लाखों रुपये फूंक कर MBA की डिग्री ले ली पर आज भी बॉस की डांट और खाली बैंक बैलेंस ही नसीब में है। असल में आप उन सीक्रेट्स को मिस कर रहे हैं जो बड़े बिजनेस स्कूल वाले सिर्फ अमीरों को सिखाते हैं। बिना इन स्किल्स के आप बस एक और एवरेज एम्प्लॉई ही बने रहेंगे।
क्या आप भी अपनी कीमती जिंदगी और पैसा फालतू की थ्योरी में बर्बाद करना चाहते हैं। अगर नहीं तो स्टीवन सिल्बीजर की यह बुक आपको वो पावर देगी जो बड़ी डिग्री भी नहीं दे पाती। आइये जानते हैं वो 3 लेसन जो आपके करियर की दिशा बदल देंगे।
लेसन १ : मार्केटिंग का मतलब सेल्स नहीं बल्कि कस्टमर की साइकोलॉजी है
ज्यादातर लोग समझते हैं कि मार्केटिंग का मतलब है बस अपना सामान किसी के गले उतार देना। अगर आप भी ऐसा सोचते हैं तो मुबारक हो आप उन लोगों की लिस्ट में टॉप पर हैं जो बिजनेस में बुरी तरह फेल होने वाले हैं। मार्केटिंग असल में चिल्ला चिल्ला कर अपना नाम बताना नहीं है बल्कि चुपचाप सामने वाले की परेशानी का हल ढूंढना है। स्टीवन सिल्बीजर अपनी बुक में बहुत साफ कहते हैं कि कस्टमर कभी भी प्रोडक्ट नहीं खरीदता वह उस प्रोडक्ट से होने वाला फायदा खरीदता है।
मान लीजिए आप एक जिम के मालिक हैं। अब आप सड़कों पर पोस्टर लगा रहे हैं कि हमारे पास दुनिया की सबसे महंगी मशीनें हैं और हमारा जिम 5000 स्क्वायर फ़ीट में फैला है। सच बताऊं तो किसी को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता कि आपकी मशीनें सोने की हैं या लोहे की। लोग आपके पास इसलिए नहीं आते कि उन्हें आपकी मशीनें देखनी हैं बल्कि वे इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें अपना बढ़ा हुआ पेट कम करना है। उन्हें उस शर्मिंदगी से बचना है जो उन्हें आईने के सामने होती है। अगर आपकी मार्केटिंग में उस पेट कम होने वाली खुशी का जिक्र नहीं है तो आप बस बिजली का बिल भर रहे हैं बिजनेस नहीं कर रहे हैं।
आजकल के स्टार्टअप्स को ही देख लीजिए। वे सोचते हैं कि अगर उन्होंने एक ऐप बना लिया और उस पर भारी डिस्काउंट दे दिया तो लोग लाइन लगा लेंगे। भाई साहब लोग डिस्काउंट के लिए आ सकते हैं पर रुकेंगे तभी जब आप उनकी जिंदगी आसान करेंगे। मार्केटिंग का पहला नियम यही है कि पहले उस गैप को पहचानो जिसे कोई और नहीं भर पा रहा है। अगर आप वही घिसा पिटा काम करेंगे जो बगल वाली दुकान वाला कर रहा है तो आपकी औकात बस एक कॉपीकैट की रह जाएगी।
मार्केटिंग में एक और चीज बहुत जरूरी है और वो है पोजीशनिंग। आप अपने आपको मार्केट में किस तरह पेश करते हैं यह तय करता है कि आपकी जेब में कितना पैसा आएगा। अगर आप खुद को सस्ता बताएंगे तो आपको वैसे ही कस्टमर मिलेंगे जो एक रुपये के लिए आपकी जान खा जाएंगे। लेकिन अगर आप खुद को वैल्यू देने वाला एक्सपर्ट बताएंगे तो लोग आपको प्रीमियम पैसा देने में भी नहीं हिचकिचाएंगे। यह सब दिमाग का खेल है।
