Hot, Flat and Crowded (Hindi)


अगर आपको लगता है कि आप अपने पुराने पेट्रोल इंजन और महंगे बिजली बिल के साथ बहुत कूल दिख रहे हैं तो मुबारक हो। आप अपनी बर्बादी की पहली कतार में खड़े हैं। जब दुनिया रिन्यूएबल एनर्जी से पैसा छाप रही होगी तब आप सिर्फ गर्मी और भीड़ में पसीना बहा रहे होंगे। स्मार्ट बनिए वरना पीछे छूट जाना ही आपकी किस्मत है।

थॉमस फ्रीडमैन की किताब हॉट फ्लैट एंड क्राउडेड हमें बताती है कि कैसे बदलती दुनिया में ग्रीन रिवोल्यूशन ही तरक्की का इकलौता रास्ता है। आइए जानते हैं वो 3 लेसन्स जो आपका भविष्य बदल सकते हैं।


लेसन १ : एनर्जी 2.0 की जरूरत और आपका बिजली बिल

दोस्तो, आज की दुनिया में अगर आप अभी भी वही पुराने घिसे पिटे तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप एक ऐसी नाव में बैठे हैं जिसमें छेद हो चुका है। थॉमस फ्रीडमैन अपनी किताब में साफ कहते हैं कि हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जो हॉट है यानी तप रही है। फ्लैट है यानी हर कोई एक दूसरे से जुड़ा है। और क्राउडेड है यानी जगह कम है और लोग ज्यादा। अब ऐसे में अगर आप सोचते हैं कि पुराना ईधन जलाकर आप तरक्की कर लेंगे तो आपकी सोच उतनी ही पुरानी है जितना कि वो नोकिया का फोन जो अब सिर्फ अलमारी की शोभा बढ़ाता है।

हॉट वर्ल्ड का मतलब यह नहीं है कि आपको बस थोड़ा ज्यादा पसीना आएगा। इसका मतलब है कि पूरा इकोसिस्टम बदल रहा है। सोचिए आप अपने घर में एसी चलाकर मजे ले रहे हैं पर बाहर का तापमान इतना बढ़ रहा है कि आपका एसी भी जवाब दे जाए। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आप एक डूबते जहाज के केबिन में बैठकर जूस पी रहे हों। फ्रीडमैन कहते हैं कि हमें एनर्जी 2.0 की जरूरत है। यह वो एनर्जी है जो क्लीन है और जो कभी खत्म नहीं होगी।

आजकल लोग रिन्यूएबल एनर्जी की बात ऐसे करते हैं जैसे यह कोई दान पुण्य का काम हो। भाई साहब यह कोई चैरिटी नहीं है। यह आने वाले समय का सबसे बड़ा धंधा है। जो देश या जो इंसान आज सोलर और विंड एनर्जी में इन्वेस्ट नहीं कर रहा है वो आने वाले समय में उतना ही गरीब होगा जितना कि वो आदमी जिसने इंटरनेट आने पर कहा था कि मुझे इसकी क्या जरूरत। इंडिया जैसे देश में जहाँ धूप की कोई कमी नहीं है वहां अगर हम अभी भी कोयले पर टिके हैं तो यह हमारी समझदारी पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

एनर्जी इंडिपेंडेंस का मतलब समझिए। आज हम दूसरे देशों से तेल खरीदते हैं। कल को अगर वो मना कर दें तो आपकी गाड़ियां खिलौना बन जाएंगी। लेकिन सूरज तो आपसे पैसे नहीं मांगता। हवा तो किसी देश की जागीर नहीं है। फ्रीडमैन समझाते हैं कि जो भी देश इस एनर्जी की रेस में जीतेगा वही दुनिया पर राज करेगा। हम अक्सर पर्यावरण बचाने की बात करते हैं पर असल में हमें खुद को बचाने की जरूरत है। प्रकृति को हमारी जरूरत नहीं है साहब हमें प्रकृति की जरूरत है।

अगर आप आज भी पुराने ईधन पर फिदा हैं तो आप उस आशिक की तरह हैं जो एक ऐसी लड़की के पीछे पड़ा है जो उसे छोड़कर जा चुकी है। अब वक्त है आगे बढ़ने का। ग्रीन एनर्जी को अपनाना सिर्फ धरती को बचाना नहीं है बल्कि अपने बैंक बैलेंस को बढ़ाना भी है। जब पूरी दुनिया बदल रही हो तब पुराने ढर्रे पर चलना बहादुरी नहीं बल्कि बेवकूफी कहलाती है।


