Awakening the Entrepreneur Within (Hindi)


अगर आप अभी भी गधों की तरह अपने ही बिजनेस में नौकर बनकर काम कर रहे हैं तो मुबारक हो आप एक फेलियर हैं। जबकि आपके पड़ोस वाला चिंटू ऐश कर रहा है क्योंकि उसे पता है कि सिस्टम कैसे बनता है और आप बस पसीना बहा रहे हैं। बिना विजन के मेहनत करना सिर्फ एक स्लो सुसाइड है जिससे आप कभी अमीर नहीं बनेंगे।

लेकिन फिक्र मत करिए। आज हम माइकल गर्बर की मास्टरक्लास से वो सीक्रेट्स निकालेंगे जो एक आम इंसान को भी एक जादुई कंपनी का मालिक बना सकते हैं। चलिए इन तीन पावरफुल लेसन्स को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : द फोर पर्सनालिटीज - आपके अंदर छुपे चार कलाकार

ज्यादातर लोग जब बिजनेस शुरू करते हैं तो उन्हें लगता है कि बस मेहनत करेंगे और पैसा छपेगा। लेकिन हकीकत यह है कि आपके दिमाग के अंदर एक वर्ल्ड वॉर चल रहा होता है। माइकल गर्बर कहते हैं कि एक सफल एंटरप्रेन्योर के अंदर चार अलग अलग पर्सनालिटीज होती हैं। अगर इनमें से एक भी छुट्टी पर चली गई तो समझो आपका स्टार्टअप कौड़ियों के भाव बिकने वाला है। पहली पर्सनालिटी है द ड्रीमर। यह वो इंसान है जो बादलों में घर बनाता है। इसे वो चीजें दिखती हैं जो अभी तक पैदा भी नहीं हुई हैं। बिना ड्रीमर के आप बस एक क्लर्क बनकर रह जाएंगे। ड्रीमर का काम है इमेजिन करना कि आपकी कंपनी दुनिया कैसे बदलेगी। अब आते हैं द थिंकर पर। थिंकर का काम है ड्रीमर के उन ऊल जलूल सपनों को एक लॉजिक देना। यह वो बंदा है जो एक्सेल शीट बनाता है और यह देखता है कि क्या सच में चांद पर चाय की दुकान खोलना मुनाफे का सौदा है या नहीं।

लेकिन यहाँ असली ट्विस्ट आता है। तीसरी पर्सनालिटी है द परफॉर्मर। यह वो मजदूर है जो आपके अंदर छुपा है। इसे सिर्फ काम करना पसंद है। इसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विजन क्या है। इसे बस आज का टास्क पूरा करना है। इंडिया में दिक्कत यही है कि हम सब सिर्फ परफॉर्मर बनकर रह जाते हैं। हम समोसे तलने में इतने बिजी हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि हमें समोसे की चेन बनानी थी। और आखिर में आता है द लीडर। लीडर का काम है इन तीनों पागलों को एक साथ जोड़कर रखना। वह देखता है कि ड्रीमर कहीं बहुत ज्यादा तो नहीं उड़ रहा या परफॉर्मर कहीं थक तो नहीं गया। अगर आप सिर्फ परफॉर्मर बनकर रह गए तो आप बिजनेस के मालिक नहीं बल्कि उसके सबसे सस्ते नौकर बन जाएंगे।

