Running Lean (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ऑफिस की डेस्क पर बैठकर पांच साल पुराना पुराना बिजनेस आइडिया चमका रहे हैं और सोचते हैं कि एक दिन आप सीधे एलन मस्क को टक्कर देंगे? जाग जाइए दोस्त क्योंकि बिना मार्केट टेस्ट किए हवा में महल बनाना सिर्फ आपको बैंक का कर्ज और भारी डिप्रेशन दे सकता है।

बिजनेस का प्लान ए हमेशा फेल होता है। इसीलिए आज हम ऐश मौर्या की किताब रनिंग लीन से सीखेंगे कि कैसे अपने फ्लॉप आइडिया को एक सफल बिजनेस में बदला जाता है। आइए जानते हैं वे तीन बड़े लेसन जो आपको कंगाली से बचाएंगे।


लेसन १ : अपने आइडिया से प्यार मत करो, कस्टमर की प्रॉब्लम से प्यार करो

मान लीजिए आपको खाना बनाना बिलकुल नहीं आता। लेकिन एक सुबह अचानक आपकी अंतरात्मा जागती है। आप सोचते हैं कि आप दुनिया का सबसे बेहतरीन करेले का हलवा बनाएंगे। आप अपनी पूरी जमापूंजी लगा देते हैं। एक आलीशान दुकान किराए पर लेते हैं। लाखों रुपए के बर्तन खरीदते हैं। दुकान के बाहर बड़ा सा बोर्ड लगाते हैं। करेले का शानदार हलवा। अब आप दुकान खोलकर बैठ जाते हैं। पूरा दिन निकल जाता है। पूरा हफ्ता निकल जाता है। लेकिन एक भी कस्टमर आपकी दुकान पर नहीं आता। आप परेशान हो जाते हैं। आप लोगों को दोष देने लगते हैं। आप सोचते हैं कि लोग ही गधे हैं जो इस महान रेसिपी को समझ नहीं पा रहे।

यही सबसे बड़ी गलती है जो ९०% नए स्टार्टअप वाले करते हैं। वे अपने आइडिया से इतना प्यार कर बैठते हैं कि मार्केट की हकीकत देखना ही भूल जाते हैं। ऐश मौर्या अपनी किताब रनिंग लीन में बहुत साफ शब्दों में कहते हैं कि कस्टमर को आपके आइडिया में कोई दिलचस्पी नहीं है। कस्टमर को सिर्फ अपने काम से काम है। उसे सिर्फ अपनी प्रॉब्लम से मतलब है। अगर आपका प्रोडक्ट उसकी किसी बड़ी प्रॉब्लम को हल नहीं कर रहा है, तो आपका आइडिया चाहे कितना भी अनोखा हो, वह कचरे के डिब्बे में ही जाएगा।

जरा सोचिए। आप रात-दिन जागकर एक ऐसा मोबाइल ऐप बनाते हैं जो लोगों को यह बताएगा कि उनकी बिल्ली दिन में कितनी बार म्याऊं करती है। आपको लगता है कि यह एक क्रांतिकारी आइडिया है। आप इसके फीचर्स चमकाने में महीनों लगा देते हैं। आप कोडिंग करते हैं। आप डिजाइनिंग करते हैं। लेकिन जब ऐप मार्केट में आता है, तो पता चलता है कि बिल्ली पालने वालों को इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। वे तो बस इस बात से परेशान हैं कि बिल्ली उनके महंगे सोफे को कैसे न नोचे। आपने बिल्ली की म्याऊं पर फोकस किया, जो कोई प्रॉब्लम थी ही नहीं। आपने सोफे वाली असली प्रॉब्लम को छोड़ दिया।

