Here Comes Everybody (Hindi)


क्या आप अभी भी वही पुरानी घिसी पिटी कंपनी और बॉस के नीचे दबकर काम करने का सपना देख रहे हैं। बहुत बढ़िया। दुनिया बदल गई है और आप अभी भी १९९० के ऑफिस कल्चर में अटके हुए हैं। अगर आपको लगता है कि बड़ा काम करने के लिए करोड़ों का ऑफिस चाहिए तो बधाई हो। आप अपनी ग्रोथ का सबसे बड़ा मौका खो रहे हैं।

आज हम क्ले शिर्की की किताब हेअर कम्स एवरीबॉडी के जरिए समझेंगे कि कैसे इंटरनेट ने पुरानी संस्थाओं की लंका लगा दी है। ये आर्टिकल आपको वो ३ पावरफुल लेसन सिखाएगा जो आपके काम करने के नजरिए को हमेशा के लिए बदल कर रख देंगे।


लेसन १ : ट्रांजेक्शन कॉस्ट की बर्बादी और इंटरनेट की आजादी

पुराने जमाने में अगर आपको कोई बड़ा काम करना होता था, तो आपको एक बड़ी कंपनी या ऑर्गेनाइजेशन की जरूरत पड़ती थी। क्यों। क्योंकि लोगों को एक साथ लाना, उनको काम समझाना और फिर उन पर नजर रखना बहुत महंगा पड़ता था। इसे क्ले शिर्की ट्रांजेक्शन कॉस्ट कहते हैं। सोचिए, पुराने समय में अगर आपको अपनी बिल्डिंग के बाहर का कचरा साफ करवाना होता, तो आपको पहले एक रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन बनानी पड़ती। फिर उसके मेंबर ढूंढो, मीटिंग करो, चाय समोसे का खर्चा उठाओ और अंत में पता चलता कि काम से ज्यादा तो कमिटी बनाने में टाइम निकल गया।

आज के दौर में क्या होता है। आप बस एक व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाते हैं या फेसबुक पर एक पोस्ट डालते हैं। लोग खुद ब खुद जुड़ जाते हैं। इसे कहते हैं ट्रांजेक्शन कॉस्ट का जमीन पर गिर जाना। अब आपको किसी भारी भरकम ऑफिस या एचआर डिपार्टमेंट की जरूरत नहीं है। अगर कल को आपको पूरे शहर के कुत्तों को खाना खिलाना है, तो आपको कोई एनजीओ रजिस्टर करवाने की जरूरत नहीं है। बस एक सोशल मीडिया कैंपेन चलाइए और पूरी दुनिया आपके साथ खड़ी हो जाएगी।

यहाँ असली कटाक्ष तो उन लोगों के लिए है जो आज भी सोचते हैं कि बिना मीटिंग और बिना सूट पहने कोई बड़ा काम नहीं हो सकता। भाई साहब, अब जमाना बदल चुका है। वो जो आपके पड़ोस वाला लड़का है जो सारा दिन फोन में लगा रहता है, वो शायद एक ऐसा ग्रुप चला रहा है जिसकी रीच आपकी पुरानी कंपनी से भी ज्यादा है।

मान लीजिए आपको एक पुरानी कार ठीक करनी है। पहले आप मैकेनिक ढूंढते, फिर पार्ट्स की दुकान पर धक्के खाते और अंत में वो मैकेनिक आपको चूना लगा देता। अब आप बस एक यूट्यूब वीडियो देखते हैं और कमेंट्स में उन लोगों से बात करते हैं जिन्होंने वही कार खुद ठीक की है। यहाँ कोई कंपनी नहीं है, कोई मालिक नहीं है, बस एक कॉमन इंटरेस्ट है जिसने हजारों लोगों को जोड़ दिया।

क्ले शिर्की हमें समझाते हैं कि अब टूल्स इतने पावरफुल हो गए हैं कि को-ऑर्डिनेशन का खर्चा लगभग जीरो हो गया है। जब खर्च जीरो होता है, तो लोग शौक के लिए भी बड़े काम कर देते हैं। अब काम करने के लिए सैलरी की नहीं, सिर्फ एक अच्छे मकसद और एक मोबाइल इंटरनेट की जरूरत है। अगर आप अभी भी इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं, तो यकीन मानिए आप उस डायनासोर की तरह हैं जो सोच रहा था कि ये छोटा सा पत्थर गिरने से क्या ही होगा।

डिजिटल टूल्स ने उस दीवार को तोड़ दिया है जो एक आम आदमी और एक बड़ी संस्था के बीच थी। अब हर कोई एक पब्लिशर है, हर कोई एक ऑर्गेनाइजर है और हर कोई एक लीडर है। बस आपको यह समझना है कि अब पावर आपके पास है, किसी बड़े ऑफिस के केबिन में नहीं।


