Machine, Platform, Crowd (Hindi)


अगर आपको लगता है कि आपकी पुरानी डिग्री और सालों का तजुर्बा आपको डिजिटल दौर में बचा लेगा, तो मुबारक हो, आप अपनी बर्बादी का टिकट खुद काट रहे हैं। दुनिया बदल चुकी है और आप अभी भी बैलगाडी वाले दिमाग से रॉकेट उडाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

इस ब्लॉग में हम एंड्रू मैकाफी की किताब मशीन प्लेटफॉर्म क्राउड की गहराई में उतरेंगे। हम उन ३ पावरफुल लेसन्स को समझेंगे जो आपको आने वाले कल के लिए तैयार करेंगे और आपके सोचने का तरीका हमेशा के लिए बदल देंगे।


लेसन १ : मशीन ओवर माइंड - जब कलपुर्जे दिमाग पर भारी पडने लगे

दोस्तो, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ इंसान को अपनी अकल पर कुछ ज्यादा ही घमंड हो गया है। हमें लगता है कि जो फैसला हम अपनी "गट फीलिंग" या सालों के तजुर्बे से ले सकते हैं, वह कोई बेजान मशीन कैसे ले सकती है। लेकिन एंड्रू मैकाफी और एरिक ब्रिनजोल्फसन अपनी किताब में सबसे पहले इसी गुब्बारे की हवा निकालते हैं। वह कहते हैं कि अब समय आ गया है कि हम अपनी बुद्धि का मोह छोडकर मशीनों की काबिलियत को सलाम करना शुरू करें। असलियत तो यह है कि इंसान इमोशन्स, थकान और पक्षपात यानी बायस का पुतला है।

मान लीजिए आप एक बहुत बडे बिजनेस टायकून हैं और आपको एक नया मैनेजर हायर करना है। आप इंटरव्यू लेते हैं और आपको एक लडका बहुत पसंद आता है क्योंकि उसने आपकी तरह ही सफेद कमीज पहनी है और वह उसी शहर से है जहाँ से आप हैं। आपकी गट फीलिंग कहती है कि यह लडका कंपनी को आसमान पर ले जाएगा। लेकिन ३ महीने बाद पता चलता है कि वह महाशय ऑफिस में काम कम और गप्पें ज्यादा लडाते हैं। यहाँ आपकी "इंसानी अकल" हार गई। दूसरी तरफ एक एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सिस्टम है जो बिना किसी भेदभाव के सिर्फ डेटा देखता है। वह उसकी पिछली परफॉरमेंस, स्किल्स और काम करने के घंटों का हिसाब लगाता है और आपको बताता है कि यह इंसान आपके लिए फिट नहीं है। मशीन को इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि सामने वाले ने कौन सा परफ्यूम लगाया है या वह कितनी मीठी बातें करता है।

हम अक्सर सोचते हैं कि डॉक्टर, वकील या बडे फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स को कभी रिप्लेस नहीं किया जा सकता। लेकिन सच तो यह है कि मशीनें अब कैंसर को डिटेक्ट करने में बडे से बडे रेडियोलॉजिस्ट से ज्यादा सटीक हो गई हैं। डॉक्टर साहब को कल रात नींद नहीं आई होगी तो शायद वह रिपोर्ट देखने में छोटी सी चूक कर दें, लेकिन मशीन को न नींद आती है और न ही वह कॉफी ब्रेक मांगती है। हम इंसान डेटा को याद रखने में कमजोर हैं और मशीनों के पास डेटा का समंदर है। आज के जमाने में अगर आप यह सोचकर बैठे हैं कि मेरा दिमाग सबसे तेज है, तो आप उसी ड्राइवर की तरह हैं जो जीपीएस को गलत बताकर खुद रास्ता ढूंढने निकलता है और दो घंटे बाद पता चलता है कि वह किसी के खेत में खडा है।