बिजनेस शुरू करने का मतलब यह नहीं है कि आप बंद कमरे में बैठकर अपनी पसंद का प्रोडक्ट बनाएं। बिजनेस का असली मतलब है मार्केट में जाना। लोगों की तकलीफों को देखना। उनकी रोजमर्रा की दिक्कतों को समझना। जब आप किसी की असली प्रॉब्लम ढूंढ लेते हैं, तो आधा काम वहीं खत्म हो जाता है। फिर आपको अपना प्रोडक्ट बेचने के लिए चिल्लाना नहीं पड़ता। लोग खुद आपके पास आते हैं। क्योंकि आपने उनकी दुखती रग पर हाथ रखा है।

इसलिए अपनी जिद छोड़िए। अपने दिमाग के बनाए जाल से बाहर निकलिए। अपने आइडिया को भगवान मानना बंद कीजिए। सबसे पहले मार्केट में जाकर असली लोगों से बात कीजिए। जानिए कि उनकी असली समस्या क्या है। जब आप कस्टमर की प्रॉब्लम से प्यार करने लगेंगे, तो आपका प्रोडक्ट अपने आप बिकने लगेगा। अगर आप अब भी अपनी ही धुन में मगन रहेंगे, तो याद रखिए कि मार्केट बहुत बेरहम है। वह आपके सारे अरमानों पर पानी फेरने में एक सेकंड भी नहीं लगाएगा।


लेसन २ : प्लान ए को टेस्ट करो, परफेक्ट मत बनाओ

पिछले लेसन में हमने देखा कि बिल्ली की म्याऊं नापने वाला ऐप बनाना कितनी बड़ी बेवकूफी थी। लेकिन मान लीजिए कि आपको होश आ गया। आपको समझ आ गया कि कस्टमर की असली प्रॉब्लम सोफा फटने से बचाना है। अब आप जोश में आ जाते हैं। आप सोचते हैं कि अब तो मैं दुनिया का सबसे शानदार सोफा प्रोटेक्टर बनाऊंगा। आप एक नया बंद कमरा ढूंढते हैं। आप पूरे छह महीने तक बाहर नहीं निकलते। आप दिन-रात एक कर देते हैं। आप सोचते हैं कि जब तक मेरा प्रोडक्ट एकदम परफेक्ट नहीं हो जाता, तब तक मैं इसे किसी को नहीं दिखाऊंगा। आप उसमें सोने की चेन लगाते हैं। आप उसमें हीरा जड़ते हैं। आप उसमें वाईफाई भी लगा देते हैं। आप सोचते हैं कि जब यह मार्केट में जाएगा, तो लोग तालियां बजाएंगे।

यही है दूसरी सबसे बड़ी गलती जो नए लोग करते हैं। वे अपने प्लान ए को परफेक्ट बनाने में अपनी पूरी जिंदगी और पैसा बर्बाद कर देते हैं। ऐश मौर्या अपनी किताब रनिंग लीन में कहते हैं कि कागजों पर बना आपका हर प्लान सिर्फ एक अनुमान है। वह कोई सच नहीं है। जब तक आपका प्रोडक्ट असली मार्केट में जाकर असली कस्टमर के हाथों में नहीं पहुंचता, तब तक आपका पूरा प्लान सिर्फ एक थ्योरी है। असलियत यह है कि आपका प्लान ए कभी भी परफेक्ट नहीं हो सकता। वह पहली बार में फेल होने के लिए ही बना है। इसलिए उसे कमरे में बैठकर चमकाने के बजाय बाहर निकालो और टेस्ट करो।

सोचिए कि आप एक बहुत बड़ा रेस्टोरेंट खोलना चाहते हैं। आप पांच करोड़ का लोन लेते हैं। आप इटली से शेफ बुलाते हैं। आप फ्रांस से फर्नीचर मंगवाते हैं। आप पूरे दो साल लगाकर रेस्टोरेंट तैयार करते हैं। ओपनिंग के दिन आप बहुत सज-धज कर खड़े होते हैं। लेकिन तभी आपको पता चलता है कि उस इलाके के लोगों को इटैलियन खाना पसंद ही नहीं है। वे तो सिर्फ कड़क चाय और समोसा खाना चाहते हैं। अब आपके वो दो साल और पांच करोड़ रुपए पानी में डूब गए। क्या यह समझदारी थी? बिलकुल नहीं।