सोचिए अगर ऐपल अपनी मार्केटिंग में यह कहता कि हमारे फोन में इतने जीबी रैम है या इतना बड़ा कैमरा है तो क्या आप उसे खरीदने के लिए अपनी किडनी बेचने को तैयार होते। बिल्कुल नहीं। वे बेचते हैं एक स्टेटस और एक अलग पहचान। वे आपको महसूस कराते हैं कि अगर आपके हाथ में यह फोन है तो आप भीड़ से अलग हैं। यही वो जादू है जिसे मार्केटिंग कहते हैं। बिना शोर मचाए सीधे दिल पर चोट करना।
तो अगर आप अपना कोई काम शुरू करने की सोच रहे हैं या पहले से कर रहे हैं तो आज ही रुकिए और सोचिए। क्या आप सिर्फ सामान बेच रहे हैं या वाकई किसी की लाइफ में वैल्यू ऐड कर रहे हैं। अगर जवाब सिर्फ सामान है तो समझ लीजिए कि आपकी दुकान का शटर कभी भी गिर सकता है। असली खिलाड़ी वही है जो कस्टमर के डर और उसकी इच्छा को समझकर उसे एक ऐसा सपना दिखाए जिसे वह सच करना चाहता है। मार्केटिंग का यह लेसन सिर्फ बिजनेस के लिए नहीं बल्कि आपकी पर्सनल ब्रांडिंग के लिए भी उतना ही जरूरी है।
लेसन २ : फाइनेंस का असली खेल प्रॉफिट नहीं बल्कि कैश फ्लो है
अगर आपको लगता है कि सिर्फ ज्यादा सेल करना ही एक सफल बिजनेस की निशानी है तो आप एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। स्टीवन सिल्बीजर इस बुक में एक ऐसी बात बताते हैं जो बड़े बड़े पढ़े लिखे लोगों को भी समझ नहीं आती। वह है कैश फ्लो और प्रॉफिट के बीच का अंतर। मान लीजिए आपकी एक बहुत बड़ी दुकान है और आपने पूरे महीने में दस लाख का सामान बेचा। आप खुशी के मारे नाच रहे हैं कि वाह भाई मजा आ गया। लेकिन महीने के अंत में जब किराया और सैलरी देने की बारी आई तो आपकी जेब खाली है। क्यों। क्योंकि आपने सारा सामान उधार पर बेच दिया था।
यही वो जगह है जहाँ एक आम इंसान और एक असली बिजनेसमैन की सोच अलग होती है। प्रॉफिट सिर्फ कागज पर दिखने वाला एक नंबर है लेकिन कैश फ्लो वो ऑक्सीजन है जिससे आपका बिजनेस सांस लेता है। अगर आपके पास कैश नहीं है तो आपका करोड़ों का टर्नओवर भी मिट्टी के बराबर है। बहुत से स्टार्टअप्स इसी चक्कर में दम तोड़ देते हैं कि वे अपनी ग्रोथ दिखाने के चक्कर में कैश जलाते रहते हैं और एक दिन अचानक पता चलता है कि बैंक अकाउंट में फूटी कौड़ी भी नहीं बची।
मान लीजिए आप एक शादी में गए हैं और वहां बहुत सारा खाना सजा हुआ है। आप प्लेट भरकर खाना ले आते हैं यानी आपका प्रॉफिट बहुत ज्यादा दिख रहा है। लेकिन जैसे ही आप पहला निवाला तोड़ने वाले होते हैं तभी लाइट चली जाती है और वेटर आकर आपसे प्लेट छीन लेता है। यहाँ लाइट का जाना और वेटर का प्लेट छीनना ही खराब कैश फ्लो है। आपके पास खाना तो था पर आप उसे खा नहीं पाए। बिजनेस में भी यही होता है कि आपके पास आर्डर तो बहुत हैं पर उन आर्डर्स को पूरा करने के लिए जेब में नगद पैसा ही नहीं है।
