अगर आप अब भी पुराने जमाने की तरह टीवी और न्यूजपेपर वाली एड्स पर पैसा बहा रहे हैं तो मुबारक हो। आप अपनी बर्बादी का टिकट खुद काट रहे हैं। दुनिया मोबाइल के जरिए आगे निकल गई और आप अभी भी वही घिसे पिटे तरीके पकड़ कर बैठे हैं। क्या सच में आपको फेल होना इतना पसंद है।
चक मार्टिन की किताब द थर्ड स्क्रीन हमें बताती है कि कैसे मोबाइल मार्केटिंग ने पूरी दुनिया का चेहरा बदल दिया है। अगर आप बिजनेस में टिकना चाहते हैं तो इन ३ लेसन्स को समझना आपके लिए बहुत जरूरी है वरना पीछे छूटने के लिए तैयार रहिए।
लेसन १ : मोबाइल ही असली तीसरी स्क्रीन है
सोचिए, आप सुबह उठते हैं, सबसे पहले किसे देखते हैं, अपने पार्टनर को। बिल्कुल नहीं। आप सबसे पहले अपने मोबाइल को देखते हैं। चक मार्टिन कहते हैं कि टीवी पहली स्क्रीन थी और कंप्यूटर दूसरी। लेकिन मोबाइल वह तीसरी स्क्रीन है जिसने बाकी दोनों को कोने में बैठा दिया है। आज के समय में अगर आपका बिजनेस कस्टमर की जेब में नहीं है तो समझ लीजिए कि आप मार्केट में हैं ही नहीं। लोग अब बेड पर लेटे लेटे शॉपिंग करते हैं और वॉशरूम में बैठकर पूरी दुनिया की खबरें पढ़ते हैं।
अगर आप अभी भी भारी भरकम होर्डिंग्स और महंगे टीवी कमर्शियल्स के भरोसे बैठे हैं तो आप उस इंसान की तरह हैं जो रॉकेट के जमाने में बैलगाड़ी लेकर रेस जीतने की सोच रहा है। मोबाइल सिर्फ एक फोन नहीं है। यह इंसान के हाथ का एक एक्स्ट्रा अंग बन चुका है। मार्केटिंग का मतलब अब सिर्फ शोर मचाना नहीं है। इसका मतलब है कस्टमर के उस छोटे से डिवाइस में अपनी जगह बनाना। टीवी पर एड आता है तो लोग चैनल बदल देते हैं या किचन में चले जाते हैं। लेकिन मोबाइल पर आपकी एड उनके अंगूठे के ठीक नीचे होती है।
मान लीजिए आपकी एक कपड़ों की दुकान है। आप शहर के बीचों बीच एक बड़ा सा बैनर लगाते हैं। लाखों खर्च होते हैं। लोग वहां से गुजरते हैं और शायद ही उसे देखते हैं। वहीं आपका कंपीटीटर इंस्टाग्राम पर एक छोटी सी मोबाइल एड चलाता है। वह सीधे उन लोगों तक पहुंचता है जो उस वक्त नए कपड़े ढूंढ रहे हैं। उसे पता है कि कौन क्या देख रहा है। यही मोबाइल की ताकत है। मोबाइल मार्केटिंग कोई ऑप्शन नहीं है। यह सर्वाइवल का सवाल है। अगर आप इस तीसरी स्क्रीन को इग्नोर कर रहे हैं तो आप सीधे सीधे अपने कस्टमर्स को कह रहे हैं कि भाई आप पड़ोसी की दुकान से सामान ले लो।
हैरानी की बात तो यह है कि कई बड़े बिजनेस आज भी अपनी वेबसाइट को मोबाइल फ्रेंडली नहीं बनाते। जब कोई कस्टमर उनकी साइट खोलता है तो उसे जूम कर कर के पढ़ना पड़ता है। यह वैसा ही है जैसे आप किसी को अपने घर बुलाएं और दरवाजा इतना छोटा रखें कि उसे रेंग कर अंदर आना पड़े। कौन आएगा आपके पास। कोई नहीं। चक मार्टिन हमें समझाते हैं कि कस्टमर अब आलसी हो चुका है और उसे सब कुछ अपनी उंगलियों पर चाहिए। अगर आप उसे वह कंफर्ट नहीं दे सकते तो आपका बिजनेस सिर्फ इतिहास की किताबों में मिलेगा। मोबाइल मार्केटिंग का मतलब है कस्टमर के साथ हर वक्त मौजूद रहना। उसे महसूस कराना कि आप बस एक क्लिक की दूरी पर हैं। जब तक आप इस माइंडसेट को नहीं अपनाएंगे तब तक आप सिर्फ अंधेरे में तीर चला रहे हैं।