मशीनें थकती नहीं हैं और न ही वह ऑफिस की राजनीति में पडती हैं। उन्हें बस डेटा चाहिए और वह आपको वह सच दिखाएंगी जो शायद आप अपनी आंखों से देखना ही नहीं चाहते। इसका मतलब यह नहीं है कि हम इंसान बेकार हो गए हैं, बल्कि मतलब यह है कि हमें मशीनों के साथ हाथ मिलाना होगा। अगर आप अभी भी अपनी पुरानी फाइलों और तजुर्बे की ढपली बजा रहे हैं, तो तैयार रहिए क्योंकि मशीनें आपके करियर का बैंड बजाने के लिए तैयार खडी हैं। यह समझना बहुत जरूरी है कि कल के विनर वह नहीं होंगे जो मशीनों से लडेंगे, बल्कि वह होंगे जो मशीनों को अपना पार्टनर बनाएंगे। यह ईगो छोडने का वक्त है क्योंकि अब मशीनें सिर्फ काम नहीं कर रहीं, वह हमसे बेहतर सोच भी रही हैं।


लेसन २ : प्लेटफॉर्म ओवर प्रोडक्ट - दुकान नहीं, बाजार बनाओ

दोस्तो, वह जमाना गया जब आप एक शानदार चीज बनाते थे और उसे मार्केट में बेचकर चैन की नींद सो जाते थे। आज के दौर में अगर आप सिर्फ एक "प्रोडक्ट" बेच रहे हैं, तो आप रेस शुरू होने से पहले ही हार चुके हैं। किताब के लेखक हमें समझाते हैं कि आज की असली ताकत प्रोडक्ट में नहीं, बल्कि "प्लेटफॉर्म" में है। प्लेटफॉर्म वह जगह है जहाँ लोग आते हैं, जुडते हैं और एक दूसरे के साथ वैल्यू शेयर करते हैं। सरल भाषा में कहूँ तो, अपनी खुद की मिठाई की दुकान खोलने से बेहतर है कि आप एक ऐसा बाजार खडा करें जहाँ शहर के सारे हलवाई अपनी दुकान लगाएं और आप बस उस बाजार के मालिक हों।

जरा सोचिए, दुनिया की सबसे बडी टैक्सी कंपनी उबेर के पास खुद की एक भी कार नहीं है। दुनिया का सबसे बडा होटल बिजनेस एयरबीएनबी खुद के नाम पर एक कमरा तक नहीं रखता। और हमारे प्यारे जोमेटो भाई साहब का अपना कोई रेस्टोरेंट नहीं है, फिर भी वह पूरे देश को खाना खिला रहे हैं। यह सब प्लेटफॉर्म की ताकत है। अब आप कहेंगे कि भाई, मैंने तो बहुत मेहनत से एक नया साबुन बनाया है, वह प्लेटफॉर्म कैसे बनेगा? यहीं तो सारा खेल है। अगर आप सिर्फ साबुन बेच रहे हैं, तो आप एक प्रोडक्ट हैं। लेकिन अगर आप एक ऐसा ऐप बना दें जहाँ लोग अपनी स्किन की प्रॉब्लम्स डिस्कस करें, एक्सपर्ट्स से सलाह लें और फिर वहां से सामान खरीदें, तो आप एक प्लेटफॉर्म बन गए हैं।

प्रोडक्ट बनाने वाला इंसान हमेशा इस टेंशन में रहता है कि कल कोई उससे सस्ता या बेहतर सामान ले आया तो उसका क्या होगा। लेकिन प्लेटफॉर्म का मालिक मजे में रहता है क्योंकि उसके पास "नेटवर्क इफेक्ट" की पावर होती है। नेटवर्क इफेक्ट का मतलब है कि जितने ज्यादा लोग आपके प्लेटफॉर्म पर आएंगे, उसकी वैल्यू उतनी ही बढती जाएगी। जैसे फेसबुक की कीमत इसलिए नहीं है कि उसका डिजाइन बहुत सुंदर है, बल्कि इसलिए है क्योंकि आपके सारे दोस्त और रिश्तेदार वहां मौजूद हैं। अगर आज आप एक नया और बहुत ही बढिया सोशल मीडिया ऐप बना भी लें, तो कोई वहां नहीं आएगा क्योंकि वहां उसकी बुआ या ताऊजी नहीं होंगे।

