क्या आप अभी भी यह सोच रहे हैं कि सिर्फ बढ़िया प्रोडक्ट बनाकर आप मार्केट जीत लेंगे। कितनी मासूमियत है यह। सच तो यह है कि आपका कॉम्पिटिटर आपसे कम कीमत में वही माल बेचकर आपके कस्टमर्स चुरा रहा है और आप बस हाथ मलते रह जाएंगे।
इस ब्लॉग में हम टैरी बेकन और डेविड पुघ की किताब विनिंग बिहेवियर से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो दुनिया की सबसे स्मार्ट कंपनियां इस्तेमाल करती हैं। चलिए इन 3 पावरफुल लेसन्स को विस्तार से समझते हैं जो आपकी सोच बदल देंगे।
लेसन १ : बिहेवियरल डिफरेंशिएशन - आपका बर्ताव ही आपकी असली दुकान है।
आजकल के दौर में हर कोई एक जैसी चीज़ें बेच रहा है। अगर आप मार्केट में एक नया स्मार्टफोन खरीदने जाएं, तो दस कंपनियां आपको एक जैसे फीचर्स, वही कैमरा और वही बैटरी लाइफ थमा देंगी। ऐसे में आप किसके पास जाएंगे। ज्यादातर लोग वहीं जाते हैं जहाँ उन्हें 'इज्जत' मिलती है। टैरी बेकन और डेविड पुघ कहते हैं कि आज के कॉम्पिटिटिव मार्केट में आपका प्रोडक्ट नहीं, बल्कि आपका बिहेवियरल डिफरेंशिएशन यानी आपका व्यवहार ही आपको भीड़ से अलग खड़ा करता है।
मान लीजिए आपके घर के पास दो परचून की दुकानें हैं। पहली दुकान वाला 'सेठ जी' जैसा है, जो हमेशा चिढ़ा हुआ रहता है। आप उससे चीनी मांगते हैं और वो ऐसे देखता है जैसे आपने उसकी किडनी मांग ली हो। वहीं दूसरी दुकान वाला राहुल है, जो आपको देखते ही मुस्कुराता है, आपके घर वालों का हाल पूछता है और अगर कभी आपके पास खुले पैसे न हों, तो कहता है कि "अरे भाई साहब, कल दे देना, आप कहाँ भागे जा रहे हैं।" अब आप खुद बताइये, आप किसके पास जाएंगे। जाहिर है राहुल के पास। प्रोडक्ट (चीनी) दोनों के पास सेम है, रेट भी शायद सेम ही हो, लेकिन राहुल का 'बिहेवियर' उसे जीत दिला रहा है।
स्मार्ट कंपनियां जानती हैं कि कस्टमर सिर्फ सामान नहीं खरीदता, वो एक एक्सपीरियंस खरीदता है। अगर आपका व्यवहार रुखा है, तो आपका करोड़ों का शोरूम भी एक कचरे के डिब्बे से ज्यादा कुछ नहीं है। कई लोग सोचते हैं कि "भाई, मेरा माल बेस्ट है, लोग अपने आप आएंगे।" यह सबसे बड़ी गलतफहमी है। दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों को देख लीजिए, वो अपने स्टाफ को केवल काम करना नहीं सिखातीं, बल्कि यह सिखाती हैं कि कस्टमर के साथ 'कनेक्ट' कैसे करना है।
अक्सर बिजनेस में लोग डेटा और नंबर्स के पीछे पागल रहते हैं। उन्हें लगता है कि एक्सेल शीट पर ग्राफ ऊपर जा रहा है तो सब बढ़िया है। लेकिन वो यह भूल जाते हैं कि वो ग्राफ इंसानों की वजह से ऊपर जा रहा है, रोबोट्स की वजह से नहीं। अगर आप अपने कस्टमर को एक 'नंबर' की तरह ट्रीट करेंगे, तो वो भी आपको सिर्फ एक 'ऑप्शन' की तरह ट्रीट करेगा।
विनिंग बिहेवियर का मतलब यह नहीं है कि आप नकली मुस्कान लेकर खड़े हो जाएं। इसका मतलब है कि आप सच में अपने कस्टमर की परवाह करें। जब आप किसी की समस्या को अपनी समस्या समझकर सुलझाते हैं, तो आप केवल एक ट्रांजेक्शन नहीं कर रहे होते, बल्कि आप एक रिश्ता बना रहे होते हैं। और याद रखिये, मार्केट में माल की कमी हो सकती है, रिश्तों की नहीं।
तो क्या आप अपने बिजनेस या प्रोफेशन में केवल 'सामान' बेच रहे हैं या फिर 'व्यवहार' से अपना नाम बना रहे हैं। क्योंकि अंत में, लोग यह भूल सकते हैं कि आपने उन्हें क्या बेचा था, लेकिन वो यह कभी नहीं भूलेंगे कि आपने उन्हें 'फील' कैसा कराया था। यही वो बारीक फर्क है जो एक साधारण कंपनी और एक महान कंपनी के बीच होता है।
लेसन २ : कस्टमर की अनकही जरूरतों का जादू - माइंड रीडर बनिए।
