क्या आप भी अपनी कंपनी में बैठ कर उन पागलों जैसे फैसलों पर हंसते हैं जो आपके बॉस लेते हैं। मुबारक हो क्योंकि आपकी एक्सीलेंट कंपनी असल में बहुत बड़ी डम्ब गलतियां कर रही है और आपको पता भी नहीं कि आप एक डूबते हुए जहाज के कैप्टन बनने की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
यह आर्टिकल उन ८ छुपे हुए बैरियर्स का कच्चा चिट्ठा है जो बड़े बड़े बिजनेसेस की जड़ें खोखली कर रहे हैं। आज हम नील स्मिथ की किताब से वो ३ पावरफुल लेसन सीखेंगे जो आपको और आपकी कंपनी को बेवकूफी भरे फैसलों की दलदल से बाहर निकाल सकते हैं।
लेसन १ : डर की दीवार और सच का गला घोंटना
अगर आपको लगता है कि आपकी कंपनी में सब कुछ चंगा है क्योंकि कोई शिकायत नहीं कर रहा है तो भाई साहब आप बहुत बड़े धोखे में हैं। नील स्मिथ कहते हैं कि किसी भी कंपनी के बर्बाद होने का सबसे पहला और बड़ा हिडन बैरियर है डर। जब एम्प्लॉई को यह लगने लगे कि सच बोलने पर उसकी नौकरी जा सकती है या बॉस का चेहरा लाल हो सकता है तो वह चुप रहना ही बेहतर समझता है। अब आप खुद सोचिये कि एक मीटिंग रूम में १० लोग बैठे हैं और सबको पता है कि नया प्रोजेक्ट पूरी तरह से फ्लॉप होने वाला है लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता। क्यों। क्योंकि सबको अपनी ईएमआई की चिंता है।
यह डर का माहौल एक ऐसी जहरीली गैस की तरह है जो धीरे धीरे पूरे ऑफिस के इनोवेशन को मार डालता है। मान लीजिये आपके ऑफिस में एक मैनेजर हैं शर्मा जी। शर्मा जी को लगता है कि वह भगवान के बाद सबसे बुद्धिमान इंसान हैं। अब उनके नीचे काम करने वाला जूनियर राहुल देख रहा है कि कंपनी एक ऐसा प्रोडक्ट लॉन्च कर रही है जिसकी मार्केट में कोई जरूरत ही नहीं है। राहुल के पास डेटा है और लॉजिक भी है। लेकिन जैसे ही राहुल अपना मुंह खोलने की कोशिश करता है शर्मा जी उसे ऐसी नजरों से देखते हैं जैसे उसने उनकी प्रॉपर्टी हड़प ली हो। नतीजा यह होता है कि राहुल अपना आईडिया अपनी जेब में डाल लेता है और चुपचाप कॉफी पीने चला जाता है।
यह तो बस एक छोटा सा उदाहरण है। असल में ऐसी डम्ब चीजें हर उस कंपनी में होती हैं जहाँ मैनेजमेंट को लगता है कि उन्हें सब पता है। जब आप अपने एम्प्लॉई को यह भरोसा नहीं दिला पाते कि उनका आईडिया और उनकी ईमानदारी से दी गई फीडबैक की कदर की जाएगी तब आप अनजाने में ही कंपनी की बर्बादी का डेथ वारंट साइन कर रहे होते हैं। लोग कंपनी छोड़ कर नहीं जाते बल्कि वे कंपनी के अंदर ही रहकर अपना दिमाग चलाना छोड़ देते हैं। और यकीन मानिए एक ऐसी कंपनी जहाँ लोग सिर्फ रोबोट की तरह काम कर रहे हैं और सच बोलने से डर रहे हैं वह कभी भी एक्सीलेंट नहीं बन सकती।
यह डर सिर्फ एम्प्लॉई तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह ऊपर तक जाता है। बोर्ड मेंबर्स सीईओ को सच बताने से डरते हैं और सीईओ इन्वेस्टर्स को। हर कोई एक झूठी मुस्कान पहन कर बैठा है जबकि जहाज में छेद हो चुका है। नील स्मिथ हमें सिखाते हैं कि अगर हमें इन डम्ब चीजों से बचना है तो सबसे पहले उस डर की दीवार को गिराना होगा। सच कड़वा जरूर होता है लेकिन वह कंपनी को उस अंधेरी खाई में गिरने से बचा लेता है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता।