फाइनेंस का मतलब सिर्फ हिसाब किताब रखना नहीं है बल्कि आने वाले कल की तैयारी करना है। बुक में बताया गया है कि आपको हर एक पैसे का हिसाब ऐसे रखना चाहिए जैसे वो आपकी अपनी जान हो। लोग अक्सर फालतू के खर्चों में पैसा बर्बाद करते हैं जैसे ऑफिस का महंगा फर्नीचर या ब्रांडेड स्टेशनरी। उन्हें लगता है कि इससे वे प्रोफेशनल दिखेंगे। लेकिन असलियत तो यह है कि कस्टमर को आपके सोफे से ज्यादा इस बात में इंटरेस्ट है कि आप उसे क्या दे रहे हैं। अगर आप अपने पैसे को सही जगह इन्वेस्ट नहीं कर रहे हैं तो आप बिजनेस नहीं बल्कि एक महंगा शौक पाल रहे हैं।
एक और बड़ी गलती जो लोग करते हैं वह है अपनी पर्सनल लाइफ और बिजनेस के पैसों को मिला देना। अगर आप अपनी दुकान के गल्ले से निकालकर हर रोज गोलगप्पे खा रहे हैं या बिना सोचे समझे घर के खर्चे चला रहे हैं तो आप अपने बिजनेस की कब्र खुद खोद रहे हैं। एक सफल माइंडसेट वाला इंसान पहले अपने बिजनेस को पालता है और फिर बिजनेस उसे पालता है। आपको नंबर्स से प्यार करना होगा। अगर आपको अपनी बैलेंस शीट देखनी नहीं आती तो आप एक ऐसे अंधे ड्राइवर की तरह हैं जो सौ की स्पीड पर गाड़ी चला रहा है। एक्सीडेंट होना तय है बस समय की बात है।
तो अगली बार जब आप अपने बिजनेस के नंबर्स देखें तो सिर्फ यह न देखें कि कितना कमाया बल्कि यह देखें कि जेब में असल में कितना आया। याद रखिए कि बिना प्रॉफिट के बिजनेस एक हॉबी है लेकिन बिना कैश के बिजनेस एक डेड बॉडी है। अपने पैसों पर पकड़ मजबूत बनाइये और फालतू के दिखावे से बचिए क्योंकि नंबर्स कभी झूठ नहीं बोलते।
लेसन ३ : ऑपरेशंस और लीडरशिप यानी सिस्टम बनाओ वरना खुद काम के गुलाम बन जाओगे
क्या आपको भी ऐसा लगता है कि अगर आप एक दिन ऑफिस न जाएं तो आपका काम ठप हो जाएगा। अगर आपका जवाब हां है तो आप एक बॉस नहीं बल्कि अपने ही काम के सबसे महंगे मजदूर हैं। स्टीवन सिल्बीजर इस बुक में समझाते हैं कि असली बिजनेस वो नहीं है जहाँ आप खुद हर काम में अपनी नाक घुसाएं। असली बिजनेस वो है जो एक सेट सिस्टम पर चले चाहे आप वहां हों या न हों। ऑपरेशंस का मतलब ही यही है कि आप अपने काम को इतना स्मूथ बना दें कि कोई भी नया इंसान उसे आसानी से कर सके।
आपने अपने शहर में किसी मशहूर चाय वाले या हलवाई को देखा होगा। वहां कितनी भी भीड़ हो पर चाय का स्वाद हमेशा एक जैसा रहता है और हर कस्टमर को समय पर सामान मिलता है। क्यों। क्योंकि उस दुकान वाले ने एक सिस्टम बना रखा है। उसे पता है कि चाय में कितनी चीनी डलेगी और कब दूध उबलेगा। दूसरी तरफ एक ऐसा इंसान है जो सोचता है कि सब कुछ मैं ही करूँगा। वह खुद ही झाड़ू लगाता है खुद ही हिसाब करता है और खुद ही चाय बनाता है। नतीजा यह होता है कि वह दिन भर थका रहता है और उसका बिजनेस कभी बड़ा नहीं हो पाता। अगर आप खुद को हर जगह इस्तेमाल करेंगे तो आप कभी भी बड़े विजन पर काम नहीं कर पाएंगे।
