अगर आप आज भी वही पुराने घिसे पिटे बिजनेस प्लान्स के भरोसे बैठे हैं तो बधाई हो। आप बहुत जल्द अपने कॉम्पिटिटर्स को अमीर बनाने की तैयारी कर रहे हैं। बिना सही स्ट्रैटिजी के काम करना वैसा ही है जैसे बिना हेलमेट के ट्रैफिक में रेस लगाना। नुकसान पक्का है।
क्या आप भी अपनी मेहनत को बिना सोचे समझे बर्बाद कर रहे हैं। चलिए आज इस बुक के जरिए जानते हैं कि कैसे आप अपनी स्ट्रैटिजी को अपग्रेड करके मार्केट के असली खिलाडी बन सकते हैं। यहाँ ३ ऐसे लाइफ चेंजिंग लेसन हैं जो आपके सोचने का तरीका बदल देंगे।
लेसन १ : स्ट्रैटिजी पैलेट - अपने बिजनेस के लिए सही रास्ता चुनना
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो हर बीमारी का इलाज एक ही क्रोसिन की गोली से करने की कोशिश करते हैं। अगर हाँ। तो आपके बिजनेस का भगवान ही मालिक है। मार्टिन रीव्स और उनके साथियों ने अपनी बुक में सबसे पहले इसी गलती पर चोट की है। वे कहते हैं कि मार्केट कोई ऐसी चीज नहीं है जहाँ एक ही साइज का जूता सबको फिट आ जाए। अक्सर लोग क्या करते हैं। वे किसी बड़ी कंपनी की सक्सेस स्टोरी पढ़ते हैं। उनकी स्ट्रैटिजी कॉपी करते हैं। और फिर जब फेल होते हैं तो किस्मत को कोसते हैं। असल में गलती किस्मत की नहीं बल्कि आपकी उस एक स्ट्रैटिजी को हर जगह फिट करने की जिद्द की है।
मान लीजिए आप एक मोहल्ले में किराने की दुकान खोलते हैं। वहां का माहौल बहुत ही प्रेडिक्टेबल है। आपको पता है कि महीने की एक तारीख को शर्मा जी आटा लेने आएंगे और दस तारीख तक वर्मा जी का उधार बढ़ जाएगा। यहाँ आपकी क्लासिक स्ट्रैटिजी काम करेगी। आप आराम से बैठकर प्लान बना सकते हैं कि कितना स्टॉक रखना है और कितना मुनाफा कमाना है। यहाँ दिमाग ज्यादा नहीं दौड़ना है बस एफिशिएंसी पर ध्यान देना है। लेकिन अब सोचिए कि आप अचानक एक टेक स्टार्टअप शुरू कर देते हैं जहाँ हर दूसरे दिन नया सॉफ्टवेयर आ जाता है और फेसबुक अपना एल्गोरिदम बदल देता है। क्या वहां आपकी किराने वाली स्ट्रैटिजी काम करेगी। बिल्कुल नहीं। वहां तो आपको हर पल गिरगिट की तरह रंग बदलना पड़ेगा।
बुक में इसे स्ट्रैटिजी पैलेट कहा गया है। यह एक रंग की प्लेट की तरह है जहाँ पांच अलग अलग रंग के माहौल बताए गए हैं। क्लासिक। एडैप्टिव। विजनरी। शेपिंग। और रिन्यूअल। अगर आपका मार्केट बहुत प्रेडिक्टेबल है तो क्लासिक चुनिए। लेकिन अगर मार्केट में कल क्या होगा किसी को नहीं पता तो एडैप्टिव बनिए। कई बार लोग विजनरी बनने के चक्कर में उस मार्केट में भी करोड़ों लुटा देते हैं जहाँ अभी डिमांड ही पैदा नहीं हुई। यह वैसा ही है जैसे आप रेगिस्तान में जाकर वाटर पार्क का पास बेच रहे हों। आपको लगता है कि आप विजनरी हैं लेकिन दुनिया आपको सिर्फ बेवकूफ कहेगी।
