अगर आपको लगता है कि आपकी टीम सिर्फ इसलिए बेस्ट है क्योंकि वहाँ कोई झगड़ा नहीं होता तो बधाई हो। आप एक ऐसे जहाज पर बैठे हैं जो डूबा नहीं है क्योंकि वह अभी तक किनारे से चला ही नहीं है। बिना कोग्निटिव फ्रिक्शन के आप सिर्फ एक बोरिंग ग्रुप हैं टीम नहीं।
आपकी टीम में सब एक जैसा सोचते हैं और आप खुश हैं। पर यही आपकी सबसे बड़ी हार है क्योंकि बिना डाइवर्सिटी के इनोवेशन मर जाता है। चलिए जानते हैं शेन स्नो की बुक ड्रीम टीम्स से वह तीन बड़े लेसन जो आपकी टीम को सच में सुपरपावर बना देंगे।
लेसन १ : कोग्निटिव डायवर्सिटी का पावर हाउस
जरा सोचिए आप एक ऐसी क्रिकेट टीम बना रहे हैं जिसमें ग्यारह के ग्यारह खिलाड़ी सिर्फ ओपनिंग बैट्समैन हैं। सुनने में बड़ा कूल लगता है ना। सब के सब चौके छक्के मारेंगे। लेकिन जैसे ही पहली विकेट गिरेगी या स्पिनर आएगा आपकी टीम ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी। असल जिंदगी और बिजनेस में भी हम यही गलती करते हैं। हम अक्सर उन लोगों को अपनी टीम में रखते हैं जो बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं। जो हमारी हर बात पर हां में हां मिलाते हैं और हमें लगता है कि वाह क्या टीम बॉन्डिंग है। शेन स्नो कहते हैं कि यह बॉन्डिंग नहीं बल्कि बर्बादी का रास्ता है। इसे कहते हैं कोग्निटिव होमोजीनिटी यानी एक जैसी सोच वाले लोगों का जमावड़ा।
ड्रीम टीम्स बनाने का पहला नियम है कोग्निटिव डायवर्सिटी। इसका मतलब यह नहीं है कि आपकी टीम में अलग अलग जेंडर या देश के लोग हों बल्कि इसका मतलब है कि आपकी टीम में अलग अलग तरह से सोचने वाले दिमाग हों। एक इंसान वो हो जो रिस्क लेने से न डरे और दूसरा वो हो जो हर कदम पर यह पूछे कि अगर यह प्लान फेल हो गया तो क्या होगा। अगर आपकी टीम में सब एक ही सांचे में ढले होंगे तो आप कभी भी कुछ नया नहीं सोच पाएंगे। आप बस एक ही लूप में घूमते रहेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा कि दुनिया आपसे आगे निकल गई है।
मान लीजिए आप एक नया स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं और आपने अपने सभी कॉलेज के पुराने दोस्तों को काम पर रख लिया। सब की पढ़ाई एक जैसी सब का बैकग्राउंड एक जैसा और सब की पसंद भी एक जैसी। अब जब कोई प्रॉब्लम आएगी तो सब के पास एक ही जैसा सोल्यूशन होगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक कमरे में दस लोग हों और सब के पास एक ही चाबी हो जबकि दरवाजे पर दस अलग अलग ताले लगे हों। असली सक्सेस तब मिलती है जब आपकी टीम में एक ऐसा बंदा हो जो आपकी सबसे शानदार आईडिया में भी कमियां निकाल सके। वह विलेन नहीं है बल्कि वह आपकी टीम का वो फिल्टर है जो कचरे को बाहर निकालता है।
लेकिन याद रखिए डायवर्सिटी का मतलब यह नहीं है कि आप बस भीड़ जमा कर लें। अगर लोग अलग तो हैं पर एक दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं हैं तो वह टीम नहीं बल्कि एक मछली बाजार बन जाएगी। कोग्निटिव डायवर्सिटी तभी काम करती है जब सबके पास एक कॉमन गोल हो। जब आपका मकसद अपनी ईगो को जीतना नहीं बल्कि कंपनी को जिताना होता है। तो अगली बार जब आप किसी को अपनी टीम में शामिल करें तो यह न देखें कि वह आपके साथ कितनी अच्छी कॉफी पीता है बल्कि यह देखें कि क्या उसके पास कोई ऐसा नजरिया है जो आपके पास नहीं है। क्योंकि अगर दो लोग हमेशा एक ही बात पर सहमत हैं तो यकीन मानिए उनमें से एक की कोई जरूरत नहीं है।