लीडरशिप का मतलब यह नहीं है कि आप लोगों पर हुक्म चलाएं और उन्हें डरा कर रखें। असल लीडर वो है जो अपनी टीम को इतना काबिल बना दे कि उन्हें आपकी जरूरत ही न पड़े। लोग अक्सर लीडरशिप को ईगो का खेल समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि चिल्लाने से या रौब झाड़ने से काम अच्छा होता है। लेकिन सच तो यह है कि लोग आपके साथ तब जुड़ते हैं जब उन्हें आपके विजन में अपना फायदा दिखता है। अगर आप अपने एम्प्लॉई को सिर्फ एक मशीन समझेंगे तो वह भी आपके लिए सिर्फ उतना ही काम करेगा जितना जरूरी है। लेकिन अगर आप उसे ओनरशिप देंगे तो वह उस काम को अपना समझकर करेगा।
बुक में एक बहुत ही कड़वी बात कही गई है कि एक अच्छा मैनेजर वो है जो खुद को रिप्लेस करने की तैयारी करता है। सुनने में अजीब लगता है ना। पर सोचिए अगर आप अपने नीचे ऐसे लोग तैयार कर लें जो आपका काम आपसे बेहतर कर सकें तो आपके पास नया सोचने और बिजनेस को दस गुना बढ़ाने का समय होगा। लेकिन हमारा ईगो हमें ऐसा करने से रोकता है। हमें डर लगता है कि कहीं कोई हमसे आगे न निकल जाए। यही डर एक छोटे बिजनेसमैन और एक बड़े लीडर के बीच की दीवार है।
ऑपरेशंस को सही करने का मतलब है कि हर काम के लिए एक चेकलिस्ट हो। जब तक आप अपने काम को डॉक्यूमेंट नहीं करेंगे तब तक आप गलतियां दोहराते रहेंगे। गलतियां करना बुरा नहीं है पर एक ही गलती को बार बार करना बेवकूफी है। एक सफल लीडर वही है जो अपनी टीम की ताकत और कमजोरी को पहचानता है और उन्हें सही जगह फिट करता है। जैसे क्रिकेट टीम में हर प्लेयर का एक खास रोल होता है वैसे ही आपके बिजनेस में भी हर इंसान का रोल फिक्स होना चाहिए।
तो अगर आप वाकई टॉप के बिजनेस स्कूल वाली स्किल्स सीखना चाहते हैं तो पहले अपनी ईगो को साइड में रखें। लोगों पर भरोसा करना सीखें और सिस्टम बनाने पर जोर दें। जब आपका सिस्टम मजबूत होगा तो आपकी गैर मौजूदगी में भी आपका बैंक बैलेंस बढ़ता रहेगा। यही वो आजादी है जिसके लिए हर इंसान बिजनेस शुरू करता है। अब फैसला आपका है कि आपको जिंदगी भर गधे की तरह मेहनत करनी है या एक लीडर बनकर राज करना है।
तो दोस्तों, यह थे द टेन डे MBA के वो कीमती लेसन जो आपको किसी भी कॉलेज में नहीं सिखाए जाएंगे। याद रखिये कि जानकारी होना एक बात है पर उसे अमल में लाना ही असली पावर है। आज ही अपने काम करने के तरीके को गौर से देखिये और तय कीजिये कि आप कौन सा एक लेसन सबसे पहले लागू करेंगे। अगर आप अपनी लाइफ में वाकई बदलाव चाहते हैं तो इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपनी नौकरी या बिजनेस में फंसे हुए महसूस कर रहे हैं। आपकी एक छोटी सी शुरुआत बड़े बदलाव की वजह बन सकती है। कमेंट में जरूर बताएं कि आपको कौन सा लेसन सबसे ज्यादा पसंद आया।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#BusinessSkills #Entrepreneurship #SuccessMindset #BookSummary #DYBooks
_