क्या आपको लगता है कि आप अपनी जिंदगी के मालिक हैं। सच तो यह है कि आपके गलत फैसले आपको भिखारी बना रहे हैं और आपको पता भी नहीं है। जब पड़ोसी तरक्की कर रहा है और आप अपनी पुरानी साइकिल का टायर पंचर जोड़ रहे हैं तब समझ आएगा कि चॉइसेज कितनी भारी पड़ती हैं।
आज के इस आर्टिकल में हम चिप हीथ और डैन हीथ की किताब डिसीसिव की मदद से वह ३ लेसन सीखेंगे जो आपके फैसले लेने के तरीके को पूरी तरह बदल देंगे। चलिए जानते हैं कैसे आप अपनी लाइफ और करियर में सही चुनाव कर सकते हैं।
लेसन १ : अपने ऑप्शंस को बड़ा करें और नैरो फ्रेमिंग के जाल से बाहर निकलें
अक्सर हम इंडियंस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम हर चीज को सिर्फ दो चश्मों से देखते हैं। या तो यह या फिर वो। जैसे कि शादी के लिए लड़का या तो सरकारी नौकरी वाला होगा या फिर अनपढ़ होगा। लाइफ में भी हम खुद को ऐसे ही एक बॉक्स में बंद कर लेते हैं जिसे ऑथर्स नैरो फ्रेमिंग कहते हैं। हम खुद से पूछते हैं कि क्या मुझे यह नौकरी छोड़ देनी चाहिए। क्या मुझे यह नया फोन खरीदना चाहिए। यहाँ हम सिर्फ हाँ या ना के बीच झूल रहे होते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप किसी ढाबे पर जाएँ और वेटर कहे कि भाईसाहब या तो दाल मखनी मिलेगी या फिर भूखे मर जाओ।
असलियत में आपके पास और भी बहुत सारे रास्ते होते हैं। लेकिन हमारा दिमाग इतना आलसी है कि वह तीसरे विकल्प के बारे में सोचना ही नहीं चाहता। मान लीजिए आप एक स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं और सोच रहे हैं कि क्या मैं अपनी फुल टाइम नौकरी छोड़ दूँ। यहाँ आप नैरो फ्रेमिंग का शिकार हैं। आप यह क्यों नहीं सोचते कि क्या मैं अपनी नौकरी के साथ वीकेंड पर काम कर सकता हूँ। या क्या मैं कंपनी से तीन महीने की बिना सैलरी वाली छुट्टी ले सकता हूँ। जब हम खुद को सिर्फ दो ऑप्शंस तक सीमित कर लेते हैं तब हम बेहतरीन मौकों को अपने हाथ से जाने देते हैं।
सोचिए आपके शर्मा जी का बेटा विदेश जा रहा है और आप यहाँ बैठे यह सोच रहे हैं कि क्या मुझे जिम जॉइन करना चाहिए या नहीं। अरे भाई आप यह भी तो सोच सकते हैं कि घर पर ही वर्कआउट शुरू कर दूँ या रोज सुबह पार्क में दौड़ लगाऊँ। नैरो फ्रेमिंग एक ऐसी बीमारी है जो आपको कुएँ का मेंढक बना देती है। हम अक्सर भावनाओं में बहकर सिर्फ वही देखते हैं जो हमारे सामने होता है। अगर आप किसी लड़के या लड़की को पसंद करते हैं तो आप बस यही सोचते हैं कि इससे शादी करूँ या न करूँ। आप यह भूल जाते हैं कि दुनिया में और भी अरबों लोग हैं और शायद आपको थोडा और समय लेकर सोचना चाहिए।
जिंदगी कोई फिल्म नहीं है जहाँ विलेन के पास सिर्फ एक ही रास्ता हो कि वह हीरो की मां को किडनैप कर ले। असल जिंदगी में स्मार्ट लोग हमेशा तीन या चार ऑप्शंस साथ लेकर चलते हैं। जब आप अपनी चॉइसेज को बढ़ाते हैं तो आपके सही फैसला लेने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। अगली बार जब भी आप किसी उलझन में हों तो खुद से पूछिए कि अगर मेरे पास ये दोनों ऑप्शंस न होते तो मैं क्या करता। यह सवाल आपके दिमाग के बंद दरवाजे खोल देगा। जब आप ऑप्शंस की बाढ़ ला देते हैं तब आप डर के मारे नहीं बल्कि समझदारी से फैसला लेते हैं। और यकीन मानिए जब ऑप्शंस ज्यादा होते हैं तब पड़ोसी की तरक्की देखकर जलन भी कम होती है क्योंकि आपको पता होता है कि आपका रास्ता बिलकुल अलग और सॉलिड है।
