क्या आप अभी भी वही पुराने घिसे पिटे तरीके यूज करके लोगों से अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहे हैं और हर बार फेल हो रहे हैं। सच तो यह है कि आपको कोई सीरियसली ले ही नहीं रहा है क्योंकि आपको इन्फ्लुएंस की एबीसीडी भी नहीं पता है। दुनिया आपका फायदा उठाकर निकल जाएगी और आप बस हाथ मलते रह जाएंगे क्योंकि आप आज भी इतने नादान हैं कि साइकोलॉजी को नहीं समझते।
लेकिन चिंता मत कीजिए। आज हम रॉबर्ट सियाल्डिनी की वर्ल्ड फेमस बुक इन्फ्लुएंस से वो राज खोलेंगे जो आपको एक आम इंसान से मास्टर पर्सुडर बना देंगे। चलिए जानते हैं वो ३ कमाल के लेसन जो आपकी लाइफ बदल देंगे।
लेसन १ : रेसिप्रोसिटी - पहले आप फिर मैं
क्या आपको वो दोस्त याद है जो आपकी शादी में ५०० रुपये का लिफाफा देकर गया था और अब जब उसकी बहन की शादी है तो आप १००० रुपये देने की प्लानिंग कर रहे हैं। यही है रेसिप्रोसिटी का असली खेल। रॉबर्ट सियाल्डिनी कहते हैं कि इंसान का दिमाग एक अजीब उधार के बोझ तले दबा रहता है। अगर किसी ने आपके लिए छोटा सा भी फेवर किया है तो आपका मन तब तक शांत नहीं बैठता जब तक आप उसे वापस न कर दें। मार्केटिंग की दुनिया में इसे फ्री सैंपल के नाम से जाना जाता है।
सोचिए आप किसी शोरूम में जाते हैं और वो सेल्समैन आपको एक फ्री कोल्ड ड्रिंक पिला देता है। अब आपको अंदर ही अंदर एक गिल्ट महसूस होने लगता है। आपको लगता है कि यार इसने इतनी इज्जत दी है तो अब खाली हाथ बाहर जाना अच्छा नहीं लगेगा। भले ही आपको वो टी शर्ट पसंद न आ रही हो लेकिन आप उस कोल्ड ड्रिंक के अहसान तले दबकर उसे खरीद लेते हैं। यह कोई जादू नहीं है बल्कि आपके दिमाग की प्रोग्रामिंग है। हम उन लोगों को कभी पसंद नहीं करते जो सिर्फ लेना जानते हैं और देना नहीं। समाज में ऐसे लोगों को मतलबी कहा जाता है और कोई भी मतलबी नहीं कहलाना चाहता।
मान लीजिए आपके पड़ोस वाले अंकल ने आपके घर दिवाली पर मिठाई का डब्बा भेजा। अब आपकी मम्मी की जान तब तक हलक में अटकी रहेगी जब तक वो उनसे बड़ा डब्बा उनके घर न पहुंचा दें। चाहे घर में पैसे हों या न हों लेकिन वापसी तो करनी पड़ेगी। ऑफिस में भी यही होता है। अगर कोई कुलीग आपकी एक बार हेल्प कर दे तो अगली बार जब वो आपसे कोई गलत काम भी करवाने आएगा तो आप उसे मना नहीं कर पाएंगे। आप सोचेंगे कि उसने भी तो मेरी मदद की थी।
पर्सुएशन का यह पहला नियम बहुत पावरफुल है। अगर आप चाहते हैं कि लोग आपकी बात मानें तो पहले उन्हें कुछ देना शुरू कीजिए। यह जरूरी नहीं कि आप पैसे ही दें। आप उन्हें वैल्यू दे सकते हैं सम्मान दे सकते हैं या कोई छोटी सी हेल्प कर सकते हैं। जब आप बिना किसी लालच के किसी की मदद करते हैं तो आप अनजाने में उनके दिमाग में एक बटन दबा देते हैं। अब वो शख्स आपकी बात मानने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुका है। लेकिन याद रहे अगर आपने इसे बहुत ज्यादा चालाकी से किया तो लोग समझ जाएंगे कि आप उन्हें फंसा रहे हैं। इसलिए इसे एक जेन्युइन इंसान की तरह इस्तेमाल करें।
ह्यूमन साइकोलॉजी का यह हिस्सा हमें सिखाता है कि गिव एंड टेक का बैलेंस ही दुनिया चलाता है। अगर आप सिर्फ मांगते रहेंगे तो लोग आपसे दूर भागेंगे। लेकिन अगर आप पहले देने वाले बनेंगे तो लोग खुद आपके पीछे आएंगे। अब जब आप यह समझ गए हैं कि किसी को अहसान तले कैसे दबाना है तो चलिए अगले लेसन की तरफ बढ़ते हैं जो यह बताएगा कि लोग भेड़ चाल में कैसे फंसते हैं।
