क्या आप भी गधे की तरह दिन भर पिस रहे हैं और फिर भी काम खत्म नहीं हो रहा। सच तो यह है कि आप अपनी लाइफ के सबसे कीमती साल फाइलों और ईमेल्स के ढेर में दफन कर रहे हैं। आपकी इसी नाकामी पर दुनिया हंस रही है क्योंकि आप बिजी तो हैं पर कामयाब बिलकुल नहीं।
परेशान मत होइए क्योंकि आज हम लोरा स्टैक की किताब से वो सीक्रेट्स निकालेंगे जो आपकी जिंदगी में हर दिन ९० मिनट्स वापस जोड़ देंगे। चलिए जानते हैं वो ३ पावरफुल लेसन जो आपको काम के बोझ से आजाद कर देंगे।
लेसन १ : रूथलेस प्रायोरिटाइजेशन यानी फालतू कामों का कत्लेआम
आज के टाइम में हम सबकी हालत उस हलवाई जैसी हो गई है जिसकी दुकान पर भीड़ तो बहुत है पर गल्ले में पैसे गायब हैं। आप सुबह ऑफिस पहुँचते हैं और ईमेल का ऐसा पहाड़ आपके सामने खड़ा होता है जैसे माउंट एवरेस्ट फतह करना हो। आप पागलों की तरह कीबोर्ड पर उंगलियाँ घिसते हैं। मीटिंग्स में ऐसे बैठते हैं जैसे देश का बजट आप ही बना रहे हैं। लेकिन शाम को जब घर लौटते हैं तो दिल से एक ही आवाज आती है कि भाई आज दिन भर किया क्या। लोरा स्टैक अपनी किताब में बहुत कड़वी मगर सच्ची बात कहती हैं कि हर वो काम जो आपको बिजी रखता है वो जरूरी नहीं होता। हम इंडियन्स की एक बहुत बड़ी बीमारी है कि हम हर किसी को खुश करना चाहते हैं। बॉस ने कुछ बोला तो हां। दोस्त ने बीच काम में चाय के लिए बुलाया तो हां। रिश्तेदार का फोन आया तो हां। भाई आप इंसान हो या कोई फ्री की सर्विस। अगर आप हर चीज को हां बोलेंगे तो असल में आप अपनी ग्रोथ और अपनी शांति को ना बोल रहे हैं।
लेखिका कहती हैं कि आपको अपने कामों का कत्लेआम करना सीखना होगा। इसे वो रूथलेस प्रायोरिटाइजेशन कहती हैं। मतलब आपको यह तय करना होगा कि कौन सा काम आपकी लाइफ में वैल्यू जोड़ रहा है और कौन सा सिर्फ आपका खून पी रहा है। इमेजिन करिए कि आप एक ऐसी नाव में हैं जो डूब रही है। अब वहां आप यह नहीं सोचेंगे कि मेरा महंगा सूटकेस या लंच बॉक्स कैसे बचेगा। आप बस वही सामान बचाएंगे जो आपकी जान बचा सके। वर्क लाइफ में भी यही लॉजिक लगाइये। उन ८० परसेंट कामों को लात मारिये जिनका आपकी तरक्की से कोई लेना देना नहीं है। हम अक्सर छोटे छोटे टुच्चे कामों में उलझे रहते हैं क्योंकि वो आसान होते हैं। ईमेल्स का रिप्लाई करना या डेस्क साफ करना हमें एक झूठी जीत का अहसास देता है। हमें लगता है कि हम बहुत काम कर रहे हैं। पर असल में हम सिर्फ असली काम से बच रहे होते हैं।
अब जरा सोचिये आपके उस कलीग के बारे में जो सारा दिन ऑफिस की पॉलिटिक्स और गॉसिप में लगा रहता है पर प्रमोशन के टाइम सबसे आगे होता है। आपको लगता होगा कि वो लकी है पर असल में उसे पता है कि कौन से २ काम करने से उसकी इमेज चमकेगी। वो बाकी फालतू चीजों को डस्टबिन में डाल देता है। आपको भी यही करना है। रोज सुबह अपनी लिस्ट में से टॉप ३ काम चुनिए और जब तक वो खत्म न हो जाएं दुनिया इधर की उधर हो जाए पर अपनी सीट से मत हिलिये। बाकी सब कुछ शोर है। अगर आप शोर मचाने वाली ईमेल्स और बिन बुलाए मेहमानों को मना करना नहीं सीखेंगे तो आप बस दूसरों के सपनों के लिए मजदूरी करते रह जाएंगे। अपनी एनर्जी को उस लेजर लाइट की तरह बनाइये जो लोहे को भी काट देती है न कि उस बल्ब की तरह जो बस रोशनी फैलाता है पर कुछ बदलता नहीं। जब आप फालतू के कामों को ना बोलना शुरू करेंगे तभी आप अपनी लाइफ के उन ९० मिनट्स को वापस पाएंगे जो अब तक चोरी हो रहे थे।
