Think Again (Hindi)


क्या आप आज भी उसी पुरानी सोच के साथ जी रहे हैं जो आपने सालों पहले अपनाई थी। बधाई हो, आप अनजाने में अपने करियर और लाइफ को खुद अपने हाथों से बर्बाद कर रहे हैं। जब पूरी दुनिया बदल रही है, तब आपका दिमाग पुरानी फाइलों को लेकर बैठा है। यह ओवरकॉन्फिडेंस आपको बहुत भारी पड़ने वाला है।

अगर आप अपनी लाइफ में सचमुच कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो आपको इस जाल से बाहर निकलना ही होगा। चलिए एडम ग्रांट की इस बेहतरीन किताब से उन तीन शक्तिशाली लेसन को समझते हैं जो आपकी सोच को पूरी तरह बदल देंगे।


लेसन १ : रीलर्निंग की ताकत

क्या आप जानते हैं कि आज के समय में सबसे बड़ा खतरा क्या है। वह खतरा कोई वायरस नहीं है बल्कि आपकी वह पुरानी सोच है जिसे आप अपनी तिजोरी में संभालकर बैठे हैं। स्कूल और कॉलेज में जो डिग्री आपको मिली थी वह केवल एक कागज का टुकड़ा है अगर आप आज नया सीखने को तैयार नहीं हैं। हमारे देश में एक बहुत बड़ी बीमारी है जिसे लोग गर्व से कहते हैं कि मुझे सब पता है। बस यही सोच आपको आगे बढ़ने से रोक देती है।

मान लीजिए कि आपके पास एक पुराना स्मार्टफोन है। आप उसमें आज के नए और भारी ऐप्स चलाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या होगा। फोन हैंग हो जाएगा और गर्म होकर बंद हो जाएगा। ठीक यही चीज आपके दिमाग के साथ भी होती है। जब आप अपनी पुरानी सोच को अपडेट नहीं करते तो लाइफ की नई रेस में आप बहुत पीछे छूट जाते हैं। लोग अक्सर कहते हैं कि पुरानी चीजें हमेशा बेस्ट होती हैं। लेकिन सच तो यह है कि जो चीज समय के साथ नहीं बदलती वह केवल कबाड़ बनती है।

एडम ग्रांट अपनी किताब थिंक अगेन में कहते हैं कि आपको अनलर्न करना सीखना होगा। अनलर्न करने का मतलब है कि जो बातें आपने पहले सच मानी थीं उनको भूलना और यह स्वीकार करना कि शायद आप गलत थे। यह सुनना थोड़ा अजीब लग सकता है। लोग सोचते हैं कि अगर वे अपनी बात से पलट गए तो समाज में उनकी नाक कट जाएगी। लोग कहेंगे कि इसे तो कुछ पता ही नहीं था। लेकिन असल में अपनी गलती को मान लेना ही सबसे बड़ी समझदारी है।

हमारे आसपास ऐसे कई लोग हैं जो आज भी उसी तरीके से बिजनेस या काम करना चाहते हैं जैसे उनके दादाजी करते थे। वे तकनीक से डरते हैं। वे नई सोच का मजाक उड़ाते हैं। फिर जब उनका काम बंद होने लगता है तो वे किस्मत को दोष देने लगते हैं। यह किस्मत का खेल नहीं है दोस्त बल्कि यह आपकी जिद का नतीजा है। अगर आप आज के समय में टिकना चाहते हैं तो आपको अपनी पुरानी मान्यताओं को कचरे के डिब्बे में डालना ही होगा।

सीखना बहुत आसान है लेकिन जो सीखा है उसे भूलकर फिर से नया सीखना सबसे मुश्किल काम है। इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए। आपको अपने ही बनाए हुए विचारों के महल को खुद अपने हाथों से तोड़ना पड़ता है। जब तक आप उस पुराने और कमजोर महल को नहीं गिराएंगे तब तक आप एक नया और मजबूत घर कैसे बनाएंगे। इसलिए अपने दिमाग के दरवाजे हमेशा खुले रखिए। हवा को आने दीजिए और पुरानी धूल को साफ होने दीजिए।

जब आप नया सीखने के लिए तैयार होते हैं तो पूरी दुनिया आपके लिए एक क्लासरूम बन जाती है। आप हर छोटी चीज से कुछ न कुछ नया सीखने लगते हैं। आपका यही एटीट्यूड आपको दूसरों से अलग बनाता है। जो लोग यह सोचते हैं कि वे सब कुछ सीख चुके हैं वे असल में रुक चुके हैं। और रुकी हुई चीज हमेशा सड़ने लगती है। इसलिए आगे बढ़ते रहिए और खुद को लगातार बदलते रहिए।


