Innovation That Fits (Hindi)


क्या आप भी उन भेड़ चाल वाले बिजनेसमैन में से हैं जो हर चमकते हुए नए ट्रेंड को देखकर उसके पीछे पागलों की तरह भागने लगते हैं। बधाई हो। आप अपनी मेहनत की कमाई और कीमती वक्त दोनों को नाले में बहाने की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। बिना सोचे समझे किया गया इनोवेशन तरक्की नहीं बर्बादी लाता है।

अगर आप नहीं चाहते कि आपका बिजनेस भी किसी फालतू के ट्रेंड की भेंट चढ़ जाए तो यह आर्टिकल आपके लिए ही है। आज हम माइकल लॉर्ड और डोनाल्ड डेबेथिजी की इस कमाल की किताब से ऐसे 3 लेसन्स सीखेंगे जो आपके डूबते हुए बिजनेस को सही दिशा और एक मजबूत स्ट्रेटजी देने का काम करेंगे।


लेसन १ : अपनी ताकत पहचानो और फिट बैठो (Alignment is Key)

आजकल के बिजनेस वर्ल्ड में एक बहुत बड़ी बीमारी फैली है जिसे मैं 'शाइनी ऑब्जेक्ट सिंड्रोम' कहता हूँ। मार्केट में कोई भी नई टेक्नोलॉजी या कोई नया तरीका आता है और हमारे देसी बिजनेसमैन उसे ऐसे पकड़ने दौड़ते हैं जैसे फ्री की सेल लगी हो। माइकल लॉर्ड और डोनाल्ड डेबेथिजी अपनी किताब 'इनोवेशन दैट फिट्स' में सबसे पहले यही समझाते हैं कि भाई साहब हर नया आईडिया आपके लिए नहीं बना है। इनोवेशन का मतलब यह नहीं है कि आप कुछ भी नया करने लगें बल्कि असली इनोवेशन वो है जो आपके बिजनेस के डीएनए में फिट बैठता हो।

सोचिए एक हलवाई की दुकान है जो अपनी बढ़िया शुद्ध देसी घी की जलेबियों के लिए मशहूर है। अब हलवाई साहब ने इंटरनेट पर देख लिया कि आजकल 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' और 'मेटावर्स' का जमाना है। जोश में आकर उन्होंने जलेबी की दुकान पर एक बड़ा सा स्क्रीन लगा दिया और बोलने लगे कि अब आप वर्चुअल रियलिटी में जलेबी बनते हुए देखेंगे। सुनने में तो बड़ा कूल लगता है लेकिन क्या इससे जलेबी का स्वाद बढ़ गया। क्या वो कस्टमर जो वहां गरम जलेबी खाने आता है उसे सच में इस तामझाम की जरूरत थी। बिल्कुल नहीं। यह एक ऐसा इनोवेशन है जो उस बिजनेस में फिट ही नहीं बैठता। हलवाई साहब को अपनी ताकत पर ध्यान देना चाहिए था जैसे कि जलेबी की शेल्फ लाइफ बढ़ाना या उसकी होम डिलीवरी को फास्ट करना।

ज्यादातर लोग यही गलती करते हैं। वो सोचते हैं कि अगर पड़ोस वाला पड़ोसी कुछ नया कर रहा है तो हमें भी वही करना चाहिए। यह तो वही बात हुई कि आपके दोस्त ने जिम जाना शुरू किया और आपने जोश में आकर भारी भरकम प्रोटीन पाउडर खरीद लिया जबकि आपको पता है कि आपसे सुबह उठा भी नहीं जाता। बिजनेस में भी यही होता है। अगर आपकी कंपनी का कल्चर बहुत ही ट्रेडिशनल है और आप रातों रात वहां गूगल जैसा ऑफिस कल्चर लाने की कोशिश करेंगे तो आपके पुराने और भरोसेमंद एम्प्लॉई भी काम छोड़कर भाग जाएंगे।

माइकल लॉर्ड कहते हैं कि पहले अपनी जड़ें पहचानो। यह देखो कि आपकी असली ताकत क्या है। क्या आप कम दाम में माल बेचते हैं या आप सबसे अच्छी क्वालिटी देते हैं। अगर आप कम दाम वाले प्लेयर हैं तो आपका हर नया आईडिया खर्च कम करने के बारे में होना चाहिए। लेकिन अगर आप प्रीमियम सर्विस देते हैं तो आपका इनोवेशन कस्टमर के एक्सपीरियंस को और भी राजा महाराजा जैसा बनाने के लिए होना चाहिए। जब आप अपनी स्ट्रेंथ के साथ खिलवाड़ करते हैं तो आप मार्केट में अपनी पहचान खो देते हैं।

