अगर आपको लगता है कि आप बहुत स्मार्ट हैं और लाइफ की हर प्रॉब्लम का हल आपके पास है तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी की तरफ बढ़ रहे हैं। दुनिया बदल रही है और आप अभी भी पुराने घिसे पिटे तरीकों से चिपक कर बैठे हैं। अगर आपने रॉकेट साइंटिस्ट की तरह सोचना नहीं सीखा तो यकीन मानिए आप भीड़ में पीछे छूट जाएंगे और लोग आपकी नाकामी पर हँसेंगे। क्या आप अपनी पूरी लाइफ एक औसत इंसान बनकर गुजारना चाहते हैं।
इस आर्टिकल में हम ओज़ान वरोल की बुक थिंक लाइक अ रॉकेट साइंटिस्ट से वो सीक्रेट तरीके सीखेंगे जो बड़े बड़े साइंटिस्ट इस्तेमाल करते हैं। चलिए जानते हैं वो ३ कमाल के लेसन जो आपकी लाइफ बदल देंगे।
लेसन १ : फर्स्ट प्रिंसिपल्स थिंकिंग का जादू
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो हमेशा कहते हैं कि यार यह काम तो ऐसे ही होता आया है। अगर हाँ तो बधाई हो आप एक रोबोट की तरह जी रहे हैं। ओज़ान वरोल कहते हैं कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो कॉपी पेस्ट करते हैं और दूसरे वो जो रॉकेट उड़ाते हैं। रॉकेट साइंटिस्ट कभी यह नहीं सोचते कि पिछली बार क्या हुआ था। वो हर प्रॉब्लम को उसकी जड़ यानी फर्स्ट प्रिंसिपल्स से देखते हैं।
इमेजिन कीजिये कि आपको एक नया बिजनेस शुरू करना है। आप अपने पड़ोसी शर्मा जी को देखते हैं। शर्मा जी ने परचून की दुकान खोली तो आप भी वही करने लगते हैं। यह है कॉपी कैट थिंकिंग। लेकिन एक रॉकेट साइंटिस्ट क्या करेगा। वो सोचेगा कि असल में लोगों को क्या चाहिए। क्या उन्हें सिर्फ सामान चाहिए या उन्हें घर बैठे सुकून चाहिए। जब आप पुरानी मान्यताओं के चश्मे उतार कर देखते हैं तभी असली इनोवेशन होता है।
एलन मस्क का एग्जांपल लीजिये। जब उन्होंने स्पेसएक्स शुरू किया तो सबको लगा कि वह पागल हो गए हैं। लोगों ने कहा कि रॉकेट खरीदना बहुत महंगा है। मस्क ने इसे फर्स्ट प्रिंसिपल्स से सोचा। उन्होंने देखा कि रॉकेट बनाने के लिए जो रॉ मटेरियल चाहिए जैसे एल्युमीनियम और कॉपर उनकी कीमत तो बहुत कम है। तो फिर रॉकेट इतना महंगा क्यों है। उन्होंने पुरानी घिसी पिटी सोच को लात मारी और खुद सस्ते में रॉकेट बना लिया।
हम अपनी लाइफ में भी यही गलती करते हैं। हम दूसरों की सक्सेस स्टोरी पढ़ते हैं और सोचते हैं कि वैसा ही करेंगे तो हम भी सफल हो जाएंगे। भाई साहब सबकी लाइफ की सेटिंग्स अलग होती हैं। अगर आप भी वही घिसा पिटा फार्मूला लगाएंगे जो दुनिया लगा रही है तो आपको भी वही मिलेगा जो दुनिया को मिल रहा है यानी स्ट्रेस और कम सैलरी।
अपनी लाइफ की किसी भी बड़ी मुश्किल को उठाइये। उसे छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ दीजिये। खुद से पूछिए कि क्या यह सच है या बस मेरा वहम है। अक्सर हम अपनी ईगो के कारण पुराने तरीकों से चिपके रहते हैं। हमें लगता है कि अगर हमने तरीका बदला तो लोग क्या कहेंगे। लोग तो वैसे भी कह ही रहे हैं। तो क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जो वाकई काम करे।
