क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ऑफिस मीटिंग में अपना बेस्ट आइडिया देते हैं और बॉस उसे कचरे के डिब्बे में डाल देता है। आपकी मेहनत बेकार जा रही है क्योंकि आपको अपनी बात बेचना नहीं आता। ऐसे ही चुपचाप बैठे रहिए और दूसरों को प्रमोशन लेते देखते रहिए।
आज हम जॉन स्पोल्स्ट्रा की बुक से वो तरीके सीखेंगे जिससे आपका बॉस आपके हर आइडिया को बिना सोचे समझे हां कह देगा। तैयार हो जाइए अपनी वैल्यू बढ़ाने के लिए।
लेसन १ : बॉस को आइडिया नहीं बल्कि प्रॉफिट और रिजल्ट्स बेचें
क्या आपको लगता है कि आपका बॉस एक बहुत बड़ा विजनरी इंसान है जो दुनिया बदलने के सपने देखता है। अगर हाँ तो आप शायद किसी फिल्म में जी रहे हैं। हकीकत में आपके बॉस को सिर्फ एक चीज से प्यार है और वो है रिजल्ट्स। जॉन स्पोल्स्ट्रा कहते हैं कि जब भी आप कोई नया प्लान लेकर जाते हैं तो आप भावनाओं में बह जाते हैं। आप बताते हैं कि ये आइडिया कितना कूल है और आप इसके लिए कितने एक्साइटेड हैं। पर यकीन मानिए आपके बॉस को आपकी एक्साइटमेंट से उतना ही मतलब है जितना कि पड़ोस वाली आंटी को आपकी सैलरी से। उन्हें बस ये जानना है कि इस काम से कंपनी का बैंक बैलेंस कितना बढ़ेगा या उनका सरदर्द कितना कम होगा।
मान लीजिए आप एक मार्केटिंग टीम में हैं। आप बॉस के पास जाते हैं और कहते हैं कि सर हमें सोशल मीडिया पर बहुत ही फनी वीडियो बनाने चाहिए क्योंकि ये आजकल ट्रेंड में है। आपका बॉस आपको ऐसी नजर से देखेगा जैसे आपने उनसे किडनी मांग ली हो। उनके दिमाग में सिर्फ ये चलेगा कि इसमें टाइम खराब होगा और लोग हमारा मजाक उड़ाएंगे। लेकिन अगर आप इसी बात को अलग तरह से कहें। आप कहें कि सर अगर हम ये तीन शॉर्ट वीडियो बनाएंगे तो हमारी सेल्स १५ परसेंट बढ़ सकती है और कॉम्पिटिटर के कस्टमर हमारे पास आ जाएंगे। अब देखिए चमत्कार। उनके कान खड़े हो जाएंगे। अब उन्हें वीडियो में इंटरेस्ट नहीं है बल्कि उस १५ परसेंट मुनाफे में इंटरेस्ट है जो आप उन्हें दिखा रहे हैं।
ज्यादातर लोग ऑफिस में रोते रहते हैं कि बॉस मेरी सुनता ही नहीं। भाई साहब वो सुनेगा भी क्यों। आप उसे काम बढ़ा कर दे रहे हैं मुनाफा नहीं। जब आप कहते हैं कि हमें एक नया सॉफ्टवेयर चाहिए क्योंकि ये नया है तो बॉस को सिर्फ उसका खर्चा और उसे सीखने की आफत दिखती है। लेकिन जब आप कहते हैं कि इस सॉफ्टवेयर से हमारी टीम का रोज का दो घंटा बचेगा जिससे हम ज्यादा क्लाइंट हैंडल कर पाएंगे तो मामला बदल जाता है। ये एक सिंपल सा साइकोलॉजिकल गेम है। आपको खुद को एक सेल्समैन समझना होगा। एक ऐसा सेल्समैन जो अपना प्रोडक्ट नहीं बल्कि सामने वाले की प्रॉब्लम का सोल्यूशन बेच रहा है।