सोचिए आपके पास एक जिम है। अगर आप खुद ही वहां झाड़ू लगा रहे हैं और खुद ही हर क्लाइंट को डंबल पकड़ा रहे हैं तो आप बिजनेस नहीं कर रहे। आप बस एक सेल्फ एम्प्लॉयड मजदूर हैं जिसने खुद को ही नौकरी पर रखा है। ड्रीमर सोचेगा कि पूरे शहर में मेरे दस जिम होंगे। थिंकर उसका प्लान बनाएगा। परफॉर्मर पहले जिम को चलाएगा और लीडर सबको मैनेज करेगा। जब तक आप अपने अंदर के इन चार चेहरों को नहीं पहचानेंगे तब तक आप बस चूहा दौड़ में भागते रहेंगे। लोग अक्सर पूछते हैं कि भाई मेरा बिजनेस बढ़ क्यों नहीं रहा। अरे भाई बढ़ेगा कैसे। आपने ड्रीमर को तो कोठरी में बंद कर दिया है और थिंकर को चाय लाने भेज दिया है। आप बस परफॉर्मर बनकर पसीना बहा रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे आप एक कार चला रहे हैं लेकिन आपको पता ही नहीं कि जाना कहाँ है। आप बस एक्सीलरेटर दबाए जा रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि तेजी से चलना ही तरक्की है। असलियत में आप बस एक ही जगह गोल गोल घूम रहे हैं।

एंटरप्रेन्योर बनने का मतलब यह नहीं है कि आपको सब कुछ खुद करना है। इसका मतलब है कि आपको यह पता होना चाहिए कि कौन सा काम कब और कैसे करवाना है। अगर आप अपने अंदर के ड्रीमर को आजादी नहीं देंगे तो आपका बिजनेस कभी भी उस लेवल पर नहीं पहुंचेगा जहाँ दुनिया उसे याद रखे। आपको एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ आपकी ये चारों पर्सनालिटीज आपस में मिलकर काम करें। जब ड्रीमर कुछ नया सोचे तो थिंकर उसे तराशे। जब थिंकर प्लान दे तो परफॉर्मर उसे जमीन पर उतारे और लीडर यह पक्का करे कि सब कुछ सही दिशा में जा रहा है। यही वो सीक्रेट सॉस है जो एक मामूली दुकानदार और एक महान बिजनेसमैन के बीच का अंतर तय करता है।


लेसन २ : बिजनेस को सिस्टम बनाना - खुद को रिप्लेस करना सीखो

अगर आपका बिजनेस आपके बिना एक दिन भी नहीं चल सकता तो यकीन मानिए आपने बिजनेस नहीं बल्कि अपने लिए एक जेल बनाई है। माइकल गर्बर कहते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा झूठ यह है कि बिजनेस चलाने के लिए मालिक का वहां होना जरूरी है। हकीकत तो यह है कि असली बिजनेस वही है जो एक सिस्टम पर चलता हो न कि किसी सुपरस्टार पर। हमारे यहाँ इंडिया में लाला जी की दुकान वाला माइंडसेट बहुत फेमस है। लाला जी को लगता है कि अगर वो गल्ले पर नहीं बैठेंगे तो मुनीम तिजोरी साफ कर देगा। इसी डर की वजह से लाला जी कभी अपनी दुकान को ब्रांड नहीं बना पाते। आपको बिजनेस में काम करने के बजाय बिजनेस पर काम करना सीखना होगा। इसका मतलब है कि आपको ऐसे रूल्स और प्रोसेस बनाने होंगे जिन्हें कोई भी फॉलो कर सके।

सोचिए मैकडोनाल्ड्स के बारे में। वहां बर्गर बनाने वाला कोई शेफ नहीं होता बल्कि एक कॉलेज जाने वाला लड़का होता है। उसे पता है कि बर्गर को कितनी देर गर्म करना है और केचप की कितनी बूंदे डालनी हैं। यह जादू उस लड़के का नहीं बल्कि उस सिस्टम का है जो माइकल गर्बर समझाना चाहते हैं। अगर आप एक सॉफ्टवेयर कंपनी चला रहे हैं और हर कोड आपको खुद चेक करना पड़ रहा है तो आप मालिक नहीं बल्कि एक ओवरपेड क्लर्क हैं। सिस्टम का मतलब है कि आपकी एब्सेंस में भी काम की क्वालिटी वैसी ही रहे जैसी आपकी मौजूदगी में होती है। लोग अक्सर अपनी स्किल्स के घमंड में रहते हैं कि मेरे जैसा काम कोई नहीं कर सकता। भाई यही तो आपकी सबसे बड़ी कमजोरी है। अगर कोई आपके जैसा काम नहीं कर सकता तो आप कभी स्केल नहीं कर पाएंगे।

