Why Decisions Fail (Hindi)


क्या आपको भी लगता है कि आपकी लाइफ के सारे खराब फैसले बस आपकी फूटी किस्मत का नतीजा हैं। बधाई हो, आप अकेले नहीं हैं जो अंधेरे में तीर चला रहे हैं और खुद को जीनियस समझ रहे हैं। बिना सोचे समझे फैसले लेना आपकी वह सुपरपावर है जो आपको बर्बादी की ओर ले जा रही है।

आज हम पॉल नट की बुक व्हाई डिसीजंस फेल से उन कड़वे सच को जानेंगे जो आपके फेलियर के पीछे छिपे हैं। यह ब्लॉग आपको उन गलतियों से बचाएगा जो बड़े बड़े लीडर्स को ले डूबी हैं। चलिए शुरू करते हैं।


लेसन १ : द रश टू जजमेंट - यानी बिना सोचे समझे छलांग मारना

क्या आपने कभी सोचा है कि हम में से ज्यादातर लोग लाइफ में फेल क्यों होते हैं। इसका जवाब बहुत सिंपल है। हम फैसला लेने के लिए इतने बेताब होते हैं कि जैसे कोई सेल खत्म होने वाली हो। पॉल नट कहते हैं कि आधी से ज्यादा नाकामयाबियों की वजह है द रश टू जजमेंट। यानी समस्या सामने आई नहीं कि हमने उसका समाधान निकाल दिया। हमें लगता है कि जो पहला आइडिया दिमाग में आया है वही मास्टरस्ट्रोक है। लेकिन असल में वह सिर्फ एक शॉर्टकट होता है जो हमें गड्ढे की तरफ ले जाता है।

मान लीजिए हमारे मोहल्ले के एक भाई साहब हैं चिंटू। चिंटू को लगा कि आजकल चाय का बड़ा क्रेज है तो उन्होंने बिना कुछ सोचे अपनी पुश्तैनी दुकान बंद करके चिंटू टी कैफे खोल दिया। चिंटू ने न तो मार्केट रिसर्च की और न ही यह देखा कि उस गली में पहले से ही पांच चाय की दुकानें हैं। चिंटू को लगा कि बस लाल रंग की केतली और थोड़े फैंसी कप रख लेने से वह बिजनेस टाइकून बन जाएंगे। नतीजा क्या हुआ। दो महीने बाद चिंटू चाय कम पी रहे थे और बेच ज्यादा रहे थे क्योंकि ग्राहक ही नहीं थे। चिंटू ने जल्दबाजी में फैसला लिया क्योंकि उन्हें लगा कि यही एक रास्ता है।

हम अक्सर विकल्पों को देखने की जहमत ही नहीं उठाते। हमारे पास विकल्प A होता है और हम उसे तुरंत चुन लेते हैं। हम कभी यह नहीं सोचते कि क्या विकल्प B, C या D भी हो सकते हैं। पॉल नट की रिसर्च कहती है कि जो लोग कम से कम दो या तीन अलग रास्तों पर विचार करते हैं उनके सफल होने के चांस बहुत ज्यादा होते हैं। लेकिन हम तो ठहरे फुर्तीले इंसान। हमें लगता है कि ज्यादा सोचना टाइम की बर्बादी है। जबकि हकीकत में वह जल्दबाजी ही सबसे बड़ा टाइम वेस्ट साबित होती है।

सर्कस के उस बंदर की तरह मत बनिए जो बिना जाल देखे ही छलांग लगा देता है। अपनी प्रॉब्लम को थोड़ा टाइम दीजिए। उसे अच्छी तरह से समझिए। क्या वाकई वही समस्या है जो आपको दिख रही है। या फिर आप सिर्फ ऊपर की धूल झाड़ रहे हैं जबकि कचरा अंदर दबा है। जल्दबाजी करना कोई बहादुरी नहीं है बल्कि यह आपकी इनसिक्योरिटी को दिखाता है। आप डरते हैं कि अगर अभी फैसला नहीं लिया तो मौका हाथ से निकल जाएगा। और इसी डर में आप एक ऐसा फैसला ले लेते हैं जिसका पछतावा आपको सालों तक रहता है।

