क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर गधे की तरह मेहनत करते हैं पर शाम को हाथ में सिर्फ थकान और जीरो रिजल्ट आता है। बधाई हो आप अपनी जिंदगी को बर्बाद करने के सबसे तेज रास्ते पर चल रहे हैं। बिना फोकस के भागना सिर्फ एक धोखा है जो आप खुद को दे रहे हैं।
आज हम माइकल हयात की किताब फ्री टू फोकस से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आपको काम के बोझ से आजादी दिलाएंगे। तैयार हो जाइए अपनी प्रोडक्टिविटी को अगले लेवल पर ले जाने के लिए क्योंकि अब सिर्फ मेहनत नहीं बल्कि सही दिशा में मेहनत होगी।
लेसन १ : एलिमिनेट करना ही असली ताकत है
आजकल की भागदौड़ भरी लाइफ में हम सबको लगता है कि जितना ज्यादा काम हम अपने सिर पर लेंगे उतने ही ज्यादा सक्सेसफुल कहलाएंगे। पर सच तो यह है कि आप जितने ज्यादा कामों में हाथ डालेंगे आप उतने ही ज्यादा फेलियर के करीब पहुंच रहे हैं। माइकल हयात अपनी किताब फ्री टू फोकस में बड़े प्यार से समझाते हैं कि असली प्रोडक्टिविटी का मतलब ज्यादा काम करना नहीं बल्कि फालतू के कामों को अपनी जिंदगी से डिलीट करना है। सोचिए अगर आप एक बाल्टी में सौ छेद कर दें और फिर उसमें पानी भरें तो क्या होगा। बाल्टी कभी नहीं भरेगी और आप बस पाइप पकड़कर खड़े रह जाएंगे। यही हाल हमारे शेड्यूल का है। हम हर उस काम को हां बोल देते हैं जो हमारे सामने आता है। चाहे वह किसी रिश्तेदार की फालतू शादी हो या ऑफिस का कोई ऐसा प्रोजेक्ट जिससे आपके करियर को कोई फायदा नहीं होने वाला।
इंडिया में तो वैसे भी हमें ना बोलना सिखाया ही नहीं गया है। अगर कोई पड़ोसी आकर कहे कि भाई जरा मार्केट तक छोड़ दो तो हम अपना जरूरी काम छोड़कर ड्राइवर बन जाते हैं। हम सोचते हैं कि अगर ना बोला तो सामने वाला क्या सोचेगा। अरे भाई वह जो सोचेगा सोचेगा पर आपका जो कीमती समय बर्बाद हुआ उसका हिसाब कौन देगा। एलिमिनेट करने का मतलब है कि आपको अपनी लाइफ का एक नो लिस्ट बनाना होगा। यह लिस्ट आपके टू डू लिस्ट से ज्यादा जरूरी है। जब तक आप कूड़े को बाहर नहीं फेकेंगे तब तक आपके घर में नई और कीमती चीजों के लिए जगह नहीं बनेगी।
मान लीजिए आप एक फ्रीलांसर हैं और आप हर महीने दस छोटे छोटे क्लाइंट्स के साथ काम करते हैं जो आपको बहुत कम पैसे देते हैं और आपका पूरा खून पी जाते हैं। अब आप हर समय बिजी रहते हैं पर बैंक बैलेंस वैसा का वैसा ही रहता है। यहाँ आपकी समस्या मेहनत की कमी नहीं है बल्कि एलिमिनेशन की कमी है। अगर आप उन आठ बेकार क्लाइंट्स को टाटा बाय बाय बोल दें तो आपके पास उन दो बड़े क्लाइंट्स पर फोकस करने का समय होगा जो आपको ज्यादा पैसा भी देंगे और आपकी इज्जत भी करेंगे। पर हम क्या करते हैं। हम उन आठ क्लाइंट्स को पकड़कर बैठे रहते हैं जैसे वह हमारे बचपन के दोस्त हों।
