The Presentation Secrets of Steve Jobs (Hindi)


क्या आप भी अपनी बोरिंग प्रेजेंटेशन से लोगों को सुलाने का टैलेंट रखते हैं। मुबारक हो। आप अपनी ग्रोथ का गला खुद ही घोंट रहे हैं। जब तक आप स्टीव जॉब्स जैसे सीक्रेट्स नहीं सीखेंगे तब तक लोग आपकी बातों को अनसुना ही करेंगे और आप बस एक एवरेज एम्प्लोयी बनकर ही रह जाएंगे।

स्टीव जॉब्स सिर्फ एक गैजेट्स बेचने वाले इंसान नहीं थे बल्कि वह एक जादूगर थे जो अपनी बातों से दुनिया बदलते थे। आज हम उनकी बुक द प्रेजेंटेशन सीक्रेट्स ऑफ स्टीव जॉब्स से वह 3 लेसन सीखेंगे जो आपको इंसैनली ग्रेट बना देंगे।


लेसन १ : अपनी कहानी में विलेन को ढूंढें और उसे खत्म करें

सोचिए आप एक फिल्म देख रहे हैं जहां सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा है। हीरो खुश है। हीरोइन खुश है। कोई लड़ाई नहीं। कोई विलेन नहीं। क्या आप ऐसी फिल्म 10 मिनट भी देखेंगे। बिल्कुल नहीं। आप तुरंत सो जाएंगे। यही गलती हम अपनी प्रेजेंटेशन में करते हैं। हम सीधे अपने प्रोडक्ट या आइडिया की तारीफ शुरू कर देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि जब तक कोई प्रॉब्लम नहीं होगी तब तक आपके सोल्यूशन की कोई वैल्यू नहीं होगी। स्टीव जॉब्स जानते थे कि लोगों को कहानी पसंद है। और हर कहानी को एक विलेन चाहिए होता है।

मान लीजिए आप एक नया वॉटर प्यूरीफायर बेचने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आप सीधे फीचर्स गिनाएंगे तो लोग बोर हो जाएंगे। लेकिन अगर आप पहले यह दिखाएं कि कैसे गंदा पानी आपके परिवार की सेहत को धीरे-धीरे बर्बाद कर रहा है तो आपने एक विलेन खड़ा कर दिया है। यहाँ विलेन कोई इंसान नहीं बल्कि वह गंदा पानी और बीमारियां हैं। जब आप अपनी ऑडियंस को उस विलेन से डराते हैं तब वह आपके हीरो यानी आपके वॉटर प्यूरीफायर का बेसब्री से इंतजार करते हैं। स्टीव जॉब्स जब भी कोई नया प्रोडक्ट लॉन्च करते थे तो वह पहले मार्केट की कमियों और कॉम्पिटिटर की गलतियों को विलेन की तरह पेश करते थे। वह बताते थे कि कैसे मौजूदा फोन्स इस्तेमाल करने में बहुत मुश्किल और सरदर्द वाले हैं।

जब वह विलेन को अच्छे से पेंट कर देते थे तब लोग खुद ही चिल्लाने लगते थे कि कोई तो हमें बचाओ। और तभी स्टीव जॉब्स अपने जादुई अंदाज में आईफोन को स्टेज पर लाते थे। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे बॉलीवुड की फिल्मों में गब्बर सिंह की एंट्री के बाद जय और वीरू का आना। अगर गब्बर नहीं होता तो जय-वीरू की क्या ही इज्जत होती। आपकी प्रेजेंटेशन में विलेन आपकी ऑडियंस की वह तकलीफ है जिसे वह रोज झेल रहे हैं। आपको बस उस तकलीफ पर थोड़ा नमक छिड़कना है।

इसे एक ऑफिस मीटिंग के उदाहरण से समझते हैं। आप चाहते हैं कि कंपनी नया सॉफ्टवेयर खरीदे। अगर आप कहेंगे कि यह सॉफ्टवेयर बहुत फास्ट है तो शायद बॉस मना कर दें। लेकिन अगर आप उन्हें यह दिखाएं कि कैसे पुराना सॉफ्टवेयर हर महीने एम्प्लोयीज के 100 घंटे बर्बाद कर रहा है और कंपनी का लाखों का नुकसान कर रहा है तो आपने विलेन खड़ा कर दिया है। अब वह 100 घंटों का नुकसान आपका विलेन है। जब आप यह विलेन दिखा देते हैं तो बॉस खुद कहेंगे कि भाई जल्दी बताओ इसका इलाज क्या है।

