क्या आप भी उसी चूहा दौड़ का हिस्सा हैं जहाँ सुबह ९ से शाम ५ तक बॉस की कड़वी बातें सुनकर आप अपनी जिंदगी का कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं। बिना नौकरी छोड़े एक्स्ट्रा इनकम का मौका खोना आपकी सबसे बड़ी बेवकूफी हो सकती है और शायद आप अपनी गरीबी से बहुत प्यार करते हैं।
आज हम डेविड लिंडाहल की किताब से वह राज खोलेंगे जो आपको नौकरी के साथ साथ अमीर बनने का रास्ता दिखाएंगे। अगर आप भी मिडिल क्लास लाइफ से तंग आ चुके हैं तो यह ३ लेसन आपकी सोच बदल देंगे।
लेसन १ : अपनी स्किल को नोट छापने की मशीन कैसे बनाएं
क्या आपको लगता है कि आप ऑफिस में जो एक्सेल शीट भरते हैं या जो कोडिंग करते हैं वह बस महीने के अंत में सैलरी पाने का एक जरिया है। अगर हाँ तो बधाई हो आप अपनी काबिलियत का कत्ल बहुत ही सलीके से कर रहे हैं। डेविड लिंडाहल अपनी किताब में बहुत ही कड़वा सच बताते हैं कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। पहले वो जो अपना समय बेचते हैं और दूसरे वो जो अपना दिमाग पैकेट में बंद करके बेचते हैं। अगर आप अपनी ८ घंटे की नौकरी के बाद भी थक कर बस नेटफ्लिक्स देख रहे हैं तो आप असल में अपनी आने वाली पुश्तों की गरीबी का इंतजाम कर रहे हैं।
सोचिए आपके पास कोई ऐसी कला है जो दूसरों के काम आ सकती है। मान लीजिए आपको गिटार बजाना आता है या आप वजन घटाने के मास्टर हैं। अब एक साधारण इंसान क्या करेगा। वह ट्यूशन देना शुरू करेगा। यानी एक घंटा सिखाओ और कुछ रुपये पाओ। यह तो वही बात हुई कि आप अपनी नौकरी से भागकर दूसरी छोटी नौकरी में फंस गए। यहाँ लेखक कहते हैं कि असली खेल इंफॉर्मेशन को प्रोडक्ट बनाने में है। आप एक बार मेहनत करके एक कोर्स बनाइए या एक ईबुक लिखिए। अब इसे ऑनलाइन डाल दीजिए। जब आप ऑफिस में अपने बॉस की डांट सुन रहे होंगे तब भी दुनिया के किसी कोने में कोई आपका वह कोर्स खरीद रहा होगा।
शर्मा जी को खाना बनाने का बहुत शौक है। अब शर्मा जी ने सोचा कि क्यों न शाम को एक स्टॉल लगाया जाए। अब शर्मा जी दिन भर ऑफिस की फाइलों से लड़ते हैं और शाम को कड़ाही से। नतीजा क्या निकला। वह एक महीने में ही हॉस्पिटल पहुँच गए क्योंकि शरीर ने जवाब दे दिया। वहीं दूसरी तरफ वर्मा जी हैं। वर्मा जी को भी कुकिंग पसंद है। उन्होंने अपनी खास रेसिपीज का एक छोटा सा डिजिटल कोर्स बनाया और उसे फेसबुक पर प्रमोट कर दिया। अब वर्मा जी ऑफिस में लंच कर रहे होते हैं और उनके मोबाइल पर नोटिफिकेशन आता है कि १० नए लोगों ने उनका कोर्स खरीदा है। इसे कहते हैं दिमाग का सही इस्तेमाल करना।
अगर आप अभी भी यह सोच रहे हैं कि मेरे पास तो कोई टैलेंट ही नहीं है तो भाई साहब आप शायद खुद को बहुत कम आंक रहे हैं। इंटरनेट के जमाने में लोग यह भी सीखने के लिए पैसे देते हैं कि सही तरीके से सोना कैसे है या बिना लड़े बीवी को कैसे मनाना है। बस आपको यह पहचानना है कि आप किस चीज में औसत से थोड़े बेहतर हैं। अपनी उस जानकारी को एक बार अच्छे से रिकॉर्ड कीजिए या लिखिए। यह आपकी वह संपत्ति बन जाएगी जो आपको तब भी कमा कर देगी जब आप बुढ़ापे में अपनी याददाश्त खो चुके होंगे। याद रखिए जो इंसान सोते समय पैसे नहीं कमा पा रहा है उसे मरते दम तक काम करना पड़ेगा। तो क्या आप तैयार हैं अपने बॉस को बिना बताए अपना गुप्त खजाना खड़ा करने के लिए।
