क्या आप भी अपनी पूरी जिंदगी 'कल से पक्का' वाले झूठ के सहारे जी रहे हैं। मुबारक हो। आप आलस के नहीं बल्कि परफेक्शनिज्म के उस जाल में फंसे हैं जहाँ आपका दिमाग काम शुरू करने से पहले ही हार मान लेता है। अपनी खुशियों को कुर्बान करके आप खुद को महान समझ रहे हैं लेकिन असल में आप सिर्फ अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहे हैं।
आज हम नील फियोर की मशहूर किताब द नाउ हैबिट से वो सीक्रेट्स सीखेंगे जो आपको काम टालने की बीमारी से आजाद कर देंगे। ये आर्टिकल आपको गिल्ट फ्री प्ले और अनशेड्यूलिंग जैसे पावरफुल टूल्स के जरिए एक प्रोडक्टिव इंसान बनाएगा। चलिए इन ३ लेसन्स को गहराई से समझते हैं।
लेसन १ : अनशेड्यूलिंग का असली जादू
हम सब की एक बहुत पुरानी बीमारी है। जब भी कोई नया साल आता है या मंडे आता है तो हम एक लंबा चौड़ा टू डू लिस्ट बना लेते हैं। उस लिस्ट में सुबह ५ बजे उठने से लेकर रात १० बजे तक सिर्फ काम ही काम भरा होता है। और फिर क्या होता है। शाम होते होते हम उसी लिस्ट के ऊपर समोसे रख कर खा रहे होते हैं क्योंकि हमसे एक भी काम पूरा नहीं होता। नील फियोर कहते हैं कि यह आपकी सबसे बड़ी गलती है। आप खुद को एक कैदी की तरह ट्रीट कर रहे हैं जिसके पास सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है। आपका दिमाग इस गुलामी से नफरत करता है और इसीलिए वो आपको इंस्टाग्राम रील्स की दुनिया में भगा देता है। इसे ही हम प्रोक्रास्टिनेशन कहते हैं।
यहीं पर काम आता है अनशेड्यूलिंग का कॉन्सेप्ट। यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन यह बहुत असरदार है। आपको अपना शेड्यूल काम से नहीं बल्कि अपने मजे से शुरू करना चाहिए। जी हां आपने सही सुना। सबसे पहले अपने कैलेंडर में वो समय लिखिये जब आप सोएंगे। जब आप खाना खाएंगे। जब आप दोस्तों के साथ गप्पे मारेंगे या जब आप नेटफ्लिक्स देखेंगे। जब आप अपनी मजे वाली चीजों को पहले ही सुरक्षित कर लेते हैं तो आपका दिमाग शांत हो जाता है। उसे पता होता है कि भाई शाम को तो क्रिकेट खेलना ही है तो अभी २ घंटे काम करने में क्या बुराई है।
मान लीजिये आपके पास एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। आप उसे देखकर ऐसे डर रहे हैं जैसे सामने कोई बिना मास्क वाला जोम्बी खड़ा हो। आप सोचते हैं कि जब तक यह खत्म नहीं होगा मै चैन से नहीं बैठूँगा। नतीजा यह होता है कि आप न तो काम कर पाते हैं और न ही चैन से बैठ पाते हैं। लेकिन अगर आप खुद से कहें कि मै सिर्फ ३० मिनट काम करूँगा और उसके बाद पक्का एक एपिसोड देखूँगा तो आपका दिमाग मान जाता है। अनशेड्यूलिंग आपको यह एहसास दिलाती है कि आपके पास वक्त की कमी नहीं है बल्कि आप वक्त के मालिक हैं।
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि जितना ज्यादा वो खुद को तपाएंगे उतना ही अच्छा रिजल्ट मिलेगा। लेकिन भाई साहब आप कोई लोहा नहीं हैं जिसे भट्टी में डालना जरूरी है। आप एक इंसान हैं। जब आप अपने दिन को खुशियों से भर देते हैं तो काम करना बोझ नहीं लगता। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी शादी में जाते हैं। वहां कितना भी शोर हो या थकान हो आप नाचते रहते हैं क्योंकि आपको पता है कि यह मजा थोड़ी देर का ही है। ठीक वैसे ही जब आप अपने काम के बीच में मजे के छोटे छोटे टुकड़े डाल देते हैं तो आपका काम भी एक डांस की तरह स्मूथ हो जाता है।