असली एंटरप्रेन्योर वो है जो खुद को बेकार बना देता है। सुनने में अजीब लग रहा है ना। लेकिन यही सच है। आपको अपना बिजनेस ऐसे डिजाइन करना चाहिए कि कल को अगर आप गोवा में छुट्टी मना रहे हों तो भी आपके बैंक अकाउंट में पैसे आते रहें। इसके लिए आपको हर छोटे काम का एक मैन्युअल बनाना होगा। चाय बनाने से लेकर क्लाइंट क्लोज करने तक का एक फिक्स तरीका होना चाहिए। जब आप सिस्टम बना लेते हैं तो आप लोगों पर निर्भर होना छोड़ देते हैं। लोग आते जाते रहेंगे लेकिन आपका सिस्टम हमेशा टिका रहेगा। हम अक्सर उन लोगों को महान मानते हैं जो दिन में अठारह घंटे काम करते हैं। लेकिन माइकल गर्बर कहते हैं कि वो लोग असल में बेवकूफ हैं जो सिस्टम बनाने के बजाय खुद को घिस रहे हैं।

जरा सोचिए अगर धीरूभाई अंबानी हर पेट्रोल पंप पर खुद तेल भरने जाते तो क्या आज रिलायंस इतनी बड़ी होती। उन्होंने सिस्टम बनाया और उन लोगों को ढूंढा जो उस सिस्टम को चला सकें। आपको भी अपनी कंपनी का आर्किटेक्ट बनना है न कि ईंट ढोने वाला मजदूर। जब आप सिस्टम पर फोकस करते हैं तो आपके पास वो कीमती समय बचता है जिसमें आप बिजनेस की ग्रोथ के बारे में सोच सकते हैं। वरना आपकी पूरी जिंदगी बस छोटे मोटे आग बुझाने वाले कामों में ही निकल जाएगी। आज लाइट नहीं है आज स्टाफ नहीं आया आज इंटरनेट बंद है। इन छोटी मुसीबतों से ऊपर उठने का एकमात्र रास्ता सिस्टम है। जब आपका बिजनेस एक मशीन की तरह चलने लगेगा तब जाकर आप असल मायने में एक कंपनी के मालिक कहलाएंगे। वरना आप बस एक दुकान चला रहे हैं जिसका शटर आपकी सेहत और मूड पर टिका हुआ है।


लेसन ३ : द गोल्डन पिरामिड - साधारण से महान बनने का रास्ता

ज्यादातर लोग बिजनेस को एक बोरिंग काम की तरह देखते हैं लेकिन माइकल गर्बर इसे एक आर्ट मानते हैं। वह कहते हैं कि एक कंपनी को महान बनाने के लिए आपको एक गोल्डन पिरामिड खड़ा करना होगा। इस पिरामिड की तीन परतें हैं जो आपके बिजनेस की आत्मा हैं। सबसे नीचे आता है आपका विजन। यह वो सपना है जो आपको रात को सोने नहीं देता। अगर आपका विजन सिर्फ पैसा कमाना है तो आप बहुत जल्दी थक जाएंगे। विजन वो बड़ा मकसद है जो दुनिया को यह बताता है कि आपके होने से क्या फर्क पड़ता है। जैसे अगर आप एक छोटी सी बेकरी चला रहे हैं तो आपका विजन सिर्फ केक बेचना नहीं बल्कि लोगों की खुशियों का हिस्सा बनना होना चाहिए। जब मकसद बड़ा होता है तो मुश्किलें छोटी लगने लगती हैं और लोग आपके साथ सिर्फ सैलरी के लिए नहीं बल्कि उस सपने के लिए जुड़ते हैं।

