आप आज भी वही पुराने घिसे पिटे तरीकों से प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हैं और फिर रोते हैं कि सक्सेस क्यों नहीं मिल रही। अपनी आंखों पर बंधी उस साधारण सोच की पट्टी को उतारिये वरना दुनिया आपको पीछे छोड़कर रॉकेट की तरह आगे निकल जाएगी। आप अपनी लाइफ में बस 'क्यों' पूछ रहे हैं जबकि असली खेल तो 'क्यों नहीं' पूछने में छुपा है। क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो किस्मत का बहाना बनाकर बैठे हैं या फिर आप अपनी हर छोटी बड़ी मुश्किल को एक मास्टरप्लान में बदलना चाहते हैं।
आज के इस आर्टिकल में हम व्हाई नॉट बुक के उन ३ जादुई लेसन्स के बारे में बात करेंगे जो आपकी सोच के दायरे को पूरी तरह बदल देंगे और आपको एक स्मार्ट प्रॉब्लम सॉल्वर बना देंगे।
लेसन १ : व्हाट वुड क्रोगर डू? यानी दूसरों के जुगाड़ को अपना बनाना
देखिये, दुनिया में हर कोई कहता है कि कुछ नया सोचो, कुछ अलग करो। लेकिन सच तो यह है कि दुनिया की आधी बड़ी समस्याओं का हल पहले ही कहीं न कहीं निकाला जा चुका है। बस फर्क इतना है कि वह हल किसी और फील्ड में छुपा होता है। बुक के ऑथर्स इसे 'व्हाट वुड क्रोगर डू' कहते हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि अगर आप किसी मुश्किल में फंसे हैं, तो सोचिये कि कोई दूसरी कंपनी या कोई दूसरी इंडस्ट्री इस सिचुएशन में क्या करती।
मान लीजिये आप एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते हैं और काउंटर पर बहुत भीड़ हो जाती है। अब आप सर पकड़कर बैठ जाएंगे या फिर यह सोचेंगे कि यार, बड़े बड़े एयरपोर्ट्स पर हज़ारों लोगों की भीड़ को कैसे मैनेज किया जाता है? वहां वो लोग टेढ़ी मेढ़ी लाइनें यानी 'जिग जैग कतारें' बनवाते हैं जिससे कम जगह में ज्यादा लोग आ जाते हैं। आपने बस वहां का आईडिया उठाया और अपनी दुकान पर चेप दिया। यह कोई चोरी नहीं है, यह तो स्मार्टनेस है। लेकिन हमारे यहाँ लोग क्या करते हैं? वो बस अपनी ही छोटी सी दुनिया में कुएं के मेंढक बनकर बैठे रहते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी प्रॉब्लम इतनी अनोखी है कि भगवान को खुद आकर उसे सुलझाना पड़ेगा।
अरे भाई, थोडा अपनी गर्दन घुमाइये और देखिये। अगर कार इंश्योरेंस कंपनियां आपसे उतना ही पैसा लेती हैं जितना आप गाड़ी चलाते हैं, तो जिम वाले आपसे पूरे साल की फीस एक साथ क्यों लेते हैं? क्या कभी आपने सोचा है कि अगर जिम की फीस भी 'जितना पसीना बहाओ, उतना पैसा दो' वाली होती तो शायद आप आज इतने मोटे न होते। लेकिन नहीं, हमें तो बस वही पुराना ढर्रा पसंद है। हम इंडियंस वैसे भी जुगाड़ के मामले में उस्ताद माने जाते हैं, लेकिन हमारा जुगाड़ अक्सर टेंपरेरी होता है। ऑथर्स कहते हैं कि इस जुगाड़ को एक सिस्टम बनाइये।
मान लीजिये आप अपनी डेट पर गए हैं और वहां बहुत सन्नाटा है। अब आप घबरा रहे हैं कि क्या बात करूँ। ऐसे में सोचिये कि एक रेडियो आरजे क्या करता? वो बस बिना रुके बकवास करता रहता है और लोग उसे सुनते हैं। तो आप भी बस आरजे बन जाइये, सामने वाले को बोलने का मौका ही मत दीजिये। मजाक अपनी जगह है, लेकिन पॉइंट यह है कि आइडियाज को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करना ही असली बुद्धिमानी है। अगर आप वही करते रहेंगे जो आप हमेशा से करते आए हैं, तो आपको वही मिलता रहेगा जो हमेशा से मिलता आया है।
अपनी सोच के दरवाज़े खोलिये। जब भी कोई समस्या आये तो यह मत पूछिये कि "मैं क्या करूँ?", बल्कि यह पूछिये कि "इस सिचुएशन में एक फाइव स्टार होटल वाला क्या करता?" या "एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर इस उलझन को कैसे सुलझाता?"। जिस दिन आपने दूसरों के सक्सेसफुल आइडियाज को अपनी लाइफ की बोरिंग समस्याओं में फिट करना सीख लिया, समझ लीजिये आप आधे जीनियस तो वहीँ बन गए। बाकी का आधा काम तो आपकी किस्मत और आपकी मेहनत कर ही देगी, हालांकि आपकी किस्मत के बारे में मुझे थोडा शक है। पर कोई बात नहीं, यह लेसन आपकी उस कमी को भी पूरा कर देगा।
लेसन २ : इंसेंटिव्स को सही करना यानी असली जड़ पर वार करना
अक्सर हम शिकायत करते हैं कि लोग अपना काम ठीक से नहीं करते। आपके ऑफिस का चपरासी फाइल आगे नहीं बढ़ा रहा, या आपका दूध वाला हमेशा पानी मिलाकर दूध दे जाता है। हमें लगता है कि दुनिया में इंसान ही खराब हैं। लेकिन दोस्त, बुक के ऑथर्स कहते हैं कि असल में इंसान खराब नहीं होते, बल्कि उनका 'इंसेंटिव' यानी लालच का ढांचा गलत होता है। अगर आप किसी को गलत काम करने के लिए ज्यादा फायदा देंगे, तो वह महापुरुष बनकर सही काम क्यों करेगा?