असली समझदारी इस बात में है कि आप पहले अपने आस पास के माहौल को पहचानें। क्या आपके कस्टमर वफादार हैं या वे सेल देखकर कहीं भी भाग जाते हैं। क्या आपके कॉम्पिटिटर शांत बैठे हैं या वे हर रोज नई स्कीम ला रहे हैं। अगर माहौल अशांत है तो अपनी प्लानिंग की डायरी को डस्टबिन में डालिए और छोटे छोटे एक्सपेरिमेंट शुरू कीजिए। लोग अक्सर स्ट्रैटिजी बनाने के नाम पर हफ़्तों मीटिंग्स करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि जब तक आपकी मीटिंग खत्म होती है तब तक मार्केट का टेस्ट बदल चुका होता है। इसलिए सही स्ट्रैटिजी चुनने का मतलब है अपनी आंखों को खुला रखना और ईगो को घर छोड़कर आना।
अगले लेसन में हम देखेंगे कि जब मार्केट पागलों की तरह व्यवहार करे तो आपको अपनी चाल कैसे बदलनी है। क्योंकि एक बार रास्ता चुन लिया तो उस पर चलना कैसे है यह और भी बड़ा चैलेंज है।
लेसन २ : एडैप्टिव स्ट्रैटिजी - अनिश्चितता में जीत का असली मंत्र
दोस्तो, अगर आप सोचते हैं कि आप पांच साल का एक परफेक्ट बिजनेस प्लान बनाएंगे और वो बिल्कुल वैसे ही चलेगा जैसे आपने सोचा था। तो शायद आप किसी और ही दुनिया में रह रहे हैं। आज का मार्केट किसी मूडी पार्टनर की तरह है जो कब किस बात पर नाराज हो जाए और अपना मन बदल ले। आपको पता भी नहीं चलेगा। ऐसी सिचुएशन में काम आती है एडैप्टिव स्ट्रैटिजी। मार्टिन रीव्स कहते हैं कि जब आप प्रेडिक्ट नहीं कर सकते तो आपको एडैप्ट करना सीखना होगा। यानी कि अपनी प्लानिंग को पत्थर की लकीर समझना बंद करना होगा।
मान लीजिए आप एक ऐसे रेस्टोरेंट के मालिक हैं जहाँ आपने मेन्यू में सिर्फ भारी भरकम पंजाबी खाना रखा है। क्योंकि आपने प्लान किया था कि लोग पनीर टिक्का ही खाएंगे। लेकिन अचानक शहर में लोग हेल्थ कॉन्शियस हो गए और सलाद ढूंढने लगे। अब एक जिद्दी बिजनेसमैन कहेगा कि नहीं। मैंने तो प्लान किया था कि मैं सिर्फ मक्खन मारके पनीर ही खिलाऊंगा। नतीजा। लोग आपके बगल वाली दुकान पर चले जाएंगे जो चुपचाप सलाद बेचना शुरू कर चुकी है। यहाँ आपकी पुरानी स्ट्रैटिजी आपकी दुश्मन बन गई। एडैप्टिव होने का मतलब है कि आप मार्केट की नब्ज पहचानें। जैसे ही देखा कि हवा बदल रही है। वैसे ही अपनी पतवार घुमा दी।
इस लेसन का सबसे बड़ा सीक्रेट है एक्सपेरिमेंटेशन। लोग अक्सर एक बड़ा रिस्क लेने से डरते हैं। और डरना भी चाहिए। लेकिन एडैप्टिव स्ट्रैटिजी कहती है कि एक बड़ा जुआ खेलने के बजाय दस छोटे छोटे दांव खेलिए। इसे वेरिएशन और सिलेक्शन का प्रोसेस कहते हैं। आप अलग अलग चीजें ट्राई कीजिए। जो चीज क्लिक कर जाए। उस पर पूरा जोर लगा दीजिए। जो फेल हो जाए। उसे बिना इमोशनल हुए चुपचाप बंद कर दीजिए। कई लोग अपनी नाकामयाब स्ट्रैटिजी से ऐसे चिपक जाते हैं जैसे वो उनकी जायदाद हो। वे सोचते हैं कि इतना पैसा खर्च कर दिया तो अब इसे चलाना ही पड़ेगा। भाई साहब। डूबते हुए जहाज में और वजन डालना बुद्धिमानी नहीं है।