लेसन २ : लूजली कपल्ड ग्रुप्स की असली ताकत

क्या आपने कभी सोचा है कि विकिपीडिया कैसे चलता है। कोई ऑफिस नहीं, कोई सैलरी देने वाला मालिक नहीं और न ही कोई अटेंडेंस रजिस्टर। फिर भी यह दुनिया का सबसे बड़ा एनसाइक्लोपीडिया है। क्ले शिर्की इसे लूजली कपल्ड ग्रुप कहते हैं। यह उन लोगों का झुंड है जो एक दूसरे को जानते भी नहीं, फिर भी साथ मिलकर कमाल कर देते हैं। पुराने जमाने की संस्थाएं एक लोहे की जंजीर जैसी थीं, अगर एक कड़ी टूटी तो पूरा सिस्टम फेल। आज की कम्युनिटी एक मकड़ी के जाल जैसी है, कहीं से भी काटो, बाकी हिस्सा अपना काम करता रहेगा।

अब जरा अपनी उस ऑफिस वाली मीटिंग को याद कीजिए जहाँ दस लोग बैठकर तय करते हैं कि समोसे के साथ चटनी कौन सी आएगी। दो घंटे निकल जाते हैं और नतीजा ढाक के तीन पात। इसे कहते हैं ओवर ऑर्गेनाइजेशन। वहीं दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर जब कोई मुद्दा ट्रेंड करता है, तो लोग बिना किसी के कहे अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदल लेते हैं। किसी ने उनको ईमेल नहीं किया, किसी ने उनको टारगेट नहीं दिया। बस एक थॉट था और सब जुड़ गए। ये वही ताकत है जो एक आम आदमी को किसी बड़े कॉर्पोरेट घराने से ज्यादा पावरफुल बनाती है।

मान लीजिए आपके मोहल्ले में बिजली नहीं आ रही। आप अकेले ऑफिस जाकर कंप्लेंट करते हैं, बाबू आपको कल आने को कहता है। आप फिर जाते हैं, वो फिर टाल देता है। अब आप एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाते हैं, मोहल्ले के ५० लोगों को जोड़ते हैं और सब मिलकर एक साथ बिजली विभाग को टैग करके ट्वीट कर देते हैं। अचानक से पूरा डिपार्टमेंट हरकत में आ जाता है। यहाँ कोई परमानेंट लीडर नहीं था, बस एक कॉमन परेशानी ने सबको जोड़ दिया। जैसे ही काम हुआ, ग्रुप शांत। यही खूबसूरती है लूजली कपल्ड ग्रुप्स की।

क्ले शिर्की कहते हैं कि डिजिटल टूल्स ने हमें यह आजादी दी है कि हम अपनी मर्जी से किसी ग्रुप का हिस्सा बनें और जब मन किया बाहर निकल जाएं। इसमें कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, कोई नोटिस पीरियड नहीं है। अगर आपको किसी की बात पसंद आई तो लाइक करो, नहीं आई तो आगे बढ़ो। लेकिन जब लाखों लोग एक ही चीज को लाइक करते हैं, तो वो एक क्रांति बन जाती है। पुराने जमाने के मैनेजर इस बात से डरते हैं क्योंकि वो ऐसे लोगों को कंट्रोल नहीं कर सकते जो उनके पेरोल पर नहीं हैं।

अगर आप आज भी सोच रहे हैं कि आपको अपनी बात मनवाने के लिए किसी बड़ी कुर्सी पर बैठना जरूरी है, तो शायद आप इंटरनेट के इस जादू को मिस कर रहे हैं। आज एक मीम बनाने वाला लड़का भी उतनी ही बड़ी ऑडियंस रखता है जितनी एक नेशनल टीवी चैनल। ये इसलिए मुमकिन है क्योंकि वो लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, न कि किसी बोरिंग नियम कायदे से। जो लोग इस लूज ग्रुप की पावर को समझ गए, वो आज इंटरनेट पर राज कर रहे हैं। बाकी सब अभी भी 'रिप्लाई ऑल' वाले ईमेल्स में उलझे हुए हैं।


