क्या आप भी अपनी घिसी पिटी बिजनेस स्ट्रेटेजी के साथ अमर होने का सपना देख रहे हैं। सच तो यह है कि मार्केट के डार्विन आपको कच्चा चबाने के लिए तैयार बैठे हैं। अगर आप अभी भी पुराने इनोवेशन के भरोसे हैं तो बधाई हो आप जल्द ही इतिहास बनने वाले हैं।
आज के इस आर्टिकल में हम जेफ्री मूर की बुक डीलिंग विद डार्विन की मदद से समझेंगे कि कैसे बड़े बिजनेस हर फेज में खुद को बदलते हैं। हम उन ३ बड़े लेसन को डिकोड करेंगे जो आपकी कंपनी को मार्केट का राजा बनाए रख सकते हैं।
लेसन १ : इनोवेशन टाइपोलॉजी - सही वक्त पर सही वार करना सीखो
दोस्तो, अगर आपको लगता है कि बस एक अच्छा आईडिया और थोड़ी सी मेहनत आपको अंबानी बना देगी तो शायद आप किसी और ही दुनिया में जी रहे हैं। मार्केट कोई स्कूल का गार्डन नहीं है जहाँ हर किसी को पार्टिसिपेशन सर्टिफिकेट मिलता है। यह एक जंगल है। और जंगल का एक ही उसूल है कि या तो आप शिकार करेंगे या आप शिकार बन जाएंगे। जेफ्री मूर अपनी बुक डीलिंग विद डार्विन में हमें सबसे पहले यह समझाते हैं कि इनोवेशन का मतलब सिर्फ नया प्रोडक्ट बनाना नहीं होता। असली खेल तो यह समझना है कि आपको कब किस तरह का इनोवेशन करना है।
मान लीजिये आप एक नई स्मार्टफोन कंपनी शुरू करते हैं। शुरू में आपका पूरा फोकस प्रोडक्ट इनोवेशन पर होगा। आप चाहेंगे कि आपका फोन सबसे पतला हो या उसका कैमरा चाँद की फोटो खींच ले। लेकिन जैसे जैसे मार्केट में दस और कंपनियाँ आ जाती हैं और सब एक जैसे फोन बेचने लगती हैं तब आपका वह कैमरा वाला इनोवेशन किसी काम का नहीं रहता। अब आपको चाहिए प्रोसेस इनोवेशन। यानी आप अपना फोन बनाने का खर्चा कम करें ताकि आप उसे सस्ते में बेच सकें। अगर आप तब भी कैमरा ठीक करने में लगे रहे तो आपकी कंपनी का हाल नोकिया जैसा होना तय है।
बहुत सारे इंडियन स्टार्टअप्स इसी ट्रैप में फंस जाते हैं। वो सोचते हैं कि अगर हम दुनिया का सबसे बेहतरीन समोसा बनाएंगे तो लोग लाइन लगाकर आएंगे। भाई साहब लोगों को समोसा पसंद है लेकिन अगर आपका कॉम्पिटिटर उसी समोसे को ड्रोन से ५ मिनट में डिलीवर कर रहा है तो आपका स्वाद धरा का धरा रह जाएगा। यहाँ आपको प्रोडक्ट नहीं बल्कि डिलीवरी मॉडल में इनोवेशन चाहिए था। मूर कहते हैं कि इनोवेशन की एक पूरी डिक्शनरी होती है। कभी आपको अपने काम करने के तरीके को बदलना पड़ता है तो कभी अपने कस्टमर से बात करने के तरीके को।
अगर आप एक मैच्योर मार्केट में हैं जहाँ सब एक जैसा ही सामान बेच रहे हैं तो वहाँ आपको एक्सपीरियंस इनोवेशन पर ध्यान देना चाहिए। स्टारबक्स इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वो सिर्फ कॉफी नहीं बेचते वो आपको वो बैठने वाली कुर्सी और वो नाम वाला कप बेचते हैं। अगर वो सिर्फ कॉफी के दाने बेहतर करने में लगे रहते तो आज वो हर गली के नुक्कड़ पर नहीं होते। आपको यह समझना होगा कि आपका बिजनेस किस फेज में है। क्या आप अभी पैदा हुए हैं या आप अब बूढ़े हो रहे हैं।