तो अगली बार जब आपको लगे कि आपके पास एक ब्रिलियंट आइडिया है तो रुकिए। गहरी सांस लीजिए। अपने आप से पूछिए कि क्या इसके अलावा भी कोई और रास्ता है। अगर आप अपने ऑप्शंस नहीं बढ़ा रहे हैं तो यकीन मानिए आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं।


लेसन २ : फेलियर ऑफ पार्टिसिपेशन - सबको किनारे लगा देना

अक्सर जब हमारे हाथ में थोड़ी सी पावर आ जाती है तो हमें लगता है कि हम ही दुनिया के सबसे बुद्धिमान प्राणी हैं। पॉल नट इसे फेलियर ऑफ पार्टिसिपेशन कहते हैं। यानी अपनी मर्जी चलाना और उन लोगों की राय को कचरे के डिब्बे में डाल देना जो उस फैसले से असल में जुड़ने वाले हैं। हमें लगता है कि अगर हम दूसरों से पूछेंगे तो हमारी वैल्यू कम हो जाएगी या लोग सोचेंगे कि हमें कुछ आता ही नहीं है। लेकिन हकीकत में अकेले लिया गया फैसला अक्सर एक तरफा और कमजोर होता है।

मान लीजिए एक कंपनी के बॉस हैं मिस्टर खन्ना। खन्ना जी को लगा कि उनके ऑफिस के कर्मचारी बहुत सुस्त हो गए हैं। तो उन्होंने रातों-रात फैसला सुना दिया कि कल से ऑफिस में कोई कुर्सी नहीं होगी और सब खड़े होकर काम करेंगे ताकि फुर्ती बनी रहे। अब खन्ना जी ने यह तो सोच लिया कि वह बहुत बड़ा रेवोल्यूशन ला रहे हैं लेकिन उन्होंने उन बेचारे एम्प्लॉइज से नहीं पूछा जिन्हें दिन में १० घंटे खड़े रहना है। नतीजा क्या हुआ। अगले दिन से आधे लोग पीठ दर्द का बहाना बनाकर छुट्टी पर चले गए और बाकी जो आए वह काम करने के बजाय खन्ना जी को कोसने में बिजी रहे। खन्ना जी का मास्टर प्लान फ्लॉप हो गया क्योंकि उन्होंने उन लोगों को शामिल ही नहीं किया जिनके लिए यह फैसला था।

पॉल नट कहते हैं कि जब आप लोगों को फैसले की प्रोसेस में शामिल करते हैं तो वह उस काम को अपनी जिम्मेदारी समझने लगते हैं। लेकिन अगर आप उन पर फैसला थोप देते हैं तो वह उसे एक बोझ की तरह देखते हैं। कई बार बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स सिर्फ इसलिए फेल हो जाते हैं क्योंकि टॉप लेवल के मैनेजर्स को लगता है कि उन्हें ग्राउंड रियलिटी पता है जबकि असली जानकारी तो उन लोगों के पास होती है जो सच में वहां काम कर रहे हैं।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपने दोस्त के लिए सरप्राइज बर्थडे पार्टी प्लान करें लेकिन उसे केक का फ्लेवर ही पसंद न हो। आपने मेहनत तो पूरी की और पैसे भी खर्च किए लेकिन एंड रिजल्ट जीरो रहा क्योंकि आपने मेन इंसान की पसंद को इग्नोर कर दिया। अपनी ईगो को थोड़ा साइड में रखना सीखिए। दूसरों की बात सुनने का मतलब यह नहीं है कि आप कमजोर हैं बल्कि इसका मतलब यह है कि आप एक समझदार लीडर हैं जो रिस्क को कम करना चाहता है।

अगर आप चाहते हैं कि आपका फैसला सिर्फ कागजों पर नहीं बल्कि हकीकत में भी कामयाब हो तो लोगों का भरोसा जीतना सीखिए। उनसे बात कीजिए और उनके डर को समझिए। जब लोग महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी जा रही है तो वह उस फैसले को सफल बनाने के लिए जान लगा देते हैं। वरना आप अकेले ही अपनी जीत का झंडा फहराते रहेंगे और पीछे मुड़कर देखेंगे तो कोई आपके साथ खड़ा नहीं होगा।