लेसन २ : इमोशनल दूरी बनाएँ और १०-१०-१० रूल का इस्तेमाल करें
जब हम कोई बड़ा फैसला लेते हैं तो हमारे अंदर की भावनाएँ किसी बॉलीवुड फिल्म के ड्रामे की तरह हावी हो जाती हैं। गुस्सा, डर या बहुत ज्यादा खुशी हमें अंधा बना देती है। आपने देखा होगा कि कैसे लोग गुस्से में आकर अपनी चश्मा तोड़ देते हैं या फिर सेल के चक्कर में वह कपड़े खरीद लेते हैं जिन्हें पहनकर वह खुद भी जोकर लगते हैं। ऑथर्स कहते हैं कि फैसले लेते समय अपनी भावनाओं से एक सुरक्षित दूरी बनाना बहुत जरूरी है। अगर आप आज कोई फैसला ले रहे हैं तो वह आपकी करंट फीलिंग्स पर बेस्ड नहीं होना चाहिए क्योंकि भावनाएँ तो मौसम की तरह बदलती रहती हैं। आज जो इंसान आपको अपनी जान से प्यारा लग रहा है, कल वही आपकी जान का दुश्मन बन सकता है।
यहाँ काम आता है एक जादुई फॉर्मूला जिसे १०-१०-१० रूल कहते हैं। जब भी आप किसी उलझन में हों तो खुद से पूछिए कि जो फैसला मैं आज ले रहा हूँ उसके बारे में मैं १० मिनट बाद कैसा महसूस करूँगा। फिर पूछिए कि १० महीने बाद मेरी क्या सोच होगी। और अंत में १० साल बाद उसका क्या असर होगा। मान लीजिए आपका अपने बॉस से झगड़ा हो गया और आप अभी के अभी इस्तीफा देना चाहते हैं। १० मिनट बाद तो आपको बड़ी तसल्ली मिलेगी कि आपने हीरो की तरह अपना पॉइंट रखा। लेकिन १० महीने बाद जब बैंक बैलेंस खत्म होगा और आप उधार मांग रहे होंगे तब वही फैसला आपको अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी लगेगा। और १० साल बाद शायद आपको याद भी न रहे कि वह बॉस कौन था और झगड़ा किस बात पर हुआ था।
हम अक्सर शॉर्ट टर्म इमोशंस के जाल में फंसकर लॉन्ग टर्म नुकसान कर बैठते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप डाइट पर हैं और सामने समोसे आ जाएँ। १० मिनट के लिए तो जीभ को जन्नत मिल जाएगी लेकिन १० महीने बाद जब शर्ट के बटन टूटने लगेंगे तब आपको अपनी उस कमजोरी पर रोना आएगा। हमारे इमोशंस हमें वर्तमान में कैद कर लेते हैं और हमें भविष्य का आईना नहीं देखने देते। अगर आप अपने दोस्त को उसकी गलती पर खरी खोटी सुनाना चाहते हैं तो बस एक बार १०-१०-१० सोच लीजिए। क्या यह रिश्ता १० साल बाद आपके लिए मायने रखेगा। अगर हाँ तो शायद आज चुप रहना ही बेहतर फैसला है।
सच्चाई तो यह है कि हमारे फैसले अक्सर हमारी ईगो या डर से कंट्रोल होते हैं। हम डरते हैं कि लोग क्या कहेंगे या फिर हम अपनी जिद्द पर अड़े रहते हैं। लेकिन जब आप खुद को एक तीसरे इंसान की तरह देखते हैं तब पिक्चर साफ होने लगती है। सोचिए कि अगर यही समस्या आपके बेस्ट फ्रेंड की होती तो आप उसे क्या सलाह देते। हम दूसरों को बड़ी समझदारी वाली सलाह देते हैं लेकिन जब खुद की बारी आती है तो हम फेल हो जाते हैं क्योंकि हम भावनाओं में डूबे होते हैं। इमोशनल दूरी बनाने का मतलब पत्थर दिल होना नहीं है बल्कि अपने दिमाग को शांत करके यह देखना है कि सच में जरूरी क्या है। जब आप अपनी भावनाओं को एक किनारे रख देते हैं तो आप अपनी लाइफ के रिमोट कंट्रोल को वापस अपने हाथ में ले लेते हैं।
लेसन ३ : गलत होने की तैयारी रखें और ऊप्स मोमेंट से बचें