समझदारी यह होती कि आप पहले ही दिन पांच करोड़ का रेस्टोरेंट न बनाते। आप पहले एक छोटा सा स्टॉल लगाते। आप खुद अपने हाथों से चार तरह के पास्ता बनाते। आप गली के मोड़ पर खड़े होकर लोगों को चखाते। आप उनसे पूछते कि भाई साहब नमक कम है या मिर्च ज्यादा है? क्या आपको यह स्वाद पसंद आ रहा है? क्या आप इसके लिए पैसे देंगे? जब पचास लोग आपके पास्ता की तारीफ करते और उसके लिए एडवांस पैसे देने को तैयार होते, तब आप बड़ा रेस्टोरेंट खोलने की सोचते।

इसे ही कहते हैं टेस्टिंग। अपने प्लान को कभी भी फाइनल मत मानो। बिजनेस कोई स्कूल का एग्जाम नहीं है जहाँ आपको पहली बार में ही सौ में से सौ नंबर लाने हैं। बिजनेस एक खेल है जहाँ आपको बार-बार गिरना है, अपनी गलती से सीखना है और फिर से उठना है। जितना जल्दी आप अपने प्रोडक्ट को मार्केट में ले जाएंगे, उतनी ही जल्दी आपको अपनी कमियां पता चलेंगी। कमियां पता चलेंगी, तो आप उन्हें ठीक कर पाएंगे। अगर आप कमरे में बैठकर उसे परफेक्ट बनाने की जिद पर अड़े रहेंगे, तो याद रखिए कि जब आप बाहर निकलेंगे, तब तक मार्केट बदल चुका होगा। इसलिए परफेक्ट बनने का भूत अपने सिर से उतारिए और आज ही अपने छोटे से आइडिया को असली लोगों के बीच ले जाकर टेस्ट कीजिए।


लेसन ३ : एमवीपी यानी मिनिमम वायबल प्रोडक्ट से शुरुआत करो

पिछले लेसन में हमने देखा कि पांच करोड़ का रेस्टोरेंट खोलने से बेहतर है कि पहले गली के मोड़ पर एक छोटा सा स्टॉल लगाकर पास्ता टेस्ट किया जाए। बिजनेस की दुनिया में इसी छोटे स्टॉल को एमवीपी यानी मिनिमम वायबल प्रोडक्ट कहते हैं। लेकिन हमारे आस-पास के कुछ नए नवेले बिजनेसमैन इस बात को नहीं समझते। वे सोचते हैं कि जब तक उनके प्रोडक्ट में दुनिया के सारे फीचर्स नहीं आ जाते, तब तक वे मार्केट में कदम नहीं रखेंगे। वे सोचते हैं कि उनकी कार में उड़ने वाले पंख भी होने चाहिए, पानी में तैरने वाला टायर भी होना चाहिए और खाना बनाने वाला रोबोट भी होना चाहिए। इसी चक्कर में उनका पूरा पैसा खत्म हो जाता है और असल में वह कार कभी सड़क पर आ ही नहीं पाती।

यह हमारे बिजनेस की तीसरी सबसे बड़ी गलती है। ऐश मौर्या अपनी किताब रनिंग लीन में समझाते हैं कि शुरुआत हमेशा सबसे छोटे रूप से करनी चाहिए। एमवीपी का मतलब है कि आपके प्रोडक्ट में सिर्फ उतने ही फीचर्स होने चाहिए जो कस्टमर की उस एक मुख्य प्रॉब्लम को हल कर सकें जिसके बारे में हमने लेसन १ में बात की थी। आपको पूरी दुनिया को एक साथ खुश नहीं करना है। आपको बस उन शुरुआती कुछ लोगों को खुश करना है जो आपकी वजह से अपनी बड़ी मुसीबत से छुटकारा पाना चाहते हैं। जब वे लोग आपके छोटे से प्रोडक्ट को इस्तेमाल करेंगे, तो वे खुद आपको बताएंगे कि आगे इसमें क्या जोड़ना है और क्या हटाना है।

