How We Compete (Hindi)


अगर आपको लगता है कि आप केवल सस्ता माल बेचकर और लेबर की सैलरी काटकर दुनिया के बड़े बिज़नेसमैन बन जाएंगे तो मुबारक हो आप एक मीठी नींद में सो रहे हैं। ग्लोबल इकॉनमी आपके पड़ोस की किराना दुकान नहीं है जहाँ सिर्फ डिस्काउंट चलता है। इस बुक के लेसन्स नहीं पढ़े तो शायद आप अपनी कंपनी का दिवाला निकलते ही देखते रह जाएंगे।

लेकिन चिंता मत कीजिये क्योंकि आज हम सुजैन बर्जर की रिसर्च से वो सीक्रेट्स निकालेंगे जो ये बताते हैं कि असली कॉम्पिटिशन में टिकने के लिए आपको अपने पुराने और घिसे पिटे बिज़नेस आइडियाज को बदलना पड़ेगा। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन्स जो आपकी सोच बदल देंगे।


लेसन १ : केवल सस्ता होना काफी नहीं है

अगर आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे बड़े बिज़नेस टाइकून बन जाएंगे सिर्फ इसलिए क्योंकि आपने अपने प्रोडक्ट की कीमत चाय की टपरी से भी कम रखी है तो आपको अपनी सोच का इलाज करवाना चाहिए। सुजैन बर्जर अपनी बुक हाउ वी कम्पीट में बहुत साफ़ शब्दों में कहती हैं कि ग्लोबल इकॉनमी में रेस सिर्फ इस बात की नहीं है कि कौन सबसे नीचे गिर सकता है। हमारे यहाँ अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर पड़ोसी दुकानदार ने समोसा दस रुपये में बेचा है तो हम उसे आठ रुपये में बेचकर करोड़पति बन जाएंगे। ये सोच आपको करोड़पति नहीं बल्कि रोडपति बनाने का शॉर्टकट है। असली दुनिया में लोग केवल ये नहीं देखते कि आपकी जेब से कितना पैसा जा रहा है बल्कि ये देखते हैं कि जो जा रहा है उसके बदले में मिल क्या रहा है।

सोचिये आप एक फ़ोन खरीदते हैं जो बहुत सस्ता है लेकिन उसे चलाने के लिए आपको हर दो घंटे में भगवान से प्रार्थना करनी पड़ती है कि वो हैंग न हो। क्या आप उसे दोबारा खरीदेंगे। बिलकुल नहीं। ग्लोबल मार्केट में भी यही होता है। चाइना के सस्ते लेबर का नाम सुनकर दुनिया भर की कंपनियां वहां भागती तो थीं लेकिन अब उन्हें समझ आ रहा है कि केवल कम मजदूरी देना काफी नहीं है। अगर आपके वर्कर के पास स्किल नहीं है या आपकी मशीनें पुरानी हैं तो आप सस्ता माल तो बना लेंगे लेकिन वो कचरा होगा। और दुनिया अब कचरा खरीदने के मूड में बिलकुल नहीं है। आज की ग्लोबल इकॉनमी में वही टिकता है जो वैल्यू देता है।

कई ऐसी इटालियन कंपनियां हैं जो कपड़े बनाती हैं। अब इटली में लेबर इंडिया या वियतनाम से तो महंगा ही है। फिर भी उनके कपड़े पूरी दुनिया में महंगे बिकते हैं। क्यों। क्योंकि उन्होंने क्वालिटी और डिज़ाइन पर इतना फोकस किया है कि लोग उनके ब्रांड के लिए एक्स्ट्रा पैसे देने को तैयार हैं। वो ये नहीं रोते कि अरे वियतनाम तो बहुत सस्ता बना रहा है हम क्या करें। वो अपने काम में इतने उस्ताद हैं कि सस्ता माल बेचने वाले उनके सामने पानी भरते हैं। अगर आप भी यही सोच रहे हैं कि सस्ता लेबर ढूंढकर आप अमेज़न या एप्पल को टक्कर दे देंगे तो शायद आपने अभी तक दुनिया देखी नहीं है।

आपको अपनी स्ट्रेटेजी बदलनी होगी। आपको ये समझना होगा कि कस्टमर बेवकूफ नहीं है। उसे पता है कि सस्ती चीज़ अक्सर महंगी पड़ती है। अगर आपकी कंपनी सिर्फ इस भरोसे चल रही है कि हम सबसे सस्ते हैं तो समझ लीजिये आपकी एक्सपायरी डेट बहुत पास है। ग्लोबल कॉम्पिटिशन में जीतने के लिए आपको अपनी क्वालिटी को इतना ऊपर ले जाना होगा कि कीमत सिर्फ एक नंबर बनकर रह जाए। सस्ता होना एक मजबूरी हो सकती है लेकिन एक विजन कभी नहीं हो सकता। इसलिए अपनी फैक्ट्री में सिर्फ कम सैलरी वाले लोग मत ढूंढिए बल्कि वो लोग ढूंढिए जो आपके प्रोडक्ट को एक लेजेंड बना सकें। वरना आप बस उस भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे जो डिस्काउंट के बोर्ड लगाकर ग्राहकों की भीख मांगती है।