फर्स्ट प्रिंसिपल्स थिंकिंग का मतलब है अपनी अक्ल का इस्तेमाल करना। यह थोड़ा मुश्किल है क्योंकि दिमाग को मेहनत करनी पड़ती है। और हमें तो बस रील्स देखकर दिमाग को सुलाने की आदत है। लेकिन अगर आप इस लेसन को समझ गए तो आप किसी भी फील्ड में टॉप पर पहुँच सकते हैं। रॉकेट साइंस सिर्फ आसमान में जाने के लिए नहीं है बल्कि जमीन पर रहकर अपनी लाइफ की बाधाओं को पार करने के लिए भी है।
लेसन २ : फेलियर को डेटा की तरह इस्तेमाल करना
ज्यादातर लोग लाइफ में फेल होने से ऐसे डरते हैं जैसे बचपन में होमवर्क न करने पर टीचर की छड़ी से डरते थे। जैसे ही लाइफ में कोई छोटा सा झटका लगता है हम सीधा चद्दर ओढ़कर सो जाते हैं या फिर किस्मत को कोसने लगते हैं। लेकिन ओज़ान वरोल कहते हैं कि रॉकेट साइंटिस्ट के लिए फेलियर कोई अंत नहीं बल्कि एक कीमती जानकारी है। जब कोई रॉकेट फटता है तो साइंटिस्ट रोते नहीं बैठते बल्कि वो मलबे में जाकर यह ढूंढते हैं कि क्या गलत हुआ।
मान लीजिये आपने जिम जाना शुरू किया और चार दिन बाद ही आपका मन उचट गया। अब एक आम इंसान सोचेगा कि यार मेरी तो बॉडी ही नहीं बन सकती मेरी तो किस्मत ही खराब है। लेकिन एक रॉकेट साइंटिस्ट वाला माइंडसेट यहाँ कहेगा कि भाई रुको। फेलियर का मतलब यह नहीं है कि आप बेकार हैं। इसका मतलब सिर्फ यह है कि आपका सिस्टम फेल हुआ है। शायद आप सुबह जल्दी नहीं उठ पा रहे या शायद आपने पहले ही दिन बहुत भारी वजन उठा लिया।
दुनिया के सबसे बड़े अविष्कार फेलियर की ही देन हैं। जब कोई साइंटिस्ट लैब में एक्सपेरिमेंट करता है और उसे वो रिजल्ट नहीं मिलता जो वो चाहता था तो वह उसे 'गलती' नहीं कहता। वह उसे 'डेटा' कहता है। वह कहता है कि अच्छा इस तरीके से काम नहीं बना तो अब दूसरा तरीका ट्राई करते हैं। हमारे यहाँ तो अगर कोई एग्जाम में फेल हो जाए तो पड़ोस की आंटी ऐसे देखती हैं जैसे कोई बड़ा क्राइम कर दिया हो।
सच्चाई तो यह है कि जो कभी फेल नहीं हुआ उसने कभी कुछ नया ट्राई ही नहीं किया। अगर आप अपनी कंफर्ट जोन में बैठकर वही कर रहे हैं जो आप पिछले दस साल से कर रहे हैं तो आप कभी फेल नहीं होंगे लेकिन आप कभी ग्रो भी नहीं करेंगे। रॉकेट तब तक जमीन पर ही रहता है जब तक उसमें आग नहीं लगाई जाती। और आग लगने पर रिस्क तो होता ही है।
अपनी लाइफ को एक लैब की तरह देखिये। अगर आपका कोई आईडिया फ्लॉप हो गया या आपकी कोई रिलेशनशिप वर्क नहीं कर रही तो खुद को ब्लेम करना बंद कीजिये। उस मलबे में उतरिये और देखिये कि असल में क्या कमी रह गई थी। क्या आपकी कम्युनिकेशन खराब थी या आपकी प्लानिंग में छेद था। जब आप फेलियर को इमोशनली नहीं बल्कि लॉजिकली देखना शुरू करते हैं तो आप डरना छोड़ देते हैं।
याद रखिये सक्सेस का रास्ता फेलियर के मलबे से होकर ही गुजरता है। जिस दिन आपने अपनी गलतियों से सीखना शुरू कर दिया उस दिन आप एक अनस्टॉपेबल रॉकेट बन जाएंगे। तो अगली बार जब आप गिरे तो उठकर अपने कपड़े झाड़िये और कहिये कि चलो एक और डेटा पॉइंट मिल गया। लाइफ कोई सस्पेंस मूवी नहीं है जहाँ एक बार क्लाइमेक्स बिगड़ा तो सब खत्म। यहाँ आप अपनी कहानी के डायरेक्टर खुद हैं।
लेसन ३ : अन्सर्टेनिटी का स्वागत करना
क्या आपको भी हर चीज का प्लान पहले से चाहिए। अगर कल क्या होगा यह सोचकर आपकी रातों की नींद उड़ जाती है तो समझ लीजिये कि आप अपनी प्रोग्रेस के दुश्मन खुद हैं। रॉकेट साइंटिस्ट जब अंतरिक्ष में यान भेजते हैं तो उन्हें नहीं पता होता कि वहाँ क्या होने वाला है। अंतरिक्ष रहस्यों से भरा है और हमारी लाइफ भी वैसी ही है। ओज़ान वरोल कहते हैं कि अन्सर्टेनिटी यानी अनिश्चितता से डरना छोड़िये क्योंकि असली ग्रोथ वहीं छिपी है।