लेसन ३ : फेल्योर इज फ्री और एक्सपेरिमेंट की आजादी

पुराने जमाने में अगर आपको कोई नया बिजनेस या प्रोजेक्ट शुरू करना होता था, तो आपको बहुत डर लगता था। क्यों। क्योंकि अगर वो फेल हो गया, तो लाखों रुपये डूब जाते थे। प्रिंटिंग प्रेस में एक किताब छापने से पहले सौ बार प्रूफरीडिंग होती थी, क्योंकि एक गलती मतलब हजारों कॉपियां रद्दी। क्ले शिर्की कहते हैं कि आज के डिजिटल दौर में फेल्योर इज फ्री। यानी अब फेल होने की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती। आप एक ट्वीट करते हैं, अगर वो फ्लॉप हुआ तो कोई बात नहीं, दूसरा कर दीजिए। इसमें आपका एक पैसा भी खर्च नहीं हुआ।

आजकल के कुछ लोग परफेक्शन के पीछे पागल रहते हैं। वो सोचते हैं कि जब तक सब कुछ एकदम चकाचक नहीं होगा, वो काम शुरू नहीं करेंगे। भाई साहब, आप शायद अभी भी १९वीं सदी के हिसाब से सोच रहे हैं। आज की दुनिया में वही जीतता है जो जल्दी फेल होता है और उससे सीखकर तुरंत दूसरा एक्सपेरिमेंट करता है। अगर आप एक ब्लॉग पोस्ट लिखते हैं और उस पर सिर्फ दो लाइक्स आते हैं, तो ये हार नहीं है। ये बस एक फ्री का लेसन है कि आपकी हेडलाइन में दम नहीं था। अगली बार सुधार लीजिए।

मान लीजिए आपको कुकिंग का शौक है। पुराने समय में आपको एक रेस्टोरेंट खोलना पड़ता, शेफ रखने पड़ते और इंटीरियर पर लाखों खर्च करने पड़ते। अगर खाना लोगों को पसंद नहीं आया, तो आप सड़क पर आ जाते। आज आप क्या करते हैं। आप बस अपने किचन में एक डिश बनाते हैं, उसका रील डालते हैं और लोगों का फीडबैक लेते हैं। अगर रील वायरल नहीं हुई, तो आपने क्या खोया। सिर्फ १० मिनट का इंटरनेट और थोड़ी सी मेहनत। लेकिन अगर वो हिट हो गई, तो आप रातों रात स्टार बन सकते हैं। यहाँ एक्सपेरिमेंट करना इतना सस्ता है कि न करना सबसे बड़ी बेवकूफी है।

क्ले शिर्की हमें समझाते हैं कि अब हमें परफेक्शनिस्ट होने की जरूरत नहीं है, बल्कि हमें को-ऑपरेटर होना चाहिए। इंटरनेट पर आधे से ज्यादा चीजें तो ट्रायल और एरर से ही बनी हैं। बड़ी कंपनियां अब अपने नए फीचर्स पहले कुछ ही लोगों को दिखाती हैं, ताकि अगर कोई गड़बड़ हो तो उसे तुरंत सुधारा जा सके। वो पुराने जमाने के 'लॉन्च इवेंट' अब बस दिखावा रह गए हैं। असली काम तो बैकग्राउंड में चल रहे छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट्स से होता है।

जो लोग आज भी इस डर में जी रहे हैं कि लोग क्या कहेंगे या अगर प्लान काम नहीं किया तो क्या होगा, वो अपनी लाइफ का सबसे बड़ा ब्लंडर कर रहे हैं। याद रखिए, आज के जमाने में चुप बैठे रहना सबसे महंगा पड़ता है, जबकि गलतियां करना बिल्कुल फ्री है। तो उठिए, अपना फोन उठाइए और वो पहला कदम लीजिए जो आप महीनों से टाल रहे हैं। दुनिया आपके परफेक्शन का इंतजार नहीं कर रही, वो आपके को-ऑपरेशन और आपके नए आइडियाज की भूखी है।


क्ले शिर्की की यह किताब हमें बस एक ही बात सिखाती है। अब ताकत किसी बड़ी संस्था के पास नहीं, बल्कि हम जैसे आम लोगों के पास है। हमें बस उन टूल्स का सही इस्तेमाल करना सीखना है जो हमें फ्री में मिले हैं। चाहे वो एक व्हाट्सएप ग्रुप हो या एक यूट्यूब चैनल, आप अपनी एक अलग दुनिया खड़ी कर सकते हैं।

तो अब आपकी बारी है। क्या आप अभी भी किसी बड़े मौके का इंतजार कर रहे हैं या आज ही अपना छोटा सा ग्रुप या प्रोजेक्ट शुरू करने वाले हैं। नीचे कमेंट्स में मुझे जरूर बताएं कि आप अगला कौन सा 'फ्री एक्सपेरिमेंट' करने जा रहे हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। क्या पता आपका एक शेयर किसी की लाइफ बदल दे।

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