लेसन २ : ऑटोमेशन और सिस्टम की असली जादूगरी
अगर आप सोच रहे हैं कि साइड बिजनेस का मतलब है कि ऑफिस से आने के बाद आपको रात भर जागकर मजदूरी करनी पड़ेगी तो आप गलत हैं। लेखक कहते हैं कि अगर आपका बिजनेस आपकी फिजिकल मौजूदगी मांग रहा है तो वह बिजनेस नहीं बल्कि एक दूसरी नौकरी है। असली आजादी तब मिलती है जब आप एक ऐसा सिस्टम खड़ा करते हैं जो आपकी गैरमौजूदगी में भी एक आज्ञाकारी रोबोट की तरह काम करे। आज के दौर में इंटरनेट आपके लिए वह सब कर सकता है जो पुराने जमाने में दस मुंशी मिलकर करते थे।
मान लीजिए आपने एक वेबसाइट बनाई है जहाँ आप अपनी ईबुक बेच रहे हैं। अब क्या आप हर कस्टमर को खुद ईमेल करेंगे। क्या आप हर पेमेंट का हिसाब खुद रखेंगे। अगर आप ऐसा करेंगे तो आपका हाल उस ढाबे वाले जैसा हो जाएगा जो खुद ही सब्जी काटता है और खुद ही बर्तन धोता है। यहाँ काम आता है ऑटोमेशन। आपको बस ऐसे टूल्स जोड़ने हैं जो अपने आप पेमेंट लें और कस्टमर को उसका सामान मेल कर दें। आपका काम सिर्फ उस मशीन को तेल देना है यानी उस पर ट्रैफिक लाना है। बाकी सारा काम टेक्नोलॉजी खुद देख लेगी।
राहुल नाम का एक लड़का है जो नौकरी के साथ साथ टीशर्ट बेचने का बिजनेस शुरू करता है। अब राहुल हर ऑर्डर आने पर खुद बाजार जाता है और कुरियर वाले के चक्कर काटता है। बेचारा राहुल ऑफिस में फाइलें कम और कुरियर के पैकेट ज्यादा गिनता है। कुछ ही दिनों में राहुल की आंखों के नीचे काले घेरे पड़ जाते हैं और उसके दोस्त उसे पहचानने से इनकार कर देते हैं। दूसरी तरफ एक स्मार्ट लड़की है प्रिया। प्रिया ने प्रिंट ऑन डिमांड का सिस्टम सेट किया है। जैसे ही कोई ऑर्डर आता है एक कंपनी अपने आप टीशर्ट छापती है और उसे कस्टमर तक पहुँचा देती है। प्रिया को बस डिजाइन पर ध्यान देना है। वह अपनी नौकरी भी मजे से कर रही है और उसका बिजनेस भी ऑटो पायलट पर चल रहा है।
लोग अक्सर डरते हैं कि ऑटोमेशन महंगा होगा या बहुत टेक्निकल होगा। पर सच तो यह है कि यह आपके फोन चलाने जितना ही आसान है। आपको बस एक बार अपनी दुकान की चाबियां सिस्टम को सौंपनी हैं। जब आप अपनी फैमिली के साथ वेकेशन पर होंगे या अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहे होंगे तब भी आपका डिजिटल शोरूम खुला रहेगा। वह न तो कभी छुट्टी मांगेगा और न ही कभी बीमार पड़ेगा। बिना सिस्टम के बिजनेस करना वैसा ही है जैसे बिना पेट्रोल की कार को धक्का मारना। शुरू में जोश बहुत होता है पर कुछ दूर जाकर आप हांफने लगेंगे। इसलिए अगर लंबी रेस का घोड़ा बनना है तो अपनी मेहनत को सिस्टम में बदलना सीखिए।
नौकरी आपको सिर्फ जिंदा रखती है लेकिन सिस्टम आपको आजाद करता है। अगर आप आज भी सब कुछ अपने हाथों से करने की जिद पर अड़े हैं तो समझ लीजिए कि आप अपनी तरक्की के रास्ते में खुद ही सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं। क्या आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस आपकी मेहनत से नहीं बल्कि आपकी बुद्धि से चले। अगर हाँ तो सिस्टम बनाना आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