ऑफिस की राजनीति और काम के बोझ के बीच हर बॉस डरा हुआ होता है। उसे डर होता है कि कहीं उसका टारगेट मिस ना हो जाए। जब आप अपना आइडिया लेकर जाते हैं तो आप दरअसल उनके उस डर को बढ़ा देते हैं क्योंकि हर नया काम अपने साथ एक नया रिस्क लाता है। इसलिए आपका पहला काम है अपने आइडिया को पैसों की भाषा में ट्रांसलेट करना। अगर आपका आइडिया कंपनी का एक रुपया भी बचा रहा है या दो रुपया कमा कर दे रहा है तो आप सही ट्रैक पर हैं। बिना डेटा और बिना रिजल्ट्स के आइडिया पेश करना वैसा ही है जैसे बिना दूल्हे के बारात ले जाना। कोई आपको घास भी नहीं डालेगा।
अगली बार जब मीटिंग रूम में कदम रखें तो अपनी क्रिएटिविटी को थोड़ा साइड में रखें और कैलकुलेटर को साथ लेकर जाएं। उन्हें दिखाएं कि आपका आइडिया कैसे उनकी कुर्सी को और मजबूत करेगा। जब आप उन्हें वो जीत दिलाएंगे जो वो चाहते हैं तो वो आपको वो परमिशन देंगे जो आप चाहते हैं। ये लेन देन का सीधा सा हिसाब है। इसमें कोई रॉकेट साइंस नहीं है बस थोड़ी सी चालाकी और सही दिशा में मेहनत की जरूरत है। अगर आप ये समझ गए तो समझिए आपने आधी जंग जीत ली।
लेसन २ : रिस्क का भूत भगाएं और बॉस को सेफ फील कराएं
पिछले लेसन में हमने समझा कि बॉस को प्रॉफिट का लालच देना कितना जरूरी है। लेकिन मान लीजिए आपने उन्हें करोड़ों के मुनाफे का सपना दिखा दिया पर फिर भी वो हिचकिचा रहे हैं। जानते हैं क्यों। क्योंकि हर बॉस के अंदर एक डरपोक बच्चा छिपा होता है जिसे फेल होने से बहुत डर लगता है। जॉन स्पोल्स्ट्रा कहते हैं कि जब भी आप कोई नया आइडिया देते हैं तो बॉस को उसमें अपॉर्चुनिटी कम और अपनी नौकरी पर खतरा ज्यादा दिखता है। उन्हें लगता है कि अगर ये आइडिया फुस्स हो गया तो ऊपर से गालियां उन्हें पड़ेंगी। इसलिए आपका दूसरा बड़ा काम है उनके इस डर का इलाज करना। आपको अपने आइडिया को इतना सुरक्षित बनाना होगा कि उन्हें लगे कि इसमें हारने का कोई चांस ही नहीं है।
मान लीजिए आप अपने घर में एक पालतू कुत्ता लाना चाहते हैं। अगर आप सीधे जाकर कहेंगे कि मुझे एक बड़ा सा जर्मन शेफर्ड चाहिए तो आपके घरवाले तुरंत मना कर देंगे। उनके दिमाग में आएगा कि घर गंदा होगा और इसे संभालेगा कौन। लेकिन अगर आप कहें कि मेरा दोस्त दस दिन के लिए बाहर जा रहा है और हमें बस उसके छोटे से पपी को दस दिन संभालना है। अब रिस्क कम हो गया है। दस दिन बाद जब सबको उस पपी से प्यार हो जाएगा तो वो खुद ही उसे रखने की बात करेंगे। ऑफिस में भी यही ट्रिक काम करती है। किसी बड़े प्रोजेक्ट की सीधे परमिशन मांगने के बजाय एक छोटे से पायलट प्रोजेक्ट की बात करें।
जब आप कहते हैं कि हमें पूरे इंडिया में ये नया कैंपेन लॉन्च करना चाहिए तो बॉस को पसीने आने लगते हैं। इसके बजाय आप कहिए कि सर हम बस एक हफ्ते के लिए एक छोटे से शहर में इसे टेस्ट करके देखते हैं। अगर वहां रिजल्ट अच्छा आया तो आगे बढ़ेंगे वरना इसे वहीं रोक देंगे। अब बॉस को लगेगा कि खोने के लिए तो कुछ है ही नहीं। आपने उनके कंधे से जिम्मेदारी का बोझ उतार कर डेटा पर डाल दिया है। इसे ही कहते हैं रिस्क को छोटे टुकड़ों में बांटना। जब रिस्क छोटा होता है तो हां सुनने की गुंजाइश सौ गुना बढ़ जाती है।
