The Catalyst (Hindi)



क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो अपनी बात मनवाने के लिए पागलों की तरह दूसरों के पीछे पड़े रहते हैं। यकीन मानिए आपकी ये मेहनत और वो बिना मतलब का ज्ञान सामने वाले को आपसे और दूर भगा रहा है। बधाई हो आप खुद ही अपनी बात रिजेक्ट करवाने के एक्सपर्ट बन चुके हैं।

असल में आप लोगों को कन्विंस नहीं कर रहे बल्कि उन्हें टॉर्चर कर रहे हैं। अगर आप अब भी वही पुराने घिसे पिटे तरीके अपना रहे हैं तो आप जिंदगी के सबसे बड़े मौके खो रहे हैं। चलिए जानते हैं कि जोनाह बर्गर की किताब द कैटलिस्ट हमें वो ३ लेसन कैसे सिखाती है जो आपकी पूरी गेम बदल देंगे।


लेसन १ : रुकावटों को हटाना (Removing Barriers)

हम अक्सर सोचते हैं कि अगर किसी को अपनी बात मनवानी है तो उसे ज्यादा से ज्यादा फायदे बताओ और उसे पुश करो। लेकिन जोनाह बर्गर कहते हैं कि ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक कार को हैंड ब्रेक खींचकर चलाने की कोशिश कर रहे हों। आप जितना ज्यादा एक्सीलरेटर दबाएंगे इंजन उतना ही शोर करेगा पर कार टस से मस नहीं होगी। असली समझदारी एक्सीलरेटर दबाने में नहीं बल्कि उस हैंड ब्रेक को रिलीज करने में है। इसे किताब में 'रुकावटों को हटाना' यानी रिएक्टेंस कम करना कहा गया है।

सोचिए आप अपने किसी दोस्त को जिम जाने के लिए मना रहे हैं। आप उसे दुनिया भर के फायदे गिनाते हैं कि भाई तेरी बॉडी बन जाएगी और तू हीरो लगेगा। लेकिन वो दोस्त जितना आप बोलते हैं उतना ही चिढ़ जाता है। क्यों? क्योंकि इंसान का दिमाग जैसे ही किसी का प्रेशर महसूस करता है वो तुरंत डिफेंसिव मोड में आ जाता है। उसे लगता है कि आप उसकी आजादी छीन रहे हैं। इसे ही रिएक्टेंस कहते हैं। जैसे ही आपने कहा कि तुझे जिम जाना चाहिए उसके दिमाग ने दस बहाने तैयार कर लिए कि उसे जिम क्यों नहीं जाना चाहिए।

यहाँ पर आपको एक 'कैटलिस्ट' बनना है। एक कैटलिस्ट वो होता है जो खुद किसी रिएक्शन में हिस्सा नहीं लेता पर उस काम को आसान बना देता है। आपको उसे धक्का नहीं देना है बल्कि वो वजह ढूंढनी है जो उसे रोक रही है। हो सकता है उसे जिम के कपड़ों में शर्म आती हो या उसे लगता हो कि जिम बहुत दूर है। जब आप उस असली रुकावट को हटा देते हैं तो इंसान खुद ब खुद आपकी बात मान लेता है।

मान लीजिए आपकी बीवी या आपकी मम्मी चाहती हैं कि आप घर की सफाई करें। अगर वो चिल्लाकर कहेंगी कि आज के आज ये कूड़ा साफ करो तो आपका मन करेगा कि आज तो बिल्कुल नहीं करना। लेकिन अगर वो चालाकी से पूछें कि तुम अलमारी साफ करना पसंद करोगे या बालकनी? अब यहाँ आपका दिमाग सफाई के विरोध के बजाय चॉइस पर फोकस करने लगता है। इसे कहते हैं लोगों को खुद रास्ता चुनने देना। जब लोग खुद चुनते हैं तो उन्हें लगता है कि फैसला उनका है और वो उसे खुशी खुशी पूरा करते हैं। तो याद रखिए अगली बार जब कोई आपकी बात न माने तो और जोर से मत चिल्लाइए बल्कि ये देखिए कि कौन सा पत्थर रास्ता रोककर खड़ा है।