लेसन २ : शेड्यूलिंग का असली जादू और कैलेंडर की गुलामी
पहले लेसन में हमने फालतू कामों को कचरे के डिब्बे में डालना सीख लिया। अब सवाल यह है कि जो असली काम बचे हैं, उनका क्या करें। बहुत से लोग बड़ी शान से अपनी टू डू लिस्ट दिखाते हैं जैसे कोई जंग जीतने का नक्शा हो। लेकिन भाई साहब, उस लिस्ट का क्या फायदा जो सिर्फ कागज पर ही रह जाती है। लोरा स्टैक कहती हैं कि एक अधूरी टू डू लिस्ट आपको मोटिवेशन नहीं, बल्कि डिप्रेशन देती है। आप उसे देखते हैं और फिर इंस्टाग्राम रील्स चलाने लगते हैं ताकि उस तनाव से बच सकें। इसे साइकोलॉजी में प्रोक्रैस्टिनेशन कहते हैं और हमारी भाषा में इसे बस आलस और डर का मिक्सचर कहा जाता है। असली जादू तब शुरू होता है जब आप लिस्ट बनाना छोड़कर शेड्यूलिंग करना शुरू करते हैं। मतलब अपने कैलेंडर में हर काम के लिए एक फिक्स टाइम अलॉट करना। अगर आपने नहीं लिखा कि आप प्रेजेंटेशन कब बनाएंगे, तो यकीन मानिए आप उसे कभी नहीं बनाएंगे। आप बस उसे टालते रहेंगे जब तक कि डेडलाइन आपके गले की हड्डी न बन जाए।
इमेजिन करिए कि आपकी लाइफ एक लोकल ट्रेन की तरह है। अगर स्टेशन पर ट्रेन रुकने का समय तय नहीं होगा, तो हर कोई प्लेटफॉर्म पर अफरा तफरी मचाएगा। यही हाल आपके दिमाग का होता है। जब आप अपने दिन को शेड्यूल नहीं करते, तो हर छोटा काम आपके दिमाग में शोर मचाता है। शेड्यूलिंग का मतलब यह नहीं है कि आप मशीन बन जाएं। इसका मतलब यह है कि आप अपने समय के खुद मालिक बन जाएं। लोरा स्टैक हमें सिखाती हैं कि सबसे मुश्किल काम को उस समय करिए जब आपकी एनर्जी सबसे ज्यादा हो। अब हमारे बीच कुछ ऐसे महान लोग भी हैं जो सुबह उठते ही सबसे पहले व्हाट्सएप चेक करते हैं। भाई, क्या एलन मस्क ने आपको रात को कोई सीक्रेट मैसेज भेजा है। नहीं ना। जब आप सुबह के सबसे कीमती दो घंटे स्टेटस देखने और दूसरों की लाइफ में झाँकने में बर्बाद कर देते हैं, तो आप खुद अपनी प्रोडक्टिविटी का गला घोंट रहे होते हैं।
अगर आप अपने समय को खुद कंट्रोल नहीं करेंगे, तो दूसरे लोग उसे कंट्रोल करेंगे। आपका वो दोस्त जिसे बस टाइमपास करना है, वो आपके शेड्यूल में घुस जाएगा। आपका वो रिश्तेदार जिसे फ्री की सलाह चाहिए, वो आपके ऑफिस ऑवर्स में घुस जाएगा। शेड्यूलिंग आपको एक ऐसी बाउंड्री देती है जिसके अंदर आप राजा होते हैं। जब आप कैलेंडर में ९० मिनट का एक ब्लॉक बनाते हैं और उस पर लिखते हैं कि नो कॉल्स, नो ईमेल्स, तब आप असली काम करते हैं। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे जिम में वर्कआउट करना। अगर आप हर २ मिनट में फोन देखेंगे, तो बॉडी नहीं बनेगी, बस पसीना ही बहेगा। इसी तरह अगर आप काम के बीच में बार बार ब्रेक लेंगे और शेड्यूल को फॉलो नहीं करेंगे, तो काम खत्म नहीं होगा, बस टाइम पास होगा। याद रखिए, सफल लोग ज्यादा काम नहीं करते, वो बस अपने काम को सही समय पर खत्म करना जानते हैं। जब आप अपने समय को एक फिक्स फ्रेम में डाल देते हैं, तो आप अचानक पाएंगे कि आपके पास अपनी फैमिली और शौक के लिए भी वक्त बचने लगा है।
लेसन ३ : डिस्ट्रैक्शन का काल और फोकस की पावर
