बधाई हो, आप दुनिया के सबसे अमीर इंसान बनकर मरने की रेस जीत रहे हैं। पर क्या आपने सोचा है कि ऊपर यमराज आपकी बैंक बैलेंस नहीं बल्कि आपकी अधूरी इच्छाओं की लिस्ट चेक करेंगे। अगर आप अपनी जवानी की मेहनत का फल बुढ़ापे में हॉस्पिटल के बिल भरने के लिए बचा रहे हैं तो आपसे बड़ा बेवकूफ कोई नहीं है।
आज हम बिल पर्किन्स की बुक डाई विथ जीरो से सीखेंगे कि कैसे अपनी मेहनत की कमाई को सही समय पर खर्च करके आप एक रिग्रेट फ्री लाइफ जी सकते हैं। चलिए उन ३ लेसन्स को समझते हैं जो आपके पैसे देखने के नजरिए को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : मेमरी डिविडेंड का जादू
क्या आपको याद है वो कॉलेज ट्रिप जिसके लिए आपने अपने पापा से लड़ाई की थी। या वो पहली डेट जहाँ आपने अपनी जेब खाली कर दी थी। आज शायद वो पैसा आपको याद भी न हो पर वो यादें आज भी आपके चेहरे पर स्माइल ले आती हैं। बिल पर्किन्स कहते हैं कि जब हम किसी एक्सपीरियंस पर पैसा खर्च करते हैं तो हम सिर्फ एक टिकट या होटल रूम नहीं खरीद रहे होते। हम असल में एक मेमरी डिविडेंड खरीद रहे होते हैं। जैसे स्टॉक मार्केट में शेयर आपको हर साल डिविडेंड यानी मुनाफा देते हैं वैसे ही आपकी यादें आपको जिंदगी भर खुशियों का रिटर्न देती रहती हैं। लोग अक्सर सोचते हैं कि पैसा बचाना ही सबसे बड़ी अक्लमंदी है। पर भाई साहब अगर आप साठ साल की उम्र में पहली बार यूरोप ट्रिप पर जा रहे हैं तो शायद आप वहां की सड़कों पर चलने के बजाय व्हीलचेयर ढूंढ रहे होंगे।
इमेजिन करिए कि एक लड़का है राहुल। राहुल दिन रात काम करता है ताकि वो रिटायरमेंट के बाद अपनी पसंद की बाइक खरीद सके। अब राहुल साठ साल का हो गया है। उसके पास पैसा है और वो चमचमाती बाइक भी है। पर दिक्कत ये है कि अब राहुल के घुटने उस बाइक का वजन नहीं सह सकते। अब वो उस बाइक को सिर्फ गैराज में खड़ा करके देख सकता है। इसे ही बिल पर्किन्स कहते हैं पैसा बर्बाद करना। राहुल ने अपनी जवानी का जोश और समय उस पैसे के पीछे कुर्बान कर दिया जिसका आनंद वो अब ले ही नहीं सकता। अगर वही राहुल अपनी पच्चीस साल की उम्र में लोन लेकर भी वो ट्रिप कर लेता तो आज उसके पास चालीस साल की शानदार यादें होतीं। वो यादें ही असली दौलत हैं जो उम्र के साथ बढ़ती जाती हैं।
हम इंडियंस की सबसे बड़ी बीमारी है कि हम हमेशा कल के लिए जीते हैं। आज की समोसे वाली पार्टी छोड़ देंगे ताकि बुढ़ापे में दवाइयों के लिए पैसे कम न पड़ें। लेकिन सच तो ये है कि आपकी यादों का कंपाउंडिंग इफेक्ट आपके बैंक के ब्याज से कहीं ज्यादा होता है। आप बीस साल की उम्र में जो ट्रेकिंग करेंगे उसका मजा आप अपनी पूरी जिंदगी बार बार याद करके ले सकते हैं। पर अस्सी साल की उम्र में किया गया खर्चा आपको बहुत कम समय का रिटर्न देगा। इसलिए कंजूस मत बनिए। अपनी यादों के बैंक में इन्वेस्ट करना शुरू करिए। पैसा तो फिर आ जाएगा पर वो उम्र और वो जोश दोबारा कभी वापस नहीं आएगा। याद रखिए कि आप अपनी यादों के साथ मरते हैं अपने बैंक बैलेंस के साथ नहीं।
लेसन २ : मरने से पहले जीरो होना