हमें लगता है कि हम भविष्य के ज्योतिषी हैं। हम पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कहते हैं कि भाई यह बिजनेस तो पक्का चलेगा या फिर यह शेयर तो आसमान छुएगा। लेकिन सच तो यह है कि किस्मत और वक्त किसी के सगे नहीं होते। ऑथर्स कहते हैं कि एक बेहतर फैसला लेने वाला इंसान वह नहीं है जिसे लगता है कि वह कभी गलत नहीं होगा बल्कि वह है जो पहले से मानकर चलता है कि उसका फैसला गलत हो सकता है। इसे कहते हैं भविष्य की गलतियों की तैयारी करना। अगर आप बिना पैराशूट के हवाई जहाज से कूद रहे हैं और सोच रहे हैं कि हवा मुझे बचा लेगी तो आप पॉजिटिव नहीं बल्कि बेवकूफ हैं।
यहाँ एक बहुत कूल कॉन्सेप्ट आता है जिसे प्री मार्टम कहते हैं। फैसला लेने के बाद यह इमेजिन कीजिए कि एक साल बीत चुका है और आपका फैसला बुरी तरह फेल हो गया है। अब खुद से पूछिए कि ऐसा क्यों हुआ होगा। क्या बजट खत्म हो गया। क्या टीम ने साथ छोड़ दिया। या फिर मार्केट ही बदल गया। जब आप अपनी नाकामी के कारण पहले ही ढूंढ लेते हैं तो आप उन गड्ढों को पहले ही भर सकते हैं। जैसे शादी से पहले लोग यह नहीं सोचते कि अगर लड़ाई हुई तो क्या होगा। वह तो बस शहनाई और पनीर के बारे में सोचते हैं। लेकिन समझदार इंसान वह है जो पहले से जानता है कि अगर हालात बिगड़े तो उसके पास क्या रास्ता है।
ज्यादातर लोग ओवरकॉन्फिडेंस के शिकार होते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी रिसर्च परफेक्ट है। लेकिन भाई साहब जब आपके पड़ोस वाले चाचा ने अपनी सारी जमापूंजी एक ऐसी स्कीम में लगा दी जो रातों रात गायब हो गई तब उन्हें समझ आया कि गलत होने की गुंजाइश रखना क्या होता है। आपको हमेशा एक बुकएंड बनाकर चलना चाहिए। यानी बेस्ट केस और वर्स्ट केस सिनेरियो। अगर सब कुछ सही रहा तो क्या होगा और अगर सब कुछ मिट्टी में मिल गया तो मैं कहाँ खड़ा हूँगा। जब आप हारने की तैयारी कर लेते हैं तो आपके जीतने के चांस अपने आप बढ़ जाते हैं।
अंत में याद रखिए कि कोई भी फैसला पत्थर की लकीर नहीं होता। चिप हीथ कहते हैं कि हमें छोटे छोटे प्रयोग करने चाहिए जिन्हें वह ऊचिंग कहते हैं। अगर आपको स्विमिंग सीखनी है तो सीधे गहरे समंदर में छलांग मत मारिए। पहले किनारे पर पैर डालिए। अपनी लाइफ के बड़े फैसलों को छोटे छोटे टेस्ट में बदल दीजिए। अगर कोई नौकरी जॉइन करनी है तो पहले वहां के लोगों से बात कीजिए। अगर कोई नया काम शुरू करना है तो पहले उसे पार्ट टाइम करके देखिए। जब आप गलतियों को छोटा कर देते हैं तो बड़ा नुकसान कभी नहीं होता। सही फैसला लेना कोई जादू नहीं है बल्कि यह एक प्रोसेस है जिसे आपको हर दिन फॉलो करना है।
तो दोस्तों, क्या आप अभी भी उन्हीं पुराने घिसे पिटे तरीकों से अपनी लाइफ के फैसले ले रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि आप अपनी सोच के दायरे को बढ़ाएं। इमोशंस को अपनी अक्ल पर हावी न होने दें और हमेशा एक बैकअप प्लान तैयार रखें। याद रखिए कि आपकी आज की एक छोटी सी चॉइस आपके कल की पूरी कहानी बदल सकती है।
अब आपकी बारी है। नीचे कमेंट करके बताइए कि आपकी जिंदगी का वह कौन सा फैसला था जिसे लेते समय आपने सिर्फ हाँ या ना में सोचा था। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा कन्फ्यूज रहता है। चलिए मिलकर बेहतर और समझदार इंडिया बनाते हैं।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#BookSummary #PersonalDevelopment #DecisionMaking #SuccessTips #Motivational
_