The Wisdom of Crowds (Hindi)


अगर आपको लगता है कि आप अकेले ही दुनिया के सबसे बड़े शूरवीर और स्मार्ट डिसीजन मेकर हैं तो यकीन मानिए आप खुद को गड्ढे में गिराने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। अकेले दिमाग चलाने का ओवरकॉन्फिडेंस आपको उस फेलियर की तरफ ले जा रहा है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचेगा।

क्या आप जानते हैं कि आपकी पूरी टीम या वो भीड़ जिसे आप नासमझ समझते हैं वह आपसे कहीं ज्यादा इंटेलिजेंट हो सकती है। आज हम जेम्स सुरोविकी की बुक द विजडम ऑफ क्राउड्स से ३ ऐसे लाइफ चेंजिंग लेसन सीखेंगे जो आपकी सोच को पूरी तरह बदल देंगे।


लेसन १ : डाइवर्सिटी ऑफ ओपिनियन (विचारों की विविधता)

क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप किसी शादी में पनीर टिक्का की प्लेट लेकर खड़े होते हैं और आसपास के दस लोग अलग-अलग बातें कर रहे होते हैं, तो असल में वहां कितनी बुद्धिमानी छिपी होती है। जेम्स सुरोविकी कहते हैं कि अगर आप किसी मुश्किल सवाल का सही जवाब चाहते हैं, तो किसी एक सुपरस्टार एक्सपर्ट के पास जाने के बजाय एक ऐसी भीड़ के पास जाइये जिसमें हर तरह के लोग हों। इसे ही डाइवर्सिटी ऑफ ओपिनियन कहते हैं।

अब मान लीजिये आपको एक नया बिजनेस शुरू करना है। आप अपने उन चार दोस्तों को बुलाते हैं जो बिल्कुल आपकी तरह सोचते हैं, आपकी तरह ही कपड़े पहनते हैं और जिनका बैंक बैलेंस भी आपके जैसा ही खाली है। मुबारक हो, आपने फ्लॉप होने की पहली सीढ़ी चढ़ ली है। जब सब एक जैसा सोचेंगे, तो गलती कौन पकड़ेगा। असली जादू तब होता है जब उस ग्रुप में एक इंजीनियर हो, एक आर्टिस्ट हो, एक जिद्दी दुकानदार हो और शायद एक ऐसी आंटी भी हों जिन्हें मोहल्ले की हर खबर रहती हो।

जेम्स ने एक बड़ा ही मजेदार उदाहरण दिया है। एक बार एक मेले में सांड (Ox) के वजन का अंदाजा लगाने का कम्पटीशन हुआ। वहां बड़े-बड़े कसाई और किसान आए थे जिन्हें लगा कि वो ही असली उस्ताद हैं। लेकिन जब आखिर में रिजल्ट आया, तो पता चला कि किसी एक एक्सपर्ट का अंदाजा सही नहीं था। लेकिन जब वहां मौजूद सभी आठ सौ लोगों के अंदाजों का एवरेज निकाला गया, तो वो सांड के असली वजन के बिल्कुल करीब था। इसे कहते हैं कलेक्टिव पावर।

हमारी प्रॉब्लम यह है कि हम हमेशा उन लोगों के बीच रहना चाहते हैं जो हमारी हर बात पर 'हाँ' में 'हाँ' मिलाएं। हमें लगता है कि अगर सब एग्री कर रहे हैं, तो हम सही जा रहे हैं। भाई साहब, यह एग्रीमेंट नहीं, यह बर्बादी का सिग्नल है। अगर आपकी टीम में हर कोई आपकी तरह ही सोच रहा है, तो समझ लीजिये कि टीम में बाकी लोग सिर्फ फर्नीचर की तरह रखे हुए हैं।

असली स्मार्ट डिसीजन तब निकलता है जब टेबल पर बैठे लोग एक-दूसरे से असहमत होते हैं। जब हर कोई अपनी अलग जानकारी और अपना अलग नजरिया लेकर आता है, तब वो छोटी-छोटी जानकारियां मिलकर एक बहुत बड़ी सच्चाई बना देती हैं। डाइवर्सिटी का मतलब सिर्फ अलग जेंडर या कास्ट नहीं है, बल्कि अलग दिमाग और अलग एक्सपीरियंस है।

तो अगली बार जब कोई आपसे अलग राय रखे, तो उसे ब्लॉक करने के बजाय उसे थैंक यू बोलिये। क्योंकि शायद उसकी वो एक अलग बात आपको उस बड़ी गलती से बचा ले जो आपके जैसे दिखने वाले दस दोस्त नहीं देख पा रहे थे। याद रखिये, जब सब एक जैसा सोचते हैं, तो असल में कोई भी नहीं सोच रहा होता है।


