क्या आप अभी भी अपनी टीम को सुबह नौ से शाम पांच बजे तक ऑफिस की कुर्सी से बांधकर रखना चाहते हैं। बधाई हो, आप अपनी कंपनी को डूबते हुए देखने का सबसे बेस्ट प्लान बना रहे हैं। जब पूरी दुनिया बदल चुकी है, तब भी पुराने घिसे-पिटे नियमों से चिपकना केवल आपके ईगो को संतुष्ट कर सकता है, आपकी कंपनी के बैंक बैलेंस को नहीं।
इस नए दौर में अगर आपने फ्लेक्सिबल टीम्स को लीड करने का सही तरीका नहीं सीखा, तो आप अपने सबसे बेहतरीन एम्प्लॉइज को हमेशा के लिए खो देंगे। चलिए आज इस शानदार किताब से तीन बड़े लेसन सीखते हैं जो आपके काम करने के तरीके को हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : फ्लेक्सिबिलिटी और भरोसा बढ़ाते हैं प्रोडक्टिविटी
ऑफिस की उस घूमती कुर्सी से आपका प्यार बहुत पुराना है। सुबह नौ बजे बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाना मानो आपके जीवन का सबसे बड़ा मकसद बन चुका है। आप सोचते हैं कि जब तक आपकी टीम आपकी आंखों के सामने बैठकर कंप्यूटर पर कीबोर्ड नहीं पीटेगी, तब तक कंपनी का काम कैसे होगा। लेकिन सच तो यह है कि आप अपनी टीम का आउटपुट नहीं बढ़ा रहे हैं, बल्कि उनका दम घोंट रहे हैं।
इस शानदार किताब का पहला लेसन हमें यही सिखाता है कि केवल ऑफिस की चारदीवारी में बैठकर काम करने से कभी प्रोडक्टिविटी नहीं आती। असली ताकत तो फ्लेक्सिबिलिटी और भरोसे में है। जब आप अपनी टीम को यह आजादी देते हैं कि वे कब और कहाँ से अपना बेस्ट काम कर सकते हैं, तब उनका आउटपुट दोगुना हो जाता है।
मान लीजिए आपकी टीम में एक बहुत ही टैलेंटेड ग्राफिक डिजाइनर है। उसका नाम राहुल है। राहुल का दिमाग रात के ग्यारह बजे सबसे तेज चलता है। नए नए क्रिएटिव आइडियाज उसके दिमाग में तब आते हैं जब पूरी दुनिया सो रही होती है। लेकिन आपके कड़े नियमों के मुताबिक राहुल को सुबह ठीक नौ बजे ऑफिस की सीट पर बैठना ही होगा। अब सुबह नौ बजे राहुल ऑफिस तो आ जाता है, लेकिन उसका दिमाग आधे रास्ते में ही छूटा होता है। वह नींद से भरी आंखों के साथ बस स्क्रीन को देखता रहता है और चाय के कप गिनता है। आप सोचते हैं कि राहुल पूरे आठ घंटे ऑफिस में था, इसलिए उसने बहुत बड़ा काम किया। लेकिन शाम को जो डिजाइन बनकर सामने आता है, उसे देखकर आप अपना सिर पकड़ लेते हैं।
यही सबसे बड़ी गड़बड़ है। आप समय को नाप रहे हैं, काम को नहीं। इस किताब के लेखक कहते हैं कि फ्यूचर ऑफ वर्क में आपको माइक्रोमैनेजमेंट की आदत को कचरे के डिब्बे में डालना होगा। आपको अपनी टीम के हर मेंबर को एक रोबोट समझना बंद करना होगा। जब आप लोगों को बांधकर रखते हैं, तो वे केवल उतना ही काम करते हैं जिससे उनकी नौकरी बची रहे। वे कभी अपना बेस्ट देने की कोशिश नहीं करते।
फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपनी टीम को पूरी छूट दे दें और वे काम ही न करें। इसका सीधा मतलब है रिजल्ट पर फोकस करना। अगर राहुल रात को जागकर दो घंटे में एक बेहतरीन डिजाइन तैयार कर देता है जो आपकी कंपनी को लाखों का फायदा करा सकता है, तो इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि उसने सुबह नौ बजे लॉगिन किया या नहीं। जब आप अपनी टीम पर भरोसा करते हैं, तो वे उस भरोसे को टूटने नहीं देना चाहते। वे अपनी जिम्मेदारी खुद समझने लगते हैं। आपको उनके पीछे डंडा लेकर पड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। ऑफिस की हाजिरी से ज्यादा जरूरी काम की क्वालिटी है।
लेसन २ : हाइब्रिड मॉडल की सफलता का आधार है खुला कम्युनिकेशन