लेसन २ : कोग्निटिव फ्रिक्शन और ग्रोथ
क्या आपने कभी माचिस की तीली जलाई है। अगर आप तीली को बहुत प्यार से मसाले पर रगड़ेंगे तो क्या आग जलेगी। बिल्कुल नहीं। आग पैदा करने के लिए फ्रिक्शन यानी रगड़ की जरूरत होती है। टीम वर्क में भी यही लॉजिक काम करता है। हम सबको शांति पसंद है। हम चाहते हैं कि मीटिंग रूम में सब मुस्कुराएं और हाथ मिलाकर बाहर निकलें। लेकिन शेन स्नो कहते हैं कि अगर आपकी मीटिंग्स में बहस नहीं हो रही है तो समझ लीजिए कि आपकी टीम में दम नहीं है। इसे वह कोग्निटिव फ्रिक्शन कहते हैं। यह वह फ्रिक्शन है जो तब पैदा होता है जब दो अलग अलग विचार आपस में टकराते हैं।
ज्यादातर लोग बहस को झगड़ा समझ लेते हैं और उसे टालने की कोशिश करते हैं। यह भारतीय परिवारों की उस पुरानी आदत जैसा है जहाँ टेबल पर नमक कम होने पर भी कोई कुछ नहीं बोलता ताकि शांति बनी रहे। लेकिन प्रोफेशनल दुनिया में यह शांति कैंसर की तरह है। कोग्निटिव फ्रिक्शन का मतलब यह नहीं है कि आप एक दूसरे पर चिल्लाएं या पर्सनल कमेंट्स करें। इसका मतलब है आइडियाज के बीच की लड़ाई। जब एक आईडिया दूसरे आईडिया से टकराता है तो जो चिंगारी निकलती है वही असली इनोवेशन होती है।
मान लीजिए आपकी मार्केटिंग टीम एक कैम्पेन लेकर आई जो उन्हें बहुत क्रांतिकारी लग रहा है। अब अगर सेल्स वाला बंदा चुपचाप उसे मान ले तो शायद वह कैम्पेन मार्केट में बुरी तरह पिट जाए। लेकिन अगर सेल्स वाला बंदा वहां फ्रिक्शन पैदा करे और कहे कि भाई यह सुनने में तो अच्छा है पर ग्राउंड लेवल पर कस्टमर इसे नहीं खरीदेगा तो वहां से सुधार शुरू होता है। यह बहस कड़वी लग सकती है पर यही उस कैम्पेन को परफेक्ट बनाएगी।
शेन स्नो हमें समझाते हैं कि फ्रिक्शन दो तरह के होते हैं। एक होता है इंटेलेक्चुअल फ्रिक्शन जो काम को बेहतर बनाता है और दूसरा होता है पर्सनल फ्रिक्शन जो रिश्तों को खराब करता है। ड्रीम टीम्स वो होती हैं जो पर्सनल फ्रिक्शन को जीरो रखती हैं और इंटेलेक्चुअल फ्रिक्शन को मैक्सिमम। अगर आप अपनी टीम के किसी मेंबर से असहमत हैं तो उसे नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि काम को ऊपर उठाने के लिए सवाल पूछिए। जब तक रगड़ नहीं होगी तब तक चमक नहीं आएगी। तो अगर आपकी टीम की मीटिंग्स आजकल बहुत ज्यादा शांत चल रही हैं तो थोड़ा मसाला डालिए और लोगों को बोलने के लिए उकसाइए। क्योंकि बिना कोग्निटिव फ्रिक्शन के आप सिर्फ एक औसत दर्जे की टीम बनकर रह जाएंगे जो कभी कोई बड़ा धमाका नहीं कर पाएगी।
लेसन ३ : इंटेलेक्चुअल ह्यूमिलिटी और लीडरशिप