हमें लगता है कि हम मल्टीटास्किंग के बादशाह हैं। एक तरफ फोन पर बात चल रही है दूसरी तरफ ईमेल टाइप हो रहा है और तीसरी तरफ चाय का कप भी हाथ में है। यह कोई टैलेंट नहीं है बल्कि अपने दिमाग का कचरा करने का तरीका है। जब आप एक साथ कई काम करते हैं तो आप किसी भी काम को ठीक से नहीं कर पाते। माइकल हयात कहते हैं कि अपने फोकस को एक लेजर बीम की तरह बनाइए। लेजर तभी काम करती है जब उसकी सारी एनर्जी एक ही पॉइंट पर होती है। अगर आप उस रोशनी को फैला देंगे तो वह बस एक साधारण टॉर्च बन जाएगी जिससे आप अंधेरे में रास्ता तो देख सकते हैं पर लोहा नहीं काट सकते।
इसलिए आज ही रुकिए और सोचिए कि आपके दिन भर के कामों में से कौन से ऐसे काम हैं जो सिर्फ आपका टाइम खा रहे हैं। क्या वह बार बार नोटिफिकेशन्स चेक करना है। क्या वह फालतू की मीटिंग्स हैं जो एक ईमेल में निपट सकती थीं। अगर आप इन चीजों को अपनी जिंदगी से एलिमिनेट नहीं करेंगे तो आप बस एक कोल्हू के बैल बनकर रह जाएंगे जो घूम तो बहुत रहा है पर पहुंच कहीं नहीं रहा है। याद रखिए एक लीडर और एक फॉलोअर में यही फर्क होता है कि लीडर जानता है कि उसे कब और किसको ना बोलना है। अपनी लाइफ के सी ई ओ बनिए और आज ही अपनी लाइफ से फालतू कामों की छंटनी शुरू कीजिए।
लेसन २ : ऑटोमेशन और डेलीगेशन का जादू
जब आप फालतू कामों को अपनी लाइफ से हटा देते हैं तो आपके पास वह काम बचते हैं जो वाकई जरूरी हैं। पर रुकिए। जरूरी होने का मतलब यह कतई नहीं है कि वह सारे काम सिर्फ आपको ही करने हैं। माइकल हयात कहते हैं कि अगर आप खुद को सुपरमैन समझकर हर काम अपने ही हाथों से करने की जिद करेंगे तो बहुत जल्द आप एक थके हुए इंसान बनकर रह जाएंगे जिसकी प्रोडक्टिविटी जीरो होगी। यहीं पर काम आता है ऑटोमेशन और डेलीगेशन का जादू। ऑटोमेशन का मतलब है कि टेक्नोलॉजी को अपना गुलाम बना लें और डेलीगेशन का मतलब है कि सही काम के लिए सही बंदा चुनकर उसे वह जिम्मेदारी सौंप दें।
आज के जमाने में भी कई लोग ऐसे हैं जो हर चीज मैन्युअली करना पसंद करते हैं जैसे कि उन्हें इसके लिए कोई मेडल मिलने वाला हो। मान लीजिए आपको हर महीने बिजली का बिल भरना है या रेंट देना है। अब अगर आप हर महीने इसके लिए कैलेंडर में रिमाइंडर सेट करते हैं और फिर बैंक की ऐप खोलकर दुखी मन से पैसे भेजते हैं तो आप अपना मेंटल स्पेस फालतू में खर्च कर रहे हैं। इसे ऑटो मोड पर डालिए। एक बार सेटिंग कीजिए और भूल जाइए। आपका दिमाग इन छोटी बातों के लिए नहीं बना है। इसे कुछ बड़ा सोचने के लिए खाली रखिए।
अब बात करते हैं डेलीगेशन की जो हमारे इंडियन कल्चर में थोड़ा मुश्किल माना जाता है। हमें लगता है कि जो काम हम खुद कर सकते हैं उसके लिए किसी और को पैसे क्यों दें। या फिर हमें यह डर सताता है कि कोई और हमारे जैसा परफेक्ट काम नहीं कर पाएगा। यह एक बहुत बड़ा जाल है। अगर आपका एक घंटा एक हजार रुपये का है और आप पांच सौ रुपये बचाने के चक्कर में दो घंटे तक सब्जी मंडी में मोलभाव कर रहे हैं तो असल में आप अपना नुकसान कर रहे हैं। एक स्मार्ट इंसान वह नहीं है जो सारा काम खुद करे बल्कि वह है जो जानता है कि कौन सा काम किससे करवाना है।
