Think Like a Freak (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो खुद को बहुत बड़ा तीस मार खां समझते हैं पर असल में घिसी पिटी सोच के गुलाम हैं? मुबारक हो आप अपनी लाइफ बर्बाद करने की रेस में सबसे आगे हैं क्योंकि बिना हटकर सोचे आप सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर ही रह जाएंगे।

इस दुनिया में हर कोई स्मार्ट बनने का नाटक कर रहा है पर असली स्मार्टनेस 'थिंक लाइक अ फ्रीक' बनने में है। आज हम स्टीवन लेविट और स्टीफन डब्नर की इस कमाल की किताब से ३ ऐसे धमाकेदार लेसन सीखेंगे जो आपके दिमाग की बत्ती पूरी तरह जला देंगे।


लेसन १ : आई डोंट नो कहना सीखो वरना गड्ढे में गिरोगे

हमारे समाज में एक बड़ी अजीब बीमारी है जिसे हम सब पालकर बैठे हैं और उसका नाम है सर्वज्ञानी बनने का नाटक। बचपन से हमें सिखाया गया है कि हर सवाल का जवाब होना चाहिए। चाहे क्लास में टीचर कुछ पूछे या ऑफिस में बॉस, अगर आप अपना हाथ ऊपर नहीं उठाते तो लोग आपको बेवकूफ समझने लगते हैं। लेकिन 'थिंक लाइक अ फ्रीक' के लेखक कहते हैं कि अगर आप सच में स्मार्ट बनना चाहते हैं तो आपको अपनी जुबान पर यह तीन शब्द लाने होंगे और वो हैं 'मुझे नहीं पता'।

सुनने में बहुत आसान लगता है ना? लेकिन जरा सोचिए पिछली बार आपने कब किसी के सामने यह माना था कि आप किसी बात के बारे में अनजान हैं? शायद कभी नहीं। हम इंडियंस तो वैसे भी रायचंदों की कौम हैं। अगर रास्ते में किसी से पता पूछ लो और उसे नहीं भी पता हो, तो भी वो आपको दो किलोमीटर गलत दिशा में भेज देगा पर यह कभी नहीं कहेगा कि भाई मुझे नहीं पता। यही हाल हमारे कॉर्पोरेट जगत का भी है। मीटिंग्स में लोग ऐसी ऐसी बड़ी बातें करते हैं जैसे दुनिया की सारी इकोनॉमी उन्हीं के कंधों पर टिकी हो। वे लंबी चौड़ी भविष्यवाणियां करते हैं जो कभी सच नहीं होतीं।

लेखक बताते हैं कि जब आप 'आई डोंट नो' कहते हैं, तो आप अपने दिमाग की खिड़कियां खोल देते हैं। जब आप मान लेते हैं कि आप खाली हैं, तभी तो कुछ नया भर पाएंगे। जो इंसान पहले से ही भरा बैठा है उसे आप क्या ही सिखाएंगे? असली समस्या यह है कि हम लोग गलत होने से इतना डरते हैं कि हम झूठ बोलना बेहतर समझते हैं। हम तुक्के मारते हैं और जब वो तुक्के फेल हो जाते हैं तो हम किस्मत को दोष देते हैं।

मान लीजिए आपका दोस्त आपसे पूछता है कि अगले साल शेयर मार्केट कहाँ जाएगा। अब कायदे से तो आपको कहना चाहिए कि मुझे नहीं पता क्योंकि मार्केट किसी के बाप का नहीं है। लेकिन आप अपनी चौड़ दिखाने के लिए कह देते हैं कि भाई तू इस कंपनी में पैसा लगा दे, यह रॉकेट बनेगा। फिर जब वो रॉकेट फुस्स होकर जमीन पर गिरता है और आपके दोस्त के पैसे डूबते हैं, तब आप कहते हैं कि यार ग्लोबल मार्केट की हालत खराब थी। आपने अपनी ईगो तो बचा ली पर अपने दोस्त की जेब खाली कर दी।

एक फ्रीक की तरह सोचने का मतलब है कि आप अपनी लिमिट्स को समझें। जब आप यह स्वीकार करते हैं कि आप नहीं जानते, तभी आप असली रिसर्च शुरू करते हैं। तभी आप डेटा को देखते हैं और तभी आप उन बारीकियों को पकड़ पाते हैं जो बाकी दुनिया मिस कर रही है। तो अगली बार जब कोई आपसे ऐसी चीज पूछे जिसका आपको आइडिया न हो, तो अपनी कॉलर ऊँची करके स्मार्ट बनने की जगह शांति से कहिये कि मुझे नहीं पता। यकीन मानिए, लोग आपको बेवकूफ नहीं बल्कि एक ईमानदार और भरोसेमंद इंसान समझेंगे। वैसे भी, झूठ बोलकर सबको इम्प्रेस करने से अच्छा है कि सच बोलकर अपनी बुद्धि बचा ली जाए।


