अगर आपको लगता है कि एक बार बिजनेस सेट करके आप पैर पसारकर सो सकते हैं तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं। दुनिया की टॉप कंपनियां रोज खुद को खत्म होने से बचाती हैं और आप अभी भी कल की जीत का लड्डू खा रहे हैं।
क्या आप जानते हैं कि अमेज़न और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियां हमेशा टॉप पर कैसे टिकी रहती हैं। इसका राज छुपा है अलेक्स कांट्रोविट्ज़ की किताब ऑल्वेज डे वन में। चलिए जानते हैं वो ३ कमाल के लेसन जो आपको भी नंबर वन बना देंगे।
लेसन १ : डे वन माइंडसेट और कॉन्स्टेंट इनोवेशन
क्या आपको याद है जब आपने अपनी पहली नौकरी शुरू की थी। उस दिन आप ऑफिस टाइम से १५ मिनट पहले पहुँच गए थे। चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी और हर छोटे काम को परफेक्टली करने का जूनून था। उसे ही कहते हैं डे वन। लेकिन जैसे ही कुछ साल बीतते हैं आप अपनी सीट पर ऐसे चिपक जाते हैं जैसे वो आपकी पुश्तैनी जायदाद हो। अमेज़न के जेफ बेजोस कहते हैं कि अगर आप डे टू में पहुँच गए तो समझो आपकी उल्टी गिनती शुरू हो गई। डे टू का मतलब है आलस और यह सोचना कि अब तो हम राजा बन गए हैं।
असल में बड़ी कंपनियां इसलिए फेल नहीं होतीं कि उनके पास पैसा खत्म हो जाता है। वो इसलिए फेल होती हैं क्योंकि वो कल की सफलता को आज का तकिया बना लेती हैं। नोकिया और कोडक जैसी कंपनियों ने यही गलती की थी। उनको लगा कि जो आज चल रहा है वही हमेशा चलेगा। लेकिन टेक की दुनिया में अगर आप रुक गए तो आप पीछे नहीं रहते बल्कि आप सीधे रेस से बाहर हो जाते हैं। ऑल्वेज डे वन का मतलब है कि आपके पास चाहे अरबों डॉलर हों या आप दुनिया के सबसे अमीर इंसान हों आपको हर सुबह इसी डर के साथ उठना है कि कोई लड़का गैराज में बैठकर आपका धंधा चौपट करने की प्लानिंग कर रहा है।
अमेज़न में आज भी हजारों एम्प्लॉई होने के बावजूद वहां का कल्चर एक स्टार्टअप जैसा है। वहां कोई यह नहीं कहता कि हमने हमेशा से ऐसे ही काम किया है। वहां हर कोई यह सोचता है कि आज नया क्या उखाड़ना है। मान लीजिए आपने एक चाय की टपरी खोली और वो सुपरहिट हो गई। अब आपके पास दो रास्ते हैं। या तो आप मलाई मार के चाय पिएं और गल्ले पर बैठकर पेट फुलाएं या फिर आप यह सोचें कि कल को अगर कोई और बढ़िया चाय पिलाने लगा तो मेरा क्या होगा। यही डर आपको नया सोचने पर मजबूर करता है।
इन्नोवेशन कोई रॉकेट साइंस नहीं है। यह सिर्फ एक एटीट्यूड है। जब आप यह मान लेते हैं कि आपको सब पता है तो आपका दिमाग नए आइडिया के लिए दरवाजे बंद कर लेता है। फेसबुक यानी मेटा के मार्क जुकरबर्ग ने भी यही किया। जब उन्हें लगा कि लोग अब सिर्फ फोटो नहीं देखना चाहते बल्कि छोटे वीडियो देखना चाहते हैं तो उन्होंने तुरंत अपनी पूरी ताकत रील्स पर झोंक दी। उन्होंने यह नहीं सोचा कि मेरा फेसबुक तो पहले से ही हिट है। उन्होंने डे वन वाला रिस्क लिया और आज वो फिर से रेस में सबसे आगे हैं।
अगर आप अपने करियर या बिजनेस में टॉप पर रहना चाहते हैं तो अपनी कुर्सी से प्यार करना छोड़ दीजिये। कल की जीत का जश्न कल ही खत्म हो गया था। आज फिर से वही मेहनत और वही पागलपन चाहिए जो पहले दिन था। जो लोग कहते हैं कि स्टेबिलिटी बहुत जरूरी है वो असल में आपको धीरे धीरे खत्म होने की सलाह दे रहे हैं। स्टेबिलिटी सिर्फ कब्रिस्तान में मिलती है बिजनेस में तो हर दिन एक जंग है। और इस जंग को वही जीतता है जो खुद को रोज अपडेट करता है।