जब आप राहुल जैसे टैलेंटेड लोगों को काम की आजादी दे देते हैं, तो असली चुनौती शुरू होती है। आप सोचते हैं कि अब सब अपनी मर्जी के मालिक हो गए, तो कोई किसी की सुनेगा ही नहीं। आपके अंदर का वह पुराना बॉस फिर से जागने लगता है। आप सोचते हैं कि जब सब अलग अलग जगह बैठे हैं, तो उन पर नजर रखने के लिए पचास नए नियम बना दिए जाएं। हर आधे घंटे में उनसे रिपोर्ट मांगी जाए। हर छोटी बात पर एक लंबी मीटिंग रख दी जाए। लेकिन यहीं पर आप एक और बहुत बड़ी भूल कर रहे होते हैं।
इस किताब का दूसरा लेसन हमें यही सिखाता है कि हाइब्रिड मॉडल को सफल बनाने के लिए कड़े नियमों की नहीं बल्कि टीम के बीच साफ़ और खुले कम्युनिकेशन की जरूरत होती है। जब टीम दूर बैठकर काम करती है, तो आपको उनके ऊपर पाबंदियों की दीवारें नहीं खड़ी करनी हैं। आपको उनके बीच बातचीत का एक मजबूत पुल बनाना है।
मान लीजिए आपकी कंपनी की एक बहुत ही सीनियर मैनेजर हैं। उनका नाम प्रीति है। प्रीति को अपनी टीम से एक बहुत इम्पोर्टेंट प्रोजेक्ट की अपडेट चाहिए। अब पुराने ढर्रे के मुताबिक प्रीति क्या करेंगी। वह अचानक दोपहर को दो बजे एक मीटिंग बुला लेंगी। उस मीटिंग में टीम के दस लोग अपना चालू काम छोड़कर आ जाएंगे। पूरे दो घंटे तक मीटिंग चलेगी। चाय पी जाएगी। इधर उधर की बातें होंगी। अंत में पता चलेगा कि जो बात सिर्फ दो मिनट के एक मैसेज में तय हो सकती थी, उसके लिए पूरी टीम के दो कीमती घंटे बर्बाद हो गए। मीटिंग खत्म होते ही टीम के लोग अपना सिर पकड़ लेते हैं। वे सोचते हैं कि काम करें या सिर्फ मीटिंग में बैठें।
यह तरीका आपकी फ्लेक्सिबल टीम को पूरी तरह बर्बाद कर देगा। इस किताब के लेखक कहते हैं कि हाइब्रिड वर्क में आपको अपनी बातचीत का तरीका बदलना होगा। आपको समझना होगा कि हर बात के लिए वीडियो कॉल या मीटिंग जरूरी नहीं होती। इसे डिजिटल दुनिया में एसिंक्रोनस कम्युनिकेशन कहते हैं। इसका मतलब है कि आप अपनी बात को एक साफ़ मैसेज या ईमेल में लिखकर भेज दीजिए। सामने वाले को जब समय मिलेगा, वह उसे पढ़ेगा और अपना बेस्ट इनपुट आपको दे देगा।
जब आप हर छोटी बात पर मीटिंग बुलाना बंद करते हैं, तो आप अपनी टीम को बिना किसी डिस्टरबेंस के लगातार काम करने का समय देते हैं। प्रीति को बस इतना करना है कि वह एक ऑनलाइन बोर्ड पर प्रोजेक्ट के टास्क लिख दें। टीम का कौन सा मेंबर क्या काम कर रहा है, वह सब वहां साफ़ दिखाई देगा। राहुल अपना डिजाइन बनाकर वहां अपलोड कर देगा। प्रीति उसे देखकर अपना फीडबैक वहीं लिख देंगी। कोई शोर नहीं, कोई लंबा भाषण नहीं और न ही समय की कोई बर्बादी।
कम्युनिकेशन का मतलब सिर्फ काम की बातें करना भी नहीं है। जब लोग ऑफिस नहीं आते, तो वे एक दूसरे से दूर होने लगते हैं। उनके बीच वह चाय के ब्रेक वाली दोस्ती खत्म होने लगती है। इसलिए एक चतुर लीडर को ऑनलाइन माध्यमों का इस्तेमाल करके टीम के बीच एक अनौपचारिक रिश्ता भी बनाना चाहिए। हफ्ते में एक बार सिर्फ हंसी मजाक के लिए एक छोटा सा सेशन रखा जा सकता है जहां काम की कोई बात न हो। जब टीम के लोग आपस में खुलकर बात कर पाते हैं, तभी वे एक दूसरे की दिक्कतों को समझते हैं। नियमों की कड़वाहट से नहीं, बल्कि साफ़ और खुले कम्युनिकेशन के भरोसे से ही रिमोट टीमें बड़े बड़े टारगेट आसानी से हासिल कर लेती हैं।
लेसन ३ : अच्छा नेतृत्व काम के साथ टीम की भलाई पर भी ध्यान देता है
