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क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सब्जी वाले से दो रुपये कम कराने में पसीने छोड़ देते हैं और ऑफिस में अपनी सैलरी बढ़ाने की बात करने पर ऐसे चुप हो जाते हैं जैसे किसी ने फेविकोल पी लिया हो? मुबारक हो, आप अपनी पूरी जिंदगी की मेहनत और कमाई टेबल पर ही छोड़ कर आ रहे हैं क्योंकि आपको सही सवाल पूछना ही नहीं आता।

अगर आप भी अपनी किस्मत को दोष देना बंद करके असल में वो हासिल करना चाहते हैं जिसके आप हकदार हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए गेम चेंजर होने वाला है। चलिए एलेक्जेंड्रा कार्टर की इस किताब से वो ३ लेसन समझते हैं जो आपकी बातचीत करने का तरीका हमेशा के लिए बदल देंगे।


लेसन १ : मिरर क्वेश्चंस - पहले खुद को आईना दिखाओ

ज्यादातर लोग नेगोशिएशन को एक जंग की तरह देखते हैं। हमें लगता है कि हमें बस सामने वाले पर टूट पड़ना है और अपनी बात मनवानी है। लेकिन एलेक्जेंड्रा कार्टर कहती हैं कि असली नेगोशिएशन सामने वाले के साथ नहीं, बल्कि आपके अपने दिमाग के अंदर शुरू होता है। इसे वो 'मिरर क्वेश्चंस' कहती हैं। अब आप सोचेंगे कि भाई, मुझे सैलरी बढ़वानी है तो मैं खुद से सवाल क्यों पूछूं? मैं तो बस बॉस को जाकर बोलूंगा कि पैसे बढ़ाओ वरना मैं चला। बस यही आपकी सबसे बड़ी गलती है।

मान लीजिए आपको नया फोन खरीदना है। आप दुकान पर जाते हैं और सेल्समैन से बहस करते हैं। लेकिन क्या आपने खुद से पूछा कि आपको नया फोन चाहिए क्यों? क्या वाकई पुराना वाला खराब है या बस पड़ोसी के नए आईफोन को देखकर आपकी जल रही है? जब तक आप अपनी असली जरूरत नहीं जानते, आप कभी सही डील नहीं कर सकते। मिरर क्वेश्चन का मतलब है खुद से यह पूछना कि "मुझे असल में क्या चाहिए?" और "मुझे वो क्यों चाहिए?"।

ज्यादातर लोग अपनी लाइफ में नेगोशिएट इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें खुद ही नहीं पता होता कि उन्हें क्या चाहिए। वो बस एक धुंधली सी इच्छा लेकर मैदान में उतर जाते हैं। जैसे कि "मुझे बस ज्यादा इज्जत चाहिए।" भाई, इज्जत का अचार डालोगे क्या? आपको इज्जत के रूप में क्या चाहिए? ज्यादा जिम्मेदारी? एक बेहतर केबिन? या बस मीटिंग में अपनी बात रखने का मौका? जब तक आप क्लियर नहीं होंगे, सामने वाला आपको घुमाता रहेगा और आप गोल-गोल घूमते रहेंगे।

एक पति-पत्नी में इस बात पर झगड़ा हो रहा था कि छुट्टियां कहां बिताई जाएं। पति को पहाड़ पसंद थे और पत्नी को समुद्र। दोनों हफ्तों तक लड़ते रहे। नेगोशिएशन फेल हो रहा था। फिर उन्होंने मिरर क्वेश्चन का इस्तेमाल किया। पति ने खुद से पूछा कि उसे पहाड़ क्यों चाहिए? जवाब मिला - "शांति और एकांत के लिए।" पत्नी ने खुद से पूछा कि उसे समुद्र क्यों चाहिए? जवाब मिला - "एडवेंचर और एक्टिविटी के लिए।" जब उन्होंने अपनी असली जरूरत को समझा, तो उन्होंने एक ऐसी जगह चुनी जहां शांत जंगल भी था और पास में ही रिवर राफ्टिंग भी थी। इसे कहते हैं दिमाग का इस्तेमाल करना, जो आजकल लोग कम ही करते हैं।