लेसन २ : साइंटिस्ट माइंडसेट अपनाना

जब आप नया सीखने के लिए तैयार हो जाते हैं तो आपके सामने सबसे बड़ा सवाल आता है कि खुद को किस सांचे में ढालें। एडम ग्रांट कहते हैं कि हमारे समाज में लोग अक्सर तीन भूमिकाओं में जीते हैं। पहले होते हैं प्रचारक जो केवल अपनी बात दूसरों पर थोपना चाहते हैं। दूसरे होते हैं वकील जो हर हाल में खुद को सही साबित करने का केस लड़ते हैं। और तीसरे होते हैं राजनेता जो दूसरों को खुश करने के लिए अपनी बात बदलते रहते हैं। लेकिन अगर आपको लाइफ में असली सक्सेस चाहिए तो आपको इन तीनों को छोड़कर एक वैज्ञानिक यानी साइंटिस्ट का माइंडसेट अपनाना होगा।

अब आप सोचेंगे कि क्या मुझे लैब में जाकर कोई एक्सपेरिमेंट करना है। बिल्कुल नहीं दोस्त। साइंटिस्ट माइंडसेट का मतलब है कि आप अपनी सोच को एक अंतिम सच न मानें बल्कि उसे केवल एक अनुमान समझें। एक वैज्ञानिक जब कोई रिसर्च करता है तो वह यह मानकर चलता है कि उसका फॉर्मूला गलत भी हो सकता है। जब उसका फॉर्मूला फेल होता है तो वह रोता नहीं है बल्कि खुश होता है कि उसे एक नया रास्ता मिल गया। लेकिन हमारे यहाँ अगर किसी की बात गलत साबित हो जाए तो लोग उसे अपनी नाक का सवाल बना लेते हैं। वे ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे उनका पूरा साम्राज्य ही तबाह हो गया हो।

मान लीजिए कि आप एक नया स्टार्टअप शुरू करते हैं। आपने सोचा कि बाजार में इस समय चाय का बिजनेस सबसे अच्छा चलेगा। आपने बहुत सारा पैसा लगा दिया। लेकिन कुछ महीने बाद आपको पता चलता है कि लोग चाय नहीं बल्कि कॉफी पसंद कर रहे हैं। अब एक आम इंसान क्या करेगा। वह रोएगा और कहेगा कि मेरी किस्मत ही खराब है। वह जबरदस्ती लोगों को चाय पिलाने की कोशिश करेगा। लेकिन एक साइंटिस्ट माइंडसेट वाला इंसान तुरंत अपनी थ्योरी बदलेगा। वह कहेगा कि चलो मेरा पहला अनुमान गलत था। अब मैं कॉफी पर काम करूँगा। यही लचीलापन आपको मार्केट का राजा बनाता है।

हमारे समाज में अक्सर उस इंसान को बहुत बुद्धिमान माना जाता है जो हर बात पर अड़ा रहता है। लोग कहते हैं कि देखो वह अपनी बात का कितना पक्का है। लेकिन सच तो यह है कि वह पक्का नहीं बल्कि पत्थर है। और पत्थर कभी बढ़ नहीं सकता वह केवल एक जगह पड़ा रह सकता है। एक वैज्ञानिक हमेशा सच की तलाश में रहता है चाहे वह सच उसकी खुद की पुरानी सोच के खिलाफ ही क्यों न हो। उसे अपनी गलतियों को ढूंढने में मजा आता है। जब आप अपनी गलतियों को सेलिब्रेट करने लगते हैं तो आपका डर पूरी तरह खत्म हो जाता है।

जब आप इस माइंडसेट को अपनाते हैं तो आप दूसरों की बातें सुनना शुरू करते हैं। आप हर बहस को जीतने के लिए नहीं बल्कि कुछ नया सीखने के लिए करते हैं। आज के सोशल मीडिया के जमाने में हर कोई एक वकील बना बैठा है। हर कोई कमेंट सेक्शन में अपनी बात को सही साबित करने के लिए लड़ रहा है। लेकिन इस लड़ाई से किसी का फायदा नहीं होता। अगर आप इस जाल से बाहर निकलकर एक साइंटिस्ट की तरह सोचना शुरू कर दें तो आप उन करोड़ों लोगों से बहुत आगे निकल जाएंगे जो केवल चिल्लाना जानते हैं।

अपनी सोच को एक वैज्ञानिक की तरह बदलिए। हर दिन खुद से एक सवाल पूछिए कि आज मैं किस बात में गलत साबित हुआ। जिस दिन आपको अपनी कोई गलती मिल जाए उस दिन समझ जाइए कि आप कल से बेहतर बन चुके हैं। यह माइंडसेट आपको कभी रुकने नहीं देगा और यही आपको लाइफ के हर मोड़ पर एक विजेता बनाएगा।