लेसन २ : आउटसोर्सिंग कोई जादू की छड़ी नहीं है

अगर आपको लगता है कि बिज़नेस करने का मतलब सिर्फ एक ऑफिस में बैठकर दूसरों से काम करवाना है तो शायद आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं। आजकल एक बड़ा अजीब सा ट्रेंड चला है जिसे देखो वो आउटसोर्सिंग के पीछे पागल है। लोग सोचते हैं कि अपनी कंपनी का हर ज़रूरी काम किसी और को सौंप दो और खुद बस नोट गिनने की मशीन लगा लो। सुजैन बर्जर कहती हैं कि ये सोच वैसी ही है जैसे आप अपनी शादी में फेरे लेने के लिए किसी और को भेज दें और उम्मीद करें कि गृहस्थी आपकी बसेगी। आउटसोर्सिंग कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाया और मुनाफा डबल हो गया। असल में ये एक दोधारी तलवार है जो अक्सर कंपनी का गला ही काट देती है।

मान लीजिये आपकी एक टेक कंपनी है और आपने अपना सारा सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट किसी ऐसी एजेंसी को दे दिया जो आपसे कोसों दूर बैठी है। अब आपको लग रहा है कि आपने पैसे बचा लिए लेकिन असल में आपने अपनी कंपनी की आत्मा ही बेच दी है। जब तक आपको पता चलेगा कि सॉफ्टवेयर में गड़बड़ है तब तक वो एजेंसी अपना बोरिया बिस्तर समेट चुकी होगी। ग्लोबल इकॉनमी में जो कंपनियां सफल हुई हैं उन्होंने ये समझा कि अपनी कोर स्ट्रेंथ यानी वो हुनर जो आपको दूसरों से अलग बनाता है उसे कभी किसी और के हाथ में नहीं देना चाहिए। अगर कोका कोला अपना फार्मूला आउटसोर्स कर देता तो आज शायद वो किसी मोहल्ले की लोकल सोडा कंपनी बनकर रह जाती।

कई बड़ी कंपनियां अपनी कस्टमर सर्विस आउटसोर्स कर देती हैं। अब आप फ़ोन करते हैं अपनी प्रॉब्लम बताने के लिए और सामने से कोई ऐसा इंसान बात करता है जिसे आपकी कंपनी के विजन के बारे में कुछ पता ही नहीं है। वो बस एक लिखी हुई स्क्रिप्ट पढ़ रहा होता है जैसे कोई तोता रटा रटाया ज्ञान दे रहा हो। नतीजा क्या होता है। कस्टमर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है और वो आपके ब्रांड को नमस्ते कह देता है। यहाँ आपने थोड़े से पैसे तो बचा लिए लेकिन अपना सबसे बड़ा एसेट यानी कस्टमर का भरोसा खो दिया। क्या ये समझदारी है। बिलकुल नहीं। ये तो वही बात हुई कि पैसे बचाने के चक्कर में आपने अपनी कार के ब्रेक ही निकाल दिए।

हाउ वी कम्पीट हमें ये सिखाती है कि आउटसोर्सिंग सिर्फ उन चीज़ों की करनी चाहिए जो आपके लिए बिलकुल भी ज़रूरी नहीं हैं। जैसे ऑफिस की साफ़ सफाई या सिक्योरिटी। लेकिन जो चीज़ आपकी पहचान है उसे तो आपको अपने सीने से लगाकर रखना होगा। कई सफल जर्मन कंपनियों ने यही किया। उन्होंने दुनिया के प्रेशर में आकर अपना मैन्युफैक्चरिंग प्लांट कहीं और शिफ्ट नहीं किया। उन्होंने वहीं रहकर अपनी मशीनों और अपने कारीगरों पर निवेश किया। उन्हें पता था कि जो हाथ उनके प्रोडक्ट को फिनिशिंग दे सकते हैं वो दुनिया में कहीं और नहीं मिलेंगे। इसलिए अगर आप भी हर काम दूसरों के भरोसे छोड़कर चैन की नींद सोना चाहते हैं तो जाग जाइये वरना आपकी नींद सीधे दिवालिया होने के बाद ही खुलेगी।