अक्सर लोग अपनी ईगो के चक्कर में बॉस को ये यकीन दिलाने की कोशिश करते हैं कि वो गलत हैं। ये सबसे बड़ी बेवकूफी है। बॉस को कभी ये मत लगने दीजिए कि आप उनके सिस्टम को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। इसके बजाय उन्हें ये फील कराएं कि आपका आइडिया उनके मौजूदा सिस्टम को और बेहतर बनाएगा। अगर आप उन्हें ये यकीन दिला दें कि इस प्लान के फेल होने पर भी उनका नाम खराब नहीं होगा तो वो आपको ग्रीन सिग्नल देने में एक सेकंड भी नहीं लगाएंगे।
याद रखिए ऑफिस की दुनिया में सबसे बड़ी करेंसी भरोसा है। अगर आप बार बार छोटे छोटे रिस्क लेकर उन्हें जीत दिलाते रहेंगे तो एक दिन ऐसा आएगा जब आप बड़े से बड़ा आइडिया भी देंगे तो वो बिना सवाल किए मान लेंगे। लेकिन वहां तक पहुँचने के लिए आपको पहले उनके डर का डॉक्टर बनना पड़ेगा। जब आप उन्हें सेफ महसूस कराते हैं तो आप दरअसल अपनी तरक्की का रास्ता साफ कर रहे होते हैं। और एक बार जब वो आपको अपना सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी मान लेंगे तो फिर देखिए कैसे आपके आइडियाज रॉकेट की तरह उड़ते हैं।
लेसन ३ : अपने आइडिया को उनका आइडिया बना दें
अब तक आपने बॉस को फायदा भी दिखा दिया और उनका डर भी दूर कर दिया। लेकिन फिर भी एक चीज आपके रास्ते में आ सकती है और वो है बॉस की अपनी ईगो। कॉर्पोरेट दुनिया का एक कड़वा सच ये है कि कई बार बॉस आपके आइडिया को सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर देते हैं क्योंकि वो आपका आइडिया है उनका नहीं। जॉन स्पोल्स्ट्रा एक बहुत ही स्मार्ट तरीका बताते हैं जिसे वो 'इन्विजिबल सेलिंग' कहते हैं। इसमें आप अपनी बात इस तरह पेश करते हैं कि अंत में बॉस को लगता है कि ये मास्टरप्लान तो उन्हीं के दिमाग की उपज था। और यकीन मानिए जब किसी को लगता है कि आइडिया उनका है तो वो उसे सफल बनाने के लिए जमीन आसमान एक कर देते हैं।
मान लीजिए आपको ऑफिस के वर्किंग ऑवर्स बदलने हैं। अगर आप सीधे जाकर कहेंगे कि सर कल से हम सब नौ बजे के बजाय दस बजे आएंगे तो बॉस को लगेगा कि आप काम से जी चुरा रहे हैं। लेकिन अगर आप बातों बातों में उनसे पूछें कि सर क्या आपने नोटिस किया है कि सुबह के पहले एक घंटे में ट्रैफिक की वजह से टीम काफी थकी हुई आती है। फिर थोड़ा रुक कर कहें कि आपने पिछले हफ्ते वो जो फ्लेक्सिबिलिटी की बात की थी क्या हम उसे यहां इस्तेमाल कर सकते हैं। अब आपने उनके दिमाग में एक बीज बो दिया है। थोड़ी देर बाद बॉस खुद कहेंगे कि क्यों ना हम टाइमिंग आधा घंटा आगे बढ़ा कर देखें। बस यही आपका मौका है। अब आपको नाचने की जरूरत नहीं है बल्कि बहुत ही सीरियस चेहरा बनाकर कहना है कि सर क्या ब्रिलियंट आइडिया है ये तो मैंने सोचा ही नहीं था।