याद रखिये बिना विलेन के आपकी प्रेजेंटेशन एक सफेद फीकी दीवार की तरह है जिस पर कोई देखना नहीं चाहता। आपको अपनी कहानी का ड्रामा बढ़ाना होगा। आपको वह टेंशन पैदा करनी होगी जिसे केवल आपका आइडिया ही सुलझा सके। स्टीव जॉब्स कभी भी सिर्फ फीचर्स नहीं बेचते थे वह हमेशा एक जंग लड़ते थे। वह जंग होती थी पुरानी टेक्नोलॉजी बनाम नई सोच की। वह अपनी ऑडियंस को उस जंग का हिस्सा बना देते थे। जब लोग आपकी बात से इमोशनली जुड़ जाते हैं तब वह आपकी हर बात पर भरोसा करने लगते हैं। तो अगली बार जब आप स्टेज पर खड़े हों तो सबसे पहले अपने गब्बर सिंह को ढूंढें। जब लोग विलेन से नफरत करने लगेंगे तभी वह आपके हीरो से प्यार करेंगे।


लेसन २ : सिम्प्लिसिटी का जादू और जादुई स्लाइड्स

क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर की दीवार पर चिपके हुए उस पुराने नोटिस को देखा है। जिसमें इतने सारे शब्द और नियम लिखे होते हैं कि उसे पढ़कर सिर घूमने लगता है। अक्सर लोग अपनी प्रेजेंटेशन की स्लाइड्स को भी उसी कचरे के डिब्बे जैसा बना देते हैं। वह सोचते हैं कि जितना ज्यादा डेटा और टेक्स्ट वो स्लाइड पर डालेंगे उतने ही वो इंटेलिजेंट लगेंगे। लेकिन असलियत में ऑडियंस के दिमाग का दही हो जाता है। स्टीव जॉब्स का मानना था कि सिम्प्लिसिटी यानी सादगी ही दुनिया का सबसे बड़ा सोफिस्टिकेशन है। उनकी स्लाइड्स में शब्द कम और इमोशन ज्यादा होते थे।

सोचिए आप अपने किसी दोस्त को अपनी नई कार के बारे में बता रहे हैं। क्या आप उसे कार के इंजन का पूरा मैनुअल पढ़कर सुनाएंगे। या फिर आप उसे उस कार की एक चमकती हुई फोटो दिखाएंगे और कहेंगे कि भाई यह रॉकेट है। बेशक आप फोटो दिखाएंगे। यही काम स्टीव जॉब्स करते थे। जब पूरी दुनिया अपनी स्लाइड्स में बुलेट पॉइंट्स और लम्बे पैराग्राफ भर रही थी तब स्टीव सिर्फ एक फोटो या एक बड़ा शब्द इस्तेमाल करते थे। वह जानते थे कि अगर ऑडियंस स्लाइड पढ़ने में बिजी हो गई तो वह उनकी बातें सुनना बंद कर देगी। आपका दिमाग एक बार में या तो पढ़ सकता है या सुन सकता है। दोनों काम एक साथ करना वैसा ही है जैसे गाड़ी चलाते हुए फोन पर चैटिंग करना। अंजाम सिर्फ एक्सीडेंट ही होगा।

मान लीजिए आप एक फिटनेस कोच हैं और आप वजन घटाने पर प्रेजेंटेशन दे रहे हैं। एक तरीका यह है कि आप एक स्लाइड बनाएं जिसमें 20 तरीके लिखे हों कि मोटापा कैसे कम करें। दूसरा तरीका यह है कि आप स्लाइड पर सिर्फ एक पिज्जा की फोटो लगाएं जिस पर बड़ा सा कांटा लगा हो और साथ में लिखा हो 'नो मोर'। अब आप सोचिए कौन सी स्लाइड लोगों को ज्यादा याद रहेगी। लोग उस पिज्जा वाली फोटो को कभी नहीं भूलेंगे। इसे कहते हैं विजुअल क्लैरिटी। स्टीव जॉब्स की स्लाइड्स में खाली जगह बहुत होती थी। वह अपनी बात को दबाते नहीं थे बल्कि उसे उभरने का मौका देते थे।