मान लीजिए आप एक ऑनलाइन कपड़े बेचने वाली वेबसाइट शुरू करना चाहते हैं। अब एक तरीका तो यह है कि आप लाखों रुपए खर्च करके एक बहुत बड़ा ऐप बनवाएं। उसमें दुनिया भर के डिजाइनर्स को जोड़ें। एक बहुत बड़ा गोदाम किराए पर लें और हजारों कपड़े खरीद कर रख लें। दूसरा और समझदारी वाला तरीका यह है कि आप सिर्फ एक साधारण सा पेज बनाएं। उस पर केवल तीन सबसे बेहतरीन टी-शर्ट की फोटो डालें। अपने दोस्तों और आस-पास के लोगों को वह लिंक भेजें। अगर लोग उन तीन टी-शर्ट को खरीदने में दिलचस्पी दिखाते हैं और आपको एडवांस पैसे देते हैं, तब जाकर आप आगे का बड़ा काम शुरू करें।

दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां इसी रास्ते पर चलकर अरबों डॉलर की बनी हैं। जब फेसबुक शुरू हुआ था, तो उसमें आज की तरह रील्स, वीडियो या मार्केटप्लेस नहीं था। वह सिर्फ एक साधारण वेबसाइट थी जहाँ कॉलेज के छात्र एक-दूसरे की प्रोफाइल देख सकते थे। जब लोगों को वह पसंद आया, तब उसमें धीरे-धीरे नए फीचर्स जोड़े गए। अगर मार्क जुकरबर्ग पहले ही दिन आज वाला फेसबुक बनाने बैठते, तो शायद वे कभी सफल नहीं हो पाते। वे कोडिंग के जाल में ही फंसे रह जाते।

इसलिए बड़े-बड़े सपने देखना अच्छी बात है, लेकिन कदम हमेशा छोटे ही उठाने चाहिए। अपने आइडिया को सीधा आसमान में उड़ाने की जिद छोड़िए। उसे पहले जमीन पर रेंगना सिखाइए। कम से कम खर्च में, कम से कम फीचर्स के साथ अपने प्रोडक्ट का पहला वर्जन तैयार कीजिए और उसे आज ही मार्केट में उतार दीजिए। याद रखिए, एक खराब लेकिन लाइव प्रोडक्ट उस परफेक्ट प्रोडक्ट से हजार गुना बेहतर है जो सिर्फ आपके दिमाग के बंद कमरे में बंद है। मार्केट आपका इंतजार कर रहा है, देर मत कीजिए।


तो दोस्तों, आज हमने ऐश मौर्या की किताब रनिंग लीन से सीखा कि बिजनेस को हवा में नहीं, बल्कि हकीकत की जमीन पर कैसे खड़ा किया जाता है। अपने आइडिया को भगवान मानना बंद कीजिए। कमरे से बाहर निकलिए और असली कस्टमर की असली प्रॉब्लम ढूंढिए। प्लान ए को परफेक्ट बनाने की जिद छोड़िए और उसे आज ही छोटे स्तर पर टेस्ट कीजिए। बड़े-बड़े फीचर्स के जाल में फंसने के बजाय एक छोटे एमवीपी से शुरुआत कीजिए।

अब आपकी बारी है। नीचे कमेंट सेक्शन में मुझे अभी बताइए कि आपके दिमाग में ऐसा कौन सा बिजनेस आइडिया है जिसे आप बिना ज्यादा पैसा खर्च किए, एक छोटे से टेस्ट के साथ आज ही शुरू कर सकते हैं? इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ जरूर शेयर कीजिए जो पिछले तीन साल से सिर्फ कागजों पर ही अपना स्टार्टअप चला रहा है। उठिए, टेस्ट कीजिए और आगे बढ़िए।

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