मान लीजिये आप एक टैक्सी ड्राइवर हैं। अगर आपको सवारी को मंजिल तक पहुंचाने के बजाय सिर्फ 'किलोमीटर' के हिसाब से पैसे मिलें, तो आप उसे सीधे रास्ते ले जाने के बजाय पूरी दिल्ली का चक्कर लगवाएंगे। क्यों? क्योंकि आपका फायदा रास्ता लंबा करने में है। अब इसमें ड्राइवर की गलती कम और उस सिस्टम की गलती ज्यादा है जिसने उसे लंबा रास्ता चुनने का लालच दिया। अगर आप चाहते हैं कि वह सही काम करे, तो आपको उसका इंसेंटिव बदलना होगा। उसे यह कहिये कि अगर तुम दस मिनट पहले पहुंचाओगे तो टिप मिलेगी। देखिये फिर वह कैसे रॉकेट की तरह गाड़ी उड़ाता है।
हमारे यहाँ तो लोग उम्मीद करते हैं कि सामने वाला खुद अपनी नैतिकता की वजह से सुधर जाए। भाई साहब, यह कलयुग है, यहाँ नैतिकता से ज्यादा नोट काम करते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा पढ़ाई करे, तो उसे डंडे से डराने के बजाय उसे यह लालच दीजिये कि हर अच्छे ग्रेड पर उसे उसकी पसंद का वीडियो गेम खेलने को मिलेगा। इसे कहते हैं 'इंसेंटिव अलाइनमेंट'। जब आप किसी का फायदा और आपका फायदा एक ही लाइन में ले आते हैं, तो सारी समस्याएं अपने आप खत्म होने लगती हैं।
हम अक्सर रेस्टोरेंट में वेटर को टिप अंत में देते हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि अगर आप आधी टिप खाना शुरू होने से पहले दे दें तो क्या होगा? वेटर को पता चल जाएगा कि यह बंदा दिलदार है, और फिर वह आपके सामने ऐसे नाचेगा जैसे आप उसके सगे साले हों। उसने अपना काम इसलिए अच्छा किया क्योंकि आपने उसे पहले ही सही इंसेंटिव दे दिया। लेकिन नहीं, हम तो बस बाद में कंजूसी दिखाने में विश्वास रखते हैं और फिर खाने की बुराई करते हैं।
सीधी सी बात है, अगर कोई काम आपके मुताबिक नहीं हो रहा है, तो गुस्से में लाल होने के बजाय ठन्डे दिमाग से यह सोचिये कि उस इंसान को गलत काम करने में क्या फायदा मिल रहा है। जिस दिन आपने उस फायदे की जड़ काट दी, उसी दिन से आपकी लाइफ की अस्सी परसेंट किच किच खत्म हो जाएगी। लोग अक्सर कहते हैं कि "सिस्टम ही ऐसा है", लेकिन वह भूल जाते हैं कि सिस्टम इंसानों ने ही बनाया है और इसे सही इंसेंटिव्स के साथ बदला भी जा सकता है। अब अगली बार जब कोई आपका काम अटकाए, तो उसे लेक्चर देने के बजाय यह देखिये कि उसे काम पूरा करने में क्या लालच दिया जा सकता है। यकीन मानिये, दुनिया बहुत जल्दी सुधरने लगेगी, बस आपको सही बटन दबाना आना चाहिए।
लेसन ३ : अनबंडलिंग और रिबंडलिंग यानी खिचड़ी को बिरयानी बनाना
हमारी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हम चीजों को वैसे ही देखते हैं जैसी वो हमें बेची जा रही हैं। अगर आपको एक नया मोबाइल फोन चाहिए, तो आपको उसके साथ वो कैमरा और वो फालतू के एप्स भी खरीदने पड़ते हैं जिनकी आपको शायद कभी जरूरत ही न हो। बुक के ऑथर्स कहते हैं कि एक स्मार्ट दिमाग हमेशा चीजों को 'अनबंडल' करता है, यानी उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देता है। और फिर अपनी जरूरत के हिसाब से उन्हें 'रिबंडल' करता है।
इसे एक आसान और मजेदार मिसाल से समझिये। मान लीजिये आप एक शादी में गए हैं। वहां बफे लगा है। अब एक आम आदमी क्या करेगा? वह अपनी प्लेट में दाल, बाटी, नूडल्स और गुलाब जामुन सब एक साथ भर लेगा। नतीजा क्या होगा? सब मिक्स हो जाएगा और स्वाद का कबाड़ा हो जाएगा। लेकिन एक 'व्हाई नॉट' थिंकर पहले यह देखेगा कि उसे सबसे ज्यादा क्या पसंद है। वह सिर्फ अपनी पसंद की चीजें चुनेगा और अपना एक पर्सनल कॉम्बो बनाएगा। यही है अनबंडलिंग का असली जादू। आप पूरी सर्विस के पैसे क्यों दें जब आपको सिर्फ एक खास हिस्से की जरूरत है?