बिना खुद को समझे दूसरों से डिमांड करना वैसा ही है जैसे बिना एड्रेस पता किए उबर बुक करना। ड्राइवर तो आएगा, लेकिन आपको ले जाएगा कहां? सिर्फ कंफ्यूजन के गड्ढे में। इसलिए अगली बार जब आप किसी बड़ी डील के लिए जाएं, तो पहले पांच मिनट शीशे के सामने खड़े हों और खुद से वो कड़वे सवाल पूछें जो आप अक्सर छुपा जाते हैं। क्या आप डर की वजह से कम मांग रहे हैं? या आप सिर्फ ईगो की वजह से ज्यादा मांग रहे हैं? याद रखिए, जो खुद को नहीं जीत सकता, वो दुनिया से क्या खाक जीतेगा।


लेसन २ : खुले सवालों का जादू - जासूस बनिए, जज नहीं

जब आप खुद को समझ लेते हैं, तब बारी आती है सामने वाले के दिमाग की खिड़की खोलने की। अक्सर हम नेगोशिएशन में ऐसे सवाल पूछते हैं जिनका जवाब 'हां' या 'ना' में खत्म हो जाता है। जैसे कि "क्या आप मुझे डिस्काउंट देंगे?" सामने वाला बोलता है "नहीं", और बस, आपकी फिल्म वहीं खत्म। एलेक्जेंड्रा कार्टर कहती हैं कि अगर आप सच में कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, तो आपको 'क्लोज एंडेड' सवालों की कब्र खोदनी होगी और 'ओपन एंडेड' यानी खुले सवालों का सहारा लेना होगा।

इसे ऐसे समझिए कि आप एक जासूस हैं जिसे सच बाहर निकलवाना है, लेकिन बिना सामने वाले को डराए। "क्यों" और "कैसे" वाले सवाल वो चाबियां हैं जो किसी भी बंद तिजोरी को खोल सकती हैं। लोग अक्सर डरते हैं कि ज्यादा सवाल पूछने से वो बेवकूफ लगेंगे, जबकि असलियत यह है कि जितना ज्यादा आप सामने वाले को बोलने का मौका देंगे, उतनी ही ज्यादा पावर आपके हाथ में आएगी। वो कहते हैं ना कि ऊपर वाले ने दो कान और एक मुंह इसलिए दिया है ताकि हम सुनें ज्यादा और बकवास कम करें।

मान लीजिए आप एक कार खरीदने गए हैं। सेल्समैन आपको एक महंगी गाड़ी चिपकाने की कोशिश कर रहा है। आप सीधा पूछने के बजाय कि "क्या यह सस्ती हो सकती है?", उससे पूछिए "यह प्राइस मेरे बजट के हिसाब से कैसे फिट बैठता है?" या "इस मॉडल में ऐसा क्या खास है जो मुझे दूसरे ब्रांड्स में नहीं मिलेगा?" अब सेल्समैन को बोलना पड़ेगा। वो जितनी सफाई देगा, उतने ही सुराग आपको मिलते जाएंगे। आपको पता चलेगा कि उसे अपना टारगेट पूरा करना है या फिर यह गाड़ी सच में बहुत दिनों से धूल खा रही है।

ज्यादातर लोग नेगोशिएशन में वकीलों की तरह जिरह करने लगते हैं, जिससे सामने वाला डिफेंसिव हो जाता है और अपना दिल और पर्स दोनों बंद कर लेता है। लेकिन जब आप पूछते हैं कि "इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए आपकी तरफ से क्या चुनौतियां हैं?", तो सामने वाले को लगता है कि आप उसके हमदर्द हैं। जबकि असल में आप तो बस अपनी जीत का रास्ता साफ कर रहे होते हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी को मीठी गोली देकर उसका ऑपरेशन कर देना।

अपनी ईगो को साइड में रखकर सवाल पूछना एक सुपरपावर है। अक्सर हम अपनी जानकारी झाड़ने के चक्कर में सामने वाले की बात काट देते हैं। लेकिन समझदार आदमी वो है जो सामने वाले को बोलने देता है जब तक कि वो अपनी सारी कमजोरियां खुद ही टेबल पर न रख दे। याद रखिए, जानकारी ही असली पैसा है। और जानकारी मांगने से मिलती है, दादागिरी दिखाने से नहीं। इसलिए अगली बार जब बातचीत फंसी हुई लगे, तो एक गहरा सांस लें और पूछें - "हम इस स्थिति को और बेहतर कैसे बना सकते हैं?" और फिर बस जादू देखें।