अक्सर ऑफिस की मीटिंग्स में लोग छोटे-छोटे फॉन्ट में ग्राफ और चार्ट डाल देते हैं जिसे पीछे वाली लाइन में बैठा इंसान तो छोड़िए खुद प्रेजेंटर भी ठीक से नहीं पढ़ पाता। यह सिर्फ प्रेजेंटेशन नहीं बल्कि ऑडियंस पर किया गया एक मानसिक हमला है। स्टीव जॉब्स कहते थे कि अगर आपकी स्लाइड पर दस शब्द से ज्यादा हैं तो समझ लीजिए आपने अपनी ऑडियंस को खो दिया है। वह अपनी प्रेजेंटेशन को एक आर्ट गैलरी की तरह सजाते थे न कि किसी किराने की दुकान की लिस्ट की तरह। उनकी स्लाइड्स बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह होती थीं जो सिर्फ उनके परफॉरमेंस को सपोर्ट करती थीं।

एक बार स्टीव से पूछा गया कि क्या उन्हें अपनी सादगी पर गर्व है। उन्होंने कहा कि सादा होना बहुत मुश्किल काम है क्योंकि इसके लिए आपको बहुत गहराई से सोचना पड़ता है। आपको वह सारा कचरा हटाना पड़ता है जो काम का नहीं है। असल में प्रेजेंटेशन देना इस बारे में नहीं है कि आप कितना ज्यादा बता सकते हैं बल्कि इस बारे में है कि आप कितना कम बोलकर कितना गहरा असर छोड़ सकते हैं। जब आपकी स्लाइड्स साफ़ और सुथरी होती हैं तब आपकी ऑडियंस का पूरा ध्यान आपकी आंखों और आपकी आवाज पर होता है।

तो अगली बार जब आप अपनी पीपीटी तैयार करें तो खुद से पूछिए कि क्या यह स्लाइड मेरी बातों में मदद कर रही है या उसे मुश्किल बना रही है। हर फालतू शब्द को डिलीट कर दीजिये। हर बेकार के एनीमेशन को हटा दीजिये। अपनी स्लाइड्स को सांस लेने की जगह दीजिये। जब आप कम दिखाएंगे तब लोग ज्यादा देखेंगे। जब आप कम बोलेंगे तब लोग ज्यादा सुनेंगे। सिम्प्लिसिटी कोई कमी नहीं है बल्कि यह एक बहुत बड़ी सुपरपावर है जिसे सिर्फ मास्टर खिलाड़ी ही इस्तेमाल करना जानते हैं। स्टीव जॉब्स ने दिखाया कि कैसे एक खाली बैकग्राउंड पर सिर्फ एक शब्द पूरी दुनिया में तहलका मचा सकता है।


लेसन ३ : द होली शिट मोमेंट और स्टेज का जादू

क्या आपको याद है जब आप बचपन में कोई जादू का शो देखने जाते थे। जादूगर अचानक से अपनी टोपी से खरगोश निकालता था और पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता था। वह एक ऐसा पल होता था जिसे आप घर आकर सबको बताते थे। स्टीव जॉब्स अपनी हर प्रेजेंटेशन में एक ऐसा ही जादुई पल क्रिएट करते थे जिसे कार्मिन गैलो ने द होली शिट मोमेंट कहा है। यह वह लम्हा होता है जब ऑडियंस के मुंह से निकलता है 'वाह यह क्या देख लिया'। अगर आपकी प्रेजेंटेशन में ऐसा कोई मोमेंट नहीं है तो समझ लीजिए आपने अपनी ऑडियंस का टाइम वेस्ट किया है। लोग आपकी पूरी स्पीच याद नहीं रखेंगे लेकिन वह एक धमाकेदार मोमेंट हमेशा उनके दिमाग में छपा रहेगा।