लेसन २ : आइडिया डेमोक्रेसी और फीडबैक कल्चर
क्या आपने कभी ऐसे ऑफिस में काम किया है जहाँ बॉस की बात पत्थर की लकीर होती है। भले ही बॉस का आइडिया एकदम सड़ा हुआ हो पर सब लोग जी हुजूर कहकर तालियां बजाते हैं। ऐसी जगहों पर टैलेंटेड लोग अपना दिमाग घर छोड़कर आते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यहाँ बोलने का कोई फायदा नहीं। लेकिन अलेक्स कांट्रोविट्ज़ बताते हैं कि गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियों की सफलता का सबसे बड़ा राज है आइडिया डेमोक्रेसी। यहाँ कुर्सी की नहीं बल्कि अच्छे आइडिया की इज्जत होती है।
मान लीजिये आप एक क्रिकेट टीम के कप्तान हैं। आपको लगता है कि आपको पहले बैटिंग करनी चाहिए लेकिन टीम का सबसे नया खिलाड़ी जो अभी अभी आया है वो कहता है कि पिच गीली है और हमें बॉलिंग करनी चाहिए। अगर आप एक घमंडी बॉस होंगे तो आप उसे चुप करा देंगे और मैच हार जाएंगे। लेकिन अगर आप गूगल की तरह सोचते हैं तो आप उसकी बात सुनेंगे और उस पर डेटा के साथ चर्चा करेंगे। गूगल में कोई भी एम्प्लॉई किसी भी सीनियर के आइडिया को चुनौती दे सकता है। इसे वहां अपमान नहीं बल्कि कंपनी के भले के लिए किया गया काम माना जाता है।
ज्यादातर भारतीय कंपनियों में बॉस को भगवान मान लिया जाता है। अगर बॉस ने कह दिया कि गोबर सोने के भाव बिकेगा तो मैनेजर भी उसकी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी बनाने लगते हैं। लेकिन टेक टाइटन्स जानते हैं कि एक इंसान चाहे कितना भी स्मार्ट हो वो हमेशा सही नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने एक ऐसा कल्चर बनाया है जहाँ फीडबैक देना अनिवार्य है। फेसबुक में आज भी टाउन हॉल मीटिंग्स होती हैं जहाँ कोई भी इंटर्न मार्क जुकरबर्ग से तीखे सवाल पूछ सकता है। वहां सार्केजम और सवाल पूछने की पूरी आजादी है क्योंकि उन्हें पता है कि अगला बड़ा आइडिया शायद उस लड़के के पास हो जो अभी अभी कॉलेज से आया है।
आइडिया डेमोक्रेसी का मतलब यह नहीं है कि हर किसी की बात मान ली जाए। इसका मतलब है कि हर किसी को अपनी बात रखने का मौका मिले। जब आप अपने एम्प्लॉई को यह भरोसा देते हैं कि उसकी बात सुनी जाएगी तो वो कंपनी को अपनी जागीर समझने लगता है। वो सिर्फ सैलरी के लिए नहीं बल्कि वैल्यू ऐड करने के लिए काम करता है। अगर आप अपने छोटे से बिजनेस में भी यह लागू कर दें कि जो सबसे अच्छा सोल्यूशन देगा उसे इनाम मिलेगा चाहे वो ऑफिस का चपरासी ही क्यों न हो तो यकीन मानिए आपकी ग्रोथ को कोई नहीं रोक सकता।
सच्चाई तो यह है कि ईगो और बिजनेस कभी साथ साथ नहीं चल सकते। अगर आपका ईगो आपके विजन से बड़ा है तो आपकी कंपनी का पतन निश्चित है। जो कंपनियां फीडबैक को गाली समझती हैं वो मार्केट से वैसे ही गायब हो जाती हैं जैसे सर्दियों में धूप। इसलिए अगर आपको टॉप पर रहना है तो अपने आसपास ऐसे लोग मत रखिये जो सिर्फ हाँ में हाँ मिलाते हों। ऐसे लोग रखिये जो आपको आइना दिखा सकें और आपके गलत फैसलों पर आपको टोक सकें। क्योंकि एक समझदार दुश्मन आपको उतना नुकसान नहीं पहुँचाएगा जितना एक बेवकूफ दोस्त जो आपकी हर बात पर ताली बजाता हो।
लेसन ३ : इन्वेंशन मशीन बनाना