लेसन २ : फालतू की पेचीदगी और रूल्स का मकड़जाल
क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि आपके ऑफिस में एक पेन खरीदने के लिए भी पांच मैनेजर के साइन और दस ईमेल की जरूरत पड़ती है। अगर हाँ तो आप कॉम्प्लेक्सिटी यानी पेचीदगी के शिकार हैं। नील स्मिथ कहते हैं कि अक्सर एक्सीलेंट कंपनियां खुद को इतना स्मार्ट समझने लगती हैं कि वे हर छोटी चीज के लिए एक नया रूल बना देती हैं। उन्हें लगता है कि ज्यादा रूल्स मतलब ज्यादा कंट्रोल। लेकिन असल में यह कंट्रोल नहीं बल्कि काम को रोकने वाला एक बहुत बड़ा पत्थर है। जब प्रोसेस काम से ज्यादा बड़ा हो जाए तो समझ लीजिये कि कंपनी अब डम्ब चीजें करने के लिए तैयार है।
मान लीजिये गुप्ता जी की एक बहुत बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी है। वहां एक नया नियम आता है कि कोई भी एम्प्लॉई अगर नया सॉफ्टवेयर टूल इस्तेमाल करना चाहता है तो उसे पहले एक १५ पेज का फॉर्म भरना होगा। फिर वह फॉर्म एचआर के पास जाएगा फिर फाइनेंस के पास और आखिर में गुप्ता जी के पीए के पास। अब बेचारा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेचैन है क्योंकि उसे काम खत्म करना है लेकिन वह फॉर्म के चक्कर में फंसा हुआ है। तीन हफ्ते बाद जब अप्रूवल मिलता है तब तक क्लाइंट ही भाग चुका होता है। यह सुनने में मजाक लगता है लेकिन असल में बड़ी कंपनियां ऐसे ही अपनी रफ्तार खो देती हैं।
हम अक्सर भूल जाते हैं कि रूल्स इंसानों की मदद के लिए बनाए गए थे न कि इंसानों को रोकने के लिए। जब कोई कंपनी बहुत बड़ी हो जाती है तो वहां लाल फीताशाही यानी ब्यूरोक्रेसी इतनी बढ़ जाती है कि लोगों को लगने लगता है कि फॉर्म भरना ही असली काम है। लोग भूल जाते हैं कि असली मकसद तो कस्टमर को खुश करना और पैसे कमाना था। नील स्मिथ बहुत साफ़ शब्दों में कहते हैं कि एक्सीलेंट कंपनियां वही हैं जो लगातार अपने फालतू के रूल्स को कचरे के डिब्बे में डालती रहती हैं। अगर कोई प्रोसेस आपकी वैल्यू नहीं बढ़ा रहा है तो वह सिर्फ एक बोझ है जिसे आप ढो रहे हैं।
यह पेचीदगी सिर्फ प्रोसेस में नहीं बल्कि बातचीत में भी होती है। भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल करना और सीधी बात को घुमा फिरा कर कहना भी एक तरह की बेवकूफी है। जब आप अपनी बात को सिंपल नहीं रख सकते तो इसका मतलब है कि आप खुद भी क्लियर नहीं हैं। जितनी ज्यादा उलझन होगी उतने ही ज्यादा गलत फैसले लिए जाएंगे। इसलिए अगर आपको अपनी कंपनी को बचाना है तो चीजों को सिंपल बनाइये। सादगी ही वह चाबी है जो बड़े बड़े बिजनेस के बंद दरवाजों को खोल सकती है। बिना मतलब की पेचीदगी सिर्फ ईगो को संतुष्ट करती है बिजनेस को नहीं।
लेसन ३ : ईगो का चश्मा और सुनने की बीमारी