ये सुनने में थोड़ा चापलूसी जैसा लग सकता है पर ये असल में एक बहुत ही गहरी साइकोलॉजी है। दुनिया में हर इंसान चाहता है कि उसे स्मार्ट समझा जाए। जब आप सारा क्रेडिट खुद लेने की कोशिश करते हैं तो आप अनजाने में अपने बॉस को नीचा दिखा रहे होते हैं। इसके बजाय अगर आप उन्हें क्रेडिट का तोहफा दे दें तो वो आपके सबसे बड़े सपोर्टर बन जाएंगे। आपको फिल्म का हीरो नहीं बल्कि वो डायरेक्टर बनना है जो पर्दे के पीछे रहकर पूरी कहानी कंट्रोल करता है। जब क्रेडिट बॉस को मिलता है तो जिम्मेदारी भी उनकी हो जाती है और फिर उस आइडिया को फेल होने से बचाने के लिए वो अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं।
अक्सर लोग मीटिंग में चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं कि ये मेरा आइडिया है। ऐसे लोग अक्सर वहीं के वहीं रह जाते हैं। असली खिलाड़ी वो है जो जानता है कि अगर काम करवाना है तो अपनी ईगो को घर छोड़कर आना होगा। जब आप अपनी टीम या अपने बॉस के सामने इस तरह से बात करते हैं कि 'जैसा कि आपने कल सुझाव दिया था' या 'आपकी उस बात से प्रेरित होकर मैंने ये सोचा' तो आप उनके बचाव के सारे रास्ते बंद कर देते हैं। अब वो आपके आइडिया का विरोध नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करना मतलब खुद का विरोध करना होगा।
आपकी जीत इस बात में नहीं है कि आपका नाम बोर्ड पर लिखा जाए बल्कि इस बात में है कि आपका काम जमीन पर उतर आए। जब आपका आइडिया अप्रूव हो जाता है और उसके रिजल्ट्स आते हैं तो हर कोई जानता है कि इसके पीछे असली दिमाग किसका था। आपको ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तो अगली बार जब कोई धांसू प्लान दिमाग में आए तो उसे सीधे पेश मत कीजिए। उसे धीरे धीरे बॉस की बातचीत का हिस्सा बनाइए और उन्हें खुद उस नतीजे तक पहुँचने दीजिए। जिस दिन आप दूसरों के दिमाग में अपने विचार बोना सीख जाएंगे उस दिन आपको किसी की परमिशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। लोग खुद आपके पास आकर कहेंगे कि भाई ये काम शुरू करो।
ऑफिस में सिर्फ मेहनत करना काफी नहीं है बल्कि अपनी मेहनत को सही तरीके से बेचना भी एक कला है। आज से ही अपनी ईगो को साइड में रखें और ऊपर दिए गए इन ३ लेसन्स को अपनी प्रोफेशनल लाइफ में उतारें। याद रखिए आपकी ग्रोथ आपके हाथ में है। अगर आपको ये बातें समझ आई हों तो इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसका बॉस कभी उसकी नहीं सुनता। कमेंट्स में बताएं कि क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि आपका आइडिया रिजेक्ट हुआ हो। चलिए साथ मिलकर ग्रो करते हैं।
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