ज्यादातर कंपनियाँ इसलिए फेल होती हैं क्योंकि वो अपनी जवानी के नुस्खे बुढ़ापे में भी इस्तेमाल करती हैं। जब मार्केट बदलता है तो आपकी स्ट्रेटेजी भी बदलनी चाहिए। अगर आप एक ही ढर्रे पर चलते रहे तो डार्विन का इवोल्यूशन आपको बहुत पीछे छोड़ देगा। याद रखिये बिजनेस में टिके रहने के लिए आपको सिर्फ दौड़ना नहीं है बल्कि यह भी देखना है कि रास्ता किधर जा रहा है। अगर रास्ता मुड़ गया है और आप सीधे भाग रहे हैं तो आप खाई में ही गिरेंगे।
लेसन २ : कोर वर्सेस कॉन्टेक्स्ट - अपनी असली ताकत को पहचानो
अब बात करते हैं उस बीमारी की जो लगभग हर दूसरे बिजनेस ओनर को होती है। इस बीमारी का नाम है सब कुछ खुद करने की खुजली। जेफ्री मूर कहते हैं कि अगर आप अपनी कंपनी को डार्विन के सर्वाइवल रूल्स में जिताना चाहते हैं तो आपको कोर और कॉन्टेक्स्ट के बीच का अंतर समझना होगा। कोर वो चीज है जिसकी वजह से कस्टमर आपके पास आता है और जिसके लिए वो आपको पैसे देता है। और कॉन्टेक्स्ट वो सब कुछ है जो बिजनेस चलाने के लिए जरूरी तो है लेकिन वो आपको मार्केट में कोई खास पहचान नहीं दिलाता।
मान लीजिये आप एक बहुत बड़े शेफ हैं और आपका कोर है लाजवाब बिरयानी बनाना। लोग दूर दूर से सिर्फ आपके हाथ का स्वाद चखने आते हैं। अब अगर आप अपना आधा समय इस बात में बर्बाद करें कि रेस्टोरेंट का बिजली का बिल कैसे कम करना है या टॉयलेट की सफाई के लिए कौन सा साबुन अच्छा है तो आप असल में अपना गला खुद ही घोंट रहे हैं। बिजली का बिल और सफाई कॉन्टेक्स्ट हैं। वो जरूरी हैं लेकिन कोई भी आपकी बिरयानी खाने इसलिए नहीं आता क्योंकि आपका बिजली का बिल कम आता है।
अक्सर कंपनियाँ अपना कीमती वक्त और पैसा उन चीजों में झोंक देती हैं जो उनके लिए कोई वैल्यू क्रिएट नहीं करतीं। वो सोचते हैं कि हम अपना खुद का लॉजिस्टिक सिस्टम बनाएंगे या हम खुद का सॉफ्टवेयर लिखेंगे। अरे भाई जब मार्केट में पहले से ही लोग बैठे हैं जो यह काम आपसे बेहतर और सस्ते में कर सकते हैं तो आप अपनी एनर्जी वहां क्यों लगा रहे हैं। जेफ्री मूर का सीधा सा फंडा है कि जो आपका कोर नहीं है उसे आउटसोर्स कर दो या उसे इतना सिंपल बना दो कि वो आपकी सोच का हिस्सा ही न रहे।
आजकल के दौर में तो यह और भी जरूरी हो गया है। आप अपनी पूरी मैनपावर को उस एक चीज पर लगाइये जो आपको मार्केट में यूनिक बनाती है। अगर आप एक सॉफ्टवेयर कंपनी हैं तो आपका कोर कोडिंग और यूजर एक्सपीरियंस होना चाहिए न कि ऑफिस की कैंटीन का मेन्यू डिसाइड करना। बहुत से बॉस खुद को बहुत बड़ा मैनेजर समझते हैं क्योंकि वो हर छोटी चीज में अपनी टांग अड़ाते हैं। असल में वो मैनेजमेंट नहीं कर रहे बल्कि वो अपनी कंपनी की ग्रोथ को धीमा कर रहे हैं।
जब आप कॉन्टेक्स्ट वाली चीजों पर ज्यादा ध्यान देते हैं तो आपकी असली ताकत यानी आपका कोर कमजोर होने लगता है। धीरे धीरे आपके कॉम्पिटिटर आपसे आगे निकल जाते हैं क्योंकि वो अपनी पूरी ताकत सिर्फ जीतने पर लगा रहे थे और आप इस बात पर रिसर्च कर रहे थे कि ऑफिस में प्रिंटर के लिए कौन सा पेपर सही रहेगा। डार्विन का इवोल्यूशन कहता है कि वही प्रजाति बचती है जो अपनी सबसे मजबूत खूबी को और ज्यादा निखारती है। इसलिए बेकार की चीजों को छोड़िये और अपनी उस एक खूबी को पकड़ लीजिये जो आपको इस भीड़ में अलग खड़ा करती है।
लेसन ३ : कैटेगरी मैच्योरिटी - वक्त के साथ ढलना ही असली समझदारी है
