क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सोचते हैं कि सोशल मीडिया बस फोटो डालने के लिए है। मुबारक हो। आप अपने कॉम्पिटिटर को अमीर बनने का पूरा मौका दे रहे हैं। जबकि दुनिया डिजिटल मार्केटिंग के गुपचुप रास्तों से नोट छाप रही है और आप पुराने तरीकों को पकड़कर बैठे हैं। यह नुकसान आपकी सोच से बड़ा है।
क्रिस ब्रोगन की यह किताब हमें सिखाती है कि कैसे गूगल प्लस का सही इस्तेमाल करके आप अपने बिजनेस की पूरी किस्मत बदल सकते हैं। चलिए जानते हैं उन 3 खास लेसन्स के बारे में जो आपके डूबते हुए काम को एक नई उड़ान दे सकते हैं।
लेसन १ : गूगल प्लस कोई फेसबुक नहीं बल्कि आपके बिजनेस का सोशल इंश्योरेंस है
आजकल हर कोई सोशल मीडिया पर ऐसे भाग रहा है जैसे फ्री की सेल लगी हो। लोग सोचते हैं कि बस फेसबुक पर फोटो डाल दी या इंस्टाग्राम पर रील बना ली तो बिजनेस चमक जाएगा। लेकिन असलियत बड़ी कड़वी है बॉस। क्रिस ब्रोगन कहते हैं कि अगर आप गूगल प्लस को सिर्फ एक और फेसबुक समझ रहे हैं तो आप अपनी लाइफ की सबसे बड़ी गलती कर रहे हैं। यह कोई आम सोशल नेटवर्क नहीं है। यह तो एक सोशल लेयर है जो आपकी हर ऑनलाइन एक्टिविटी को गूगल की नजरों में वीआईपी बना देती है।
सोचिए आप एक दुकान खोलते हैं लेकिन वह शहर की ऐसी सुनसान गली में है जहां कोई आता जाता ही नहीं। अब आप वहां चाहे जितनी भी बढ़िया लाइटिंग कर लें या डिस्काउंट बोर्ड लगा लें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। गूगल सर्च उसी बड़े शहर के मेन चौराहे जैसा है। अगर आप वहां नहीं दिख रहे तो आप एक्सिस्ट ही नहीं करते। गूगल प्लस आपके बिजनेस के लिए वही काम करता है जो एक नेता के लिए उसका रसूख करता है। जब आप यहाँ एक्टिव होते हैं तो गूगल को लगता है कि भाई इस बंदे में कुछ तो दम है। फिर जब भी कोई आपके काम से जुड़ा कुछ सर्च करता है तो गूगल बड़े प्यार से आपका नाम सबसे ऊपर लाकर रख देता है।
मान लीजिए हमारे मोहल्ले के शर्मा जी ने एक जिम खोला। अब शर्मा जी दिन भर फेसबुक पर अपनी मसल्स वाली फोटो डालते हैं। लेकिन जब कोई नया लड़का गूगल पर सर्च करता है बेस्ट जिम नियर मी तो शर्मा जी का नाम कहीं नहीं आता। क्यों। क्योंकि शर्मा जी तो अपनी दुनिया में मस्त हैं। वहीं दूसरी तरफ वर्मा जी थोड़े स्मार्ट निकले। उन्होंने गूगल प्लस की ताकत को समझा और वहां अपनी वर्कआउट टिप्स शेयर करने लगे। नतीजा यह हुआ कि गूगल बाबा उन पर मेहरबान हो गए। अब जो भी सर्च करता है उसे सबसे पहले वर्मा जी का जिम दिखता है। शर्मा जी आज भी फेसबुक पर लाइक गिन रहे हैं और वर्मा जी के जिम में पैर रखने की जगह नहीं है।
यही फर्क है एक भीड़ का हिस्सा बनने में और एक ब्रांड बनने में। अगर आप चाहते हैं कि लोग आपको खोजें तो आपको वहां होना पड़ेगा जहां गूगल की खुद की नजर है। आप यहाँ जो भी पोस्ट करते हैं वह सीधा सर्च इंजन की इंडेक्सिंग में जाता है। मतलब आपकी हर पोस्ट एक कीवर्ड की तरह काम करती है। यह तो वही बात हुई कि आपने एक तीर से दो शिकार कर लिए। एक तरफ आप अपनी कम्युनिटी बना रहे हैं और दूसरी तरफ गूगल की गुड बुक्स में अपनी जगह पक्की कर रहे हैं। अगर अब भी आप इसे इग्नोर कर रहे हैं तो यकीन मानिए आप अपने बिजनेस के पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हैं। और फिर बाद में यह मत कहना कि किस्मत खराब थी। किस्मत नहीं आपकी स्ट्रेटेजी खराब है।