लेसन ३ : इग्नोरिंग एथिकल डेंजर सिग्नल्स - खतरे की घंटी को अनसुना करना

हम सभी के अंदर एक छोटा सा लालची इंसान बैठा होता है जो हमेशा शॉर्टकट ढूंढता है। पॉल नट कहते हैं कि बहुत सारे फैसले इसलिए तबाह हो जाते हैं क्योंकि लोग एथिकल डेंजर सिग्नल्स को नजरअंदाज कर देते हैं। जब हमें सामने बहुत बड़ा फायदा या प्रॉफिट दिख रहा होता है तो हम अपनी नैतिकता और आने वाले रिस्क पर पट्टी बांध लेते हैं। हमें लगता है कि थोड़ा सा झूठ या थोड़ी सी हेराफेरी से क्या ही बिगड़ जाएगा। लेकिन यही छोटा सा छेद एक दिन पूरे जहाज को डुबो देता है।

हमारे एक पड़ोसी हैं वर्मा जी। वर्मा जी ने एक नया मिलावट वाला दूध का बिजनेस शुरू किया। उन्हें लगा कि अगर वह दूध में थोड़ा पानी और पाउडर मिला देंगे तो रातों-रात अमीर बन जाएंगे। उनके दिमाग में सिर्फ बड़ा बंगला और गाड़ी घूम रही थी। जब उनके मुनीम ने टोकते हुए कहा कि वर्मा जी यह गलत है और लोग बीमार पड़ सकते हैं तो वर्मा जी ने उसे यह कहकर चुप करा दिया कि बिजनेस में इतना तो चलता है। कुछ महीने तो वर्मा जी ने खूब नोट छापे लेकिन फिर एक दिन फूड इंस्पेक्टर का छापा पड़ा और वर्मा जी की सारी अमीरी जेल की सलाखों के पीछे चली गई। वर्मा जी ने डेंजर सिग्नल को देखा तो था पर इग्नोर कर दिया।

हम भी अपनी लाइफ में अक्सर यही करते हैं। हम ऐसे रिश्ते चुनते हैं जो हमें पता है कि गलत हैं या ऐसे जॉब्स में बने रहते हैं जो हमारी वैल्यूज के खिलाफ हैं। हम खुद को दिलासा देते हैं कि अभी तो सब ठीक चल रहा है। लेकिन पॉल नट चेतावनी देते हैं कि जो फैसला सच्चाई की बुनियाद पर नहीं टिका होता वह एक न एक दिन ढह ही जाता है। दुनिया के बड़े बड़े कॉर्पोरेट स्कैम और पॉलिटिकल फेलियर इसी वजह से हुए क्योंकि किसी ने उस वक्त सवाल नहीं उठाया जब उठाने की जरूरत थी।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आपकी कार के डैशबोर्ड पर लाल लाइट जल रही हो और आप उस पर टेप चिपका कर गाड़ी चलाते रहें। टेप चिपकाने से लाइट तो दिखना बंद हो जाएगी लेकिन इंजन का फटना तय है। अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करना दुनिया की सबसे महंगी गलती साबित हो सकती है। कोई भी सक्सेस तब तक सक्सेस नहीं है जब तक वह सही तरीके से न मिली हो। क्योंकि गलत तरीके से मिली जीत का स्वाद हमेशा कड़वा ही होता है।

तो दोस्तों फैसला लेना सिर्फ दिमाग का खेल नहीं है बल्कि इसमें ईमानदारी और हिम्मत की भी जरूरत होती है। उन चेतावनियों को गंभीरता से लें जो आपके सामने आती हैं। अगर कुछ गलत लग रहा है तो रुक जाइए। अपनी इमेज और अपने भविष्य को दांव पर लगाकर कोई भी फैसला लेना समझदारी नहीं बल्कि बेवकूफी है। याद रखिए एक गलत फैसला आपकी बरसों की मेहनत को एक पल में राख कर सकता है।


तो दोस्तों, क्या आपने भी कभी जल्दबाजी में या किसी की बात अनसुनी करके कोई गलत फैसला लिया है। अपनी कहानी नीचे कमेंट्स में शेयर करें ताकि दूसरे भी उससे सीख सकें। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो बिना सोचे समझे फैसले लेते हैं। याद रखिए आपका एक शेयर किसी की लाइफ का अगला बड़ा नुकसान बचा सकता है।

-----

आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now




#DecisionMaking #BookSummary #SuccessMindset #LeadershipSkills #SelfImprovement


_

Post a Comment

Previous Post Next Post