लेसन २ : कम्युनिकेशन में चॉइस देना (Providing Choice)

अब आते हैं दूसरे सबसे जरूरी लेसन पर जिसे जोनाह बर्गर 'कन्फर्मेशन बायस और डिस्टेंस' का नाम देते हैं। सरल भाषा में कहें तो लोगों की अपनी एक 'कंफर्ट जोन' वाली सोच होती है। अगर आप उन्हें कोई ऐसी बात बताते हैं जो उनकी पुरानी मान्यताओं से बहुत ज्यादा अलग है तो उनका दिमाग उसे तुरंत कचरे के डिब्बे में डाल देता है। इसे 'जोन ऑफ रिजेक्शन' कहते हैं। आप चाहे जितनी भी लॉजिक दे दें अगर आपकी बात उनकी सोच की सीमा से कोसों दूर है तो वो आपकी बात कभी नहीं मानेंगे।

मान लीजिए आपका एक छोटा भाई है जो दिन भर वीडियो गेम खेलता है और पढ़ाई को टाइम पास समझता है। अब अगर आप एक दिन उसके कमरे में जाकर भाषण देने लगें कि भाई गेम खेलना छोड़ दे और दिन में १२ घंटे पढ़ना शुरू कर दे तो क्या वो आपकी बात सुनेगा। बिल्कुल नहीं। वो उल्टा आपसे बहस करेगा क्योंकि आपकी मांग उसकी मौजूदा लाइफस्टाइल से बहुत ज्यादा दूर है। यहाँ गलती उसकी नहीं आपकी है क्योंकि आपने उसे एक ही बार में माउंट एवरेस्ट चढ़ने को कह दिया।

एक स्मार्ट कैटलिस्ट क्या करेगा। वो दूरी को कम करेगा। वो उसे ये नहीं कहेगा कि गेम छोड़ दो बल्कि वो कहेगा कि भाई सिर्फ ३० मिनट के लिए एक चैप्टर पढ़ ले फिर तू आराम से गेम खेलना। ३० मिनट पढ़ना उसकी सोच के दायरे के अंदर आता है। इसे कहते हैं 'इंक्रीमेंटल चेंज'। जब वो ३० मिनट पढ़ना शुरू कर देगा तब धीरे धीरे आप उस समय को बढ़ा सकते हैं। बड़ी लड़ाइयां एक दिन में नहीं बल्कि छोटे छोटे मोर्चों को जीतकर जीती जाती हैं।

यही नियम ऑफिस में भी काम आता है। अगर आप अपने बॉस के पास जाकर कहें कि सर पूरी कंपनी का सिस्टम बदल देते हैं तो वो आपको पागल समझेंगे। लेकिन अगर आप कहें कि सर हम सिर्फ इस एक छोटे से प्रोजेक्ट में ये नया तरीका आजमा सकते हैं तो चांस है कि वो मान जाएं। लोग बड़े बदलाव से डरते हैं पर छोटे बदलाव उन्हें सुरक्षित महसूस कराते हैं।

आपको यह समझना होगा कि हर इंसान के दिमाग में एक रबर बैंड होता है। अगर आप उसे बहुत जोर से खींचेंगे तो वो टूट जाएगा। लेकिन अगर आप उसे धीरे धीरे स्ट्रेच करेंगे तो वो अपनी जगह बना लेगा। तो अगली बार किसी की सोच बदलने से पहले ये चेक कर लें कि आपकी बात उसकी सोच से कितनी दूर है। अगर फासला ज्यादा है तो छोटे कदम उठाएं क्योंकि कछुए की चाल अक्सर खरगोश के अहंकार को हरा देती है।


लेसन ३ : दूरी कम करना (Reducing Distance)