लेसन ३ : कोई एक फिक्स्ड रास्ता नहीं होता

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो अपनी बुद्धि चलाते हैं और दूसरे वो जो भेड़चाल चलते हैं। बिज़नेस की दुनिया में भी यही हाल है। अक्सर नए एंटरप्रेन्योर्स को लगता है कि अगर कोई कंपनी अमेरिका में एक खास तरीके से सफल हुई है तो वही फॉर्मूला इंडिया या जापान में भी काम कर जाएगा। सुजैन बर्जर अपनी रिसर्च में इस भ्रम को जड़ से उखाड़ फेंकती हैं। वो कहती हैं कि ग्लोबल इकॉनमी कोई ऐसा स्कूल नहीं है जहाँ सबको एक ही यूनिफॉर्म पहनकर आना है। यहाँ जीतने के सौ रास्ते हैं और हारने के हजार। अगर आप किसी और के सक्सेस मॉडल को बिना सोचे समझे कॉपी कर रहे हैं तो आप बस किसी और की पुरानी उतरन पहनने की कोशिश कर रहे हैं जो आपको कभी फिट नहीं आएगी।

सोचिये एक ऐसी कंपनी है जो बहुत ज्यादा ऑटोमेशन और रोबोट्स का इस्तेमाल करके करोड़ों कमा रही है। अब आप उसे देखकर अपनी सारी जमा पूंजी रोबोट्स पर लगा देते हैं जबकि आपके पास ऐसे स्किल्ड लोग मौजूद थे जो हाथ से ज्यादा बेहतर काम कर सकते थे। नतीजा क्या होगा। न तो आपके रोबोट्स ठीक से चलेंगे और न ही वो लोग आपके साथ रहेंगे। ग्लोबल मार्केट में कोई एक फिक्स्ड रास्ता नहीं होता कि आपको ऐसा ही करना पड़ेगा। कुछ कंपनियां सब कुछ अपनी फैक्ट्री के अंदर बनाकर सफल हैं तो कुछ कंपनियां डिज़ाइन कहीं और और असेंबली कहीं और करके राज कर रही हैं। असल में सफलता का कोई सीक्रेट सॉस नहीं है जो सबको एक जैसा स्वाद दे।

हमारे यहाँ जब कोई एक स्टार्टअप यूनिकॉर्न बनता है तो अगले दिन दस और लोग उसी जैसा आइडिया लेकर खड़े हो जाते हैं। अगर एक ने चाय बेची तो सब चाय बेचने निकल पड़ते हैं। ये तो वही बात हुई कि पड़ोसी का लड़का इंजीनियर बन गया तो अब आप भी बनोगे चाहे आपको गणित का ग भी न आता हो। सुजैन बर्जर ने अलग अलग देशों की ५०० कंपनियों का डेटा देखा और पाया कि डेल जैसी कंपनी का मॉडल अलग था और लेनोवो का अलग। दोनों ने अपने अपने तरीके से मार्केट को जीता। इसका मतलब ये है कि आपको अपनी स्ट्रेंथ और अपनी कमियों को पहचानकर अपना खुद का रास्ता बनाना होगा। दूसरों के नक्शेकदम पर चलकर आप सिर्फ उनके पीछे ही रह सकते हैं उनके आगे कभी नहीं निकल सकते।

अब समय आ गया है कि आप इस हकीकत को स्वीकार करें। ग्लोबल कॉम्पिटिशन में वही कंपनी लंबी रेस का घोड़ा साबित होती है जो अपनी परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालना जानती है। फ्लेक्सिबिलिटी ही असली ताकत है। अगर आप पत्थर की तरह सख्त रहेंगे कि मैं तो अपनी पुरानी जिद पर ही अड़ा रहूँगा तो मार्केट आपको तोड़कर निकल जाएगा। लेकिन अगर आप पानी की तरह रास्ता बनाना जानते हैं तो पूरी दुनिया आपकी मुट्ठी में होगी। सुजैन बर्जर की ये बुक हमें डराती नहीं है बल्कि हमें आज़ाद करती है कि हम अपनी मर्जी का बिज़नेस मॉडल चुनें। बस शर्त ये है कि वो मॉडल लॉजिक पर आधारित होना चाहिए न कि किसी की नकल पर।


तो क्या आप भी वही पुरानी भेड़चाल का हिस्सा बने रहना चाहते हैं या अपनी कंपनी के लिए एक नया और यूनिक रास्ता बनाने की हिम्मत रखते हैं। याद रखिये ग्लोबल इकॉनमी में जगह मांगने से नहीं बल्कि अपनी वैल्यू साबित करने से मिलती है। आज ही अपने बिज़नेस की कोर स्ट्रेंथ को पहचानिये और उस पर काम शुरू कीजिये। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो सिर्फ सस्ते के चक्कर में अपना बिज़नेस डूबा रहे हैं। कमेंट्स में बताइये कि आपके हिसाब से ग्लोबल मार्केट में इंडिया की सबसे बड़ी स्ट्रेंथ क्या है।

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