जब प्रीति और राहुल की तरह आपकी पूरी टीम ऑनलाइन बोर्ड पर एक दूसरे से जुड़ जाती है, तो बातचीत की समस्या तो खत्म हो जाती है। काम भी समय पर होने लगता है। लेकिन तभी आपके सामने एक नया और बहुत बड़ा संकट आकर खड़ा हो जाता है। आप देखते हैं कि लोग काम तो कर रहे हैं, लेकिन उनके चेहरों से मुस्कान गायब हो चुकी है। वे थक चुके हैं। वे दिन रात बस स्क्रीन को घूरते रहते हैं। ऑफिस न आने की वजह से अब उनके घर और काम के बीच की दूरी खत्म हो चुकी है। वे सुबह उठकर भी काम कर रहे हैं और रात को सोते समय भी ईमेल चेक कर रहे हैं।
इस शानदार किताब का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण लेसन हमें यही सिखाता है। एक अच्छे लीडर को केवल काम के आउटपुट पर नहीं, बल्कि अपनी टीम के हर मेंबर के मानसिक स्वास्थ्य और उनके आपसी जुड़ाव पर ध्यान देना चाहिए। जब तक आपकी टीम अंदर से खुश और स्वस्थ नहीं होगी, तब तक वे लंबे समय तक आपकी कंपनी को आगे नहीं ले जा सकते।
एक बहुत ही दिलचस्प उदाहरण देखिए। मान लीजिए आपकी कंपनी के एक और एम्प्लॉई हैं। उनका नाम अमित है। अमित अपनी फील्ड के पक्के खिलाड़ी हैं। वह हमेशा अपना काम समय से पहले पूरा करते हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से अमित का व्यवहार थोड़ा बदला हुआ है। वह कॉल्स पर चिड़चिड़े रहने लगे हैं। काम में छोटी छोटी गलतियां करने लगे हैं। अब एक पुराना और पारंपरिक बॉस क्या करेगा। वह अमित को अपने केबिन में बुलाएगा या फोन पर डांटेगा। वह कहेगा कि अमित तुम्हारी परफॉर्मेंस खराब हो रही है, इसे ठीक करो वरना नौकरी से हाथ धो बैठोगे। लेकिन यह तरीका अमित को पूरी तरह तोड़ देगा। वह अपनी नौकरी से नफरत करने लगेगा।
यहीं पर आपको एक मॉडर्न और समझदार लीडर की भूमिका निभानी होगी। इस किताब के लेखक कहते हैं कि फ्यूचर ऑफ वर्क में आपको अपनी टीम के प्रति सहानुभूति रखनी होगी। जब अमित जैसे लोग दूर बैठकर अकेले काम करते हैं, तो वे बर्नआउट का शिकार हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि वे सिर्फ एक मशीन हैं जिससे केवल काम लिया जा रहा है।
एक अच्छे लीडर के रूप में आपको अमित से काम की बात करने से पहले उनका हालचाल पूछना चाहिए। आपको यह समझना होगा कि फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब यह नहीं है कि आपकी टीम चौबीस घंटे काम के लिए उपलब्ध रहे। आपको कंपनी में एक ऐसा कल्चर बनाना होगा जहाँ काम खत्म होने के बाद लैपटॉप बंद करने की पूरी आजादी हो। जब अमित को यह महसूस होगा कि उसका बॉस केवल उसके काम की नहीं बल्कि उसकी भी परवाह करता है, तो उसका अपनी कंपनी के प्रति लगाव दस गुना बढ़ जाएगा। वह दुगनी ताकत और खुशी के साथ काम पर लौटेगा।
फ्यूचर ऑफ वर्क कोई ऐसी चीज नहीं है जो आने वाले दस सालों में आएगी। वह आज और अभी शुरू हो चुकी है। अगर आप अभी भी अपनी पुरानी सोच और कड़े नियमों से बंधे रहेंगे, तो आप रेस में बहुत पीछे छूट जाएंगे। राहुल, प्रीति और अमित जैसे बेहतरीन लोग आपकी कंपनी की सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्हें ऑफिस की दीवारों में कैद मत करिए। उन्हें भरोसा दीजिए, उनके साथ साफ़ कम्युनिकेशन रखिए और उनके मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखिए।
आज ही एक लीडर के रूप में अपने काम करने के तरीके को बदलिए। अपनी टीम को वह आजादी दीजिए जिसके वे हकदार हैं। फिर देखिए कि वे आपकी कंपनी को किस ऊंचाई पर लेकर जाते हैं।
आपको इस किताब का कौन सा लेसन सबसे ज्यादा पसंद आया। क्या आप भी अपनी कंपनी में फ्लेक्सिबिलिटी चाहते हैं। नीचे कमेंट सेक्शन में अपने विचार हमारे साथ जरूर शेयर करें और इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों और बॉस के साथ शेयर करें जिन्हें अपनी सोच बदलने की सबसे ज्यादा जरूरत है।
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