लेसन २ : लोकेशन आधारित मार्केटिंग का पावर
पुराने समय में मार्केटिंग का मतलब था एक बड़ा सा जाल फेंकना और उम्मीद करना कि कोई न कोई मछली तो फंसेगी ही। लेकिन मोबाइल ने इस खेल को पूरी तरह बदल दिया है। अब आपके पास एक ऐसी सुपरपावर है जिसे 'हाइपर लोकल मार्केटिंग' कहते हैं। चक मार्टिन समझाते हैं कि मोबाइल हमेशा कस्टमर के साथ रहता है और सबसे बड़ी बात यह है कि वह हर वक्त अपनी लोकेशन शेयर करता रहता है। इसका मतलब यह है कि आप कस्टमर को तब मैसेज भेज सकते हैं जब वह आपकी दुकान के ठीक बाहर से गुजर रहा हो। इसे कहते हैं सही समय पर सही प्रहार।
मान लीजिए आपका एक शानदार कॉफी शॉप है। अब आप शहर भर में पोस्टर लगा दें तो शायद कोई बहुत दूर से आपकी कॉफी पीने नहीं आएगा। लेकिन सोचिए क्या होगा अगर कोई इंसान आपकी दुकान से १०० मीटर की दूरी पर है और अचानक उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है। उस मैसेज में लिखा है कि अगले १५ मिनट के लिए आपकी फेवरेट कॉफी पर ५० परसेंट डिस्काउंट है। क्या वह इंसान रुक पाएगा। बिल्कुल नहीं। वह खींचा चला आएगा जैसे मैग्नेट लोहे को खींचता है। यह जादू है लोकेशन आधारित मार्केटिंग का। इसमें आप अपना पैसा उन लोगों पर बर्बाद नहीं करते जो आपसे मीलों दूर बैठे हैं और कभी आने ही नहीं वाले।
आजकल का कस्टमर इतना स्मार्ट है कि उसे पता है उसके आसपास क्या मिल रहा है। अगर आप उसे वह जानकारी नहीं दे रहे जो उसके करंट लोकेशन के हिसाब से जरूरी है तो आप बस एक शोर मचाने वाले इंसान से ज्यादा कुछ नहीं हैं। लोग अब 'कॉफी शॉप नियर मी' या 'बेस्ट जिम नियर मी' सर्च करते हैं। अगर आप वहां नहीं दिख रहे तो आप गायब हैं। यह वैसा ही है जैसे आप किसी पार्टी में जाएं और वहां किसी को अपना नाम ही न बताएं और फिर घर आकर रोएं कि किसी ने मुझसे बात नहीं की। मोबाइल आपको वह मौका देता है कि आप कस्टमर के रास्ते में खड़े हो जाएं लेकिन एक मददगार दोस्त की तरह न कि एक परेशान करने वाले सेल्समैन की तरह।
मार्केटिंग का यह तरीका बहुत ही सटीक है। इसमें आप कस्टमर के बिहेवियर को समझते हैं। अगर कोई मॉल में घूम रहा है तो उसे जूतों की सेल का ऑफर देना समझदारी है। लेकिन अगर वही इंसान श्मशान घाट पर बैठा है और आप उसे पार्टी वियर ड्रेस का एड दिखा रहे हैं तो भाई आपसे बड़ा बेवकूफ कोई नहीं है। मोबाइल आपको वह कॉन्टेक्स्ट देता है कि आपका कस्टमर उस वक्त किस मूड में है और कहां है। चक मार्टिन कहते हैं कि मोबाइल मार्केटिंग का असली मजा तभी है जब आप कस्टमर की जरूरत को उसकी लोकेशन से जोड़ दें। अगर आपने यह कला सीख ली तो आपको कस्टमर के पीछे भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वह खुद आपका रास्ता ढूंढता हुआ आएगा क्योंकि आपने उसे वह दिया जो उसे ठीक उसी पल चाहिए था।
लेसन ३ : कस्टमर के हाथ में कंट्रोल
