Habit Stacking (Hindi)


वाह। आप अभी भी वही पुराने घिसे पिटे न्यू ईयर रेजोल्यूशन बना रहे हैं जो दो दिन भी नहीं टिकते। सच तो यह है कि आपकी जिंदगी उतनी ही बोरिंग रहेगी क्योंकि आप छोटे बदलावों की ताकत को नहीं समझते। इस आर्टिकल को छोड़ दीजिए अगर आपको फेल होने में मजा आता है।

लेकिन अगर आप वाकई अपनी हेल्थ और वेल्थ को लेकर सीरियस हैं तो स्टीव स्कॉट की यह किताब आपको वह सीक्रेट बताएगी जो बड़े बड़े जीनियस इस्तेमाल करते हैं। चलिए जानते हैं वह ३ पावरफुल लेसन जो आपकी लाइफ बदल देंगे।


लेसन १ : हैबिट स्टैकिंग का असली जादू - पुरानी आदतों का सहारा

क्या आपको याद है कि पिछली बार आपने कब सोचा था कि कल से मैं सुबह उठकर कसरत करूँगा और फिर वह 'कल' कभी आया ही नहीं। हम सब अपनी लाइफ में बड़े बड़े बदलाव करना चाहते हैं लेकिन हमारा आलसी दिमाग हमें पुरानी आदतों की आरामदायक सोफे से उठने ही नहीं देता। स्टीव स्कॉट कहते हैं कि नई आदत डालना एक छोटे बच्चे को भीड़ में अकेला छोड़ने जैसा है। वह खो जाएगा। अगर आप चाहते हैं कि आपकी नई आदत टिके तो उसे एक 'बॉडीगार्ड' की जरूरत है। और वह बॉडीगार्ड है आपकी एक पुरानी और पक्की आदत।

इसे ही लेखक हैबिट स्टैकिंग कहते हैं। इसका सीधा सा लॉजिक है कि आप अपनी नई आदत को उस काम के पीछे चिपका दें जिसे आप रोज बिना सोचे समझे करते हैं। जैसे दांत साफ करना या सुबह की चाय पीना। मान लीजिए आप चाहते हैं कि आप रोज थोड़ा स्ट्रेचिंग करें। अब अगर आप सोचेंगे कि दोपहर में कभी टाइम मिला तो करूँगा तो यकीन मानिए आप कभी नहीं करेंगे। लेकिन अगर आप खुद से कहें कि 'जैसे ही मैं सुबह की चाय का कप सिंक में रखूँगा मैं तुरंत २ मिनट स्ट्रेचिंग करूँगा' तो आपके कामयाब होने के चांस बढ़ जाते हैं।

यहाँ आपका चाय पीना वह पुराना खूंटा है जिससे आपने नई आदत की रस्सी को बांध दिया है। हमारे इंडियन घरों में तो यह और भी मजेदार हो सकता है। जैसे ही मम्मी का फोन आए आप वॉक करना शुरू कर दें। क्योंकि हम जानते हैं कि मम्मी का फोन कम से कम २० मिनट तो चलेगा ही। तो क्यों न उस समय का इस्तेमाल अपनी हेल्थ के लिए किया जाए। या फिर जैसे ही आप ऑफिस से घर लौटें और जूते उतारें तुरंत १ गिलास पानी पिएं।

ज्यादातर लोग गलती यह करते हैं कि वे एक ही दिन में पहाड़ तोड़ना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि कल से मैं सीधा १ घंटा जिम जाऊँगा। भाई साहब आप जिम तो चले जाएंगे लेकिन तीसरे दिन आपके पैर आपसे बदला लेंगे और आप फिर वही बिस्तर पर चिपके मिलेंगे। हैबिट स्टैकिंग का मंत्र बहुत सिंपल है। अपनी वर्तमान आदतों की एक लिस्ट बनाइए। आप सुबह से रात तक जो भी करते हैं उसे लिखिए। फिर देखिए कि आप अपनी नई छोटी सी आदत को कहाँ फिट कर सकते हैं। यह सुनने में बहुत बेसिक लगता है लेकिन इसकी ताकत कमाल की है। जब आप अपनी नई आदत को किसी पुरानी आदत के साथ जोड़ देते हैं तो आपका दिमाग उसे एक अलग टास्क नहीं मानता। वह उसे आपके डेली रूटीन का हिस्सा समझ लेता है।