लेसन ३ : लैंडिंग द प्लेन - डील को अंजाम तक पहुँचाना

अब आपने खुद को समझ लिया और सामने वाले के राज भी जान लिए। लेकिन अब क्या? क्या आप बस बातें करते रहेंगे? यहीं पर सबसे ज्यादा लोग मार खा जाते हैं। वो रनवे पर तो बहुत तेज दौड़ते हैं, लेकिन जब प्लेन उड़ाने या लैंड करने की बारी आती है, तो उनके हाथ-पांव फूल जाते हैं। एलेक्जेंड्रा कार्टर इसे 'लैंडिंग द प्लेन' कहती हैं। इसका मतलब है कि अपनी सारी बातचीत को एक ठोस नतीजे या एक्शन प्लान में बदलना। वरना आपकी सारी नेगोशिएशन बस एक लंबी और बोरिंग पंचायत बनकर रह जाएगी।

अक्सर हमें लगता है कि नेगोशिएशन का मतलब है सामने वाले को पूरी तरह हरा देना। लेकिन सच तो यह है कि अगर सामने वाला हार गया, तो वो आपके साथ काम करना बंद कर देगा या फिर आपके काम में रोड़े अटकाएगा। असली जीत तब है जब आप एक ऐसा रास्ता निकालें जिसमें आप अपनी जीत भी पक्की कर लें और सामने वाले को भी यह महसूस हो कि उसने कुछ पाया है। इसे हम 'विन-विन' सिचुएशन कहते हैं, लेकिन देसी भाषा में कहें तो - सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।

सोचिए, आप अपने मकान मालिक से किराया कम करने की बात कर रहे हैं। आपने उसे बताया कि आप एक जिम्मेदार किरायेदार हैं और घर का ख्याल रखते हैं। अब अंत में आपको यह नहीं कहना चाहिए कि "ठीक है, फिर आप सोच के बताना।" नहीं! आपको प्लेन लैंड करना है। आपको कहना चाहिए, "तो क्या हम अगले ६ महीने के लिए किराया ५ प्रतिशत कम करने और बदले में मैं घर की पेंटिंग खुद करवाने का एग्रीमेंट फाइनल कर सकते हैं?" यहाँ आपने एक साफ ऑफर दिया और गेंद उनके पाले में डाल दी।

नेगोशिएशन के आखिर में हमेशा 'अगले कदम' यानी नेक्स्ट स्टेप्स को स्पष्ट करना बहुत जरूरी है। लोग अक्सर शर्म या डर के मारे आखिरी बात नहीं कह पाते। वो सोचते हैं कि सामने वाला बुरा मान जाएगा। भाई, सामने वाला बुरा माने या भला, आपका घर उसकी दुआओं से नहीं, बल्कि आपके हक के पैसों से चलेगा। अगर आप अंत में यह साफ नहीं कर रहे हैं कि "कौन, क्या और कब" करेगा, तो समझ लीजिए कि आपने अपना कीमती वक्त बर्बाद कर दिया है।

एक आखिरी बात याद रखिए, नेगोशिएशन का मतलब सिर्फ पैसे नहीं होते। यह रिश्तों को बेहतर बनाने का एक तरीका है। जब आप सही सवाल पूछते हैं और एक स्पष्ट नतीजे पर पहुँचते हैं, तो आप लोगों का भरोसा जीतते हैं। लोग उन लोगों के साथ काम करना पसंद करते हैं जो साफ बात करते हैं, न कि उनके साथ जो जलेबी की तरह बातें घुमाते हैं। तो अगली बार जब आप किसी टेबल पर बैठें, तो पायलट की तरह कॉन्फिडेंस रखें। अपनी तैयारी पूरी रखें, सही सवाल पूछें और जब मौका मिले, तो अपनी डील को पूरी शान से लैंड कराएं।


तो दोस्तों, क्या आप अब भी वही पुराने घिसे-पिटे तरीके से बातचीत करेंगे या एलेक्जेंड्रा कार्टर के इन १० सवालों के जादुई पिटारे को खोलेंगे? याद रखिए, दुनिया आपको उतना ही देती है जितना आप मांगने की हिम्मत रखते हैं। आज ही कमेंट्स में बताइए कि ऐसी कौन सी चीज है जिसे मांगने से आप अब तक डर रहे थे? इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो सैलरी की बात आते ही हकलाने लगता है। चलिए, मिलकर अपनी वैल्यू बढ़ाते हैं।

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