क्या आप भी उन भेड़ चाल चलने वालों में से हैं जो बिना सोचे समझे बस काम किए जा रहे हैं। अपनी कीमती जिंदगी को ऐसे बर्बाद होते देख आपको शर्म भी नहीं आती। अगर आपको अभी तक अपना मकसद यानी 'वाय' नहीं पता तो मुबारक हो आप एक चलती फिरती लाश हैं।
लेकिन रुकिए। अब वक्त आ गया है कि आप अपनी बोरियत भरी लाइफ को टाटा बाय बाय कहें। साइमन सिनेक की यह किताब आपको वह सीक्रेट बताएगी जो ९९ परसेंट लोग कभी जान ही नहीं पाते। चलिए समझते हैं उन ३ लेसन्स को जो आपकी किस्मत बदलने वाले हैं।
लेसन १ : गोल्डन सर्कल का जादू और आपका असली 'वाय'
दोस्तो, जरा सोचिए। आप सुबह उठते हैं, ब्रश करते हैं, और ऑफिस या कॉलेज के लिए निकल जाते हैं। शाम को थक हारकर वापस आते हैं और सो जाते हैं। अगले दिन फिर वही कहानी। क्या कभी खुद से पूछा है कि आप यह सब आखिर कर क्यों रहे हैं। साइमन सिनेक कहते हैं कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। पहले वो जिन्हें पता है कि वो 'क्या' (What) कर रहे हैं। जैसे, मैं इंजीनियर हूं या मैं जूस बेचता हूं। दूसरे वो जिन्हें पता है कि वो यह काम 'कैसे' (How) कर रहे हैं। जैसे, मैं बहुत मेहनत से कोडिंग करता हूं या मैं ताजे फलों का जूस निकालता हूं। लेकिन असली बाजी वो मारते हैं जिन्हें अपना 'क्यों' (Why) पता होता है।
जरा सोचिए उस पड़ोस वाले शर्मा जी के लड़के के बारे में। उसने कोडिंग सीखी क्योंकि सबको लगा कि इसमें बहुत पैसा है। अब वो ऑफिस में बैठकर बस घड़ियां गिनता है कि कब ५ बजेंगे और वो इस कैद से भागेगा। क्यों। क्योंकि उसे पता है कि वो 'क्या' कर रहा है और 'कैसे' कर रहा है, पर उसका 'क्यों' गायब है। वहीं दूसरी तरफ कोई ऐसा बंदा है जो शायद एक छोटा सा स्टार्टअप चला रहा है, पर उसका 'क्यों' क्लियर है। उसे दुनिया की कोई समस्या सुलझानी है। उसे नींद नहीं आती क्योंकि उसका मकसद उसे सोने नहीं देता।
हकीकत तो यह है कि ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी 'बाहर से अंदर' की तरफ जीते हैं। वो पहले 'क्या' देखते हैं, फिर 'कैसे' और 'क्यों' तक तो कभी पहुंच ही नहीं पाते। सफल लोग और कंपनियां 'अंदर से बाहर' की तरफ सोचते हैं। एपल कंपनी का उदाहरण लीजिए। वो ये नहीं कहते कि हम बहुत अच्छे कंप्यूटर बनाते हैं, आप खरीद लीजिए। वो कहते हैं कि हमारा मकसद है हर उस चीज को चुनौती देना जो पुरानी और घिसी पिटी है। हम अलग सोचना पसंद करते हैं। और इसी वजह से हम बहुत ही सुंदर और आसान प्रोडक्ट्स बनाते हैं। क्या आप एक खरीदना चाहेंगे। देखा आपने। जब 'क्यों' पहले आता है, तो लोग आपके काम से नहीं बल्कि आपके मकसद से जुड़ते हैं।
अगर आप भी बस इसलिए काम कर रहे हैं क्योंकि बिल भरने हैं या समाज को दिखाना है, तो यकीन मानिए आप एक बिना इंजन की गाड़ी चला रहे हैं। बाहर से चमचमाती हुई पर अंदर से एकदम ठप। लोग आपके 'क्या' को नहीं खरीदते, वो आपके 'क्यों' को खरीदते हैं। इसलिए अगर आप अपनी लाइफ में वो स्पार्क वापस लाना चाहते हैं, तो सबसे पहले उस बीच वाले सर्कल को पकड़िए। अपने आपसे पूछिए कि अगर आज आपको पैसे की चिंता न हो, तो भी क्या आप वही काम करेंगे जो आज कर रहे हैं। अगर जवाब 'ना' है, तो समझ लीजिए कि आप गलत पटरी पर गाड़ी दौड़ा रहे हैं।
