अगर आप आज भी पुराने घिसे पिटे बिजनेस रूल्स को पकड़ कर बैठे हैं तो मुबारक हो आप फेलियर की रेस में सबसे आगे खड़े हैं। गूगल की ये सीक्रेट स्ट्रेटेजीज इग्नोर करके आप सिर्फ सक्सेस ही नहीं बल्कि अपनी पूरी इंटरनेट सेंचुरी का करियर बर्बाद कर रहे हैं। क्या सच में आपको लगता है कि आप बिना स्मार्ट क्रिएटिव्स के इस कंपटीशन में टिक पाएंगे?
गूगल जैसी बड़ी कंपनी आखिर चलती कैसे है? एरिक श्मिट और जोनाथन रोसेनबर्ग ने इस बुक में उन रूल्स का खुलासा किया है जो हर प्रोफेशनल को जानने चाहिए। चलिए इस इंटरनेट सेंचुरी के ३ सबसे पावरफुल लेसन्स को गहराई से समझते हैं जो आपकी ग्रोथ को चार गुना बढ़ा देंगे।
लेसन १ : स्मार्ट क्रिएटिव्स की फौज खड़ी करना ही असली गेम है
आज के टाइम में अगर आप किसी ऑफिस में घुसें और वहां आपको सिर्फ ऐसे लोग मिलें जो चुपचाप अपनी डेस्क पर बैठकर बस हुक्म का इंतजार कर रहे हैं तो समझ जाइये कि वह कंपनी डूबने वाली है। गूगल कहता है कि इंटरनेट सेंचुरी में आपको सिर्फ एम्प्लॉईज नहीं चाहिए। आपको चाहिए स्मार्ट क्रिएटिव्स। अब आप पूछेंगे कि ये किस चिड़िया का नाम है? क्या ये कोई ऐसे लोग हैं जो सतरंगी कपड़े पहनकर ऑफिस आते हैं? बिल्कुल नहीं।
स्मार्ट क्रिएटिव वह इंसान है जिसके पास टेक्निकल स्किल्स तो हैं ही लेकिन उसका दिमाग एक बिजनेस ओनर की तरह चलता है। उसे काम बताने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि वह खुद आपको बताता है कि काम को और बेहतर कैसे किया जा सकता है। अगर आप एक मैनेजर हैं और अपनी टीम में सिर्फ जी हुजूर करने वाले लोग भर रहे हैं तो आप अपनी ही कब्र खोद रहे हैं। असल में हम अक्सर ऐसे लोगों को हायर कर लेते हैं जो हमारे ईगो को सहलाते रहें। हमें लगता है कि जो हमारी हर बात पर हां में हां मिलाए वही बेस्ट है। लेकिन गूगल का रूल इसे कचरे के डिब्बे में डाल देता है।
मान लीजिये आप एक नया रेस्टोरेंट खोल रहे हैं। आपने एक शेफ को काम पर रखा जो बहुत ही आज्ञाकारी है। आप उसे कहते हैं कि नमक कम डालो तो वह चुपचाप कम कर देता है। भले ही खाना बेस्वाद हो जाए पर वह अपनी जुबान नहीं खोलेगा। यह एक आम एम्प्लॉई है। अब दूसरी तरफ एक स्मार्ट क्रिएटिव शेफ को देखिये। जब आप उसे नमक कम करने को कहेंगे तो वह सीधे आपके मुंह पर बोलेगा कि सर अगर नमक कम किया तो यह डिश बर्बाद हो जाएगी और कस्टमर दोबारा नहीं आएगा। वह आपको डेटा देगा और बताएगा कि लोग चटपटा खाना पसंद करते हैं। वह रिस्क लेगा और आपको गलत साबित करेगा क्योंकि उसका गोल आपको खुश करना नहीं बल्कि बिजनेस को हिट कराना है।
ज्यादातर इंडियन स्टार्टअप्स और बिजनेसेस में लोग इस बात से डरते हैं कि कहीं उनका जूनियर उनसे ज्यादा स्मार्ट न निकल जाए। यह डर आपको कभी गूगल जैसा बड़ा नहीं बनने देगा। स्मार्ट क्रिएटिव्स थोड़े जिद्दी होते हैं। वे सवाल पूछते हैं। वे हर उस चीज को चैलेंज करते हैं जो उन्हें लॉजिकल नहीं लगती। अगर आपकी टीम में ऐसे लोग नहीं हैं जो आपकी मीटिंग्स में आपको पसीने छुड़ा सकें तो समझ लीजिये कि आप सिर्फ एक भेड़ चाल का हिस्सा हैं। गूगल में हायरिंग के वक्त सिर्फ डिग्री नहीं देखी जाती। वहां यह देखा जाता है कि क्या इस बंदे में सीखने की भूख है? क्या यह फेल होने के बाद वापस उठने का दम रखता है?