पिछले दो लेसन्स में हमने कचरा साफ किया और अपना टाइम टेबल भी सेट कर लिया। पर अब बारी आती है उस दुश्मन की जो सबसे मासूम दिखता है पर सबसे बड़ा विलेन है, और वो है डिस्ट्रैक्शन। आज के डिजिटल दौर में हमारा फोकस उस पतंग जैसा हो गया है जिसकी डोर किसी और के हाथ में है। हर दो मिनट में फोन की वो टिंग वाली आवाज आती है और आपका दिमाग काम छोड़कर उस नोटिफिकेशन की गुलामी करने लगता है। लोरा स्टैक कहती हैं कि अगर आपने अपनी एकाग्रता यानी फोकस को नहीं बचाया, तो दुनिया की कोई भी शेड्यूलिंग आपको कामयाब नहीं बना पाएगी। हम सोचते हैं कि बस एक सेकंड के लिए मैसेज ही तो देखना है। पर रिसर्च कहती है कि एक बार ध्यान भटकने के बाद दिमाग को वापस उसी फ्लो में आने के लिए कम से कम २३ मिनट लगते हैं। अब आप खुद हिसाब लगाइये कि दिन भर में आप कितनी बार खुद का कत्ल कर रहे हैं।
हम इंडियन्स को मल्टीटास्किंग का बड़ा शौक है। हम फोन पर बात करते हुए ईमेल भी टाइप करते हैं और साथ में चाय की चुस्की भी लेते हैं। हमें लगता है कि हम शक्तिमान हैं। पर हकीकत ये है कि मल्टीटास्किंग सिर्फ एक धोखा है। आपका दिमाग एक बार में एक ही काम को ढंग से कर सकता है। जब आप एक साथ दस चीजें करते हैं, तो आप किसी भी काम को परफेक्टली नहीं कर पाते। लोरा का कहना है कि अगर आप रोज के ९० मिनट बचाना चाहते हैं, तो आपको अपनी वर्कस्पेस को एक मंदिर की तरह पवित्र बनाना होगा। फोन को दूसरे कमरे में रखिये, फालतू टैब्स बंद करिये और अपने कलीग्स को साफ बता दीजिये कि यह आपका फोकस टाइम है। शुरू में लोगों को बुरा लगेगा, वो आपको घमंडी भी कह सकते हैं। पर याद रखिये, जब आपकी सैलरी और पोजीशन बढ़ेगी, तो वही लोग आपके ऑटोग्राफ के लिए लाइन लगाएंगे।
असल में डिस्ट्रैक्शन सिर्फ बाहर नहीं होता, वो हमारे अंदर भी होता है। काम शुरू करते ही अचानक याद आता है कि कल खाने में क्या बनेगा या उस पुराने दोस्त ने फेसबुक पर क्या पोस्ट किया होगा। इसे रोकने का एक ही तरीका है, वो है अपने दिमाग को ट्रेनिंग देना। जब भी मन भटके, उसे डांटकर वापस काम पर लाइए। लोरा स्टैक की यह बुक हमें सिखाती है कि ९० मिनट बचाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बल्कि यह अपने आत्म सम्मान की लड़ाई है। क्या आप इतने कमजोर हैं कि एक ऐप का नोटिफिकेशन आपकी पूरी जिंदगी का डायरेक्शन बदल दे। अपनी बाउंड्रीज खुद तय कीजिये। जब आप पूरी शिद्दत से एक ही काम में डूब जाते हैं, तो उसे खत्म करने में आधा समय लगता है। यही वो सीक्रेट है जो आपको भीड़ से अलग खड़ा करेगा और आपको वो आजादी देगा जिसका आप सपना देखते हैं।
समय कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप दुकान से खरीद सकें। हर बीतता हुआ सेकंड आपकी लाइफ की बैंक से कट रहा है। आप चाहे तो इस आर्टिकल को पढ़कर भूल जाएं और वापस उसी भागदौड़ भरी, बोझिल जिंदगी में लौट जाएं जहाँ शाम को सिर्फ थकान और पछतावा मिलता है। या फिर आज यह कसम खाएं कि आप अपने समय के चौकीदार बनेंगे। लोरा स्टैक के ये ३ लेसन आपकी लाइफ बदल सकते हैं अगर आप इन्हें सच में लागू करें।
आज ही अपने उन ५ फालतू कामों की लिस्ट बनाइये जिन्हें आप अब से ना बोलने वाले हैं। कमेंट्स में हमें बताइये कि वो कौन सी एक चीज है जो आपका सबसे ज्यादा समय बर्बाद करती है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा कहता है कि भाई बहुत काम है, टाइम ही नहीं मिलता। याद रखिये, वक्त सबके पास उतना ही है, बस फर्क इस बात का है कि कौन इसे जी रहा है और कौन सिर्फ काट रहा है। उठिये और अपनी लाइफ के वो ९० मिनट आज ही वापस लीजिये।
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