लेसन २ : सोशल प्रूफ - भेड़ चाल का असली सच
क्या आपने कभी नोटिस किया है कि आप उसी ढाबे पर खाना खाना पसंद करते हैं जहाँ बाहर गाड़ियों की लम्बी लाइन लगी होती है। भले ही बगल वाला रेस्टोरेंट एकदम साफ सुथरा और खाली खड़ा हो लेकिन आपका दिमाग कहेगा कि भाई जहाँ भीड़ है वहीं माल अच्छा मिलेगा। इसे ही रॉबर्ट सियाल्डिनी सोशल प्रूफ कहते हैं। हमारा दिमाग बहुत आलसी है। वह हर चीज के लिए खुद रिसर्च नहीं करना चाहता। इसलिए वह यह देखता है कि बाकी लोग क्या कर रहे हैं। अगर सब लोग एक ही दिशा में भाग रहे हैं तो हमें लगता है कि रास्ता वही सही होगा।
कॉमेडी शोज में जो बैकग्राउंड में हंसने की आवाजें यानी लाफ ट्रैक सुनाई देते हैं वह इसका सबसे बड़ा और इरिटेटिंग एक्जाम्पल हैं। आपको पता है कि वह हंसी नकली है। आपको यह भी पता है कि वह एक मशीन से बजाई जा रही है। फिर भी रिसर्च कहती है कि जब पीछे से लोग हंसते हैं तो हमें भी वो जोक ज्यादा मजेदार लगने लगता है। हम दूसरों की हंसी की नकल करने लगते हैं। मार्केटिंग वाले इस कमजोरी को बखूबी जानते हैं। इसलिए वो एड्स में दिखाते हैं कि भारत के करोड़ों लोगों का भरोसा या फिर नंबर १ चॉइस। उन्हें पता है कि जैसे ही आप देखेंगे कि सब इसे इस्तेमाल कर रहे हैं आप भी अपनी अक्ल ताक पर रख देंगे।
मान लीजिए आप सड़क पर चल रहे हैं और अचानक ५-६ लोग आसमान की तरफ उंगली करके खड़े हो जाएं। ९० परसेंट चांस है कि आप भी अपनी गर्दन टेढ़ी करके आसमान में वो चीज ढूंढने लगेंगे जो वहां है ही नहीं। आप बस इसलिए देख रहे हैं क्योंकि बाकी सब देख रहे हैं। ऑनलाइन शॉपिंग करते वक्त भी हम रिव्यूज पढ़ते हैं। अगर किसी प्रोडक्ट पर १००० लोगों ने ५ स्टार दिए हैं तो हम बिना फीचर्स पढ़े उसे आर्डर कर देते हैं। हमें लगता है कि १००० लोग पागल थोड़े ही होंगे। लेकिन असल में हम यह भूल जाते हैं कि कभी-कभी पूरी भीड़ भी गलत रास्ते पर जा रही होती है।
यह लेसन हमें सिखाता है कि अनिश्चितता की स्थिति में हम दूसरों की नकल करते हैं। जब हमें समझ नहीं आता कि क्या करना है तो हम अपने आसपास के लोगों को देखते हैं। अगर आप अपना कोई आईडिया या प्रोडक्ट बेचना चाहते हैं तो लोगों को यह मत बताइए कि वो कितना अच्छा है। बल्कि उन्हें यह दिखाइए कि उनके जैसे कितने सारे लोग पहले से ही उसे पसंद कर रहे हैं। जब आप लोगों को टेस्टिमोनियल्स या सक्सेस स्टोरीज दिखाते हैं तो उनका डर खत्म हो जाता है। उन्हें लगता है कि अगर इतने सारे लोग यह कर रहे हैं तो सेफ ही होगा।
लेकिन सावधान रहें। सोशल प्रूफ एक दोधारी तलवार है। अक्सर लोग गलत काम भी सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि समाज में उसे कूल माना जाता है। तो अगली बार जब आप किसी सेल को देखकर या किसी ट्रेंड को देखकर कूदने वाले हों तो एक सेकंड रुककर खुद से पूछिएगा कि क्या आप वाकई वो चीज चाहते हैं या बस भेड़ चाल का हिस्सा बन रहे हैं। अब जब आप भीड़ का मनोविज्ञान समझ गए हैं तो चलिए जानते हैं उस चीज के बारे में जो हमें किसी भी चीज के लिए पागल बना देती है।
लेसन ३ : स्कार्सीटी - जो कम है वही कीमती है