इससे आपकी इच्छाशक्ति यानी विलपावर पर ज्यादा जोर नहीं पड़ता। आपको सोचना नहीं पड़ता कि अब क्या करूँ। पुरानी आदत खत्म हुई और नई शुरू हो गई। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आप बिजली का बिल भरने जाते हैं और साथ में पास वाली दुकान से धनिया भी ले आते हैं। अलग से धनिया लेने जाने में आलस आता लेकिन बिल भरने के साथ वह काम 'स्टैक' हो गया। लाइफ में डिसिप्लिन लाने का इससे सस्ता और टिकाऊ तरीका दूसरा नहीं है।


लेसन २ : ५ मिनट का नियम और छोटे बदलावों की ताकत

हम भारतीयों की एक बड़ी प्रॉब्लम है। हमें या तो सब कुछ चाहिए या कुछ भी नहीं। अगर हम डाइटिंग शुरू करते हैं तो सीधा घास फूस पर आ जाते हैं और अगर पढ़ना शुरू करते हैं तो लगता है कि एक ही दिन में पूरी लाइब्रेरी खत्म कर देंगे। स्टीव स्कॉट हमें इस 'सब या कुछ नहीं' वाली बीमारी से बचाते हैं। वे कहते हैं कि आपकी आदत इतनी छोटी होनी चाहिए कि उसे 'ना' कहना मुश्किल हो जाए। लेसन ०२ का सबसे बड़ा मंत्र है कि कोई भी नई आदत ५ मिनट से ज्यादा की नहीं होनी चाहिए।

सोचिए अगर मैं आपसे कहूँ कि आपको रोज ५ मिनट अपनी अलमारी साफ करनी है। आप कहेंगे कि यह तो बहुत आसान है। लेकिन अगर मैं कहूँ कि आपको पूरा घर एक साथ चमकाना है तो आप उसे अगले संडे पर टाल देंगे। यही इंसान की फितरत है। हम बड़े कामों से डरते हैं पर छोटे कामों को हंसते हुए कर लेते हैं। हैबिट स्टैकिंग में छोटी आदतों का मतलब है वह काम जो आपकी वेल्थ या हेल्थ में सुधार लाएं पर आपके दिमाग पर बोझ न बनें।

अगर आप अमीर बनना चाहते हैं तो रोज अपनी बैंक ऐप खोलकर अपना बैलेंस देखना शुरू करें। इसमें सिर्फ ३० सेकंड लगते हैं। लेकिन यह छोटी सी आदत आपको आपके खर्चों के प्रति सावधान कर देगी। या फिर अगर आप अपनी नॉलेज बढ़ाना चाहते हैं तो सिर्फ १ पेज रोज पढ़ें। सिर्फ १ पेज। आप सोचेंगे कि १ पेज से क्या होगा। जनाब १ पेज पढ़ना उस किताब को न छूने से हजार गुना बेहतर है।

यहाँ सारा खेल कंसिस्टेंसी यानी लगातार करने का है। जब आप ५ मिनट का काम रोज करते हैं तो आपके अंदर एक कॉन्फिडेंस आता है। आपको लगता है कि आप अपनी लाइफ के कंट्रोल में हैं। और मजेदार बात यह है कि एक बार जब आप वह ५ मिनट का काम शुरू कर देते हैं तो अक्सर आप उसे ज्यादा देर तक करते हैं। जैसे जिम के कपड़े पहनकर जूते पहन लेना सबसे मुश्किल काम है। एक बार जूते पहन लिए तो फिर इंसान २-४ चक्कर तो लगा ही लेता है।

लेखक समझाते हैं कि यह छोटे बदलाव एक कंपाउंड इफेक्ट पैदा करते हैं। जैसे बैंक में छोटा छोटा इन्वेस्टमेंट सालों बाद बड़ा फंड बन जाता है वैसे ही यह छोटी आदतें आपके कैरेक्टर को बदल देती हैं। व्यंग्य की बात तो यह है कि लोग घंटों सोशल मीडिया पर रील देखने में बर्बाद कर देंगे पर अपनी लाइफ सुधारने के लिए ५ मिनट का इन्वेस्टमेंट करने में उन्हें मौत आती है। वे सोचते हैं कि जब तक कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा तब तक कुछ नहीं बदलेगा। पर असलियत में बड़े बदलाव उन छोटे छोटे ईंटों से बनते हैं जो आप रोज लगाते हैं। तो अगली बार जब आप कुछ नया शुरू करना चाहें तो खुद से पूछें कि क्या यह इतना छोटा है कि मैं इसे आज अभी इसी वक्त ५ मिनट में कर सकता हूँ। अगर हाँ तो बस शुरू हो जाइए।