लेसन ३ : कंस्ट्रक्टिव कॉन्फ्लिक्ट का महत्व

जब आप एक वैज्ञानिक की तरह सोचना शुरू करते हैं तो आपके सामने एक नई चुनौती आती है। वह चुनौती है दूसरों के साथ बातचीत करना। जब आप अपनी सोच को बदलने के लिए तैयार होते हैं तो आपको ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो आपकी कमियों को आपके सामने रख सकें। लेकिन हमारे समाज में लोग बहस से बहुत डरते हैं। अगर कोई उनके विचार के खिलाफ कुछ कह दे तो वे उसे अपना दुश्मन मान लेते हैं। लोग सोचते हैं कि शांति बनाए रखने का मतलब है कि हर बात पर हाँ में हाँ मिलाना। लेकिन एडम ग्रांट कहते हैं कि तरक्की के लिए ऐसी बहस बहुत जरूरी है जो आपके काम को बेहतर बनाए। इसे हम रचनात्मक बहस या कंस्ट्रक्टिव कॉन्फ्लिक्ट कहते हैं।

मान लीजिए कि आप अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक नया प्रोजेक्ट बना रहे हैं। आपके ग्रुप में एक ऐसा दोस्त है जो आपकी हर बात पर ताली बजाता है। आप चाहे कितना भी बेकार आइडिया दें वह हमेशा कहता है कि भाई तुम तो जीनियस हो। आपको सुनने में यह बहुत अच्छा लग सकता है। लेकिन सच तो यह है कि वह दोस्त आपके प्रोजेक्ट को डुबो रहा है। इसके विपरीत एक दूसरा दोस्त है जो आपके हर आइडिया में कमियाँ निकालता है। वह कहता है कि यह प्लान यहाँ पर फेल हो सकता है। आपको उस पर बहुत गुस्सा आता है। आप सोचते हैं कि यह हमेशा मेरी टांग क्यों खींचता है। लेकिन असल में वही आपका सच्चा शुभचिंतक है। वह आपके अहम् पर चोट कर रहा है ताकि आपका काम खराब न हो।

हमारे यहाँ लोग रिश्तों को बचाने के लिए सच बोलना बंद कर देते हैं। वे सोचते हैं कि अगर सच कहा तो रिश्ता टूट जाएगा। दफ्तरों में भी यही होता है। बॉस ने जो कह दिया सब लोग चुपचाप मान लेते हैं। कोई भी यह कहने की हिम्मत नहीं करता कि सर यह तरीका गलत है। इसका नतीजा यह होता है कि पूरी कंपनी एक गलत रास्ते पर आगे बढ़ जाती है। एक बुद्धिमान इंसान और एक अच्छी टीम हमेशा ऐसी बहसों का स्वागत करती है जो काम को निखारती हैं। आपको ऐसी टीम बनानी होगी जो आपसे असहमत होने से न डरे। जब अलग-अलग विचार आपस में टकराते हैं तभी एक बेहतरीन रास्ते का जन्म होता है।

इस तरह की बहस का मतलब यह नहीं है कि आप एक-दूसरे पर चिल्लाने लगें या व्यक्तिगत हमले करें। यह कोई टीवी डिबेट नहीं है दोस्त जहाँ सिर्फ शोर मचाया जाता है। इसका मतलब है कि आप काम पर ध्यान दें न कि इंसान पर। जब आप किसी के विचार को गलत कहते हैं तो आप उस इंसान को गलत नहीं कह रहे होते। इस अंतर को समझना बहुत जरूरी है। जब आप इस बात को समझ जाते हैं तो आपका अहंकार बीच में नहीं आता। आप दूसरों के सुझावों को खुले दिल से स्वीकार करने लगते हैं। यही बात आपको एक महान लीडर बनाती है।

अब समय आ गया है कि हम अपनी इस पूरी यात्रा को एक साथ जोड़कर देखें। सबसे पहले हमने लेसन 1 में यह सीखा कि पुरानी और सड़ चुकी सोच को छोड़ना कितना जरूरी है। फिर लेसन 2 में हमने देखा कि इस सोच को बदलने के लिए हमें एक वैज्ञानिक का नजरिया अपनाना होगा जो हमेशा सच की तलाश में रहता है। और अब लेसन 3 में हमने समझा कि इस वैज्ञानिक नजरिए को मजबूत करने के लिए हमें उन लोगों की जरूरत है जो हमसे रचनात्मक बहस कर सकें। यह तीनों लेसन मिलकर ही आपको एक ऐसा इंसान बनाते हैं जो कभी नहीं हारता क्योंकि वह हर परिस्थिति में खुद को बदलने और सीखने के लिए तैयार रहता है।


तो दोस्त, क्या आप आज भी अपनी उसी पुरानी जिद के साथ जीना चाहते हैं या फिर अपनी सोच को बदलकर एक नई शुरुआत करने के लिए तैयार हैं। आज ही अपने दिमाग के जालों को साफ कीजिए। अपने आसपास ऐसे लोगों को रखिए जो आपको सच बता सकें। कमेंट सेक्शन में मुझे जरूर बताइए कि इस पूरी चर्चा में आपको कौन सी बात सबसे अच्छी लगी और आप आज से ही अपनी कौन सी पुरानी सोच को बदलने जा रहे हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो हमेशा खुद को सही समझते हैं। आपकी एक शेयरिंग किसी की पूरी सोच को बदल सकती है।

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