लेसन २ : फ्लैट वर्ल्ड का जाल और बढ़ती भीड़ का प्रेशर

दोस्तो, आज की दुनिया में फेसबुक और इंस्टाग्राम ने सबको इतना पास ला दिया है कि अब कोई दूरी बची ही नहीं है। इसी को थॉमस फ्रीडमैन फ्लैट वर्ल्ड कहते हैं। लेकिन रुकिए यह कोई खुशी की बात नहीं है। यह असल में एक बहुत बड़ा कंपटीशन है। पहले आपको सिर्फ अपने पड़ोस वाले शर्मा जी के बेटे से आगे निकलना होता था। पर अब आपका मुकाबला पूरी दुनिया के उन करोड़ों लोगों से है जो आपकी ही तरह एक अच्छी लाइफ जीना चाहते हैं। सबको कार चाहिए। सबको एसी चाहिए। और सबको वो बड़ा वाला फ्रिज चाहिए जिसमें आधा सामान तो सिर्फ एक्सपायरी डेट देखने के लिए रखा होता है।

समस्या यह है कि दुनिया तो उतनी ही बड़ी है पर इसे इस्तेमाल करने वाले लोग और उनकी भूख बढ़ती जा रही है। इसी को फ्रीडमैन क्राउडेड वर्ल्ड कहते हैं। सोचिए एक छोटा सा पिज्जा है और उसे खाने वाले पहले दो लोग थे पर अब दस लोग आ गए हैं। ऊपर से उन दस में से हर किसी को एक्स्ट्रा चीज भी चाहिए। अब पिज्जा तो उतना ही है तो जाहिर है कि छीना झपटी तो होगी ही। यही हाल हमारी धरती के रिसोर्स का है। मिडिल क्लास की आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि अब धरती भी कह रही है कि भाई बस करो अब और जगह नहीं है।

अब यहाँ आता है असली मोड़। जब दुनिया फ्लैट होती है तो एक जगह की गंदगी दूसरी जगह पहुंचने में देर नहीं लगाती। अगर चीन में धुआं निकलता है तो उसका असर आपके शहर की हवा पर भी पड़ता है। अब आप यह नहीं कह सकते कि मेरा घर तो साफ है तो मुझे क्या फर्क पड़ता है। फर्क सबको पड़ता है बॉस। क्योंकि अब हम सब एक ही छत के नीचे रह रहे हैं और वो छत अब धीरे धीरे कमजोर हो रही है। लोग कहते हैं कि आबादी बढ़ना एक अच्छी बात है क्योंकि हाथ बढ़ रहे हैं। पर फ्रीडमैन याद दिलाते हैं कि हाथ के साथ साथ पेट भी तो बढ़ रहे हैं।

अगर हम इसी रफ्तार से चलते रहे और अपनी आदतों को नहीं बदला तो हम उस बस की तरह होंगे जिसमें क्षमता से ज्यादा सवारी बैठी है। वो बस चलेगी तो सही पर कभी भी उसका टायर फट सकता है या वो खाई में गिर सकती है। और मजे की बात देखिए हम सब उस बस में बैठकर मजे से सेल्फी ले रहे हैं। हमें लगता है कि कोई और आकर सब ठीक कर देगा। पर हकीकत तो यह है कि यहाँ कोई सुपरमैन नहीं आने वाला। हमें खुद ही अपनी सीट बेल्ट बांधनी होगी और ड्राइवर को बताना होगा कि भाई रास्ता बदलो।

फ्लैट वर्ल्ड में अगर आप सबसे तेज नहीं दौड़ रहे हैं तो आप कुचले जाएंगे। और क्राउडेड वर्ल्ड में अगर आप समझदारी से नहीं जी रहे हैं तो आप भूखे मर जाएंगे। यह डर नहीं है बल्कि यह आज की कड़वी सच्चाई है। जो लोग इस बदलाव को नहीं देख पा रहे हैं वो असल में अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर हाईवे पर चल रहे हैं। अब फैसला आपका है कि आपको अपनी आंखों की पट्टी हटानी है या बस के साथ खाई में गिरना है।