लेसन ३ : चेकलिस्ट और एन्वायरमेंट की सेटिंग - फेल होने का रास्ता बंद करें

अब तक हमने सीखा कि आदतों को चिपकाना कैसे है और उन्हें छोटा कैसे रखना है। लेकिन मान लीजिए आपने तय किया कि आप रोज सुबह उठकर कसरत करेंगे। पर सुबह उठते ही आपको अपने जूते नहीं मिल रहे या आपका टी शर्ट गंदा है। बस। आपका दिमाग तुरंत बहाना ढूंढ लेगा और आप वापस सो जाएंगे। स्टीव स्कॉट कहते हैं कि इच्छाशक्ति यानी विलपावर एक बैटरी की तरह है जो दिन खत्म होते होते डिस्चार्ज हो जाती है। इसलिए आपको अपने भरोसे नहीं बल्कि अपने सिस्टम के भरोसे रहना चाहिए। लेसन ०३ हमें सिखाता है कि अपनी आदतों को ऑटोपायलट पर कैसे डालें।

इसका सबसे बढ़िया तरीका है एक 'हैबिट स्टैकिंग चेकलिस्ट' बनाना। यह सुनने में स्कूल के होमवर्क जैसा लग सकता है लेकिन दुनिया के सबसे सफल लोग अपनी जेब में एक लिस्ट रखते हैं। जब आपके पास एक लिखित लिस्ट होती है कि 'ए' के बाद 'बी' करना है और 'बी' के बाद 'सी' तो आपके दिमाग को डिसीजन लेने की मेहनत नहीं करनी पड़ती। हमारे यहाँ लोग घंटों सिर्फ यह सोचने में बिता देते हैं कि आज क्या करना चाहिए। और जब तक वे फैसला लेते हैं तब तक एनर्जी खत्म हो चुकी होती है। लेखक का सुझाव है कि आप अपनी आदतों को समय या जगह के हिसाब से एक लॉजिकल क्रम में रखें। जैसे सुबह की आदतों की एक अलग लिस्ट और शाम की एक अलग।

इसके साथ ही अपने माहौल यानी एन्वायरमेंट को ऐसा बनाइए कि अच्छी आदत डालना आसान और बुरी आदत पालना मुश्किल हो जाए। अगर आप फल खाना चाहते हैं तो उन्हें डाइनिंग टेबल के बीच में सजाकर रखें न कि फ्रिज के किसी अंधेरे कोने में। अगर आप रात को फोन कम चलाना चाहते हैं तो चार्जर को दूसरे कमरे में रखें। यह छोटे छोटे बदलाव आपके डिसीजन मेकिंग को आसान बना देते हैं। व्यंग्य तो देखिए कि हम नेटफ्लिक्स की फिल्म चुनने में आधा घंटा लगा सकते हैं पर अपनी लाइफ की सबसे जरूरी आदतों को हम 'देख लेंगे' के भरोसे छोड़ देते हैं।

चेकलिस्ट होने का एक और बड़ा फायदा है 'डोपामाइन हिट'। जब आप अपनी लिस्ट के एक काम पर टिक लगाते हैं तो आपके दिमाग को जीत वाली खुशी मिलती है। यही खुशी आपको अगले काम के लिए मोटिवेट करती है। स्टीव स्कॉट का यह सिस्टम उन लोगों के लिए वरदान है जो बहुत जल्दी स्ट्रेस में आ जाते हैं। आपको बस अपनी लिस्ट फॉलो करनी है और धीरे धीरे आपकी लाइफ खुद ब खुद ट्रैक पर आ जाएगी। याद रखिए कि आप अपनी आदतों का भविष्य नहीं चुनते आप अपनी आदतें चुनते हैं और आपकी आदतें आपका भविष्य तय करती हैं।


जिंदगी रातों रात नहीं बदलती और न ही कोई चमत्कार होने वाला है। स्टीव स्कॉट की यह किताब हमें याद दिलाती है कि हमारी असलियत हमारे उन छोटे छोटे कामों में छुपी है जो हम रोज करते हैं। अगर आप वही करते रहेंगे जो आज तक करते आए हैं तो आपको वही मिलेगा जो आज तक मिलता आया है। क्या आप तैयार हैं उन ५ मिनट की छोटी जीतों को हासिल करने के लिए। आज ही अपनी पहली हैबिट स्टैक बनाइए और नीचे कमेंट में शेयर कीजिए कि आप अपनी कौन सी पुरानी आदत के साथ नई आदत जोड़ने वाले हैं। आलस छोड़िए और अपने कल को आज से बेहतर बनाइए।

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