पहले के जमाने में मार्केटिंग एकतरफा ट्रैफिक की तरह थी। कंपनी जो चाहे बोलती थी और कस्टमर को वही सुनना पड़ता था। जैसे घर का वो बड़ा बुजुर्ग जो सिर्फ अपनी सुनाता है और किसी की सुनता नहीं। लेकिन अब मोबाइल ने कस्टमर को शेर बना दिया है। चक मार्टिन कहते हैं कि आज का कस्टमर अब 'एम्पॉवर्ड' है यानी उसके पास सारी जानकारी उसकी मुट्ठी में है। आप उसे ये कहकर उल्लू नहीं बना सकते कि आपका प्रोडक्ट दुनिया में सबसे बेस्ट है। क्योंकि जैसे ही आप ये बोलेंगे वो तुरंत अपने फोन पर रिव्यू चेक कर लेगा। अगर आपका प्रोडक्ट बेकार है तो वो वहीं खड़े खड़े आपकी पोल खोल देगा।
सोचिए आप एक मोबाइल की दुकान पर जाते हैं। सेल्समैन आपको एक फोन चिपकाने की कोशिश करता है और कहता है कि सर इससे अच्छा कैमरा तो मार्केट में है ही नहीं। पुराने जमाने में आप मान लेते। लेकिन आज आप क्या करते हैं। आप तुरंत अपना मोबाइल निकालते हैं और दूसरे कस्टमर्स के कमेंट्स पढ़ते हैं। अगर वहां लिखा है कि ये फोन दो दिन में ही गर्म होकर तवा बन जाता है तो आप सेल्समैन की तरफ एक ऐसी हंसी हंसते हैं जो उसे अपनी नौकरी पर शक करने पर मजबूर कर देती है। यही है असली कंट्रोल। अब आप राजा हैं और कंपनियां आपकी प्रजा।
आजकल लोग विज्ञापनों से ज्यादा अजनबियों के रिव्यूज पर भरोसा करते हैं। अगर आपके ब्रांड की इमेज इंटरनेट पर खराब है तो आप करोड़ों के एड चला लीजिए कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मोबाइल ने कस्टमर को एक ग्लोबल मंच दे दिया है। एक छोटा सा ट्वीट या एक फेसबुक पोस्ट आपकी सालों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। इसलिए मार्केटिंग का नया नियम ये है कि बेचना बंद करो और मदद करना शुरू करो। अगर आप कस्टमर की लाइफ में वैल्यू ऐड करेंगे तो वो खुद आपका एडवर्टाइजर बन जाएगा। वो आपकी तारीफ के पुल बांधेगा और वो भी बिल्कुल मुफ्त में।
जो बिजनेस इस बदलाव को नहीं समझते वो बहुत जल्दी गायब हो जाते हैं। आप कस्टमर को फोर्स नहीं कर सकते कि वो आपकी बात सुने। आपको उसे ऐसा कंटेंट देना होगा जिसे वो खुद देखना चाहे। अगर आप उसे परेशान करेंगे तो उसके पास 'ब्लॉक' और 'अनफॉलो' का बटन हमेशा तैयार रहता है। ये बटन नहीं है ये एक डिजिटल फांसी का फंदा है जो वो कभी भी आपके ब्रांड के गले में डाल सकता है। इसलिए द थर्ड स्क्रीन हमें सिखाती है कि कस्टमर की इज्जत करना सीखिए। उसे सही जानकारी दीजिए और उसे ये एहसास कराइए कि फैसला उसी का है। जब आप कंट्रोल छोड़ देते हैं तभी आप असल में कस्टमर का दिल जीत पाते हैं।
मोबाइल की ये दुनिया बहुत तेजी से भाग रही है। अगर आप अब भी अपनी पुरानी मार्केटिंग की चादर ओढ़कर सो रहे हैं तो जाग जाइए। चक मार्टिन की ये बातें सिर्फ थ्योरी नहीं हैं बल्कि आज की हकीकत हैं। या तो आप इस मोबाइल रिवोल्यूशन का हिस्सा बनिए या फिर गुमनामी के अंधेरे में खो जाने के लिए तैयार रहिए।
क्या आप अपने बिजनेस को इस तीसरी स्क्रीन के लिए तैयार कर चुके हैं। नीचे कमेंट्स में बताइए कि आप मोबाइल मार्केटिंग का कौन सा तरीका आजमाने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिए जो आज भी पुराने जमाने में जी रहे हैं। चलिए साथ मिलकर इस डिजिटल बदलाव का स्वागत करते हैं।
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