लेसन ३ : ग्रीन ही नया रेड, व्हाइट और ब्लू है

दोस्तो, अक्सर जब हम पर्यावरण या पेड़ों की बात करते हैं तो लोग हमें झोलाछाप समझने लगते हैं। लोगों को लगता है कि यह तो बस खाली बैठे लोगों का काम है। थॉमस फ्रीडमैन इस सोच की धज्जियां उड़ाते हुए कहते हैं कि आज के दौर में ग्रीन होना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है। उन्होंने अमेरिका के झंडे के रंगों रेड, व्हाइट और ब्लू का जिक्र करते हुए कहा कि अब असली ताकत ग्रीन होने में है। यही बात इंडिया पर भी लागू होती है। अगर आप अपने देश से प्यार करते हैं तो आपको ग्रीन रिवोल्यूशन का सिपाही बनना ही पड़ेगा।

आज के जमाने में पावरफुल वो नहीं है जिसके पास बहुत बड़ा हथियार है बल्कि वो है जिसके पास सबसे ज्यादा क्लीन एनर्जी है। सोचिए अगर हमारे देश के हर घर की छत पर अपना पावर प्लांट हो तो हमें किसी और के आगे हाथ फैलाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। जो लोग इसे सिर्फ एक छोटा सा बदलाव समझ रहे हैं वो बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। यह एक नया इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन है। जो इसमें पहले कूदेगा वही बाजी मारेगा। बाकी सब तो बस पुरानी यादों में खोए रहेंगे कि कभी हमारे यहाँ भी बिजली सस्ती हुआ करती थी।

ग्रीन टेक्नोलॉजी में इन्वेस्ट करना वैसा ही है जैसे सही समय पर बिटक्वाइन या शेयर मार्केट में पैसा लगाना। जो लोग आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं वो उस दुकानदार की तरह हैं जो डिजिटल पेमेंट लेने से मना करता है। अंत में ग्राहक उसी के पास जाएगा जो स्मार्ट है। फ्रीडमैन कहते हैं कि हमें अपनी अर्थव्यवस्था को ग्रीन रंग में रंगना होगा। यह सिर्फ हवा साफ करने के लिए नहीं है बल्कि नए रोजगार पैदा करने का सबसे बड़ा जरिया है। सोलर पैनल बनाना और विंड टर्बाइन लगाना आने वाले समय की सबसे डिमांड वाली नौकरियां होंगी।

अगर आप आज भी यह सोच रहे हैं कि यह सब तो सरकार का काम है तो आप उस पैसेंजर की तरह हैं जो ट्रेन में बिना टिकट बैठा है और उम्मीद कर रहा है कि टीटी उसे वीआईपी सीट देगा। बदलाव की शुरुआत आपके अपने नजरिए से होती है। जब आप कचरा कम करते हैं या बिजली बचाते हैं तो आप सिर्फ पैसे नहीं बचा रहे होते बल्कि आप आने वाली पीढ़ी को एक मौका दे रहे होते हैं कि वो भी इस धरती पर सांस ले सकें। बिना ऑक्सीजन के आपका आईफोन भी किसी काम का नहीं रहेगा साहब।

दुनिया बदल चुकी है और वो अब और गरम और ज्यादा भीड़ वाली होने वाली है। आपके पास दो ही रास्ते हैं। या तो इस बदलाव का हिस्सा बनिए और लीडर कहलाइए या फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठिए और इतिहास के पन्नों में धूल बन जाइए। थॉमस फ्रीडमैन की यह किताब हमें डराने के लिए नहीं बल्कि जगाने के लिए है। जाग जाइए वरना यह दुनिया आपको सोने का मौका भी नहीं देगी। अब वक्त है अपनी सोच बदलने का और एक नई ग्रीन क्रांति का हिस्सा बनने का।


दोस्तो, अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो अभी भी पुराने जमाने में जी रहे हैं। नीचे कमेंट में बताएं कि आप अपने घर को ग्रीन बनाने के लिए क्या छोटा सा कदम आज उठाने वाले हैं। याद रखिए आपकी एक छोटी सी पहल बड़ी लहर बन सकती है।

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