मान लीजिए आप एक कंटेंट क्रिएटर हैं। आपका असली काम है रिसर्च करना और वीडियो की स्क्रिप्ट लिखना। पर आप क्या कर रहे हैं। आप खुद ही वीडियो एडिट कर रहे हैं खुद ही थंबनेल के साथ कुश्ती लड़ रहे हैं और खुद ही कमेंट्स का रिप्लाई भी कर रहे हैं। रिजल्ट क्या निकलता है। आप हफ्ते में सिर्फ एक वीडियो डाल पाते हैं क्योंकि आप बाकी कामों में फंसे हुए हैं। अगर आप एक एडिटर रख लें तो शायद आप हफ्ते के तीन वीडियो बना पाएं। आपकी ग्रोथ तीन गुना बढ़ सकती है पर आप अभी भी उस एडिटर की सैलरी बचाने के चक्कर में खुद को थका रहे हैं।
डेलीगेशन का मतलब काम से पीछा छुड़ाना नहीं बल्कि अपनी काबिलियत को सही जगह लगाना है। माइकल हयात इसे डिजायर जोन कहते हैं। यह वह जगह है जहाँ आपकी स्किल्स और आपका पैशन दोनों मिलते हैं। बाकी सब कुछ या तो ऑटोमेट होना चाहिए या डेलीगेट। अगर आप अपनी कंपनी के मालिक होकर भी चपरासी वाले काम कर रहे हैं तो आप अपनी कंपनी के सबसे बड़े दुश्मन हैं। दूसरों पर भरोसा करना सीखिए। शुरू में शायद वे आपके जितना परफेक्ट काम न करें पर धीरे धीरे वे आपसे भी बेहतर बन सकते हैं।
तो आज से ही लिस्ट बनाइए उन कामों की जो आप हर रोज करते हैं पर जिन्हें कोई और भी कर सकता है। चाहे वह घर की साफ सफाई हो ऑफिस की ईमेल्स का जवाब देना हो या सोशल मीडिया पोस्ट शेड्यूल करना हो। अपने कीमती समय को बचाकर उसे वहां लगाइए जहाँ सिर्फ आप ही काम कर सकते हैं। जब आप दूसरों को बढ़ने का मौका देते हैं और टेक्नोलॉजी का सहारा लेते हैं तब आप असल में फ्री होते हैं फोकस करने के लिए। याद रखिए एक कैप्टन अगर खुद ही जहाज का फर्श साफ करने लग जाए तो जहाज अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुंचेगा।
लेसन ३ : रीज Juvenate होकर परफॉरमेंस बढ़ाना
अब तक हमने सीखा कि फालतू कामों को कैसे काटें और जरूरी कामों को कैसे दूसरों को सौंपें। लेकिन इन सबके बाद भी एक ऐसी चीज है जिसे अक्सर हम नजरअंदाज कर देते हैं और वह है खुद को रिचार्ज करना। माइकल हयात कहते हैं कि अगर आप एक मशीन की तरह चौबीस घंटे काम करेंगे तो एक दिन आपका सिस्टम क्रैश होना तय है। हमारे समाज में एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि जो इंसान कम सोता है और हर वक्त लैपटॉप से चिपका रहता है वही सबसे ज्यादा मेहनती है। सच तो यह है कि वह इंसान बस अपनी मौत और बीमारी को दावत दे रहा है। प्रोडक्टिविटी का मतलब खुद को खत्म करना नहीं बल्कि खुद को इतना फ्रेश रखना है कि जब आप काम पर बैठें तो आपका दिमाग बिजली की तरह चले।