लेसन २ : सर्कल्स की पावर और मतलब की नेटवर्किंग
अब जब आप समझ गए हैं कि गूगल की नजरों में आना क्यों जरूरी है, तो चलिए अब बात करते हैं कि आए हुए लोगों को संभालना कैसे है। अक्सर लोग सोशल मीडिया पर 'शादी के कार्ड' की तरह कंटेंट बांटते हैं। सबको एक जैसा ही मैसेज भेज देते हैं, चाहे सामने वाले को उसमें इंटरेस्ट हो या न हो। क्रिस ब्रोगन कहते हैं कि यह तो वही बात हुई कि आप एक शाकाहारी इंसान को जबरदस्ती चिकन बिरयानी खिलाने की कोशिश कर रहे हैं। नतीजा क्या होगा। वह इंसान आपसे दूर भागेगा। यहीं पर काम आते हैं गूगल प्लस के 'सर्कल्स'।
सर्कल्स का मतलब है अपनी ऑडियंस को उनकी पसंद और जरूरत के हिसाब से अलग-अलग खानों में बांटना। यह आपके बिजनेस के लिए किसी सुपरपावर से कम नहीं है। जरा सोचिए, आपके पास तीन तरह के कस्टमर्स हैं। एक वो जो सिर्फ जानकारी लेना चाहते हैं, दूसरे वो जो खरीदने के लिए तैयार बैठे हैं, और तीसरे वो जो पहले से आपके लॉयल कस्टमर्स हैं। क्या आप इन तीनों को एक ही बात बोलेंगे। बिल्कुल नहीं। अगर आप सबको एक ही लाठी से हांकेंगे, तो लोग आपको 'स्पैमर' समझकर अनफॉलो कर देंगे। और सच कहूं तो आज के जमाने में इग्नोर होना, गाली खाने से भी ज्यादा बुरा है।
मान लीजिए आप एक मोबाइल फोन की दुकान चलाते हैं। अब आपके पास एक कस्टमर आया जिसे 10 हजार का बजट फोन चाहिए, और दूसरा आया जिसे डेढ़ लाख का आईफोन लेना है। अब अगर आप बजट वाले को आईफोन के फीचर्स बताने लगेंगे, तो वह बेचारा अपनी किडनी की फिक्र करने लगेगा और दुकान से भाग जाएगा। वहीं अगर आप अमीर कस्टमर को सस्ते फोन की मजबूती गिनाएंगे, तो उसे लगेगा कि आप उसकी स्टेटस की तौहीन कर रहे हैं। शर्मा जी की तरह 'सबको सब कुछ' बेचने की कोशिश मत करिए। वर्मा जी बनिए, जिन्होंने अपने कस्टमर्स के लिए अलग-अलग 'सर्कल्स' बना रखे हैं। वह बजट वाले को डिस्काउंट के ऑफर भेजते हैं और प्रीमियम वाले को नए लॉन्च की एक्सक्लूसिव जानकारी।
यही तो असली बिजनेस है बॉस। जब आप सही बंदे को सही बात सही समय पर बताते हैं, तो उसे लगता है कि आप उसका ख्याल रख रहे हैं। यह पर्सनल टच ही कस्टमर को आपका दीवाना बना देता है। लोग आजकल विज्ञापनों से थक चुके हैं, उन्हें चाहिए कनेक्शन। गूगल प्लस के सर्कल्स आपको यह मौका देते हैं कि आप बिना शोर मचाए, सीधे अपने टारगेट तक पहुंचें। अगर आप अब भी सबको एक ही ब्रॉडकास्ट लिस्ट में डालकर कचरा फैला रहे हैं, तो समझ लीजिए कि आप अपने बिजनेस का गला घोंट रहे हैं। मार्केटिंग का मतलब शोर मचाना नहीं, बल्कि सही कान में सही बात कहना है। और जो यह सीख गया, समझो उसने आधे से ज्यादा जंग जीत ली।
लेसन ३ : हैंगआउट्स का जादू और भरोसे की दुकान
सर्कल्स से लोगों को छांटने के बाद अब बारी आती है उनसे रिश्ता बनाने की। आज के डिजिटल दौर में सबसे बड़ी कमी है 'भरोसे' की। लोग इंटरनेट पर चीजें देखते तो हैं, लेकिन खरीदने से पहले दस बार सोचते हैं कि कहीं चूना न लग जाए। क्रिस ब्रोगन इस किताब में एक कमाल का टूल बताते हैं जिसे 'गूगल प्लस हैंगआउट्स' कहा जाता है। यह सिर्फ एक वीडियो कॉल नहीं है, यह आपके बिजनेस का चेहरा है। जब लोग आपको लाइव देखते हैं, आपसे बात करते हैं और आपके चेहरे के हाव भाव देखते हैं, तो वह जो कनेक्शन बनता है, उसे दुनिया का कोई भी महंगा विज्ञापन नहीं खरीद सकता।