हम अपनी लाइफ में भी यही गलती करते हैं। हम उन दोस्तों या पार्टनर्स के साथ रहना पसंद करते हैं जो हमें कंफर्ट जोन में रखते हैं। जो कभी हमारे गलत फैसलों पर उंगली नहीं उठाते। लेकिन अगर आपको इंटरनेट सेंचुरी में राज करना है तो आपको अपनी टीम और अपनी लाइफ में उन लोगों को जगह देनी होगी जो आपसे बेहतर हों। स्मार्ट क्रिएटिव्स को मैनेज करना आसान नहीं है क्योंकि वे भेड़ों की तरह हांकने से नहीं चलते। उन्हें आजादी चाहिए। उन्हें ऐसा माहौल चाहिए जहां उनके आइडियाज को इज्जत मिले। अगर आप उन्हें एक पिंजरे में बंद करेंगे तो वे उड़ जाएंगे और किसी और के पास जाकर दुनिया बदल देंगे। इसलिए अगर आप अपनी कंपनी या अपने काम को अगले लेवल पर ले जाना चाहते हैं तो खुद को सबसे होशियार समझना बंद कीजिये और उन लोगों को ढूंढिए जो आपको हर दिन चैलेंज कर सकें। यही वह पहला स्टेप है जो एक नॉर्मल कंपनी और गूगल के बीच का अंतर पैदा करता है।
लेसन २ : डिफॉल्ट टू ओपन - सीक्रेट्स को तिजोरी से बाहर निकालो
अगर आप उन पुराने खयालात के बॉस हैं जो सोचते हैं कि इंफॉर्मेशन ही पावर है और उसे अपनी मुट्ठी में बंद रखना चाहिए तो समझ लीजिये कि आप एक पुरानी जंग लगी मशीन चला रहे हैं। गूगल का बहुत सीधा सा फंडा है जिसे वे कहते हैं डिफॉल्ट टू ओपन। इसका मतलब है कि जब तक कोई बहुत बड़ी मजबूरी न हो कंपनी की हर जानकारी हर एम्प्लॉई के लिए खुली होनी चाहिए। हमारे यहाँ अक्सर क्या होता है? ऑफिस के कोनों में फुसफुसाहट होती है। "अरे तुझे पता है नया प्रोजेक्ट क्या है?" या "मैनेजर ने उसे कैबिन में क्यों बुलाया?" ये सब इसलिए होता है क्योंकि इंफॉर्मेशन को एक जादुई खजाने की तरह छुपा कर रखा जाता है।
सोचिये अगर एक फुटबॉल टीम का कैप्टन अपनी स्ट्रेटेजी सिर्फ खुद तक रखे और बाकी खिलाड़ियों को बताए ही नहीं कि गोल किस तरफ करना है तो क्या होगा? सब मैदान पर पागलों की तरह भागेंगे और अंत में हार ही मिलेगी। गूगल में हर किसी को पता होता है कि कंपनी का गोल क्या है और बोर्ड मीटिंग्स में क्या बातें हुई हैं। जब आप लोगों पर भरोसा करते हैं और उन्हें पूरी पिक्चर दिखाते हैं तो वे खुद को कंपनी का हिस्सा समझते हैं। लेकिन अगर आप उन्हें अंधेरे में रखेंगे तो वे सिर्फ एक मशीन के पुर्जे बनकर रह जाएंगे जो बिना दिमाग लगाए बस बटन दबाते हैं।
मान लीजिये आप एक जॉइंट फैमिली में रहते हैं और आप घर का नया टीवी खरीदने का प्लान बना रहे हैं। अब आपने ये बात सिर्फ अपनी बीवी को बताई और बाकी घर वालों से छुपा कर रखी ताकि सरप्राइज दे सकें। नतीजा क्या होगा? आपके पिताजी पुराने वाले टीवी की रिपेयरिंग पर ५००० रुपये खर्च कर देंगे। आपका छोटा भाई अपने कमरे के लिए एक अलग छोटा टीवी उठा लाएगा। जब आप नया बड़ा टीवी लेकर घर पहुंचेंगे तो खुशी के बजाय घर में वर्ल्ड वॉर ३ शुरू हो जाएगा। क्यों? क्योंकि आपने इंफॉर्मेशन शेयर नहीं की। अगर आप शुरू में ही सबको बता देते तो पैसे भी बचते और सबका इनपुट भी मिलता।