यह गोल्डन सर्कल कोई किताबी ज्ञान नहीं है, बल्कि यह आपके दिमाग के उस हिस्से से जुड़ा है जो फैसले लेता है। जब आप अपना 'क्यों' ढूंढ लेते हैं, तो आपकी मेहनत बोझ नहीं लगती। फिर आपको मोटिवेशनल वीडियो देखने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि आपका मकसद खुद आपको बिस्तर से बाहर खींच लेता है। लेकिन रुकिए, यह मकसद हवा में नहीं मिलता। इसे ढूंढने के लिए आपको अपने बीते हुए कल की गलियों में झांकना होगा, जिसके बारे में हम अगले लेसन में बात करेंगे।
लेसन २ : अपनी पुरानी कहानियों में छिपा खजाना खोजिए
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई यह 'वाय' मिलेगा कहाँ। क्या यह किसी हिमालय की चोटी पर बैठा है या किसी मोबाइल ऐप पर डाउनलोड होगा। सच तो यह है कि आपका मकसद आपके भविष्य में नहीं बल्कि आपके बीते हुए कल में छिपा है। साइमन सिनेक कहते हैं कि आपका 'वाय' २० साल की उम्र तक पूरी तरह बन जाता है। यह उन कहानियों का निचोड़ है जिन्होंने आपको बनाया है। लेकिन हम क्या करते हैं। हम अपनी पुरानी गलतियों और यादों को एक कचरे के डिब्बे में डालकर ढक्कन बंद कर देते हैं। और फिर गूगल पर सर्च करते हैं कि 'हाउ टू बी हैप्पी'। क्या बात है।
सोचिए उस समय के बारे में जब स्कूल में किसी ने आपका मजाक उड़ाया था और आपने कसम खाई थी कि आप किसी और के साथ ऐसा नहीं होने देंगे। या फिर वह पल जब आपने किसी की मदद की थी और आपको लगा था कि आज लाइफ सफल हो गई। यही वो छोटी-छोटी कहानियां हैं जिनमें आपका असली गोल्ड छिपा है। लोग अक्सर सोचते हैं कि मकसद कोई बहुत बड़ा सपना होता है जैसे 'मुझे दुनिया बदलनी है'। अरे भाई, पहले अपनी कहानियों को तो समझ लो। अगर आप खुद को नहीं पहचानते, तो दुनिया क्या ही बदलोगे।
मान लीजिए एक बंदा है जो बहुत ही सार्केस्टिक है और हर बात पर मजे लेता है। उसे लगता है कि यह उसकी बुराई है। लेकिन जब वो अपनी लाइफ की कहानियों को पीछे मुड़कर देखता है, तो उसे पता चलता है कि वो हमेशा मुश्किल वक्त में लोगों को हंसाकर उनका तनाव कम करता था। अब उसका 'वाय' यह नहीं है कि उसे जोक सुनाने हैं, बल्कि उसका 'वाय' है कि उसे भारी माहौल को हल्का बनाना है ताकि लोग खुलकर जी सकें। अब वो चाहे डॉक्टर बने या दुकानदार, उसका मकसद साफ है।
हम अक्सर अपनी उपलब्धियों यानी 'व्हाट' को अपना मकसद मान लेते हैं। जैसे 'मैंने बड़ी गाड़ी खरीदी'। भाई, गाड़ी खरीदना मकसद नहीं है, वो तो नतीजा है। असली चीज तो वो एहसास है जो आपको उस गाड़ी को पाने के सफर में मिला। अपनी लाइफ की कम से कम ५ से ७ ऐसी कहानियां याद कीजिए जिन्होंने आपको झकझोर दिया हो। चाहे वो खुशी के पल हों या गम के। उन कहानियों में एक पैटर्न ढूंढिए। क्या आप हर बार लोगों को जोड़ रहे थे। क्या आप हर बार कुछ नया बना रहे थे।