सोचिए, एक तरफ एक बड़ी कंपनी है जिसका सिर्फ एक लोगो दिखता है और दूसरी तरफ आप हैं जो लाइव आकर लोगों के सवालों के जवाब दे रहे हैं। लोग मशीन से नहीं, इंसान से जुड़ना पसंद करते हैं। अगर आप पर्दे के पीछे छिपे रहेंगे, तो लोग आपको सिर्फ एक 'यूजरनेम' समझेंगे। लेकिन जब आप सामने आते हैं, तो आप एक 'भरोसा' बन जाते हैं। और याद रखिए, बिजनेस में पैसा बाद में आता है, पहले भरोसा आता है। अगर भरोसा है, तो लोग आपकी मिट्टी भी सोने के भाव खरीद लेंगे, और अगर नहीं, तो आप असली सोना भी बेचेंगे तो लोग उसमें खोट निकाल लेंगे।
हमारे मोहल्ले के राजू भाई ने ऑनलाइन 'हेयर ग्रोथ ऑयल' बेचना शुरू किया। उन्होंने वेबसाइट पर ऐसी फोटो लगाई जैसे रात भर में सबके सिर पर घने जंगल उग आएंगे। लेकिन किसी ने नहीं खरीदा। लोग कमेंट्स में पूछते रहे कि भाई असली है या चिपचिपा तेल। फिर राजू भाई ने स्मार्ट मूव खेला। उन्होंने एक लाइव सेशन किया, जिसमें उन्होंने खुद वह तेल लगाकर दिखाया और लोगों के अजीबोगरीब सवालों के जवाब दिए। उन्होंने यह भी मान लिया कि भाई यह कोई जादू नहीं है, वक्त लगेगा। उनकी इस ईमानदारी और लाइव आकर बात करने के अंदाज ने लोगों का दिल जीत लिया। जो लोग पहले शक कर रहे थे, अब वही लोग राजू भाई के ब्रांड एंबेसडर बन गए।
यही ताकत है 'ह्यूमन टच' की। आप चाहे कितने भी बड़े टेक एक्सपर्ट बन जाएं, अगर आप अपने कस्टमर की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर सकते, तो आप कभी एक बड़ा ब्रांड नहीं बना पाएंगे। गूगल प्लस आपको वह मंच देता है जहां आप अपनी दुकान की दीवारें गिराकर ग्राहकों को अंदर बुला सकते हैं। यह मौका मत गंवाइए। अगर आप अभी भी सिर्फ टेक्स्ट मैसेज और ईमेल के पीछे छिपकर बिजनेस करना चाहते हैं, तो मुबारक हो, आप बहुत जल्द इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। दुनिया बदल रही है, लोग अब असलियत देखना चाहते हैं। अगर आप असली हैं, तो सामने आइए, वर्ना भीड़ तो पहले ही बहुत ज्यादा है।
तो दोस्तों, गूगल प्लस फॉर बिजनेस सिर्फ एक पुरानी सोशल मीडिया साइट की कहानी नहीं है, बल्कि यह ऑनलाइन दुनिया में अपनी जगह बनाने का एक मास्टरक्लास है। चाहे वह गूगल सर्च में टॉप पर आना हो, सही लोगों तक पहुंचना हो, या फिर लाइव आकर लोगों का भरोसा जीतना हो, यह किताब हमें सिखाती है कि बिजनेस सिर्फ सामान बेचने का नाम नहीं, बल्कि रिश्ते बनाने का नाम है।
अब फैसला आपके हाथ में है। क्या आप भी शर्मा जी की तरह भीड़ में खो जाना चाहते हैं या वर्मा जी और राजू भाई की तरह स्मार्ट बनकर अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं। आज ही अपने बिजनेस करने के तरीके पर गौर करें। नीचे कमेंट में बताएं कि इन तीनों लेसन्स में से आपको सबसे ज्यादा कौन सा पसंद आया। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपना नया बिजनेस शुरू करने की सोच रहे हैं। याद रखिए, सही जानकारी ही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है। चलिए, मिलकर कुछ बड़ा करते हैं।
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