क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ लोग आपके बिना कुछ बोले ही आपकी बात समझ जाते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें आप नक्शा बनाकर भी समझा दें, तो भी वो वही करेंगे जो उन्हें समझ आता है। बिजनेस की दुनिया में स्मार्ट कंपनियां वही हैं जो कस्टमर की जुबान से निकलने से पहले ही उसकी जरूरत को भांप लेती हैं। ऑथर्स कहते हैं कि अगर आप केवल वही दे रहे हैं जो कस्टमर मांग रहा है, तो आप सिर्फ अपना फर्ज निभा रहे हैं। लेकिन अगर आप वो दे रहे हैं जिसकी उसने उम्मीद भी नहीं की थी, तो आप 'विनिंग बिहेवियर' दिखा रहे हैं।
मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट में जाते हैं और वेटर से कहते हैं कि "भाई, दाल मखनी में मिर्ची कम रखना।" वेटर कहता है "जी सर।" अब अगर वो सिर्फ कम मिर्ची वाली दाल ले आता है, तो वो एक एवरेज वेटर है। लेकिन अगर वो दाल के साथ बिना मांगे थोड़ा सा एक्स्ट्रा दही या शहद का छोटा सा स्कूप ले आता है और कहता है कि "सर, मुझे लगा आपको शायद इसकी जरूरत पड़े अगर मिर्च फिर भी तेज लगे," तो भाई साहब, वो वेटर नहीं, वो एक 'एक्सपीरियंस' बेच रहा है। अब आप अगली बार अपने पूरे खानदान को वहीं लेकर जाएंगे। क्यों। क्योंकि उसने आपकी उस जरूरत को समझा जो आपने बोली ही नहीं थी।
ज्यादातर कंपनियां अपनी पूरी जिंदगी यह पूछने में निकाल देती हैं कि "सर, आपको और क्या चाहिए।" अबे भाई, अगर कस्टमर को सब पता ही होता तो वो खुद कंपनी न खोल लेता। कस्टमर को यह नहीं पता होता कि उसे क्या चाहिए जब तक आप उसे वो दिखा न दें। जो कंपनियां केवल सर्वे फॉर्म्स और फीडबैक के भरोसे बैठी रहती हैं, वो हमेशा पीछे रह जाती हैं। असली खिलाड़ी वो है जो कस्टमर के जूते में पैर रखकर देखता है कि उसे काँटा कहाँ चुभ रहा है।
सफल कंपनियां कस्टमर की लाइफ को आसान बनाने के बहाने ढूंढती हैं। वो यह नहीं देखतीं कि हम और क्या 'बेच' सकते हैं, वो यह देखती हैं कि हम कस्टमर की कौन सी 'मुसीबत' कम कर सकते हैं। अगर आप किसी को उसकी परेशानी से मुक्ति दिला देते हैं, तो वो इंसान आपका परमानेंट फैन बन जाता है। यहाँ पर थोड़ा ह्यूमर और थोड़ी ऑब्जर्वेशन की जरूरत है। अगर आप एक डॉक्टर के पास जाएं और वो सिर्फ दवाई लिखकर दे दे, तो आप ठीक तो हो जाएंगे लेकिन दिल नहीं जुड़ेगा। पर अगर वो डॉक्टर दवाई के साथ यह कह दे कि "चिंता मत कीजिये, कल तक आप बिल्कुल फिट होकर ऑफिस जाएंगे," तो आधी बीमारी तो उसकी बातों से ही ठीक हो जाती है।
अक्सर लोग सोचते हैं कि एक्स्ट्रा वैल्यू देने का मतलब है बहुत सारा पैसा खर्च करना। नहीं जनाब। एक्स्ट्रा वैल्यू का मतलब है 'एक्स्ट्रा केयर'। जब आप किसी के लिए वो छोटा सा कदम उठाते हैं जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी, तो आप उसके दिमाग में एक अलग जगह बना लेते हैं। मार्केट में हजारों दुकानें होंगी, लेकिन कस्टमर मुड़कर आपके पास ही आएगा क्योंकि उसे पता है कि आप उसे समझते हैं।
तो क्या आप सिर्फ ऑर्डर्स पूरे कर रहे हैं या फिर आप अपने कस्टमर की खामोशी को पढ़ना सीख रहे हैं। याद रखिये, जो इंसान सामने वाले की अनकही बात समझ लेता है, वही असली लीडर बनता है। बिजनेस केवल लेन-देन का नाम नहीं है, यह तो इमोशन्स और केयर का एक खूबसूरत खेल है।
लेसन ३ : भरोसे की नींव - टैलेंट से बड़ा ईमानदारी का खेल।