प्रोक्रास्टिनेशन असल में काम से बचने का तरीका नहीं है बल्कि उस तनाव से बचने का तरीका है जो आपने काम के साथ जोड़ दिया है। अनशेड्यूलिंग उस तनाव की जड़ ही काट देती है। जब आप यह जान लेते हैं कि काम खत्म करने के बाद आपको कोई मेडल नहीं बल्कि अपनी पसंद का काम करने की आजादी मिलेगी तो आप खुद ही 'नाउ' यानी अभी वाले मोड में आ जाते हैं। यह लेसन आपको सिर्फ काम करना नहीं सिखाता बल्कि आपको अपनी लाइफ का रिमोट कंट्रोल वापस दिलाता है।
लेसन २ : परफेक्शनिज्म का डर और काम की शुरुआत
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपने किसी प्रोजेक्ट के बारे में सोचा और फिर तुरंत गूगल पर जाकर 'बेस्ट आइडियाज' सर्च करने लगे। आप चाहते हैं कि जब आप अपना काम दुनिया को दिखाएं तो लोग खड़े होकर तालियां बजाएं और आपको ऑस्कर दे दें। लेकिन असलियत में आप उस सफेद खाली पन्ने को घंटों तक देखते रहते हैं। नील फियोर कहते हैं कि आपका यह 'परफेक्ट' बनने का भूत ही आपको 'प्रोक्रास्टिनेटर' बना रहा है। आप फेल होने से इतना डरते हैं कि आप शुरू ही नहीं करते। आपको लगता है कि अगर काम बेस्ट नहीं हुआ तो लोग क्या कहेंगे। भाई साहब लोग वैसे भी कुछ न कुछ कहेंगे ही। तो क्यों न आप कुछ करके उनकी बातें सुन लें।
परफेक्शनिज्म असल में एक बहुत ही सोफिस्टिकेटेड बहाना है। यह आपके दिमाग का वो हिस्सा है जो कहता है कि अगर तुम इसे ठीक से नहीं कर सकते तो इसे करो ही मत। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई इंसान जिम जाने से पहले सोचे कि जब तक मेरी बॉडी रितिक रोशन जैसी नहीं दिखेगी तब तक मै टी शर्ट नहीं उतारूंगा। अब भाई जब तक जिम जाओगे नहीं तब तक बॉडी बनेगी कैसे। हम अक्सर खुद को यह कहकर बेवकूफ बनाते हैं कि हम तो 'क्वालिटी' पर ध्यान दे रहे हैं। पर सच तो यह है कि हम सिर्फ अपनी बेइज्जती होने से डर रहे हैं। इस डर की वजह से हम काम को कल पर टालते रहते हैं और वो 'कल' कभी नहीं आता।
मान लीजिये आपको अपनी क्रश को मैसेज करना है। आप आधे घंटे तक बैकस्पेस दबाते रहते हैं। आप सोचते हैं कि क्या लिखूं कि वो इम्प्रेस हो जाए। 'हाय' लिखूं या 'हेलो' या फिर कोई शायरी मार दूं। इस चक्कर में आप रात के २ बजा देते हैं और मैसेज कभी जाता ही नहीं। लेकिन आपका वो दोस्त जो बिल्कुल फालतू बातें करता है वो 'क्या हाल है' लिखकर बाजी मार ले जाता है। काम का भी यही हाल है। परफेक्शन के चक्कर में बैठे रहने से अच्छा है कि आप एक बहुत ही खराब शुरुआत करें। कम से कम आपके पास सुधारने के लिए कुछ तो होगा।
नील फियोर हमें 'स्टार्टिंग' पर फोकस करने के लिए कहते हैं न कि 'फिनिशिंग' पर। जब आप सोचते हैं कि मुझे यह पूरा काम खत्म करना है तो आपका बीपी बढ़ जाता है। लेकिन जब आप खुद से कहते हैं कि मुझे बस १५ मिनट के लिए इस पर बैठना है और चाहे जितना भी गंदा काम हो मुझे बस शुरू करना है तो सारा प्रेशर खत्म हो जाता है। इसे 'लो प्रेशर' काम कहिये। जब आप खुद को फेल होने की इजाजत दे देते हैं तो आप असल में ज्यादा क्रिएटिव हो जाते हैं।
याद रखिये कि दुनिया के बड़े बड़े राइटर्स और बिजनेसमैन ने भी पहले बहुत ही घटिया ड्राफ्ट्स तैयार किए थे। उन्होंने बस शुरुआत की थी। परफेक्शन का बोझ उतार कर फेंक दीजिये। यह आपके कंधे झुका देता है और आपकी रफ़्तार धीमी कर देता है। जब आप यह मान लेते हैं कि पहली बार में सब कुछ बिगड़ना तय है तो आप मजे से काम शुरू कर पाते हैं। और यकीन मानिये एक बार जब आप शुरू कर देते हैं तो आपका दिमाग अपने आप उसे बेहतर बनाने के रास्ते ढूंढ लेता है। तो अगली बार जब परफेक्शनिज्म आपके कान में आकर कहे कि 'अभी रुक जाओ' तो उसे बोलिये कि 'भाई तू साइड हट मुझे बस शुरू करने दे'।
लेसन ३ : गिल्ट फ्री प्ले और काम का नया नजरिया