जरा सोचिए कि आप अपनी पूरी जिंदगी एक गधे की तरह काम करते हैं ताकि आप करोड़ों की प्रॉपर्टी जोड़ सकें। और फिर एक दिन अचानक आप भगवान को प्यारे हो जाते हैं। अब वो सारा पैसा या तो आपके रिश्तेदार उड़ाएंगे या फिर सरकार टैक्स में ले जाएगी। बिल पर्किन्स कहते हैं कि अगर आप अपने बैंक में एक करोड़ रुपए छोड़कर मरे हैं तो इसका मतलब है कि आपने अपनी जिंदगी के वो कीमती घंटे मुफ्त में काम किया जिन्हें आप एन्जॉय कर सकते थे। इसे कहते हैं लाइफ को ठीक से प्लान न करना। लोग अक्सर सेविंग के चक्कर में अपनी असली लाइफ जीना ही भूल जाते हैं। जैसे किसी फिल्म का टिकट लेकर आप आधी फिल्म देख कर बाहर आ जाएं और बाकी का पैसा थिएटर वाले को दान कर दें। क्या यह अक्लमंदी है। बिल्कुल नहीं।
यहाँ बात सिर्फ फिजूलखर्ची की नहीं है। बात है अपनी मेहनत की कमाई का पूरा फायदा उठाने की। मान लीजिए मिस्टर शर्मा हैं जो बहुत बड़े कंजूस हैं। उन्होंने पूरी लाइफ एक एक पैसा बचाया। यहाँ तक कि उन्होंने कभी अच्छे कपड़े नहीं खरीदे और न ही कभी बाहर खाना खाया। जब वो सत्तर साल के हुए तो उनके पास दो करोड़ रुपए थे। पर अब उनकी तबियत इतनी खराब रहती है कि वो दाल चावल के अलावा कुछ खा नहीं सकते और बेड से उठ भी नहीं सकते। अब वो दो करोड़ रुपए उनके किस काम के। वो पैसा अब सिर्फ एक नंबर है जो स्क्रीन पर दिखता है। अगर शर्मा जी ने वही पैसा अपनी मिडिल एज में अपने बच्चों की पढ़ाई या अपनी पत्नी के साथ घूमने में खर्च किया होता तो आज उनके पास पछतावा नहीं बल्कि सुकून होता।
मरने से पहले जीरो होने का मतलब ये नहीं है कि आप कल ही अपनी सारी जमा पूंजी उड़ा दें और परसों भीख मांगें। इसका मतलब है अपनी लाइफ की यूटिलिटी को मैक्सिमाइज करना। आपको यह कैलकुलेट करना होगा कि आपको अपनी बची हुई जिंदगी के लिए असल में कितने पैसे चाहिए। बाकी का पैसा आपको उन चीजों पर लगा देना चाहिए जो आपको सच्ची खुशी दें। चाहे वो किसी की मदद करना हो या अपने किसी पुराने शौक को पूरा करना। बहुत से लोग सोचते हैं कि वो अपने बच्चों के लिए करोड़ों छोड़कर जाएंगे। पर पर्किन्स कहते हैं कि अपने बच्चों को पैसे तब दें जब उन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत हो यानी जब वो अपने करियर के शुरुआती दौर में हों। उन्हें अस्सी साल की उम्र में वसीयत देने का कोई मतलब नहीं है जब वो खुद बूढ़े हो चुके होंगे।
अपनी दौलत को सही समय पर खत्म करना एक आर्ट है। अगर आप बहुत ज्यादा पैसा छोड़कर जा रहे हैं तो आपने अपनी लाइफ के हजारों घंटे बर्बाद कर दिए जो आप अपनों के साथ बिता सकते थे। ये समाज हमें सिखाता है कि जितना ज्यादा पैसा उतनी ज्यादा सफलता। पर असली सफलता तो वो है कि जब आप इस दुनिया से जाएं तो आपका बैंक अकाउंट भले ही जीरो हो पर आपका दिल अनुभवों से भरा हो। तो अगली बार जब आप ओवर टाइम करने का सोचें तो खुद से पूछिए कि क्या ये पैसा सच में आपकी लाइफ की क्वालिटी बढ़ाएगा या सिर्फ आपकी वसीयत की रकम। पैसे के गुलाम मत बनिए बल्कि उसे अपनी खुशियों का जरिया बनाइए।
लेसन ३ : टाइम बकेट का सही इस्तेमाल