दिक्कत यह है कि हम अपनी ही लाइफ की फिल्म के हीरो होते हुए भी उसकी स्क्रिप्ट पढ़ना भूल जाते हैं। हमें लगता है कि जो बीत गया वो मिट्टी है। पर असल में वही मिट्टी आपकी जड़ें हैं। जब तक आप उन जड़ों को नहीं पहचानेंगे, आपकी सफलता का पेड़ ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा। लोग अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं। अरे वो तो यूट्यूबर बन गया, मैं भी बन जाता हूं। लेकिन भाई, उसका 'वाय' अलग है और आपका अलग। अगर आप उसकी कहानी कॉपी करेंगे, तो आप एक सस्ती कॉपी बनकर रह जाएंगे। इसलिए अपनी पुरानी फाइलों को खोलिए और देखिए कि आपका दिल किस बात पर सबसे तेज धड़कता था।
लेसन ३ : अकेले नहीं मिल पाएगा आपका मकसद
अब आता है सबसे बड़ा ट्विस्ट। आप सोच रहे होंगे कि चलिए आज रात कमरा बंद करके बैठूंगा और अपना 'वाय' ढूंढ निकालूंगा। पर रुकिए। खुद का मकसद खुद ढूंढना वैसा ही है जैसे अपनी पीठ पर खुद ही मालिश करना। कोशिश तो बहुत करते हैं पर मजा नहीं आता। साइमन सिनेक कहते हैं कि आप खुद के लिए अंधे होते हैं। आपको अपनी ही कहानियों में छिपे वो पैटर्न्स नजर नहीं आते जो किसी बाहर वाले को साफ दिख जाते हैं। आपको एक पार्टनर की जरूरत है।
जरा याद कीजिए जब आप अपनी किसी प्रॉब्लम में फंसे होते हैं और आपका कोई दोस्त आकर कहता है कि अरे भाई तू तो हमेशा यही गलती करता है। आपको गुस्सा आता है पर वो सच कह रहा होता है। मकसद ढूंढने के सफर में भी यही हाल है। आपको एक ऐसा इंसान चाहिए जो आपको गौर से सुने। वो आपकी कहानियों को सुने और देखे कि जब आप किसी खास घटना के बारे में बताते हैं तो आपकी आँखों में चमक कब आती है। आपकी आवाज कब भारी होती है। आप खुद उन बारीकियों को मिस कर देंगे क्योंकि आपके लिए वो बातें नॉर्मल हैं।
सोचिए आप एक ऐसे दोस्त के साथ बैठे हैं जो आपकी बातें सुनकर नोट्स बना रहा है। आप उसे बता रहे हैं कि कैसे आपने बचपन में एक टूटा हुआ रेडियो ठीक किया था। आपको लग रहा है कि आप बस एक पुरानी बात बता रहे हैं। लेकिन आपका पार्टनर देख पा रहा है कि आपका असली जूनून चीजों को ठीक करने में नहीं बल्कि किसी बिगड़ी हुई चीज को वापस काम के लायक बनाने में है। यही वो बारीक फर्क है जो आपकी जिंदगी बदल सकता है। हम अक्सर खुद को बहुत ज्यादा जज करते हैं। हमें लगता है कि हमारी कहानियां तो बहुत छोटी और मामूली हैं। पर दूसरा इंसान उनमें छिपा हीरा देख सकता है।
इसलिए ईगो को साइड में रखिए। यह मत सोचिए कि आप सुपरमैन हैं और अकेले ही दुनिया जीत लेंगे। एक सच्चा साथी ढूंढिए जो आपसे सवाल पूछे। जो आपकी बातों के बीच में 'क्यों' घुसा दे। जब आप अपनी कहानियों का निचोड़ उस पार्टनर के सामने रखेंगे तभी असली 'वाय' निकलकर बाहर आएगा। बिना पार्टनर के आप बस गोल-गोल घूमते रहेंगे और अंत में थककर फिर वही भेड़ चाल चलने लगेंगे। याद रखिए महान काम कभी अकेले नहीं होते और महान मकसद कभी अकेले नहीं मिलते।
तो क्या आप तैयार हैं उस अंधी दौड़ को छोड़कर अपनी असली पहचान ढूंढने के लिए। अपनी लाइफ की उन धूल जमी कहानियों को साफ कीजिए और किसी दोस्त का हाथ थामकर अपने 'वाय' की तलाश शुरू कीजिए। क्योंकि जब मकसद साफ होता है तो रास्ता अपने आप दिखने लगता है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिए जिसे आप अपना पार्टनर बनाना चाहते हैं। नीचे कमेंट में बताइए कि क्या आपको लगता है कि आप सही रास्ते पर हैं। आपकी एक खोज आपकी पूरी लाइफ बदल सकती है।
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