मान लीजिए आपको एक सर्जरी करवानी है। आपके पास दो डॉक्टर्स के ऑप्शन हैं। पहला डॉक्टर गोल्ड मेडलिस्ट है, बहुत बड़ा टैलेंटेड है, लेकिन उसका रिकॉर्ड है कि वो ऑपरेशन के बीच में ही चाय पीने चला जाता है या पेशेंट की किडनी की जगह कुछ और ही देख लेता है। दूसरा डॉक्टर शायद उतना बड़ा गोल्ड मेडलिस्ट नहीं है, लेकिन वो अपनी बात का पक्का है और उस पर आप आँख बंद करके भरोसा कर सकते हैं। आप किसके पास जाएंगे। जाहिर है, दूसरे वाले के पास। टैरी बेकन और डेविड पुघ समझाते हैं कि दुनिया की सबसे स्मार्ट कंपनियां केवल टैलेंटेड लोगों के दम पर नहीं, बल्कि ट्रस्टवर्दी बिहेवियर यानी भरोसेमंद व्यवहार के दम पर राज करती हैं।
इसे एक देसी उदाहरण से देखते हैं। हर मोहल्ले में एक 'मैकेनिक भाई' होता है। जब आपकी गाड़ी खराब होती है, तो आप उस मैकेनिक के पास जाते हैं जो शायद थोड़ा टाइम ज्यादा ले, लेकिन आपको पता है कि वो पुराने पार्ट डालकर नए के पैसे नहीं वसूलेगा। वहीँ दूसरी तरफ एक चमचमाता सर्विस सेंटर हो सकता है जहाँ एसी लगा हो, लेकिन आपको हमेशा डर रहता है कि कहीं ये फालतू का बिल न बना दें। जिस दिन कस्टमर के मन में यह शक आ गया कि "क्या यह मुझे चूना लगा रहा है", समझो उसी दिन आपका बिजनेस आईसीयू में चला गया।
सफल कंपनियां अपनी गलतियों को छुपाती नहीं हैं, बल्कि उन्हें मान लेती हैं। आजकल के जमाने में जहाँ लोग अपनी गलती दूसरों पर मढ़ने में एक्सपर्ट हैं, वहां अगर कोई कंपनी अपनी भूल स्वीकार कर ले, तो लोगों का भरोसा उस पर और बढ़ जाता है। स्मार्ट कंपनियां जानती हैं कि एक झूठ बोलकर आप एक बार तो मुनाफा कमा सकते हैं, लेकिन आप एक परमानेंट कस्टमर खो देते हैं। और भाई साहब, नया कस्टमर ढूंढने से सस्ता पुराने कस्टमर को संभालकर रखना होता है।
भरोसा रातों-रात नहीं बनता। यह छोटी-छोटी कंसिस्टेंसी से बनता है। अगर आपने कहा है कि डिलीवरी मंगलवार को होगी, तो वो मंगलवार को ही होनी चाहिए। अगर आप अपनी बात नहीं रख सकते, तो आपकी बड़ी-बड़ी डिग्रियां और करोड़ों की एडवरटाइजिंग सिर्फ दिखावा है। कई लोग सोचते हैं कि "अरे एक दिन लेट हो गया तो क्या फर्क पड़ता है।" फर्क पड़ता है बॉस। क्योंकि आपने सिर्फ सामान लेट नहीं किया, आपने अपना वादा तोड़ा है। और टूटे हुए वादे पर कभी तरक्की की इमारत नहीं खड़ी होती।
विनिंग बिहेवियर का सबसे बड़ा मंत्र यही है कि आप जो कहते हैं, वो करके दिखाएं। मार्केट में चालाकी करने वाले बहुत हैं, लेकिन ईमानदारी दिखाने वाले बहुत कम। जब आप अपने काम में सच्चाई और कंसिस्टेंसी लाते हैं, तो आपको मार्केटिंग पर पैसा बहाने की जरूरत नहीं पड़ती। आपके कस्टमर्स ही आपके सबसे बड़े प्रमोटर बन जाते हैं। वो चीख-चीख कर दुनिया को बताते हैं कि "भाई, काम करवाना है तो इन्हीं से करवाओ।"
तो क्या आप अपने काम में केवल स्मार्ट बन रहे हैं या फिर आप भरोसेमंद भी बन रहे हैं। याद रखिये, स्मार्टनेस आपको रेस की शुरुआत में आगे रख सकती है, लेकिन भरोसा ही आपको रेस के अंत तक विजेता बनाए रखेगा। बिजनेस हो या लाइफ, अंत में वही जीतता है जिसकी जुबान की कीमत उसके सामान से ज्यादा होती है।
Winning Behavior हमें सिखाती है कि बिजनेस केवल स्ट्रेटजी और नंबर्स का खेल नहीं है, यह इंसानी बर्ताव का आईना है। अगर आप भी भीड़ से अलग निकलना चाहते हैं, तो आज ही अपने व्यवहार पर काम करना शुरू करें। याद रखिये, दुनिया आपके प्रोडक्ट को भूल सकती है, पर आपके व्यवहार को हमेशा याद रखेगी।
आज से ही एक छोटा बदलाव करें। अपने अगले कस्टमर या क्लाइंट के साथ केवल बिजनेस की बात न करें, बल्कि उनकी फिक्र करें। क्या आप तैयार हैं अपने व्यवहार से मार्केट जीतने के लिए। नीचे कमेंट में 'WIN' लिखें अगर आप आज से ही अपने बर्ताव को बेहतर बनाने का वादा करते हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपना बिजनेस बड़ा करना चाहते हैं।
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