जिंदगी कोई वीडियो गेम नहीं है जहाँ आप लेवल हारने पर फिर से स्टार्ट कर सकें। यहाँ हर स्टेज का एक ही मौका मिलता है। बिल पर्किन्स हमें टाइम बकेट का कांसेप्ट समझाते हैं। इसका मतलब है कि आप अपनी बकेट लिस्ट को उम्र के हिसाब से बाँट दें। बहुत से लोग सोचते हैं कि जब रिटायर होंगे तब दुनिया घूमेंगे। पर क्या आपको लगता है कि सत्तर साल की उम्र में आप पहाड़ों पर चढ़ पाएंगे या रात भर पार्टी कर पाएंगे। हर एक्टिविटी की एक एक्सपायरी डेट होती है। अगर आप अपने सपनों को कल पर टाल रहे हैं तो आप असल में उन सपनों का गला घोंट रहे हैं। समय और पैसा दोनों का तालमेल बिठाना ही असली अमीरी है।
एक शख्स है अमित। अमित को वाटर स्पोर्ट्स और एडवेंचर का बहुत शौक है। वो सोचता है कि अभी तो करियर बनाने का टाइम है तो वो दिन रात ऑफिस में घिसता रहता है। वो अपनी इच्छाओं को अपनी साठ साल वाली बकेट में डाल देता है। अब अमित साठ साल का हो गया और उसके पास बहुत पैसा है। वो स्कूबा डाइविंग करने जाता है पर डॉक्टर उसे मना कर देते हैं क्योंकि उसका ब्लड प्रेशर हाई है। अमित के पास पैसा तो है पर वो फिजिकल एबिलिटी नहीं रही जो पच्चीस साल की उम्र में थी। अमित ने अपना वो टाइम बकेट मिस कर दिया। अब वो चाहकर भी उस मजे को वापस नहीं पा सकता। इसलिए जो काम आप आज कर सकते हैं उसे बुढ़ापे के भरोसे मत छोड़िए।
हम अक्सर पैसों को बचाने में इतने बिजी हो जाते हैं कि हम भूल जाते हैं कि समय सबसे कीमती रिसोर्स है। पैसा दोबारा कमाया जा सकता है पर बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। आपको अपनी लाइफ को पांच या दस साल के ब्लॉक्स में डिवाइड करना चाहिए। पूछिए खुद से कि ऐसे कौन से काम हैं जो मुझे तीस की उम्र से पहले करने हैं और कौन से चालीस की उम्र से पहले। अगर आप अपनी पूरी जवानी सिर्फ बैंक बैलेंस बढ़ाने में निकाल देंगे तो यकीन मानिए आप एक अमीर लाश के अलावा और कुछ नहीं बनेंगे। हेल्थ और वेल्थ का ग्राफ हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जैसे जैसे उम्र बढ़ती है पैसा खर्च करने की आपकी क्षमता और उसका आनंद लेने की ताकत कम होने लगती है।
डाई विथ जीरो का असली मतलब यही है कि आप अपनी लाइफ के हर फेज को उसकी पूरी कैपेसिटी के साथ जिएं। कंजूसी और सेविंग के बीच की पतली लकीर को पहचानिए। अपने आप को वो चीजें अभी दीजिए जिनकी आपको आज जरूरत है। कल शायद आपके पास पैसा और ज्यादा हो पर उसे एन्जॉय करने वाली सेहत और भूख न हो। अपनी खुशियों को फिक्स्ड डिपॉजिट में मत डालिए क्योंकि यादों का कोई नॉमिनी नहीं होता। अपनी लाइफ की स्क्रिप्ट खुद लिखिए और हर सीन को पूरी शिद्दत से जिएं। पैसा सिर्फ एक टूल है उसे भगवान मत बनाइए।
तो दोस्तों, क्या आप भी उस रेस का हिस्सा हैं जिसका कोई फिनिशिंग पॉइंट नहीं है। आज ही बैठिए और अपनी टाइम बकेट बनाइए। सोचिए कि वो कौन सा काम है जो आप पैसों की वजह से टाल रहे हैं जबकि आपकी उम्र निकली जा रही है। अपनी पहली मेमरी डिविडेंड आज ही बुक करिए। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो बहुत बड़ा कंजूस है और उसे याद दिलाएं कि कफन में जेब नहीं होती। नीचे कमेंट में बताएं कि आप अपनी कौन सी एक अधूरी ख्वाहिश इसी साल पूरी करने वाले हैं। चलिए साथ मिलकर एक ऐसी लाइफ बनाते हैं जहाँ बैंक अकाउंट खाली हो पर यादें ओवरफ्लो कर रही हों।
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