अगर आपको लगता है कि आप रूम में सबसे स्मार्ट इंसान हैं तो यकीन मानिए आप सबसे बड़े खतरे में हैं। नील स्मिथ कहते हैं कि बड़ी कंपनियों के लीडर्स अक्सर एक ऐसी बीमारी का शिकार हो जाते हैं जिसे हम ईगो कहते हैं। जब आप टॉप पर बैठते हैं तो आपको लगने लगता है कि नीचे वाले लोगों को क्या ही पता होगा। आप खुद को एक ऐसे कांच के महल में बंद कर लेते हैं जहाँ सिर्फ अपनी ही तारीफें सुनाई देती हैं। यह ईगो का चश्मा आपको वो डम्ब चीजें देखने ही नहीं देता जो आपकी कंपनी को दीमक की तरह चाट रही हैं।
मान लीजिये एक बहुत बड़ी रिटेल कंपनी के सीईओ हैं मिस्टर खन्ना। खन्ना साहब को लगता है कि उन्हें पता है कि कस्टमर क्या चाहता है। अब स्टोर पर खड़ा वो सेल्समैन जो रोज हजारों लोगों से मिलता है वो खन्ना साहब को बताना चाहता है कि लोग अब ऑनलाइन ज्यादा खरीद रहे हैं। लेकिन खन्ना साहब का ईगो इतना बड़ा है कि वो उस सेल्समैन की बात सुनने के बजाय उसे चुप करा देते हैं। नतीजा यह होता है कि कुछ साल बाद खन्ना साहब की कंपनी बंद हो जाती है और वो सोचते रह जाते हैं कि आखिर गलती कहाँ हुई। भाई साहब गलती आपकी सुनने की बीमारी में थी।
असल में एक्सीलेंट कंपनियां वो होती हैं जहाँ लीडर्स अपने कान खुले रखते हैं। उन्हें पता होता है कि असली आईडिया अक्सर एसी कमरों में नहीं बल्कि फील्ड पर काम करने वाले लोगों के पास होते हैं। अगर आप सिर्फ उन लोगों की बात सुनेंगे जो आपके सामने जी हुजुरी करते हैं तो आप कभी सच नहीं जान पाएंगे। ईगो आपको अंधा बना देता है और फिर आप ऐसे फैसले लेते हैं जिन पर दुनिया बाद में मीम्स बनाती है। याद रखिए कि एक अच्छा लीडर वो नहीं होता जिसके पास हर सवाल का जवाब हो बल्कि वो होता है जो सही सवाल पूछना जानता हो और दूसरों की बात सुनने की हिम्मत रखता हो।
जब आप दूसरों के नजरिए को तवज्जो देते हैं तो आप न केवल अपनी कंपनी को बचाते हैं बल्कि एक ऐसा कल्चर बनाते हैं जहाँ हर कोई खुद को जरूरी समझता है। ईगो को साइड में रखकर अगर आप यह मान लें कि आप भी गलत हो सकते हैं तो समझ लीजिये कि आपने आधी जंग जीत ली है। बेवकूफी भरे फैसलों से बचने का सबसे आसान तरीका यही है कि आप अपने ईगो को ऑफिस के गेट के बाहर छोड़ कर आएं और उस इंसान की बात भी सुनें जो आपसे पद में छोटा है लेकिन तजुर्बे में शायद आपसे आगे हो।
तो दोस्तों, क्या आप भी अपनी लाइफ या बिजनेस में वही पुरानी डम्ब गलतियां दोहरा रहे हैं। नील स्मिथ की यह बातें सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए नहीं बल्कि हम सबके लिए हैं। चाहे डर की दीवार हो या फिजूल के रूल्स या फिर वो बड़ा सा ईगो। ये सब हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं। आज ही बैठिए और सोचिए कि आपके काम में वो कौन से ८ हिडन बैरियर्स हैं जो आपको एक्सीलेंट बनने से रोक रहे हैं। वक्त आ गया है उन दीवारों को तोड़ने का और सच का सामना करने का।
अगर आपको यह आर्टिकल काम का लगा और लगा कि यह आपके किसी दोस्त या कलीग की आंखें खोल सकता है तो इसे अभी शेयर करें। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपके ऑफिस की सबसे डम्ब चीज क्या है। चलिए मिलकर इन बेवकूफियों को खत्म करते हैं और एक एक्सीलेंट वर्क कल्चर बनाते हैं।
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