क्या आपको याद है बचपन में जब आप स्कूल से घर आते थे और बिना किसी टेंशन के सीधे मैदान में खेलने भाग जाते थे। तब आपको यह फिक्र नहीं होती थी कि होमवर्क बचा है या कल टेस्ट है। लेकिन जैसे जैसे हम बड़े हुए हमने खेल और मजे को एक 'क्राइम' बना दिया। आजकल का माहौल ऐसा है कि अगर आप काम नहीं कर रहे हैं तो आपको अपराधी जैसा महसूस कराया जाता है। आप अगर संडे को सोफे पर लेटे हैं तो आपका दिमाग आपको ताने मारता है कि 'देख तेरा दोस्त जिम जा रहा है और तू यहाँ पड़ा है'। नील फियोर कहते हैं कि यही वो गिल्ट है जो आपकी क्रिएटिविटी का गला घोंट देता है। इसे खत्म करने का एक ही तरीका है और वो है 'गिल्ट फ्री प्ले'।
गिल्ट फ्री प्ले का मतलब है वो समय जब आप पूरी तरह से आज़ाद हों और आपके दिमाग के किसी कोने में भी काम का भूत न नाच रहा हो। अक्सर हम क्या करते हैं। हम काम टालते हैं और उस खाली समय में यूट्यूब पर मोटिवेशनल वीडियो देखते हैं या रील्स स्क्रोल करते हैं। क्या इसे मजा कहेंगे। बिल्कुल नहीं। यह तो सजा है। आप न काम कर रहे हैं और न ही मजे कर रहे हैं। आप बस एक बीच के दलदल में फंसे हैं जहाँ सिर्फ पछतावा है। लेखक कहते हैं कि अगर आप हफ्ते में कम से कम १५ से २० घंटे बिना किसी शर्म के मौज मस्ती के लिए निकालते हैं तो आपका काम करने का मन खुद ब खुद होने लगेगा।
मान लीजिये आप एक डाइट पर हैं और आपने कसम खाई है कि आप पिज्जा नहीं छुएंगे। लेकिन आपका पूरा ध्यान उसी पिज्जा पर है। अंत में आप टूट जाते हैं और छुपकर पिज्जा खाते हैं लेकिन उस वक्त भी आप डर रहे होते हैं कि कोई देख न ले। क्या आपको उस पिज्जा का स्वाद आया। नहीं। लेकिन अगर आप पहले ही तय कर लेते कि सैटरडे नाइट को मै एक स्लाइस पिज्जा पक्का खाऊंगा तो आप पूरे हफ्ते खुशी खुशी सलाद खा पाते। काम के साथ भी यही लॉजिक है। जब आपको पता होता है कि शाम को पक्का दोस्तों के साथ महफ़िल जमेगी तो आप दोपहर में जी जान लगाकर काम निपटाते हैं।
जब हम खुद को मजे करने की परमिशन देते हैं तो हमारा दिमाग हमें रिवॉर्ड देने लगता है। यह एक साइकिल की तरह काम करता है। ज्यादा खेल मतलब कम तनाव और कम तनाव मतलब ज्यादा फोकस। हम अक्सर सोचते हैं कि मजे करना वक्त की बर्बादी है लेकिन असल में मजे न करना सबसे बड़ी बर्बादी है क्योंकि थका हुआ दिमाग कभी भी जीनियस आइडियाज पैदा नहीं कर सकता। आपका दिमाग एक बैटरी की तरह है। अगर आप उसे सिर्फ डिस्चार्ज करते रहेंगे तो वो एक दिन डेड हो जाएगी। उसे चार्ज करने के लिए आपको वो काम करने होंगे जो आपको खुशी देते हैं चाहे वो गिटार बजाना हो या बस छत पर लेटकर तारे गिनना।
तो अब से अपनी लाइफ को सिर्फ 'काम की जेल' मत बनाइये। अपने कैलेंडर में सबसे पहले मजे के लिए जगह बनाइये। जब आप खुलकर जीना सीख जाएंगे तो काम टालने की आदत खुद ही गायब हो जाएगी क्योंकि तब काम आपके लिए बोझ नहीं बल्कि उस मजे तक पहुँचने का एक जरिया बन जाएगा। अपनी आज़ादी को वापस मांगिये और याद रखिये कि आप काम करने के लिए पैदा नहीं हुए हैं बल्कि आप एक शानदार जिंदगी जीने के लिए पैदा हुए हैं जिसमें काम सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है।
अब वक्त आ गया है कि आप उस 'कल' को मार दें जो कभी आता ही नहीं। द नाउ हैबिट हमें सिखाती है कि हमारी असली ताकत 'अभी' में है। प्रोक्रास्टिनेशन कोई आदत नहीं बल्कि एक डर है जिसे आप अपनी खुशियों से जीत सकते हैं। क्या आप तैयार हैं अपने गिल्ट को पीछे छोड़कर एक नई शुरुआत करने के लिए। नीचे कमेंट में लिखिये 'मै अभी शुरू करूँगा' और इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा 'कल' का इन्तजार करता रहता है। आपकी एक शेयर किसी की जिंदगी से आलस का जाला साफ कर सकती है।
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