हम लोग अक्सर एक सुरक्षित नौकरी और एक फिक्स रूटीन के पीछे भागते हैं। हमें लगता है कि अगर सब कुछ तय रहेगा तो हम खुश रहेंगे। लेकिन भाई साहब लाइफ कोई ट्रेन की पटरी नहीं है जिस पर आप बस सीधे चलते रहेंगे। लाइफ तो वो समंदर है जहाँ कभी भी तूफान आ सकता है। जो इंसान तूफान से डरकर किनारे पर खड़ा रहता है वह कभी नए टापू नहीं खोज पाता।
इमेजिन कीजिये कि आपको एक नया स्किल सीखना है या कोई नया शहर जाना है। आपका दिमाग तुरंत कहेगा कि यार अगर वहां जाकर कुछ नहीं हुआ तो। अगर पैसे डूब गए तो। यह 'अगर' और 'मगर' ही वो जंजीरें हैं जो आपको जमीन से बांधे रखती हैं। रॉकेट को जमीन छोड़ने के लिए ग्रेविटी से लड़ना पड़ता है। वैसे ही आपको अपने डर और कंफर्ट जोन की ग्रेविटी को तोड़ना होगा।
एक मजेदार बात बताऊं। जब हम किसी अनजान रास्ते पर होते हैं तो हमारा दिमाग सबसे ज्यादा एक्टिव होता है। जब हम डरे हुए होते हैं तो हमारी सीखने की पावर बढ़ जाती है। साइंटिस्ट इसी डर को अपनी ताकत बनाते हैं। वो अन्सर्टेनिटी को एक एडवेंचर की तरह देखते हैं। अगर आपको पता हो कि फिल्म के अंत में क्या होने वाला है तो क्या आपको फिल्म देखने में मजा आएगा। बिलकुल नहीं। तो फिर अपनी लाइफ की स्क्रिप्ट पहले से फिक्स क्यों करना चाहते हैं।
अन्सर्टेनिटी का मतलब है पॉसिबिलिटी। यानी कुछ भी हो सकता है। और अगर कुछ भी हो सकता है तो कुछ बहुत अच्छा भी तो हो सकता है। हम हमेशा बुरे के बारे में सोचते हैं लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि अगर सब कुछ सही हो गया तो लाइफ कितनी हसीन होगी। अपनी लाइफ के कंट्रोल को थोड़ा ढीला छोड़िये। हर चीज को मैनेज करने की कोशिश करना बंद कीजिये।
जब आप यह मान लेते हैं कि आपको सब कुछ नहीं पता तो आप सीखने के लिए तैयार हो जाते हैं। एक रॉकेट साइंटिस्ट हमेशा एक स्टूडेंट बनकर रहता है। वह जानता है कि ब्रह्मांड बहुत बड़ा है और उसकी नॉलेज बहुत छोटी। यही हंबल माइंडसेट उसे महान बनाता है। तो अगली बार जब लाइफ आपके सामने कोई ऐसी सिचुएशन खड़ी करे जिसका आपके पास कोई जवाब न हो तो घबराइये मत। मुस्कुराइए और कहिये कि चलिए कुछ नया सीखने का टाइम आ गया है।
तो दोस्तों, थिंक लाइक अ रॉकेट साइंटिस्ट सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि एक नया नजरिया है। हमने सीखा कि कैसे अपनी सोच को जड़ से बदलना है फेलियर को टीचर बनाना है और अनजाने रास्तों पर बेखौफ चलना है। अब फैसला आपके हाथ में है। क्या आप अभी भी वही पुरानी घिसी पिटी लाइफ जीना चाहते हैं या अपने सपनों का रॉकेट लॉन्च करने के लिए तैयार हैं।
आज ही अपनी लाइफ की किसी एक प्रॉब्लम को पकड़िये और उस पर फर्स्ट प्रिंसिपल्स थिंकिंग लगाइये। कमेंट में लिखिये कि आप अपनी लाइफ का कौन सा रॉकेट आज लॉन्च करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो रिस्क लेने से डरते हैं। याद रखिये आसमान की कोई सीमा नहीं है सीमा सिर्फ आपके दिमाग में है।
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