आजकल की कंपनियां भी यही कर रही हैं। पहले आपको पूरा म्यूजिक एल्बम खरीदना पड़ता था चाहे आपको सिर्फ एक गाना पसंद हो। अब आप सिर्फ वो एक गाना डाउनलोड कर सकते हैं। यह अनबंडलिंग है। लेकिन क्या आपने अपनी लाइफ में इसे कभी इस्तेमाल किया? मान लीजिये आप एक बड़ा सा घर खरीदना चाहते हैं लेकिन आपके पास उतने पैसे नहीं हैं। तो क्या आप हार मान लेंगे? व्हाई नॉट थिंकर सोचेगा कि क्या मैं सिर्फ एक कमरा या सिर्फ छत का हिस्सा खरीद सकता हूँ? सुनने में यह पागलपन लग सकता है, लेकिन दुनिया के बड़े-बड़े सौदे इसी तरह होते हैं।
हम इंडियंस तो वैसे भी कॉम्बो पैक के दीवाने हैं। लेकिन कभी-कभी वो कॉम्बो हमें लूटने के लिए बनाया जाता है। अगर आप जिम जाते हैं और वहां आपको योगा, जुम्बा और डाइट प्लान सब एक साथ मिल रहा है, तो रुकिए। क्या आपको वाकई उन सबकी जरूरत है? अगर आप सिर्फ लोहे से खेलना चाहते हैं, तो आप उन बाकी चीजों के पैसे क्यों दे रहे हैं? जिस दिन आप अपनी जरूरतों को टुकड़ों में बांटना सीख जाएंगे, उस दिन आप न सिर्फ पैसे बचाएंगे बल्कि अपनी लाइफ की फालतू की भीड़ को भी कम कर देंगे।
यह तरीका सिर्फ बिजनेस में ही नहीं, रिश्तों में भी काम आता है। अगर आपका कोई दोस्त बहुत अच्छा खाना बनाता है पर बहुत ज्यादा बोलता है, तो उसके साथ 'अनबंडलिंग' वाला रिश्ता रखिये। उसे सिर्फ डिनर पर बुलाइये और अपनी कान की मशीन बंद रखिये। आपको बेहतरीन खाना भी मिल गया और दिमाग की शांति भी बनी रही। चीजों को उनके हिस्सों में तोड़कर देखिये, फिर आपको समझ आएगा कि जिसे आप एक बड़ी और नामुमकिन समस्या समझ रहे थे, वह असल में छोटे-छोटे आसान समाधानों का एक गुच्छा है। बस उन्हें सही तरीके से जोड़ना सीख जाइये, फिर देखिये कैसे दुनिया आपके इशारों पर नाचती है।
तो दोस्तों, व्हाई नॉट सिर्फ एक सवाल नहीं है, यह एक लाइफस्टाइल है। अगर आप वही पुरानी घिसे-पिटे तरीकों से अपनी लाइफ जीना चाहते हैं, तो शौक से जीजिये, हमें क्या। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि लोग आपकी प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स की मिसालें दें, तो इन तीन लेसन्स को आज से ही अपनी जेब में रख लीजिये। दूसरों के आईडिया चुराना (यानी इंस्पिरेशन लेना), इंसेंटिव्स को समझना और चीजों को तोड़कर नया बनाना—यही वो चाबियां हैं जो कामयाबी के बंद दरवाजों को खोलेंगी।
अगर आपको लगता है कि इस आर्टिकल ने आपके दिमाग की थोड़ी सी भी बत्ती जलाई है, तो इसे उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा अपनी किस्मत का रोना रोते रहते हैं। और हां, कमेंट्स में बताइये कि आपकी लाइफ की ऐसी कौन सी प्रॉब्लम है जहाँ आप 'व्हाई नॉट' वाला फार्मूला लगाने वाले हैं। याद रखिये, दुनिया उनके लिए नहीं बदलती जो सिर्फ देखते हैं, बल्कि उनके लिए बदलती है जो सवाल पूछते हैं।
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