आप हर महीने अपनी पूरी सैलरी एक ऐसे इंसान पर लुटा रहे हैं जो शायद किसी और के सपनों में खोया है। आप रात भर जागकर जिसके मैसेज का इंतजार करते हैं, उसका दिमाग किसी और के लिए केमिकल रिलीज कर रहा है। यह कोई किस्मत का खेल नहीं है, यह दिमाग का एक खतरनाक केमिकल ट्रैप है जिसमें आप बुरी तरह फंस चुके हैं।
अगर आप इस केमिकल सिस्टम को आज नहीं समझे, तो आने वाले कई साल सिर्फ रिजेक्शन, दिल टूटने और डिप्रेशन में बर्बाद हो जाएंगे।
हेलन फिशर की किताब व्हाई वी लव हमें बताती है कि प्यार कोई दिल से जुड़ा अहसास नहीं, बल्कि दिमाग का एक बहुत ही जिद्दी ड्राइव है। यह आर्टिकल आपको उस अदृश्य केमिकल जाल से बाहर निकालेगा जो आपकी लाइफ कंट्रोल कर रहा है।
अब समझते हैं कि आपका दिमाग आपके ही खिलाफ यह गेम कैसे खेलता है।
लेसन १ : प्यार कोई इमोशन नहीं, दिमाग का अडिक्शन है
हम सब बचपन से फिल्मों में देखते आए हैं कि प्यार दिल से होता है, तितलियां उड़ती हैं और दुनिया हसीन लगने लगती है। सच तो यह है कि आपका दिल सिर्फ खून पंप करने का काम करता है, प्यार का असली गुंडा तो आपके खोपड़े में बैठा दिमाग है। हेलन फिशर ने अपने स्कैन में साफ देखा कि जब आप किसी के प्यार में पागल होते हैं, तो आपके दिमाग का वही हिस्सा जगमगाता है जो कोकीन का नशा करने वाले इंसान का होता है। यह कोई कविता नहीं, न्यूरोसाइंस है। आपके दिमाग में डोपामाइन नाम का केमिकल बहने लगता है। यह वही डोपामाइन है जो आपको बार-बार फोन उठाकर नोटिफिकेशन चेक करने पर मजबूर करता है।
मान लीजिए आपका एक दोस्त है - राहुल। राहुल भाई साहब को ऑफिस की नई कली से प्यार हो गया है। अब राहुल की हालत यह है कि वह दिन में दस बार उसकी प्रोफाइल चेक करता है। अगर सामने से एक छोटा सा रिप्लाई आ जाए, तो राहुल भाई ऐसे खिलखिलाते हैं जैसे लॉटरी लग गई हो। और अगर रिप्लाई न आए, तो ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया ही खत्म हो गई। राहुल को लगता है कि यह सच्चा प्यार है, जबकि सच यह है कि उसका दिमाग सिर्फ एक डोपामाइन शॉट मांग रहा है। वह उस इंसान का नहीं, उस केमिकल हिट का आदी हो चुका है। आप स्मार्टवॉच पहनकर अपना हार्ट रेट मापते रहिए, लेकिन असली हलचल तो खोपड़ी के अंदर चल रही है।
इंसान जब प्यार में पड़ता है, तो उसका लॉजिकल दिमाग पूरी तरह बंद हो जाता है। आप उस इंसान की सौ बुराइयों को भी अनदेखा कर देते हैं। वह अगर आपको इग्नोर भी करे, तो आपका दिमाग बहाने बनाने लगता है कि शायद काम में बिजी होगा। यह दिमाग का वह रिवॉर्ड सिस्टम है जो आपको किसी भी कीमत पर उस टारगेट को पाने के लिए उकसाता है। इंसान सोचता है कि वह अपने फैसले खुद ले रहा है, पर असल में वह अपने ही दिमाग के बनाए केमिकल ट्रैप का गुलाम बन चुका होता है।