आज के दौर में गूगल। अमेजन और नेटफ्लिक्स जैसी कंपनियां इसलिए बड़ी नहीं बनीं क्योंकि उनके पास कोई जादुई प्लान था। वे इसलिए बड़ी बनीं क्योंकि वे आपसे और हमसे ज्यादा तेजी से एक्सपेरिमेंट करती हैं। वे हर रोज अपनी वेबसाइट पर छोटे बदलाव करते हैं। देखते हैं कि लोग कहाँ क्लिक कर रहे हैं। और फिर उसी हिसाब से बदल जाते हैं। अगर आप भी अपने काम में ये सोचकर बैठे हैं कि जैसा दस साल पहले चलता था वैसा ही आज चलेगा। तो आप बस अपने अंत का इंतजार कर रहे हैं।
एडैप्टिव स्ट्रैटिजी में जीत उसी की होती है जिसकी सीखने की रफ्तार उसके कॉम्पिटिटर से ज्यादा तेज होती है। यहाँ हारना कोई बुराई नहीं है। बुराई है हार से न सीखना और अपनी गलतियों को दोहराना। तो अगली बार जब आपका प्लान फेल हो जाए। तो रोने के बजाय ये देखिए कि मार्केट आपको क्या इशारा दे रहा है। शायद वो आपको किसी बड़ी जीत की तरफ मोड़ने की कोशिश कर रहा है।
पिछले दो लेसन्स में हमने देखा कि सही रास्ता कैसे चुनें और बदलती परिस्थितियों में खुद को कैसे ढालें। लेकिन एक असली लीडर सिर्फ आज की नहीं सोचता। अगले लेसन में हम बात करेंगे उस बैलेंस की जो एक कंपनी को सालों साल टिकने में मदद करता है।
लेसन ३ : एम्बीडेक्सट्रस ऑर्गेनाइजेशन - आज को संभालना और कल को संवारना
क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक नोकिया आखिर क्यों सिमट कर रह गई। उनके पास पैसा था। नाम था। और मार्केट पर कब्जा भी था। लेकिन उनकी एक ही बड़ी गलती थी। वे सिर्फ उसी काम में लगे रहे जो वे आज कर रहे थे। उन्होंने भविष्य की तैयारी नहीं की। मार्टिन रीव्स इस लेसन में एम्बीडेक्सट्रस ऑर्गेनाइजेशन की बात करते हैं। एम्बीडेक्सट्रस का मतलब होता है वह इंसान जो अपने दोनों हाथों का बराबर इस्तेमाल कर सके। बिजनेस की भाषा में कहें तो एक हाथ से आज के बिजनेस को चलाना और दूसरे हाथ से कल के नए आइडियाज को खोजना।
मान लीजिए आपके पास एक बहुत पुरानी मिठाई की दुकान है जिसकी जलेबी पूरे शहर में मशहूर है। अब आप दिन भर उसी पुरानी रेसिपी से जलेबी बना रहे हैं और खूब पैसा कमा रहे हैं। यह बहुत अच्छी बात है। इसे कहते हैं एक्सप्लॉइटेशन। यानी जो चीज काम कर रही है उससे ज्यादा से ज्यादा फायदा निकालना। लेकिन अगर आप सिर्फ यही करते रहेंगे तो कल को जब लोग शुगर फ्री या मॉडर्न मिठाइयां मांगेंगे तब आप क्या करेंगे। एक स्मार्ट दुकानदार वही है जो अपनी मशहूर जलेबी भी बेचता रहे। लेकिन साथ ही दुकान के एक छोटे से कोने में नए तरीके की मिठाइयों का एक्सपेरिमेंट भी करता रहे। ताकि जब कल को लोगों का टेस्ट बदले। तो वह पीछे न रह जाए। इसे कहते हैं एक्सप्लोरेशन।