प्लेटफॉर्म की दुनिया में घुसना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि यहाँ "विनर टेक्स ऑल" का नियम चलता है। यानी जो सबसे पहले बडा नेटवर्क बना लेगा, वही राजा बनेगा। बाकी सब तो बस धूल चाटते रह जाएंगे। आपने देखा होगा कि कैसे अमेज़न ने छोटे-मोटे ऑनलाइन सेलर्स की छुट्टी कर दी। क्यों? क्योंकि उसके पास सबसे ज्यादा ग्राहक हैं और सबसे ज्यादा दुकानदार भी। यह एक ऐसा चक्र है जिसे तोडना नामुमकिन सा लगता है। अगर आप अभी भी पुराने बिजनेस मॉडल में फंसे हैं और सोच रहे हैं कि सिर्फ क्वालिटी सुधारने से काम चल जाएगा, तो आप उस टेलर की तरह हैं जो बहुत बढिया कपडे सीता है लेकिन उसके पास कोई ग्राहक नहीं आता क्योंकि सब रेडीमेड मॉल में जा रहे हैं।

आज के स्टार्टअप्स को देखिए, वह मुनाफा कमाने से पहले अपना प्लेटफॉर्म बडा करने पर ध्यान देते हैं। वह आपको फ्री डिस्काउंट देते हैं, कैशबैक देते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि एक बार आप उनके प्लेटफॉर्म के आदी हो गए, तो फिर आप कहीं और नहीं जा पाएंगे। यह एक जाल है, लेकिन बहुत ही सुंदर और कामयाब जाल। तो अगर आप बिजनेस में हैं या करियर बनाने की सोच रहे हैं, तो यह सोचना बंद कीजिए कि "मैं क्या बना सकता हूँ" और यह सोचना शुरू कीजिए कि "मैं लोगों को आपस में कैसे जोड सकता हूँ"। क्योंकि अंत में जीत उसी की होगी जिसके पास सबसे बडा मेला होगा, उसकी नहीं जिसके पास सबसे अच्छी दुकान होगी।


लेसन ३ : क्राउड ओवर कोर - एक्सपर्ट्स की छुट्टी और जनता का राज

दोस्तो, अब बात करते हैं उस लेसन की जो बडे-बडे सीईओ और एक्सपर्ट्स की रातों की नींद उडा देता है। इसे कहते हैं "क्राउड ओवर कोर"। पुराने जमाने में माना जाता था कि किसी भी कंपनी की असली ताकत उसके अंदर बैठे मुट्ठी भर टैलेंटेड लोग होते हैं, जिन्हें हम "कोर" कहते हैं। लेकिन एंड्रू मैकाफी कहते हैं कि अब जमाना बदल गया है। अब कंपनी की चारदीवारी के अंदर बैठे चंद एक्सपर्ट्स से कहीं ज्यादा स्मार्ट बाहर बैठी "क्राउड" यानी आम जनता है। अगर आप आज भी यह सोचते हैं कि आपकी टीम के १० लोग दुनिया की हर समस्या का हल निकाल लेंगे, तो आप बहुत बडी गलतफहमी में जी रहे हैं।

जरा विकिपीडिया का उदाहरण लीजिए। एक जमाने में "एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका" हुआ करती थी, जिसमें दुनिया के सबसे बडे विद्वान आर्टिकल्स लिखते थे। फिर आया विकिपीडिया, जहाँ दुनिया का कोई भी एरा-गेरा नत्थू-खैरा जानकारी अपडेट कर सकता था। शुरू में एक्सपर्ट्स ने खूब मजाक उडाया कि "भला आम जनता क्या खाक सही जानकारी देगी"। नतीजा क्या हुआ? आज ब्रिटानिका इतिहास बन चुकी है और विकिपीडिया दुनिया का सबसे बडा ज्ञान का भंडार है। यहाँ क्राउड ने कोर को धोबी पछाड दे दी। क्राउड के पास वह डाइवर्सिटी और वैरायटी है जो किसी भी ऑफिस के केबिन में नहीं मिल सकती।