जब आप इस बात को समझ जाते हैं, तो आपको एहसास होता है कि आप किसी इंसान के पीछे नहीं, बल्कि अपने दिमाग के एक केमिकल लोचे के पीछे भाग रहे थे। और जैसे ही आप इस नशे को पहचान लेते हैं, इसका असर कम होने लगता है। लेकिन खेल यहीं खत्म नहीं होता, क्योंकि दिमाग सिर्फ एक केमिकल पर नहीं रुकता, इसके बाद शुरू होता है अट्रैक्शन का दूसरा चरण।
लेसन २ : प्यार के तीन अलग फेज - लस्ट, अट्रैक्शन और अटैचमेंट
अक्सर लोग सोचते हैं कि शादी या लंबे रिलेशनशिप के बाद सुरूर कम क्यों हो जाता है। लोग पार्टनर को कोसने लगते हैं कि तुम बदल गए हो। सच यह है कि पार्टनर नहीं बदला, उसके दिमाग की बैटरी और केमिकल बदल गए हैं। हेलन फिशर बताती हैं कि प्यार तीन अलग-अलग रास्तों से गुजरता है। पहला है लस्ट, दूसरा है अट्रैक्शन, और तीसरा है अटैचमेंट। इन तीनों को कंट्रोल करने वाले हार्मोन्स भी पूरी तरह अलग होते हैं। हम सब इन तीनों को एक ही तराजू में तोलने की भूल कर बैठते हैं।
अब जरा अपने पडोसी वर्मा जी को देखिए। वर्मा जी को कॉलेज के दिनों में अपनी वाइफ से भयंकर वाला अट्रैक्शन हुआ था। रात-रात भर फोन पर बातें होती थीं, नींद उड़ गई थी। तब उनके दिमाग में नोरेपिनेफ्रिन और डोपामाइन नाच रहे थे। अब शादी के दस साल बाद वर्मा जी और उनकी वाइफ साथ बैठकर शांति से चाय पीते हैं और घर के राशन की बात करते हैं। वर्मा जी को लगता है कि प्यार खत्म हो गया। अरे भाई, प्यार खत्म नहीं हुआ, वह अट्रैक्शन से निकलकर अटैचमेंट वाले फेज में आ गया है। अब वहाँ ऑक्सीटोसिन काम कर रहा है, जो सुकून और सुरक्षा देता है, न कि वह शुरुआती पागलपन। आप नोइज़ कैंसिलेशन हेडफोन लगाकर रोमांटिक गाने सुनते रहिए, लेकिन दिमाग का केमिकल फेज तो अपने हिसाब से ही बदलेगा।
समस्या तब आती है जब लोग अट्रैक्शन वाले रोमांच को ही असली प्यार मान लेते हैं। जैसे ही वह शुरुआती नशा कम होता है, लोग नया पार्टनर ढूंढने निकल पड़ते हैं। उन्हें लगता है कि पुराने रिश्ते में स्पार्क खत्म हो गया। भाई साहब, वह स्पार्क नहीं था, वह सिर्फ एक केमिकल तूफान था जो हमेशा नहीं रह सकता। दिमाग अगर हर वक्त अट्रैक्शन मोड में रहेगा, तो इंसान काम-धंधा छोड़कर सन्यास ले लेगा या पागल हो जाएगा।
इसलिए इस पैटर्न को समझना बहुत जरूरी है। अगर आप रिश्ते में सिर्फ उस शुरुआती रोमांच की उम्मीद करेंगे, तो आप हर बार निराश ही होंगे। जब आप यह समझ जाते हैं कि अटैचमेंट ही रिश्ते की असली ताकत है, तब आप व्यर्थ की भागदौड़ बंद कर देते हैं। लेकिन सोचिए, क्या होगा जब यह पूरा सिस्टम अचानक टूट जाए? जब सामने वाला आपको रिजेक्ट कर दे? तब दिमाग जो करता है, वह और भी खतरनाक है।
लेसन ३ : ब्रेकअप का दर्द कोई वहम नहीं, असली शारीरिक चोट है