लेसन २ : दुनिया को बच्चों की नजर से देखो, बड़ों ने तो रायता फैलाया ही है

जब हम बड़े हो जाते हैं, तो हमें लगता है कि हमारे पास दुनिया का सारा तजुर्बा आ गया है। हम खुद को बहुत गंभीर और समझदार दिखाने की कोशिश करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि यह सो कॉल्ड गंभीरता अक्सर हमारी सोच को कुंद कर देती है। 'थिंक लाइक अ फ्रीक' के लेखक कहते हैं कि अगर आपको कोई बड़ी प्रॉब्लम सॉल्व करनी है, तो आपको एक बच्चे की तरह सोचना होगा। बच्चे छोटे होते हैं, निडर होते हैं और सबसे जरूरी बात, वे उन चीजों पर भी सवाल उठाते हैं जिन्हें बड़े लोग सच मानकर बैठ जाते हैं।

आजकल के कॉर्पोरेट ऑफिसों को ही देख लीजिये। वहां लोग कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम्स के इतने भारी भरकम सोल्यूशन्स लेकर आते हैं कि सुनकर ही चक्कर आ जाए। हर कोई दुनिया बदलने की बातें करता है लेकिन कोई यह नहीं देखता कि असल समस्या कितनी छोटी और बेसिक हो सकती है। बच्चे कभी भी किसी आईडिया को जज नहीं करते। वे पागलों की तरह सवाल पूछते हैं। क्यों? क्यों नहीं? कैसे? और यही वो सवाल हैं जो हमें असली सच तक ले जाते हैं।

लेखक यहाँ एक बहुत मजेदार उदाहरण देते हैं कॉम्पिटिटिव ईटिंग का। आपने उन लोगों को देखा होगा जो एक बार में पचास साठ हॉट डॉग खा जाते हैं। एक जापानी लड़के ने इस पूरी प्रतियोगिता का नक्शा ही बदल दिया क्योंकि उसने एक बच्चे की तरह सोचा। जहाँ बाकी महारथी अपनी ताकत और बड़े पेट के दम पर जीतने की कोशिश कर रहे थे, उस लड़के ने सवाल पूछा कि क्या मैं हॉट डॉग को खाने का तरीका बदल सकता हूँ? उसने उसे पानी में भिगोकर और तोड़कर खाना शुरू किया। बड़ों को यह तरीका शायद बचकाना या अजीब लगता, लेकिन उसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।

हम लोग अक्सर बहुत बड़े और डरावने दिखने वाले सवालों के पीछे भागते हैं। जैसे कि दुनिया से गरीबी कैसे खत्म करें? अब यह सवाल इतना बड़ा है कि इसका जवाब ढूंढते ढूंढते आपकी पुश्तें गुजर जाएंगी। एक फ्रीक की तरह सोचने वाला इंसान इसे छोटा करेगा। वो पूछेगा कि क्या हम इस एक खास स्कूल के बच्चों के खाने की क्वालिटी सुधार सकते हैं? जब आप छोटे सवाल पूछते हैं, तो आपको सटीक जवाब मिलते हैं। बड़े और खोखले सवालों का जवाब अक्सर भाषणों तक ही सीमित रह जाता है।

एक और बात, बच्चों को नई चीजें ट्राई करने में शर्म नहीं आती। हम बड़े लोग तो यह सोचने में ही आधा जीवन बिता देते हैं कि लोग क्या कहेंगे। अगर मैंने यह घटिया सा दिखने वाला आईडिया दिया तो मैनेजर क्या सोचेगा? बच्चे को कोई फर्क नहीं पड़ता। वो मिट्टी का घर बनाता है और अगर वो गिर जाए तो हँसकर फिर से शुरू कर देता है। हमें भी अपनी ईगो को साइड में रखकर अपनी प्रॉब्लम्स के साथ खेलना सीखना होगा।

तो अगर आप अपनी बोरिंग लाइफ और ऑफिस की फाइलों में फंस चुके हैं, तो जरा रुकिए। अपनी उस थ्री पीस सूट वाली सोच को खूंटी पर टांगिए और थोड़ा बचपना दिखाइए। ऐसे सवाल पूछिए जो सुनने में बेवकूफी भरे लगें क्योंकि अक्सर सबसे महान सोल्यूशन्स उन्हीं बेवकूफाना सवालों के पीछे छुपे होते हैं। आखिर में, एक सीरियस एडल्ट बनने से कहीं बेहतर है एक जिज्ञासु बच्चा बने रहना, कम से कम आप कुछ नया तो सीख पाएंगे।