लीजेंडरी परफॉरमेंस के लिए आपको अपनी नींद, अपनी डाइट और अपने आराम के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहिए। आपने देखा होगा कि जब आप बहुत ज्यादा थक जाते हैं तो एक छोटा सा ईमेल लिखने में भी आपको एक घंटा लग जाता है। वही काम अगर आप सोकर उठने के बाद फ्रेश माइंड से करें तो वह दस मिनट में खत्म हो जाता है। तो असल में आपने सोकर अपना समय बर्बाद नहीं किया बल्कि अपना समय बचाया है। माइकल हयात इसे रीज Juvenation कहते हैं। यह कोई लग्जरी नहीं बल्कि एक जरूरत है। जैसे आपके मोबाइल को रोज चार्जिंग की जरूरत होती है वैसे ही आपके दिमाग को भी शांति और ब्रेक की जरूरत होती है।
मान लीजिए आप एक बहुत बड़े जिम फ्रीक हैं और आप सोचते हैं कि अगर मैं रोज आठ घंटे वर्कआउट करूँगा तो मेरी बॉडी बहुत जल्दी बन जाएगी। आप जिम जाते हैं और पागलों की तरह वजन उठाते हैं। क्या होगा। आपकी मसल्स बनेंगी नहीं बल्कि फट जाएंगी। मसल्स तभी बनती हैं जब आप जिम के बाद घर जाकर आराम करते हैं और अच्छी नींद लेते हैं। काम का भी यही हिसाब है। अगर आप अपने दिमाग को हर समय टेंशन में रखेंगे तो वह नए आइडियाज देना बंद कर देगा। फिर आप बस एक ही जगह गोल गोल घूमते रहेंगे।
इंडिया में तो लोग छुट्टी लेने को भी पाप समझते हैं। अगर कोई एम्प्लॉई संडे को ऑफिस का फोन न उठाए तो बॉस को लगता है कि यह तो गद्दार है। पर हकीकत यह है कि जो इंसान संडे को ढंग से एन्जॉय करता है वह मंडे को सबसे ज्यादा काम करके देता है। अपनी हॉबीज के लिए वक्त निकालिए। अपने परिवार के साथ बैठिए या बस चुपचाप बैठकर छत को ताकिये। यह सब फालतू नहीं है। यह आपके दिमाग की सर्विसिंग है। जब आप अपने काम से पूरी तरह कट जाते हैं तभी आप वापस आकर उसमें पूरी तरह डूब पाते हैं।
याद रखिए आपकी लाइफ कोई स्प्रिंट रेस नहीं है बल्कि एक मैराथन है। अगर आप शुरू में ही अपनी पूरी जान लगा देंगे तो बीच रास्ते में ही ढेर हो जाएंगे। अपनी एनर्जी को बचाकर रखिए। फ्री टू फोकस होने का मतलब यह भी है कि आप अपने समय के मालिक खुद बनें। जब काम का समय हो तो दुनिया की कोई ताकत आपको डिस्टर्ब न कर पाए और जब आराम का समय हो तो ऑफिस का कोई ईमेल आपके सुकून को न छीन पाए। जिस दिन आप यह बैलेंस बनाना सीख गए समझ लीजिए कि आपने लाइफ की सबसे बड़ी जंग जीत ली है।
दोस्तो, फ्री टू फोकस सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि एक जीने का तरीका है। यह हमें याद दिलाती है कि हम इंसान हैं कोई रोबोट नहीं। अपनी प्रायोरिटी सेट कीजिए फालतू चीजों को कचरे के डिब्बे में डालिए और जो काम जरूरी हैं उनके लिए अपना बेस्ट दीजिए। लेकिन इन सबके बीच खुद को मत भूलिए। आपकी सेहत और आपकी दिमागी शांति ही आपकी असली दौलत है।
आज ही अपने दिन के शेड्यूल को देखिए और कोई एक ऐसा काम चुनिए जिसे आप आज ही अपनी लाइफ से एलिमिनेट कर सकते हैं। कमेंट्स में लिखकर बताइए कि आप अपना फोकस वापस पाने के लिए कौन सा बड़ा कदम उठाने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिए जो हमेशा बिजी रहने का नाटक करता है पर काम कुछ नहीं करता। चलिए साथ मिलकर अपनी लाइफ को सिंपल और फोकस बनाते हैं।
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