बिजनेस में भी यही होता है। जब आप अपनी टीम से डेटा और गोल्स छुपाते हैं तो आप उनकी क्रिएटिविटी का गला घोंट देते हैं। लोग अक्सर डरते हैं कि अगर सब कुछ ओपन कर दिया तो लीक हो जाएगा। लेकिन गूगल का मानना है कि इंफॉर्मेशन लीक होने का खतरा उस नुकसान से बहुत कम है जो इंफॉर्मेशन छुपाने से होता है। जब हर किसी को पता होता है कि क्या चल रहा है तो प्रॉब्लम्स जल्दी सॉल्व होती हैं। लोग एक दूसरे की मदद कर पाते हैं।
हम इंडियंस के साथ दिक्कत ये है कि हमें लगता है कि अगर हमने अपना "सीक्रेट सॉस" सबको बता दिया तो हमारी वैल्यू कम हो जाएगी। जबकि हकीकत ये है कि इंटरनेट सेंचुरी में सीक्रेट्स की एक्सपायरी डेट बहुत छोटी होती है। आपकी असली वैल्यू इसमें नहीं है कि आप क्या जानते हैं बल्कि इसमें है कि आप उस जानकारी के साथ क्या नया बना सकते हैं। डिफॉल्ट टू ओपन का मतलब सिर्फ डेटा शेयर करना नहीं है बल्कि एक ऐसा कल्चर बनाना है जहां सवाल पूछना और सच बोलना मना न हो। अगर आपकी टीम का सबसे जूनियर बंदा भी आपसे आकर ये कह सकता है कि "सर ये आईडिया बेकार है" तो समझ जाइये कि आप सही रास्ते पर हैं। लेकिन अगर आपके ऑफिस में सब एक दूसरे से बातें छुपा रहे हैं तो आप सिर्फ एक डूबती हुई नैया के कैप्टन हैं।
लेसन ३ : फेल फास्ट और लर्न फास्टर - हारने का डर निकालो और उड़ान भरो
हमारे समाज में फेल होने को किसी पाप की तरह देखा जाता है। अगर आप फेल हो गए तो पड़ोस वाली आंटी से लेकर दूर के रिश्तेदार तक आपको ऐसे देखेंगे जैसे आपने कोई जुर्म कर दिया हो। लेकिन गूगल की डिक्शनरी में फेलियर का मतलब फुल स्टॉप नहीं बल्कि एक कोमा है। इंटरनेट सेंचुरी का सबसे बड़ा रूल यही है कि अगर आपको कुछ बड़ा करना है तो आपको फेल होने के लिए तैयार रहना होगा। और सिर्फ फेल होना काफी नहीं है, आपको "जल्दी" फेल होना होगा। इसे कहते हैं फेल फास्ट।
जरा सोचिये, आप एक ऐसी ऐप बना रहे हैं जिस पर आप दो साल तक कमरे में बंद होकर काम करते हैं। आप अपना सारा पैसा, खून और पसीना उसमें लगा देते हैं। दो साल बाद जब आप उसे लॉन्च करते हैं तो पता चलता है कि लोगों को उसकी जरूरत ही नहीं है। अब आप पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। गूगल कहता है कि ये बेवकूफी है। इसके बजाय दो महीने में एक छोटा मॉडल बनाओ, उसे लोगों को दिखाओ और अगर वो फ्लॉप होता है तो वहीं रुक जाओ। कम से कम आपके बाकी के २० महीने और लाखों रुपये तो बच गए। गूगल प्लस और गूगल ग्लास जैसे प्रोजेक्ट्स इसके बड़े उदाहरण हैं। जब गूगल को लगा कि ये चीजें वैसी नहीं चल रही जैसी उम्मीद थी, तो उन्होंने उन्हें बंद करने में देर नहीं लगाई।