लेसन ३ : इन्सेंटिव्स का असली खेल समझो वरना दुनिया तुम्हें नचाती रहेगी

अगर आपको लगता है कि लोग अपनी मर्जी से काम करते हैं, तो भाई साहब आप किसी बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। इस दुनिया का हर इंसान एक कठपुतली है जिसकी डोर 'इन्सेंटिव्स' यानी इनाम या लालच के हाथ में है। 'थिंक लाइक अ फ्रीक' के लेखक हमें समझाते हैं कि अगर आप यह समझ गए कि किसी इंसान को क्या चीज मोटिवेट करती है, तो आप दुनिया के सबसे बड़े जादूगर बन सकते हैं। लेकिन समस्या यह है कि हम लोग अक्सर गलत इन्सेंटिव्स सेट कर देते हैं और फिर बैठकर रोते हैं कि काम क्यों नहीं हो रहा।

मान लीजिए आपके ऑफिस में बॉस ने एलान किया कि जो सबसे ज्यादा कॉल्स करेगा, उसे महीने के अंत में बोनस मिलेगा। अब बॉस को लगा कि इससे काम बढ़ेगा। लेकिन असल में क्या होगा? कर्मचारी पागलों की तरह फोन मिलाएंगे, चाहे सामने वाला बात करना चाहे या नहीं। वे सिर्फ अपनी संख्या बढ़ाने पर ध्यान देंगे, काम की क्वालिटी पर नहीं। इसे कहते हैं 'कोबरा इफेक्ट'। जब आप समस्या को सुलझाने के लिए ऐसा इनाम रखते हैं जो समस्या को और बढ़ा दे।

इतिहास में भी ऐसा ही हुआ था जब दिल्ली में सांपों की संख्या बढ़ने पर सरकार ने हर मरे हुए सांप पर इनाम रखा। लोगों ने पैसे कमाने के चक्कर में घर में सांप पालने शुरू कर दिए। जब सरकार को पता चला और उन्होंने इनाम बंद किया, तो लोगों ने वो सांप सड़कों पर छोड़ दिए। नतीजा? सांप पहले से भी ज्यादा हो गए। यही हाल हमारी डेली लाइफ का है। हम बच्चों को कहते हैं कि बेटा होमवर्क कर लो तो चॉकलेट मिलेगी। बच्चा होमवर्क तो कर लेता है पर उसका दिमाग सिर्फ उस चॉकलेट में होता है, पढ़ाई में नहीं।

एक फ्रीक की तरह सोचने का मतलब है कि आप लोगों के कहे हुए शब्दों पर नहीं, बल्कि उनके पीछे छुपे हुए असली लालच को देखें। लोग अक्सर वही करते हैं जो उनके फायदे में होता है, न कि वह जो सही होता है। अगर आप चाहते हैं कि आपका जिम ट्रेनर आपको सच में फिट बनाए, तो उसे वजन कम करने पर बोनस दीजिये, न कि सिर्फ क्लास लेने पर। जब तक आप सही नस नहीं पकड़ेंगे, तब तक लोग आपको गोल गोल घुमाते रहेंगे।

सच्चाई तो यह है कि हम खुद भी इसी जाल में फंसे हैं। हम सोशल मीडिया पर पोस्ट इसलिए नहीं डालते कि हमें ज्ञान बांटना है, बल्कि इसलिए डालते हैं क्योंकि हमें उन 'लाइक' और 'कमेंट' वाले छोटे छोटे इन्सेंटिव्स की भूख है। अगर फेसबुक आज लाइक का बटन हटा दे, तो आधे लोग कंटेंट बनाना छोड़ देंगे। तो अगर आप लाइफ में कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो पहले अपना खुद का रिवॉर्ड सिस्टम बदलिए। अपने आप को उन चीजों के लिए इनाम दीजिये जो लॉन्ग टर्म में आपके काम आएं, न कि उन चीजों के लिए जो सिर्फ दो मिनट की खुशी दें।


तो दोस्तों, 'थिंक लाइक अ फ्रीक' हमें सिखाती है कि दुनिया वैसी नहीं है जैसी हमें दिखती है। अपनी अज्ञानता को स्वीकार करना, बच्चे जैसी मासूमियत से सवाल पूछना और लोगों के असली इरादों को समझना ही एक स्मार्ट इंसान की पहचान है। घिसी पिटी सोच को छोड़िये और आज से ही कुछ अलग सोचना शुरू कीजिये।

अगर आपको यह ३ लेसन्स पसंद आए हैं, तो इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो खुद को बहुत बड़ा विद्वान समझते हैं। नीचे कमेंट में लिखकर बताइये कि आपकी लाइफ में ऐसा कौन सा इन्सेंटिव है जो आपको आगे बढ़ने से रोकता है। चलिए मिलकर अपनी सोच को फ्रीक जैसा बनाते हैं।

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