सोचिए आप एक नई कार की चाबी अपनी जेब से निकालकर दिखा रहे हैं। यह नॉर्मल है। लेकिन अगर आप उस कार को स्टेज के ऊपर आसमान से क्रेन के जरिए उतरते हुए दिखाएं तो वह एक मोमेंट बन जाता है। स्टीव जॉब्स इसके उस्ताद थे। साल 2008 में जब उन्होंने मैकबुक एयर लॉन्च किया था तो उन्होंने कोई भारी भरकम भाषण नहीं दिया। उन्होंने बस स्टेज पर रखा एक पीला लिफाफा उठाया और उसके अंदर से एक लैपटॉप निकाल कर दिखा दिया। दुनिया दंग रह गई। किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक पावरफुल लैपटॉप इतना पतला हो सकता है कि एक मामूली लिफाफे में आ जाए। वह लिफाफा सिर्फ एक प्रॉप नहीं था बल्कि वह एक इमोशन बन गया था जिसने कॉम्पिटिशन की धज्जियां उड़ा दीं।

अक्सर हम अपनी अचीवमेंट्स को बस नंबर्स में बता देते हैं। जैसे कि हमने इस साल 20 परसेंट ग्रोथ की। यह सुनकर किसी के रोंगटे नहीं खड़े होंगे। लेकिन अगर आप स्टेज पर एक खाली कांच का जार रखें और उसमें धीरे-धीरे सोने के सिक्के गिराते हुए कहें कि यह हमारी ग्रोथ की आवाज है तो लोग उसे महसूस करेंगे। आपको अपनी बात को विजुलाइज कराना होगा। आपको कुछ ऐसा करना होगा जिसकी किसी ने कल्पना भी न की हो। स्टीव जॉब्स ने जब आईपॉड लॉन्च किया था तो उन्होंने सिर्फ यह नहीं कहा कि इसमें बहुत ज्यादा मेमोरी है। उन्होंने कहा 1000 गाने आपकी जेब में और फिर अपनी जींस की छोटी पॉकेट से आईपॉड निकालकर दिखा दिया।

लोग उन प्रेजेंटर्स को पसंद करते हैं जो उन्हें सरप्राइज देते हैं। हम भारतीयों को तो वैसे भी ड्रामा और सस्पेंस बहुत पसंद है। तो अपनी मीटिंग या स्पीच में वह ड्रामा लेकर आइये। अगर आप कोई नया आईडिया पिच कर रहे हैं तो उसे सीधे मत बताइये। थोड़ा सस्पेंस बनाइये। थोड़ा माहौल गरमाइये। और फिर जब सबकी एक्साइटमेंट पीक पर हो तब अपना धमाका कीजिये। इसे करने के लिए आपको बहुत प्रैक्टिस की जरूरत होती है। स्टीव जॉब्स इस एक मोमेंट के लिए हफ़्तों तक रिहर्सल करते थे। वह हर लाइट हर साउंड और अपनी हर मूवमेंट को बारीकी से चेक करते थे। वह जानते थे कि परफेक्शन ही उनकी पहचान है।

आज के सोशल मीडिया के दौर में अगर आपकी प्रेजेंटेशन में कोई 'शेयरेबल मोमेंट' नहीं है तो आपकी बात कमरे से बाहर नहीं जाएगी। आपको कुछ ऐसा करना होगा कि लोग अपने फोन निकालें और उसका फोटो खींचकर तुरंत स्टेटस लगा दें। यह तभी होगा जब आप घिसे-पिटे तरीकों को छोड़कर कुछ हटकर करेंगे। याद रखिये लोग यह भूल सकते हैं कि आपने क्या कहा था लेकिन वह यह कभी नहीं भूलेंगे कि आपने उन्हें कैसा महसूस कराया था। वह हैरानी वह खुशी और वह वाव वाली फीलिंग ही आपकी असली जीत है।


तो दोस्तों, स्टीव जॉब्स की तरह महान बनना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। आपको बस एक विलेन की जरूरत है एक साफ-सुथरी कहानी की और एक ऐसा जादू दिखाने की जिसे देखकर दुनिया दांतों तले उंगली दबा ले। प्रेजेंटेशन देना सिर्फ जानकारी देना नहीं है बल्कि एक एक्सपीरियंस देना है। जब आप अपनी पूरी जान लगा देते हैं और स्टेज पर खुद को झोंक देते हैं तब आप सिर्फ एक स्पीकर नहीं बल्कि एक लीडर बन जाते हैं। अपनी अगली प्रेजेंटेशन को सिर्फ एक काम मत समझिये उसे अपना मास्टरपीस बनाइये। क्या आप तैयार हैं अपनी ऑडियंस को हैरान करने के लिए। उठिए और दुनिया को दिखा दीजिये कि आप भी इंसैनली ग्रेट बन सकते हैं।

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