लेसन २ : इंडिपेंडेंस (स्वतंत्र सोच की ताकत)

क्या आपने कभी गौर किया है कि जब एक इंसान आसमान की तरफ देखने लगता है, तो धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला अपनी गर्दन टेढ़ी करके ऊपर देखने लगता है। भले ही ऊपर सिर्फ एक पतंग कट रही हो या शायद कुछ भी न हो। जेम्स सुरोविकी इसे ही सबसे बड़ा खतरा बताते हैं। भीड़ तब तक स्मार्ट है जब तक उस भीड़ का हर आदमी अपना खुद का दिमाग इस्तेमाल कर रहा है। जैसे ही लोग एक-दूसरे की नकल करने लगते हैं, वह भीड़ बेवकूफों की टोली बन जाती है।

असली विजडम तब आती है जब आप सोशल मीडिया के भेड़चाल वाले ट्रेंड्स को छोड़कर अपनी खुद की जानकारी पर भरोसा करते हैं। मान लीजिये आपके ऑफिस में एक मीटिंग चल रही है। बॉस ने एक बड़ा ही घटिया आईडिया दिया। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला यह कि आप भी बाकी चमचों की तरह 'वाह-वाह' करें और अपनी इंडिपेंडेंस को डस्टबिन में डाल दें। दूसरा यह कि आप शांति से सोचें कि क्या यह सच में काम करेगा।

जेम्स कहते हैं कि ग्रुप तभी सही डिसीजन लेता है जब उसके मेंबर्स एक-दूसरे से इन्फ्लुएंस हुए बिना अपनी बात रखें। अगर आप अपनी राय सिर्फ इसलिए बदल देते हैं क्योंकि आपके पड़ोसी शर्मा जी ने शेयर मार्केट में पैसे लगाए हैं, तो आप इंडिपेंडेंट नहीं हैं। आप बस उस लहर का हिस्सा हैं जो अंत में किनारे पर जाकर दम तोड़ देगी। नकल करना बहुत आसान है, लेकिन अपनी अक्ल लगाना ही असली टास्क है।

हैरानी की बात यह है कि जितनी ज्यादा इन्फॉर्मेशन हमें दूसरों से मिलती है, हम उतने ही कन्फ्यूज हो जाते हैं। हम अक्सर यह सोचते हैं कि इतने सारे लोग गलत कैसे हो सकते हैं। भाई साहब, हिस्ट्री गवाह है कि करोड़ों लोग एक साथ मिलकर भी हिमालय जैसी बड़ी गलती कर सकते हैं। जब लोग एक-दूसरे को देख-देखकर फैसला लेते हैं, तो इसे 'इन्फॉर्मेशनल कैस्केड' कहते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक आदमी रेस्टोरेंट के बाहर लाइन देखकर खड़ा हो जाता है, यह सोचे बिना कि शायद अंदर खाना जहर जैसा हो।

स्मार्ट डिसीजन मेकिंग का सीक्रेट यही है कि आप ग्रुप में रहें, पर ग्रुप का हिस्सा न बनें। अपनी प्राइवेट इन्फॉर्मेशन और अपने एक्सपीरियंस को कभी भी दूसरों के प्रेशर में आकर न छोड़ें। जब आप अपनी इंडिपेंडेंट राय को टेबल पर रखते हैं, तभी ग्रुप को वो कीमती डेटा मिलता है जो उसे सही रास्ते पर ले जा सकता है। याद रखिये, अगर आप भीड़ के पीछे भागेंगे तो आप सिर्फ धूल चाटेंगे, लेकिन अगर आप अपनी दिशा खुद चुनेंगे तो शायद पूरी दुनिया आपके पीछे आए।

एक सफल इंसान वही है जो दूसरों की राय सुनता तो है, लेकिन अपना फैसला अपनी रिसर्च और लॉजिक के बेस पर लेता है। इंडिपेंडेंस का मतलब यह नहीं कि आप जिद्दी बन जाएं। इसका मतलब यह है कि आप अपनी सोच को किसी और के रिमोट कंट्रोल से न चलने दें।


लेसन ३ : डिसेंट्रलाइजेशन (ज्ञान का विकेंद्रीकरण)

