ जैसा। तब जो आप रास्ता निकालते हैं वही असली मैनेजमेंट है।

अक्सर हमें सिखाया जाता है कि बेस्ट प्रैक्टिस को फॉलो करो। यानी जो दूसरी बड़ी कंपनियों ने किया वही आप भी करो। लेकिन ये तो वही बात हुई कि पड़ोसी का बच्चा डॉक्टर बना है तो आप भी उसे देखकर डॉक्टर बनने की कोशिश करें। चाहे आपको खून देखकर चक्कर ही क्यों न आते हों। हर बिजनेस की अपनी एक आत्मा होती है। हर टीम का अपना एक मिजाज होता है। दूसरों की नकल करके आप शायद थोड़े समय के लिए स्मार्ट दिख जाएं। लेकिन लंबी रेस में आप बुरी तरह हांफने लगेंगे। इसलिए किताबी ज्ञान की बेड़ियों को तोड़िये। अपने कान और आंखें खुली रखिये। क्योंकि असल सबक क्लासरूम में नहीं बल्कि ऑफिस के उस वाटर कूलर के पास मिलते हैं जहाँ लोग सच में दिल की बात करते हैं।


लेसन ३ : असली ताकत इंसानी समझ में है, नंबर्स में नहीं

आपने वो नजारा तो देखा ही होगा जब बॉस हाथ में लाल पेन लेकर मीटिंग में आता है। वो बोर्ड पर लिखे नंबर्स को ऐसे देखता है जैसे वो किसी खजाने का नक्शा हों। उसे लगता है कि अगर ये नंबर बदल गए तो कंपनी की किस्मत चमक जाएगी। मैथ्यू स्टुअर्ट हमें यही समझाते हैं कि असली खेल नंबर्स का नहीं बल्कि उन इंसानों का है जो उन नंबर्स के पीछे खड़े हैं। अगर आप सिर्फ डेटा के दीवाने हैं तो आप एक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। आप एक ऐसी कार चलाने की कोशिश कर रहे हैं जिसका इंजन तो खराब है पर आप उसके डैशबोर्ड पर चमकती लाइटों को देखकर खुश हो रहे हैं।

सोचिये आपकी कंपनी में एक एम्प्लॉई है जो पिछले पाँच साल से सबसे ज्यादा काम कर रहा है। अचानक उसकी परफॉरमेंस गिर जाती है। एक 'मैनेजमेंट एक्सपर्ट' तुरंत ग्राफ देखेगा और कहेगा कि इसे बाहर निकालो। इसकी एफिशिएंसी कम हो गई है। लेकिन एक असली लीडर क्या करेगा? वो उसके पास जाकर पूछेगा कि भाई क्या बात है? शायद उसके घर में कोई परेशानी हो। शायद वो बस थोड़े से आराम का हकदार हो। जब आप उसे एक इंसान की तरह ट्रीट करते हैं तो वो आपके लिए जान लगा देता है। नंबर्स आपको ये कभी नहीं बता पाएंगे कि वफादारी और मेहनत का असली मोल क्या है।

अक्सर बड़े बड़े कंसल्टेंट्स आते हैं और आपकी कंपनी को री-स्ट्रक्चर करने का ज्ञान देते हैं। वो कहते हैं कि इस डिपार्टमेंट को हटा दो और उसे उस डिपार्टमेंट में मिला दो। सुनने में यह किसी पहेली को सुलझाने जैसा लगता है। लेकिन असल में वो उस टीम की सालों की मेहनत और उनके आपसी रिश्तों को तोड़ रहे होते हैं। ये एक्सपर्ट्स ऐसे बिहेव करते हैं जैसे वो किसी वीडियो गेम के कैरेक्टर्स को इधर उधर कर रहे हों। उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि इससे किसी की नींद उड़ रही है या किसी का मोटिवेशन खत्म हो रहा है। स्टुअर्ट कहते हैं कि मैनेजमेंट का सबसे बड़ा मिथ यही है कि इसे कंट्रोल किया जा सकता है। हकीकत में आप केवल लोगों को प्रेरित कर सकते हैं। उन्हें कंट्रोल करना तो बस एक वहम है।

ऑफिस में अक्सर ऐसे लोग प्रमोट होते हैं जो केवल अच्छी बातें करना जानते हैं। वो नंबर्स को ऐसे घुमाकर पेश करेंगे कि आपको लगेगा वो कोई जादूगर हैं। लेकिन जब सच में काम करने की बारी आती है तो वो गायब हो जाते हैं। असली मैनेजमेंट वो है जो काम की गहराई को समझे। जो ये देखे कि कौन सच में पसीना बहा रहा है और कौन सिर्फ एसी में बैठकर हवाबाजी कर रहा है। अगर आपकी आँखें सिर्फ एक्सेल शीट पर टिकी हैं तो आप उस टैलेंट को कभी नहीं देख पाएंगे जो आपकी कंपनी को सच में आगे ले जा सकता है।

मैथ्यू स्टुअर्ट हमें याद दिलाते हैं कि एथिक्स और मोरालिटी कोई ऐसी चीजें नहीं हैं जिन्हें सिर्फ संडे के प्रवचन में सुना जाए। ये बिजनेस चलाने का सबसे जरूरी हिस्सा हैं। अगर आप अपनी टीम के साथ ईमानदार नहीं हैं तो आपकी सारी थ्योरीज और सारे टूल्स धरे के धरे रह जाएंगे। भरोसा कमाना सबसे मुश्किल काम है और इसे किसी चार्ट पर नहीं दिखाया जा सकता। इसलिए उन भारी भरकम मैनेजमेंट टर्म्स को डस्टबिन में डालिये। एक इंसान बनिए। अपनी टीम की बात सुनिए। और देखिये कि कैसे बिना किसी 'मैनेजमेंट गुरु' के आपकी कंपनी कमाल करती है। अंत में वही जीतता है जिसके साथ लोग दिल से जुड़े होते हैं।


अगर आपको भी लगता है कि कॉर्पोरेट दुनिया की ये खोखली थ्योरीज अब बंद होनी चाहिए तो इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो मैनेजर बनने का सपना देख रहे हैं। नीचे कमेंट में बताइये कि क्या आपके बॉस ने भी कभी कोई ऐसी अजीब थ्योरी आप पर थोपी है? आइये मिलकर एक ऐसा वर्क कल्चर बनाएं जहाँ इंसानों की कद्र नंबर्स से ज्यादा हो।

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