इस कॉन्सेप्ट को एक और मजेदार मिसाल से समझते हैं। मान लीजिए आपको अपनी कंपनी के लिए एक नया लोगो डिजाइन करवाना है। आप एक बहुत महंगे डिजाइनर को लाखों रुपये देते हैं। वह आपको दो-तीन ऑप्शन देता है और आपको उनमें से ही चुनना पडता है। लेकिन अब आप इंटरनेट पर एक कॉन्टेस्ट रख देते हैं जहाँ दुनिया भर के हजारों लोग अपने डिजाइन भेजते हैं। यहाँ आपको लाखों रुपये खर्च करने की जरूरत नहीं है, बस एक छोटा सा इनाम रखना है। अब आपके पास हजारों दिमागों के आईडियाज हैं। हो सकता है कि गांव में बैठा कोई छोटा सा लडका ऐसा डिजाइन भेज दे जो उस महंगे शहर वाले डिजाइनर ने सोचा भी न हो। इसे कहते हैं क्राउड की ताकत का सही इस्तेमाल।

लेखक चेतावनी देते हैं कि क्राउड का मतलब सिर्फ सोशल मीडिया पर कमेंट करना नहीं है। इसका मतलब है "विजडम ऑफ क्राउड" का फायदा उठाना। आज कंपनियाँ अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए ओपन चैलेंज रखती हैं। वह जानती हैं कि जो समस्या उनके साइंटिस्ट २ साल में हल नहीं कर पाए, उसे इंटरनेट पर बैठा कोई अनजान इंसान २ दिन में सुलझा सकता है। अगर आप एक लीडर हैं और आपको लगता है कि सिर्फ आपकी बात ही पत्थर की लकीर है, तो भाई साहब, आप आउटडेटेड हो चुके हैं। आज का दौर "कोलैबोरेशन" का है, "कंट्रोल" का नहीं।

लेकिन याद रहे, क्राउड को संभालना कोई आसान काम नहीं है। यह एक बिना लगाम के घोडे जैसा है। अगर आपने इसे सही दिशा नहीं दी, तो यह आपकी कंपनी की लंका भी लगा सकती है। आपको एक ऐसा सिस्टम बनाना होगा जहाँ आप इस भीड की एनर्जी को सही काम में लगा सकें। आज के दौर में जो इंसान या कंपनी इस क्राउड की ताकत को नहीं समझेगी, वह वैसे ही गायब हो जाएगी जैसे नोकिया गायब हो गया। तो अपनी टीम के बाहर देखना शुरू कीजिए, क्योंकि आपकी अगली बडी कामयाबी का आईडिया शायद किसी अजनबी के पास है जो आपके ऑफिस से हजारों मील दूर बैठा है।


दोस्तो, मशीन, प्लेटफॉर्म और क्राउड—यह सिर्फ किताबी शब्द नहीं हैं, बल्कि आपके भविष्य का नक्शा हैं। अगर आप बदलते वक्त के साथ खुद को नहीं बदलेंगे, तो इतिहास आपको याद भी नहीं रखेगा। आज ही कमेंट्स में बताइए कि आप इनमें से किस बदलाव के लिए सबसे ज्यादा तैयार हैं? इस जानकारी को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो आज भी पुराने तरीकों से बिजनेस या करियर चला रहे हैं। जागिए, क्योंकि डिजिटल भविष्य आ चुका है।

-----

आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now




#MachinePlatformCrowd #DigitalFuture #BusinessStrategy #BookSummary Hindi #SuccessTips


_

Post a Comment

Previous Post Next Post