क्या आपने कभी गौर किया है कि ई-कॉमर्स वेबसाइट्स पर जब आप कोई जूता देखते हैं तो वहां लाल अक्षरों में लिखा आता है "ओनली २ लेफ्ट इन स्टॉक"। उसे पढ़ते ही आपके पेट में मरोड़ उठने लगती है और आप बिना सोचे समझे "बाय नाउ" पर क्लिक कर देते हैं। यही है स्कार्सीटी यानी कमी का जादू। रॉबर्ट सियाल्डिनी कहते हैं कि इंसान की फितरत है कि उसे वो चीज सबसे ज्यादा चाहिए जो उसे मिल नहीं सकती या जो बहुत कम मात्रा में मौजूद है। जैसे ही हमें पता चलता है कि कोई चीज खत्म होने वाली है तो उसकी वैल्यू हमारी नजरों में अचानक से १० गुना बढ़ जाती है।
इसे हम "लॉस एवर्जन" भी कहते हैं। हमें कुछ पाने की उतनी ख़ुशी नहीं होती जितना कुछ खोने का डर सताता है। मार्केटिंग की दुनिया में इसे "लिमिटेड टाइम ऑफर" या "फ्लैश सेल" का नाम देकर आपको लूटा जाता है। आपको लगता है कि अगर आज यह डील नहीं ली तो जिंदगी भर का घाटा हो जाएगा। जबकि सच तो यह है कि वो सेल अगले हफ्ते फिर आने वाली है। लेकिन हमारा दिमाग उस वक्त लॉजिक नहीं लगा पाता। उसे बस यह डर सताता है कि कहीं मैं पीछे न रह जाऊं।
मान लीजिए आप किसी शोरूम में खड़ी एक कार देख रहे हैं। आपको वो पसंद तो है लेकिन आप कन्फ्यूज्ड हैं। तभी सेल्समैन आकर धीरे से आपके कान में कहता है कि सर अभी एक और फैमिली आई थी जो इसी कार का एडवांस देने वाली है बस वो एटीएम तक गए हैं। बस इतना सुनना काफी है। अब आपकी ईगो जाग जाएगी। आपको लगेगा कि वो कार आपकी ही थी और कोई उसे छीनकर ले जा रहा है। आप तुरंत चेक बुक निकाल लेंगे और बुकिंग कर देंगे। उस सेल्समैन ने बस एक झूठ बोलकर आपके अंदर स्कार्सीटी का बटन दबा दिया।
इतना ही नहीं यह नियम रिश्तों में भी काम करता है। जो इंसान हर वक्त फ्री रहता है और एक मैसेज करते ही हाजिर हो जाता है लोग अक्सर उसकी वैल्यू नहीं करते। लेकिन जो शख्स थोड़ा बिजी रहता है और मुश्किल से मिलता है लोग उसके साथ वक्त बिताने के लिए तरसते हैं। यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन कड़वा सच यही है कि अगर आप अपनी वैल्यू बढ़ाना चाहते हैं तो आपको अपनी उपलब्धता यानी अपनी अवेलेबिलिटी कम करनी पड़ेगी। जो चीज हर गली नुक्कड़ पर मिलती है उसकी कोई इज्जत नहीं होती।
तो इस बुक का पूरा सार यही है कि अगर आप दुनिया पर राज करना चाहते हैं और लोगों से अपनी बात मनवाना चाहते हैं तो आपको इन साइकोलॉजिकल ट्रिगर्स को समझना होगा। चाहे वो कुछ देकर किसी को अपना कर्जदार बनाना हो या भीड़ दिखाकर किसी का भरोसा जीतना हो या फिर कमी दिखाकर किसी को बेचैन कर देना हो। यह सब आपके हाथ में है। बस याद रखिए कि इन पावर्स का इस्तेमाल सही काम के लिए करें क्योंकि एक बार अगर लोगों को पता चल गया कि आप उनके साथ गेम खेल रहे हैं तो आपका इन्फ्लुएंस मिट्टी में मिल जाएगा।
तो दोस्तों, यह थे रॉबर्ट सियाल्डिनी की किताब के वो ३ लेसन जो आपको एक ऑर्डिनरी इंसान से एक्स्ट्राऑर्डिनरी मास्टर ऑफ पर्सुएशन बना सकते हैं। अब आप बताइए कि क्या आप भी कभी किसी सेल्समैन की बातों में आकर कोई फालतू चीज खरीद लाए हैं। अपनी कहानी कमेंट्स में जरूर शेयर करें। और हां अगर आप चाहते हैं कि आपका दोस्त भी चालाक बने तो उसे यह आर्टिकल जरूर भेजें। याद रखिए नॉलेज बांटने से ही बढ़ती है और यही असली इन्फ्लुएंस है।
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