जब कोई आपका दिल तोड़ता है, तो सीने में एक अजीब सा खिंचाव और भारीपन महसूस होता है। आप खुद से कहते हैं कि यह सब दिमाग का वहम है, लेकिन दर्द बिल्कुल असली होता है। हेलन फिशर ने जब ब्रेकअप से गुजर रहे लोगों के दिमाग का स्कैन किया, तो एक बहुत ही हैरान करने वाली बात सामने आई। रिजेक्शन मिलने पर दिमाग का वही हिस्सा एक्टिव होता है जो तब होता है जब आपका हाथ आग से जल जाए या कोई हड्डी टूट जाए। यानी आपका दिमाग दिल टूटने को एक शारीरिक चोट की तरह ही देखता है।
अब जरा अपने दोस्त अमित को याद कीजिए। अमित का हाल ही में ब्रेकअप हुआ है। अमित भाई ने देवदास बनकर खाना-पीना छोड़ दिया है और दिन भर सैड गाने सुन रहे हैं। दोस्त उन्हें समझाते हैं कि भाई एक लड़की ही तो थी, भूल जा और लाइफ में आगे बढ़। लेकिन अमित से आगे बढ़ा ही नहीं जा रहा। लोग सोचते हैं कि अमित नाटक कर रहा है, लेकिन सच यह है कि अमित का दिमाग एक भयंकर विथड्रॉल सिम्टम से गुजर रहा है। जैसे शराब या नशे की आदत अचानक छूटने पर शरीर तड़पता है, ठीक वही हाल अमित के दिमाग का हो रहा है। वह बार-बार स्मार्टफोन उठाकर पुरानी चैट पढ़ता है ताकि दिमाग को किसी तरह डोपामाइन की एक छोटी सी खुराक मिल जाए।
जब रिजेक्शन मिलता है, तो दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम शांत होने के बजाय और ज्यादा एक्टिव हो जाता है। आप उस इंसान को पाने के लिए और ज्यादा बेचैन हो जाते हैं। इसे साइंस की भाषा में फ्रस्ट्रेशन अट्रैक्शन कहते हैं। यानी जो चीज नहीं मिलती, दिमाग उसी के पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है। इंसान अपनी पूरी self respect दांव पर लगाकर गिड़गिड़ाने लगता है, मैसेज पर मैसेज भेजने लगता है। उसे लगता है कि वह प्यार जता रहा है, जबकि असल में वह अपने दिमाग की तड़प मिटाने की नाकाम कोशिश कर रहा होता है।
इस सच को स्वीकार करना ही इस दर्द से बाहर निकलने का पहला कदम है। जब आप जान जाते हैं कि यह तड़प किसी इंसान के लिए नहीं बल्कि आपके दिमाग के केमिकल विथड्रॉल की वजह से है, तो आप खुद को कोसना बंद कर देते हैं। आप समझ जाते हैं कि समय के साथ दिमाग के ये रिसेप्टर्स अपने आप शांत हो जाएंगे। और जब यह शांति मिलती है, तब आप अपनी जिंदगी का कंट्रोल वापस अपने हाथ में लेने के लिए तैयार होते हैं।
अगर आपको भी आज यह समझ आया है कि आपका दिमाग आपके साथ कौन सा खेल खेल रहा था, तो इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो किसी के प्यार में देवदास बने घूम रहे हैं। नीचे कमेंट करके मुझे बताएं कि क्या आपने भी कभी इस केमिकल विथड्रॉल को महसूस किया है। ऐसे ही और भी कमाल के बुक समरी आर्टिकल्स पढ़ने के लिए डीवाई बुक्स को सब्सक्राइब करना बिल्कुल न भूलें।
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