मान लीजिये आप जिम जाना शुरू करते हैं और पहले ही दिन आप सोचते हैं कि आप १०० किलो का वजन उठा लेंगे। आप कोशिश करते हैं और आपकी कमर में लचक आ जाती है। अब आप दो महीने तक बेड रेस्ट पर हैं। यहाँ आपकी गलती ये नहीं थी कि आपने वजन उठाने की कोशिश की, बल्कि ये थी कि आपने अपनी लिमिट को जल्दी टेस्ट नहीं किया। स्मार्ट तरीका ये होता कि आप ५ किलो से शुरू करते, अगर वो नहीं उठता तो आपको तुरंत पता चल जाता कि अभी बॉडी तैयार नहीं है। आप बिना बड़ी चोट खाए अपनी स्ट्रेटेजी बदल लेते।
बिजनेस और लाइफ में भी हम अक्सर परफेक्ट होने के चक्कर में कभी शुरुआत ही नहीं कर पाते। हम सोचते हैं कि जब सब कुछ सही होगा तब कदम बढ़ाएंगे। यकीन मानिए, वो "परफेक्ट" दिन कभी नहीं आता। गूगल का मानना है कि शिप को बंदरगाह पर खड़े रहकर जंग लगाने से बेहतर है कि उसे समंदर में उतारा जाए, भले ही उसमें छोटे मोटे छेद हों। आप लहरों के बीच उन छेदों को भरना सीख जाएंगे। अगर आप गिरते नहीं हैं, तो इसका मतलब है कि आप अपनी लिमिट्स को पुश ही नहीं कर रहे हैं। आप बस एक सेफ गेम खेल रहे हैं और सेफ खेलने वाले लोग कभी हिस्ट्री क्रिएट नहीं करते।
लेकिन यहाँ एक पेंच है। फेल होने का मतलब ये नहीं है कि आप बार-बार एक ही गलती दोहराएं। गूगल में फेलियर को सेलिब्रेट तब किया जाता है जब उससे कुछ नया सीखा जाए। अगर आप एक ही गड्ढे में १० बार गिर रहे हैं तो आप स्मार्ट क्रिएटिव नहीं बल्कि सिर्फ जिद्दी हैं। इंटरनेट सेंचुरी में जीत उसकी नहीं होती जिसके पास सबसे ज्यादा पैसा है, बल्कि उसकी होती है जो सबसे जल्दी अपनी गलतियों को सुधार कर खुद को बदल लेता है। तो अगली बार जब आप कुछ नया ट्राई करें और वो फेल हो जाए, तो उदास होकर कोपचे में मत बैठिये। थोड़ा मुस्कुराइए, अपनी धूल झाड़िए और देखिये कि इस बार आपने क्या नया सीखा जो पिछली बार नहीं पता था।
दोस्तों, गूगल की सफलता का कोई जादू टोना नहीं है। यह बस एक सही माइंडसेट का खेल है। स्मार्ट लोगों को चुनना, उनके साथ ईमानदारी बरतना और हार से न डरना ही वह फॉर्मूला है जिसने एक गैराज से शुरू हुई कंपनी को पूरी दुनिया का मालिक बना दिया।
अब आपकी बारी है। आप अपनी लाइफ या बिजनेस में इन ३ लेसन्स में से सबसे पहले किसे लागू करने वाले हैं? क्या आप आज से ही अपनी टीम के साथ ज्यादा ओपन होने वाले हैं या अपने उस डरावने आइडिया पर काम शुरू करने वाले हैं जिसे आप फेल होने के डर से दबा कर बैठे हैं? नीचे कमेंट्स में अपनी राय जरूर शेयर कीजिये क्योंकि आपका एक छोटा सा कदम आपकी पूरी लाइफ बदल सकता है। उठिये और इस इंटरनेट सेंचुरी के असली खिलाड़ी बनिए।
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