क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ कंपनियां एक हिट प्रोडक्ट देने के बाद गायब क्यों हो जाती हैं और कुछ कंपनियां हर साल एक नया धमाका कैसे कर देती हैं। इसका जवाब है इन्वेंशन मशीन। अलेक्स कांट्रोविट्ज़ बताते हैं कि अमेज़न और एप्पल जैसी कंपनियां सिर्फ सामान नहीं बेचतीं बल्कि उन्होंने एक ऐसा सिस्टम बना लिया है जो खुद नए आइडिया पैदा करता रहता है। वो किस्मत के भरोसे नहीं बैठते कि कभी कोई न्यूटन आएगा और उसके सिर पर सेब गिरेगा। उन्होंने सेब गिरने का पूरा प्रोसेस ही ऑटोमेट कर दिया है।
इसे ऐसे समझिये कि अगर आप एक हलवाई हैं और आप खुद ही समोसे तलते हैं तो आप एक दिन में लिमिटेड समोसे ही बेच पाएंगे। लेकिन अगर आप एक ऐसी मशीन बना लें जो परफेक्ट शेप और स्वाद के समोसे खुद तैयार करे तो आप दुनिया के सबसे बड़े हलवाई बन सकते हैं। टेक दिग्गज यही करते हैं। वो खुद को एक प्रोडक्ट कंपनी नहीं बल्कि एक प्रोसेस कंपनी मानते हैं। अमेज़न में जब भी कोई नया आइडिया आता है तो वो पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन नहीं दिखाते। वहां नियम है कि आपको छह पन्ने का एक मेमो लिखना होगा जिसे प्रेस रिलीज की तरह पढ़ा जाएगा। इससे यह साफ हो जाता है कि क्या यह आइडिया वाकई कस्टमर की कोई प्रॉब्लम सॉल्व कर रहा है या आप सिर्फ हवा में तीर चला रहे हैं।
इन्वेंशन मशीन बनाने का मतलब है कि आप अपनी सफलता को किसी एक इंसान के टैलेंट पर निर्भर नहीं छोड़ते। आज अगर एलन मस्क को कुछ हो जाए तो शायद उनकी कंपनियां डगमगा जाएं लेकिन अमेज़न और गूगल ने खुद को इस तरह डिजाइन किया है कि वो बिना किसी स्टार लीडर के भी नए इन्वेंशन करते रहेंगे। वो डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके यह पहले ही जान लेते हैं कि जनता को कल क्या चाहिए होगा। और जब तक बाकी लोग कल की प्लानिंग कर रहे होते हैं तब तक ये लोग परसों का माल तैयार कर चुके होते हैं।
हम में से ज्यादातर लोग अपनी मेहनत का इस्तेमाल गड्ढा खोदने में करते हैं लेकिन ये कंपनियां मेहनत का इस्तेमाल ऐसी मशीन बनाने में करती हैं जो खुद गड्ढा खोद सके। यही फर्क है एक मजदूर और एक मालिक की सोच में। अगर आप अपने बिजनेस में फंसे हुए हैं और हर छोटा फैसला आपको ही लेना पड़ता है तो मुबारक हो आपने बिजनेस नहीं बल्कि खुद के लिए एक नौकरी पैदा कर ली है। एक असली लीडर वो है जो ऐसे सिस्टम बनाता है कि उसकी गैरमौजूदगी में भी काम पहले से बेहतर हो सके।
अंत में याद रखिये कि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। अगर आप आज इन्वेंशन मशीन नहीं बनेंगे तो कल आप इतिहास की किताब का एक छोटा सा हिस्सा बनकर रह जाएंगे। सफलता का मतलब यह नहीं है कि आपने एक बार पहाड़ चढ़ लिया। सफलता का मतलब है कि आपने एक ऐसी लिफ्ट बना ली है जो आपको और आपकी टीम को बार बार ऊपर ले जा सके। तो आज ही अपनी मशीन पर काम शुरू कीजिये वरना आपकी जगह कोई और ले लेगा और आपको पता भी नहीं चलेगा।
दोस्तों, सफलता कोई मंजिल नहीं बल्कि एक सफर है जो हर सुबह डे वन से शुरू होता है। अगर आप भी अपने कंफर्ट जोन में फंसे हैं तो आज ही उसे लात मारिये और नया सीखना शुरू कीजिये। मुझे कमेंट्स में बताइये कि आप अपने काम में कौन सा नया बदलाव लाने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो कल की जीत के भरोसे आज सो रहा है। जागते रहिये और नया करते रहिये।
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