लेसन ३ : रिस्क को पालतू बनाना और टेस्टिंग का खेल
ज्यादातर लोग बिजनेस इसलिए शुरू नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके लिए उन्हें अपनी जमीन जायदाद बेचनी पड़ेगी या अपनी पक्की नौकरी को लात मारनी पड़ेगी। लेकिन डेविड लिंडाहल कहते हैं कि यह तो सरासर बेवकूफी है। असली खिलाड़ी वह नहीं जो बिना सोचे गहरे पानी में कूद जाए बल्कि वह है जो पहले किनारे पर खड़े होकर पानी की गहराई नापे। लेखक का यह लेसन आपको सिखाता है कि कैसे आप बिना किसी बड़े नुकसान के अपना साम्राज्य खड़ा कर सकते हैं। इसे वह टेस्टिंग का नाम देते हैं।
जब आप कोई नया आइडिया सोचते हैं तो सीधा उस पर लाखों रुपये मत लगाइए। आज के दौर में फेसबुक और गूगल जैसे टूल्स आपको यह सुविधा देते हैं कि आप महज कुछ सौ रुपयों में यह पता कर सकें कि लोग आपके प्रोडक्ट को पसंद करेंगे या नहीं। अगर रिस्पांस अच्छा है तो आगे बढ़िए और अगर नहीं तो अपना आइडिया बदल दीजिए। आपकी नौकरी आपके लिए एक सेफ्टी नेट की तरह है जो आपको गिरते समय चोट लगने से बचाती है। जब तक आपका साइड बिजनेस आपकी सैलरी से दुगना पैसा न देने लगे तब तक अपने बॉस का चेहरा झेलते रहिए।
एक हैं हमारे मोटिवेशनल चौरसिया जी। उन्होंने एक दिन जोश में आकर अपनी नौकरी छोड़ी और कर्ज लेकर एक बड़ा कैफ़े खोल लिया। चौरसिया जी को लगा कि लोग लाइन लगाकर उनके यहाँ कॉफी पिएंगे। लेकिन हकीकत में वहां सिर्फ मक्खियां भिनभिना रही थीं। कुछ ही महीनों में चौरसिया जी की जमापूंजी खत्म हो गई और अब वह फिर से उसी पुरानी कंपनी में नौकरी की भीख मांग रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ सुमित है। सुमित ने नौकरी के साथ ही एक छोटा सा ऑनलाइन सर्विस पेज शुरू किया। उसने पहले महीने सिर्फ ५०० रुपये के विज्ञापन चलाए। जब उसे लगा कि लोग सच में उसकी सर्विस मांग रहे हैं तब उसने धीरे धीरे अपना समय और पैसा बढ़ाया। सुमित ने कोई रिस्क नहीं लिया बल्कि उसने रिस्क को मैनेज किया।
याद रखिए कि हर बड़ा बिजनेस कभी न कभी एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट ही था। अगर आप परफेक्ट होने का इंतजार करेंगे तो यकीन मानिए आप कभी शुरुआत ही नहीं कर पाएंगे। अपनी नौकरी को एक एटीएम की तरह इस्तेमाल कीजिए जो आपके बिजनेस के एक्सपेरिमेंट के लिए पैसे देता है। जिस दिन आपका यह साइड वाला छोटा सा पौधा एक बड़ा पेड़ बन जाए उस दिन आप अपनी नौकरी की बेड़ियाँ तोड़ सकते हैं। तब तक स्मार्ट बनिए और छोटे छोटे कदमों से बड़ी मंजिल की ओर बढ़िए।
जिंदगी एक बार मिलती है और इसे सिर्फ दूसरों के सपने पूरे करने में बिता देना सबसे बड़ा गुनाह है। यह किताब हमें याद दिलाती है कि हम सिर्फ एक एम्प्लॉई बनने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। आज ही अपने अंदर के उस छिपे हुए बिजनेसमैन को जगाइए। एक छोटा सा कदम उठाइए चाहे वह सिर्फ एक पेज लिखना ही क्यों न हो। क्या आप अपनी अगली जनरेशन को एक मिडिल क्लास कहानी सुनाना चाहते हैं या एक कामयाबी का इतिहास। फैसला आपका है। नीचे कमेंट में बताएं कि आपका वह कौन सा टैलेंट है जिसे आप आज ही प्रोडक्ट में बदलना चाहते हैं।
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