तीसरा और आखिरी लेसन है सबसे बड़ा खेल जिसे 'अनसर्टेन्टी' यानी अनिश्चितता कम करना कहते हैं। लोग नया रास्ता चुनने से इसलिए नहीं डरते कि उन्हें पुराने रास्ते से प्यार है, बल्कि इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें नए रास्ते पर गड्ढों का डर होता है। जब भी आप किसी को कुछ नया करने के लिए कहते हैं, उनके दिमाग में एक ही सवाल आता है— "अगर ये काम नहीं किया तो क्या होगा?"। यही डर उन्हें पुरानी और बोरिंग जिंदगी में जकड़े रखता है।

मान लीजिए आपको एक बहुत ही महंगा और नया गैजेट खरीदना है। आपका मन तो बहुत है, पर आपके पापा कभी राजी नहीं होंगे। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि इतने पैसे डूब गए और ये मशीन दो दिन में खराब हो गई तो क्या होगा। यहाँ उनकी समस्या पैसे नहीं बल्कि वो डर है जो उन्हें फैसला लेने से रोक रहा है। अब एक सेल्समैन की तरह चिल्लाने से काम नहीं चलेगा। यहाँ आपको 'ट्रायल' की ताकत का इस्तेमाल करना होगा।

किताब कहती है कि अगर आप किसी को कोई चीज चखने का मौका दे दें, तो आधा काम तो वहीं खत्म हो जाता है। बड़ी-बड़ी कंपनियां इसी वजह से आपको 'फ्री ट्रायल' या '७ दिन की मनी बैक गारंटी' देती हैं। उन्हें पता है कि एक बार आपने वो सर्विस इस्तेमाल कर ली, तो आपका डर खत्म हो जाएगा। आपको भी अपनी जिंदगी में यही करना है। अगर आप अपने किसी दोस्त को कोई नया बिजनेस आईडिया समझा रहे हैं, तो उसे ये मत कहिए कि अपनी नौकरी छोड़कर इसमें कूद जा। उसे कहिए कि भाई बस इस हफ्ते के दो घंटे दे और देख कि ये कैसे काम करता है। जब रिस्क कम हो जाता है, तो इंसान का कॉन्फिडेंस अपने आप बढ़ जाता है।

एक और बात, लोग हमेशा भीड़ के साथ चलना पसंद करते हैं जिसे 'कोरोबोरेटिंग एविडेंस' कहा जाता है। अगर आप किसी को अकेले कुएं में कूदने को कहेंगे तो वो मना कर देगा, पर अगर वो देखेगा कि चार और लोग पहले से वहां तैर रहे हैं, तो वो खुद ही छलांग लगा देगा। तो किसी को मनाने के लिए उसे ये मत बताइए कि ये उसके लिए क्यों अच्छा है, बल्कि उसे ये दिखाइए कि उसके जैसे और कितने लोग ये पहले ही कर चुके हैं और खुश हैं।

तो दोस्तों, कैटलिस्ट बनना कोई जादू नहीं है। ये बस सामने वाले के मन की खिड़की खोलना है ताकि वो बाहर की ताजी हवा देख सके। लोगों को धक्का मारना बंद कीजिए और उनके रास्ते के पत्थर हटाना शुरू कीजिए। जब रास्ता साफ होगा, तो वो खुद अपनी मंजिल की तरफ दौड़ेंगे। आज ही ये तरीके आजमाएं और देखें कि कैसे आपकी बातें पत्थर की लकीर बन जाती हैं।


अगर आपको आज का ये आर्टिकल पसंद आया और आप भी एक 'कैटलिस्ट' बनकर लोगों का दिल जीतना चाहते हैं, तो इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो हमेशा बहस में हार जाते हैं। नीचे कमेंट में बताएं कि इन ३ लेसन में से आपको सबसे ज्यादा कौन सा पसंद आया? याद रखिए, बदलाव की शुरुआत हमेशा एक छोटे से कदम से होती है। चलिए, आज से ही एक कैटलिस्ट बनें।

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