अब मान लीजिए आपकी टीम में अलग अलग सोच वाले लोग भी आ गए और उनके बीच बढ़िया आइडियाज की रगड़ भी शुरू हो गई। लेकिन अगर इस पूरी प्रकिया का कैप्टन यानी आप खुद को खुदा समझने लगें तो क्या होगा। सारी मेहनत पानी में मिल जाएगी। यहाँ एंट्री होती है इंटेलेक्चुअल ह्यूमिलिटी की। यह सुनने में भारी भरकम शब्द लग सकता है पर इसका सीधा सा मतलब है यह मानने की हिम्मत रखना कि मैं गलत भी हो सकता हूं। हमारे यहाँ अक्सर बॉस का मतलब वो इंसान होता है जिसके पास हर सवाल का जवाब हो और जो कभी गलती न करे। लेकिन शेन स्नो कहते हैं कि एक असली लीडर वो नहीं है जो सबसे ज्यादा जानता है बल्कि वो है जो सबसे अच्छा सीखने के लिए तैयार रहता है।
एक तरफ वो अंकल हैं जो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की हर खबर को सच मानकर पूरे खानदान को ज्ञान देते हैं और बहस होने पर चिल्लाने लगते हैं। दूसरी तरफ वो इंसान है जो कहता है कि भाई मुझे इस बारे में पूरी जानकारी नहीं है क्या तुम मुझे समझा सकते हो। आपको क्या लगता है किसके साथ लोग काम करना चाहेंगे। बिल्कुल सही दूसरे वाले के साथ। ड्रीम टीम्स में जब तक इंटेलेक्चुअल ह्यूमिलिटी नहीं होगी तब तक कोग्निटिव फ्रिक्शन सिर्फ ईगो की लड़ाई बनकर रह जाएगा। अगर आप इस डर में जीते हैं कि अगर आपने अपनी गलती मान ली तो आपकी इज्जत कम हो जाएगी तो आप लीडर नहीं बल्कि एक कमजोर इंसान हैं।
सक्सेसफुल टीमों में लोग एक दूसरे के आइडियाज को इसलिए नहीं सुनते कि उन्हें मौका देना है बल्कि इसलिए सुनते हैं क्योंकि उन्हें सच में लगता है कि सामने वाला उनसे बेहतर बात कह सकता है। जब एक लीडर कहता है कि मुझे नहीं पता चलिए मिलकर पता लगाते हैं तो पूरी टीम का कॉन्फिडेंस बढ़ जाता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी अनजान रास्ते पर जा रहे हों और ड्राइवर ये मानने से मना कर दे कि वो रास्ता भटक गया है। ऐसी जिद आपको मंजिल तक नहीं बल्कि गड्ढे में ले जाएगी।
इंटेलेक्चुअल ह्यूमिलिटी का मतलब खुद को कम आंकना नहीं है। इसका मतलब है अपने दिमाग की खिड़की खुली रखना ताकि ताजी हवा यानी नए विचार अंदर आ सकें। जब आप यह स्वीकार करते हैं कि आपके पास दुनिया का सारा ज्ञान नहीं है तो आप दूसरों के लिए स्पेस बनाते हैं। और जब लोग देखते हैं कि उनके आइडियाज को सच में तवज्जो दी जा रही है तो वो सिर्फ काम नहीं करते बल्कि अपना दिल और जान लगा देते हैं। याद रखिए एक महान टीम किसी एक सुपरस्टार के कंधों पर नहीं चलती बल्कि उन लोगों के मेल से बनती है जो एक दूसरे को बेहतर बनाने के लिए अपनी ईगो को दरवाजे के बाहर छोड़कर आते हैं। तो क्या आप तैयार हैं अपनी ईगो को साइड में रखकर एक ऐसी टीम बनाने के लिए जो सच में दुनिया बदल सके।
अगर आप भी अपनी टीम को सिर्फ एक ग्रुप से बदलकर एक सुपरपावर बनाना चाहते हैं तो आज ही अपनी टीम में एक ऐसा इंसान ढूंढिए जो आपसे बिल्कुल अलग सोचता हो। उसकी बात सुनिए और उसे समझने की कोशिश कीजिए। कमेंट्स में हमें बताइए कि आपकी टीम की सबसे बड़ी ताकत क्या है। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपनी टीम को लीड कर रहे हैं। याद रखिए टीम वर्क ही ड्रीम वर्क है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#TeamBuilding #LeadershipTips #ShaneSnow #DreamTeams #Productivity
_