जब आप कोर और कॉन्टेक्स्ट का अंतर समझ जाते हैं, तब बारी आती है यह देखने की कि आपका पूरा मार्केट किस दिशा में जा रहा है। जेफ्री मूर कहते हैं कि हर बिजनेस कैटेगरी का एक लाइफ साइकिल होता है। जैसे इंसान बच्चा होता है, फिर जवान और फिर बूढ़ा, वैसे ही हर इंडस्ट्री भी मैच्योर होती है। अगर आप कल की जवानी के जोश में आज के बुढ़ापे का सामना करेंगे, तो मार्केट आपको किनारे लगा देगा। इसे हम कैटेगरी मैच्योरिटी कहते हैं और इसे इग्नोर करना बिजनेस के लिए सुसाइड जैसा है।
एक वक्त था जब ई-कॉमर्स इंडिया में बिल्कुल नया था। तब सिर्फ वेबसाइट होना ही अपने आप में एक बड़ा इनोवेशन था। लेकिन आज के समय में जब गली का किराना स्टोर भी व्हॉट्सएप पर आर्डर ले रहा है, तब वेबसाइट होना कोई बड़ी बात नहीं रह गई। अब यह कैटेगरी मैच्योर हो चुकी है। अब असली मुकाबला इस बात पर नहीं है कि किसके पास ऐप है, बल्कि इस बात पर है कि कौन १० मिनट में दूध और ब्रेड घर पहुंचा रहा है। अगर आप आज भी सिर्फ ऐप बनाने में खुशी मना रहे हैं, तो आप रेस से बाहर हैं।
जब मार्केट मैच्योर होता है, तो कस्टमर का बर्ताव बदल जाता है। शुरू में लोग रिस्क लेने को तैयार होते हैं, लेकिन बाद में उन्हें सिर्फ रिलायबिलिटी और कम दाम चाहिए होते हैं। यहाँ डार्विन का नियम कहता है कि आपको अपने बिजनेस मॉडल को पूरी तरह से री-इन्वेंट करना होगा। अब आपको प्रोडक्ट में नहीं, बल्कि अपने ऑपरेशन्स और कस्टमर रिलेशनशिप में इनोवेशन लाना होगा। जो कंपनी इस बदलाव को नहीं भांप पाती, वो एक शानदार म्यूजियम का हिस्सा बनकर रह जाती है।
अक्सर बड़े ब्रांड्स को लगता है कि उनकी पुरानी साख उन्हें हमेशा बचाए रखेगी। यह उनकी सबसे बड़ी गलतफहमी है। मार्केट को आपकी पुरानी कहानियों में कोई दिलचस्पी नहीं है, उसे मतलब है कि आप आज उसकी कौन सी प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हैं। अगर आपकी कैटेगरी मैच्योर हो गई है और आप अभी भी पुराने तरीके से मार्केटिंग कर रहे हैं, तो आप उस आदमी की तरह हैं जो टाइपराइटर के जमाने में सबसे तेज टाइपिंग की क्लास चला रहा है। हुनर बहुत है, पर उसकी जरूरत किसी को नहीं है।
तो आखिर में बात वहीं आती है कि क्या आप बदलने के लिए तैयार हैं। बदलाव दर्दनाक होता है, पर खत्म हो जाना उससे भी ज्यादा बुरा है। जेफ्री मूर की यह किताब हमें सिखाती है कि सर्वाइवल कोई किस्मत का खेल नहीं है, बल्कि यह एक सोची समझी स्ट्रेटेजी है। अपनी कैटेगरी को पहचानिये, अपने कोर पर फोकस कीजिये और सही वक्त पर सही इनोवेशन का दांव खेलिए। तभी आप डार्विन के इस बेरहम बिजनेस जंगल में एक लीजेंड की तरह जिंदा रह पाएंगे।
दोस्तो, बिजनेस सिर्फ पैसे कमाने की मशीन नहीं है, यह लगातार खुद को बेहतर बनाने का एक सफर है। क्या आप आज वो बदलाव करने की हिम्मत रखते हैं जो आपको कल का लीडर बनाएगा। या फिर आप बस इस भीड़ का हिस्सा बनकर गुमनाम हो जाना चाहते हैं। फैसला आपका है, क्योंकि डार्विन का इवोल्यूशन किसी का इंतजार नहीं करता। आज ही अपने बिजनेस के कोर को पहचानिये और उस पर काम करना शुरू कीजिये।
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