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके घर के पास वाले किराने वाले को यह कैसे पता होता है कि कल सुबह मोहल्ले में किस ब्रांड का दूध सबसे ज्यादा बिकेगा। उसे किसी बड़ी यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की डिग्री नहीं मिली है, फिर भी उसका अंदाजा किसी बड़े डेटा साइंटिस्ट से बेहतर होता है। जेम्स सुरोविकी इसे ही डिसेंट्रलाइजेशन कहते हैं। इसका मतलब है कि असली ज्ञान किसी ऊंचे एयर-कंडीशंड ऑफिस में बैठे बॉस के पास नहीं, बल्कि उन लोगों के पास होता है जो जमीन पर काम कर रहे हैं।

अब मान लीजिये एक बहुत बड़ी कंपनी है जो जूते बनाती है। कंपनी का मालिक ऊपर बैठकर यह डिसाइड कर रहा है कि अगले महीने कौन सा कलर ट्रेंड में होगा। लेकिन उसे यह नहीं पता कि छोटे शहरों की गलियों में बच्चे किस तरह के जूते पहनकर क्रिकेट खेल रहे हैं। यहाँ मालिक फेल हो जाता है क्योंकि उसके पास लोकल जानकारी नहीं है। असली स्मार्टनेस तब आती है जब आप उन छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़ते हैं जो अलग-अलग जगहों पर बिखरे हुए हैं।

जेम्स कहते हैं कि जब पावर और नॉलेज एक ही जगह जमा हो जाती है, तो वो सड़ने लगती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक ही नल से पूरे शहर को पानी पिलाने की कोशिश करना। अगर वो नल खराब हुआ तो पूरा शहर प्यासा मर जाएगा। लेकिन अगर हर घर का अपना कुआं हो, तो रिस्क कम हो जाता है। बिजनेस और लाइफ में भी यही होता है। जब आप अपनी टीम के हर मेंबर को फैसला लेने की आजादी देते हैं, तो आपको वो रिजल्ट्स मिलते हैं जो अकेले आप कभी नहीं सोच सकते थे।

प्रॉब्लम यह है कि हमें 'कंट्रोल' करने की बहुत बुरी आदत है। हमें लगता है कि अगर हमने सब कुछ अपने हाथ में नहीं रखा, तो रायता फैल जाएगा। भाई साहब, रायता तब फैलता है जब आप दूसरों की एक्सपर्टाइज को इग्नोर करते हैं। एक अच्छा लीडर वो नहीं है जो सबसे ज्यादा जानता है, बल्कि वो है जो यह जानता है कि उसे किससे क्या पूछना है। हर इंसान के पास अपनी एक छोटी सी दुनिया का बड़ा अनुभव होता है।

जब हम इन अलग-अलग अनुभवों को एक साथ मिलाते हैं, तो एक ऐसी सुपर-इंटेलिजेंस तैयार होती है जिसे हराना नामुमकिन है। इसे ही हम कलेक्टिव विजडम कहते हैं। तो अपनी ईगो को थोड़ा साइड में रखिये और उन लोगों की सुनिए जो फील्ड में पसीना बहा रहे हैं। उनकी छोटी सी जानकारी आपके करोड़ों के नुकसान को बचा सकती है।

डिसेंट्रलाइजेशन का मतलब सिर्फ काम बांटना नहीं है, बल्कि भरोसे को बांटना है। जब आप लोगों को यह महसूस कराते हैं कि उनकी राय की कीमत है, तब वो आपको वो सच बताते हैं जो आपकी बड़ी-बड़ी रिपोर्ट्स में कभी नहीं दिखेगा। याद रखिये, दुनिया इतनी बड़ी है कि इसे एक दिमाग से नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिए हमें हजारों छोटे दिमागों के तालमेल की जरूरत होती है।


तो दोस्तों, जेम्स सुरोविकी की यह बातें हमें सिखाती हैं कि अकेले चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। अगर आप अपनी लाइफ और बिजनेस में बड़ी जीत चाहते हैं, तो दूसरों की डाइवर्सिटी को अपनाइये, अपनी इंडिपेंडेंट सोच को बचाकर रखिये और ज्ञान को एक जगह कैद मत होने दीजिये। भीड़ बेवकूफ नहीं होती, बस उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना आना चाहिए।

अब आपकी बारी है। क्या आपने कभी किसी ग्रुप के साथ मिलकर कोई ऐसा फैसला लिया है जिसने आपको हैरान कर दिया। या फिर क्या आप भी उस भीड़ का हिस्सा बन गए थे जिसने आपको डुबो दिया। अपनी कहानी नीचे कमेंट्स में जरूर शेयर कीजिये। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त को भेजिये जो खुद को बहुत बड़ा 'मिस्टर नो इट ऑल' समझता है। आइये मिलकर एक स्मार्ट कम्युनिटी बनाते हैं।

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