पिरामिड की दूसरी परत है आपका मिशन। मिशन का मतलब है वो रास्ता जिस पर चलकर आप अपने विजन तक पहुंचेंगे। यह आपके बिजनेस का डेली ऑपरेशन नहीं है बल्कि वो स्ट्रेटेजी है जो आपको भीड़ से अलग बनाती है। लोग अक्सर विजन और मिशन में कंफ्यूज हो जाते हैं। विजन यह है कि हमें पहाड़ की चोटी पर पहुंचना है और मिशन यह है कि हम कौन सा रास्ता चुनेंगे और हमारे पास क्या क्या सामान होगा। बिना मिशन के आपका विजन सिर्फ एक मुंगेरी लाल का हसीन सपना बनकर रह जाएगा। इंडिया में बहुत से स्टार्टअप इसलिए फेल हो जाते हैं क्योंकि उनके पास आईडिया तो जबरदस्त होता है लेकिन उस आईडिया को जमीन पर उतारने का कोई क्लियर मिशन नहीं होता। वह बस हवा में तीर चलाते हैं और जब निशाना नहीं लगता तो किस्मत को दोष देते हैं।

और पिरामिड की सबसे ऊपर वाली परत है आपकी जॉब। यह वो असल काम है जो हर कर्मचारी को करना है। लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा कैच है। माइकल गर्बर कहते हैं कि जॉब ऐसी होनी चाहिए जिसे एक साधारण इंसान भी एक्स्ट्राऑर्डिनरी तरीके से कर सके। अगर आपको अपना बिजनेस चलाने के लिए सिर्फ गोल्ड मेडलिस्ट या जीनियस लोग चाहिए तो आपका बिजनेस मॉडल ही गलत है। एक महान कंपनी वो है जहाँ प्रोसेस इतने मजबूत हों कि एक औसत दर्जे का इंसान भी वर्ल्ड क्लास रिजल्ट दे सके। जब आप इन तीनों चीजों को यानी विजन मिशन और जॉब को एक पिरामिड की तरह सेट कर देते हैं तब आपकी कंपनी एक लेजेंड बन जाती है। तब आप सिर्फ एक बिजनेस नहीं चला रहे होते बल्कि आप एक ऐसी विरासत छोड़ रहे होते हैं जो आपके बाद भी जिंदा रहेगी।

सोचिए उस चाय वाले के बारे में जिसने अपनी छोटी सी दुकान को एक नेशनल ब्रांड बना दिया। उसने सिर्फ चाय नहीं बेची बल्कि उसने चाय पीने के एक्सपीरियंस को एक सिस्टम में बांध दिया। उसका विजन क्लियर था उसका मिशन सटीक था और उसकी दुकान पर काम करने वाले लड़के की जॉब बिल्कुल डिफाइंड थी। यही वो जादू है जो माइकल गर्बर हमें सिखाना चाहते हैं। अगर आप भी चाहते हैं कि आपकी कंपनी सिर्फ एक नाम बनकर न रह जाए तो आज ही अपने गोल्डन पिरामिड पर काम करना शुरू करें। यह मत सोचिए कि आप अभी छोटे हैं। याद रखिए हर बड़ा पेड़ एक छोटे से बीज से ही शुरू होता है लेकिन उस बीज के अंदर एक विशाल पेड़ बनने का विजन पहले से मौजूद होता है।


तो दोस्तों, क्या आप अभी भी अपने ही बिजनेस के कैदी बने रहना चाहते हैं या फिर एक ऐसा एम्पायर खड़ा करना चाहते हैं जो आपकी गैरमौजूदगी में भी फले फूले। माइकल गर्बर की यह किताब हमें याद दिलाती है कि एंटरप्रेन्योर पैदा नहीं होते बल्कि बनाए जाते हैं। आज ही अपने अंदर के उस ड्रीमर को जगाइए और पसीना बहाने के बजाय सिस्टम बनाने पर ध्यान दीजिए। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी लाइफ में कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो इसे उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो खुद का कुछ शुरू करना चाहते हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपके बिजनेस का सबसे बड़ा विजन क्या है। याद रखिए बदलाव की शुरुआत हमेशा एक छोटे से फैसले से होती है।

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