अक्सर कंपनियां इसी जाल में फंस जाती हैं। जब पैसा आ रहा होता है तो मैनेजमेंट को लगता है कि सब कुछ बढ़िया है। वे नए आइडियाज पर ध्यान देना बंद कर देते हैं। उन्हें लगता है कि रिसर्च और डेवलपमेंट में पैसा बर्बाद हो रहा है। लेकिन दोस्तो। याद रखिए कि जो आज आपका सबसे बड़ा प्रॉफिट वाला प्रोडक्ट है। वो कल किसी और कंपनी का पुराना कूड़ा बन सकता है। आपको अपनी एनर्जी को दो हिस्सों में बांटना पड़ेगा। एक हिस्सा आपके मौजूदा ऑपरेशंस को परफेक्ट बनाने में। और दूसरा हिस्सा उन रिस्की आइडियाज में जो शायद भविष्य में बड़े बन सकें।
यह काम कहना आसान है लेकिन करना बहुत मुश्किल। क्योंकि जब आप आज का काम कर रहे होते हैं तो आपको डिसिप्लिन और रूल्स चाहिए होते हैं। लेकिन जब आप नए आइडियाज पर काम करते हैं तो आपको आजादी और थोड़ी सी पागलपंती चाहिए होती है। एक ही ऑफिस में इन दोनों तरह के माहौल को बनाए रखना ही असली लीडरशिप है। अगर आप सिर्फ आज में जिएंगे तो कल खत्म हो जाएंगे। और अगर सिर्फ कल के सपने देखेंगे तो आज भूखे मर जाएंगे। इसलिए बैलेंस ही असली चाबी है।
मार्टिन रीव्स कहते हैं कि आपको अपनी स्ट्रैटिजी को समय के साथ रिन्यू करते रहना चाहिए। पुरानी सफलताओं को अपने गले का हार मत बनाइए। बल्कि उन्हें एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कीजिए। ताकि आप अगले ऊंचे मुकाम तक पहुँच सकें। अपनी कंपनी के अंदर एक ऐसा कल्चर बनाइए जहाँ लोग फेल होने से न डरें। बल्कि कुछ नया ट्राई न करने से डरें। क्योंकि असली रिस्क कुछ नया करने में नहीं है। असली रिस्क तो वैसा ही बने रहने में है जैसा आप कल थे।
तो दोस्तो, योर स्ट्रैटिजी नीड्स अ स्ट्रैटिजी का यह सफर हमें सिखाता है कि बिजनेस सिर्फ मेहनत का काम नहीं है। बल्कि यह सही वक्त पर सही चाल चलने का खेल है। चाहे वो स्ट्रैटिजी पैलेट का चुनाव हो। एडैप्टिव होना हो। या एम्बीडेक्सट्रस बनकर भविष्य की तैयारी करना। जीत उसी की होगी जो बदलते माहौल को समझेगा।
अब आप मुझे कमेंट सेक्शन में बताइए कि आपका बिजनेस या काम किस फेज में है। क्या आप क्लासिक तरीके से चल रहे हैं या आपको भी अब एडैप्टिव होने की जरूरत महसूस हो रही है। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो अपनी पुरानी स्ट्रैटिजी से चिपके बैठे हैं। क्या पता आपका एक शेयर उनका बिजनेस डूबने से बचा ले। चलिए। मिलकर एक बेहतर और स्ट्रैटिजिक इंडिया बनाते हैं।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#BusinessStrategy #Leadership #BookSummary #Entrepreneurship #GrowthMindset
_