इनोवेशन को एक नए जूते की तरह समझिये। अगर जूता बहुत सुंदर है लेकिन आपके पैर में फिट नहीं आ रहा तो क्या आप उसे पहनकर दौड़ पाएंगे। बिल्कुल नहीं। आप लंगड़ा कर चलेंगे और थोड़े समय बाद गिर जाएंगे। इसलिए सिर्फ फैशन देखकर जूता मत चुनिए बल्कि यह देखिये कि क्या वो आपके कदम के साथ कदम मिलाकर चल सकता है। बिजनेस में भी वही बदलाव लाइए जो आपके काम करने के तरीके को और आसान बनाए ना कि उसे और उलझा दे। जब आप अपनी कोर वैल्यूज के साथ अलाइन होकर चलते हैं तब जाकर आपको असली सक्सेस मिलती है।


लेसन २ : ट्रेंड्स के पीछे भागना बंद करो (Avoiding the Fad Trap)

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो अपनी अकल चलाते हैं और दूसरे वो जो सिर्फ हवा का रुख देखते हैं। माइकल लॉर्ड अपनी किताब में साफ कहते हैं कि बिजनेस में हर चमकती चीज सोना नहीं होती। आजकल मार्केट में एक नया शब्द बहुत पॉपुलर है 'ट्रेंड'। लोग कहते हैं कि अगर आप ट्रेंड के साथ नहीं चले तो आप पीछे रह जाएंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि आधे से ज्यादा ट्रेंड्स सिर्फ खाली डिब्बे होते हैं जो बजते ज्यादा हैं पर उनके अंदर कुछ होता नहीं है। इसे लेखक 'फैड ट्रैप' कहते हैं। यह एक ऐसा जाल है जिसमें फंसकर अच्छे खासे चलते हुए बिजनेस भी दम तोड़ देते हैं क्योंकि वो अपनी पहचान भूलकर किसी और की नकल करने लगते हैं।

कल्पना कीजिए एक पुरानी और भरोसेमंद प्रिंटिंग प्रेस है जो दशकों से शादियों के कार्ड छाप रही है। अब अचानक मार्केट में शोर मचा कि अब तो भाई सब कुछ 'शॉर्ट वीडियो' और 'रील्स' का जमाना है। प्रेस वाले अंकल ने सोचा कि चलो हम भी रील्स बनाएंगे। उन्होंने अपनी छपाई की मशीनों को कोने में डाला और खुद कैमरे के सामने नाचने लगे। नतीजा क्या हुआ। पुराने कस्टमर को लगा कि अंकल सठिया गए हैं और नए लोगों को उनके नाचने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यहाँ गलती क्या थी। अंकल ने एक ऐसे ट्रेंड को पकड़ा जिसका उनके बिजनेस मॉडल से कोई लेना देना नहीं था। उन्होंने अपनी सालों की इज्जत एक ऐसे फैड के चक्कर में दांव पर लगा दी जो शायद कुछ महीनों में खत्म हो जाएगा।

ट्रेंड्स के पीछे भागना वैसा ही है जैसे किसी ऐसे लड़के या लड़की को इम्प्रेस करने की कोशिश करना जिसे आप खुद भी पसंद नहीं करते बस इसलिए क्योंकि वो क्लास में बहुत पॉपुलर है। आप अपनी पर्सनालिटी बदल लेते हैं अपनी पसंद बदल लेते हैं और आखिर में आप ना तो खुद की नजर में कुछ रहते हैं और ना ही उसकी। बिजनेस में भी जब आप फालतू के बदलाव करते हैं तो आप अपने वफादार ग्राहकों को कन्फ्यूज कर देते हैं। लोग आपके पास इसलिए आते हैं क्योंकि आप कुछ खास देते हैं। अगर आप वही सब करने लगेंगे जो हर दूसरा एरा गैरा नत्थू खैरा कर रहा है तो फिर कोई आपके पास क्यों आएगा।

लेखक समझाते हैं कि इनोवेशन का मतलब यह नहीं है कि आप हर हफ्ते अपनी स्ट्रेटजी बदलें। असली इनोवेशन बहुत ही शांत और गहरा होता है। वो शोर नहीं मचाता बल्कि रिजल्ट देता है। आपको यह समझना होगा कि कौन सा बदलाव आपके बिजनेस के लिए 'विटामिन' है और कौन सा 'पेन किलर'। विटामिन वो है जो आपको लंबे समय में मजबूत बनाएगा और पेन किलर वो जो बस थोड़ी देर के लिए दर्द कम करेगा लेकिन बीमारी को खत्म नहीं करेगा। ज्यादातर ट्रेंड्स बस पेन किलर होते हैं जो आपको थोड़े समय के लिए महसूस कराते हैं कि आप कुछ कूल कर रहे हैं लेकिन असल में वो आपके रिसोर्सेज को धीरे धीरे खत्म कर रहे होते हैं।

अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस सालों साल चले तो आपको भेड़ चाल से बाहर निकलना होगा। मार्केट के शोर को इग्नोर करना सीखिए। जब सब लोग एक ही दिशा में भाग रहे हों तो रुककर खुद से पूछिए कि क्या मुझे भी वहां जाने की जरूरत है। क्या वहां जाकर मेरा मुनाफा बढ़ेगा या सिर्फ मेरी फोटो अखबार में छपेगी। याद रखिये बिजनेस फोटो खिंचवाने के लिए नहीं बल्कि वैल्यू क्रिएट करने के लिए किया जाता है। जब आप इस 'फैड ट्रैप' से बच जाते हैं तभी आप कुछ ऐसा बना पाते हैं जो वक्त की कसौटी पर खरा उतरे।


लेसन ३ : रिस्क और रिवॉर्ड का बैलेंस (Strategic Risk Management)

अब आप सोच रहे होंगे कि भाई अगर ट्रेंड्स के पीछे नहीं भागना है और अपनी पुरानी ताकत पर ही टिके रहना है तो क्या हम कभी कुछ नया करेंगे ही नहीं। क्या हम बस बाबा आदम के जमाने की तरह बैठे रहेंगे। माइकल लॉर्ड और डोनाल्ड डेबेथिजी इसका बहुत ही सटीक जवाब देते हैं। वो कहते हैं कि रिस्क लेना जरूरी है लेकिन 'अंधा रिस्क' लेना बेवकूफी है। बिजनेस में इनोवेशन कोई जुआ नहीं है कि आपने सिक्का उछाला और भगवान भरोसे बैठ गए। असली खिलाड़ी वो है जो अपनी चादर देखकर पैर फैलाता है और यह जानता है कि अगर पैर चादर से बाहर निकल गए तो ठंड उसे ही लगेगी।

मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट चला रहे हैं। अब आप चाहते हैं कि आप अपने मेनू में कुछ नया जोड़ें। एक तरीका तो यह है कि आप रातों रात अपना सारा पुराना मेनू हटा दें और कल से सिर्फ 'चाइनीज कॉन्टिनेंटल फ्यूजन' बेचना शुरू कर दें। यह है बेवकूफी वाला रिस्क। इसमें चांस ज्यादा हैं कि आपके पुराने ग्राहक भाग जाएंगे और नए शायद आएं ही ना। दूसरा तरीका यह है कि आप अपनी सबसे पॉपुलर डिश के साथ एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट करें। जैसे अगर आपकी बिरयानी मशहूर है तो आप बस एक नए तरीके का रायता या एक खास मसाला इंट्रोड्यूस करें। यह है स्मार्ट इनोवेशन। इसमें अगर रायता फ्लॉप भी हुआ तो आपकी बिरयानी तो बिक ही रही है।

लेखक समझाते हैं कि आपको अपनी कैपेसिटी पहचाननी होगी। कई बार छोटी कंपनियां बहुत बड़ा रिस्क ले लेती हैं और एक ही झटके में दिवालिया हो जाती हैं। वहीं बड़ी कंपनियां इतना डरती हैं कि वो कुछ नया करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पातीं और धीरे धीरे मार्केट से गायब हो जाती हैं जैसे नोकिया या कोडक के साथ हुआ। आपको इन दोनों के बीच का रास्ता ढूंढना है। इसे हम 'पोर्टफोलियो अप्रोच' कह सकते हैं। अपने बिजनेस का 80% हिस्सा वही रखिए जो आपको पक्का पैसा कमाकर दे रहा है और बाकी 20% हिस्से में नए एक्सपेरिमेंट्स कीजिए।

रिस्क को मैनेज करने का मतलब डरना नहीं है बल्कि तैयारी करना है। जब आप कोई नया आईडिया लाते हैं तो खुद से पूछिए कि 'अगर यह फेल हुआ तो मेरा कितना नुकसान होगा'। अगर वो नुकसान आप झेल सकते हैं तो ही आगे बढ़िए। बिजनेस में ईगो पर आकर फैसले लेना सबसे खतरनाक होता है। कई लोग बस यह दिखाने के लिए कि वो बहुत बड़े इनोवेटर हैं ऐसे प्रोजेक्ट्स में पैसा झोंक देते हैं जिनका कोई भविष्य नहीं होता। यह वैसा ही है जैसे अपनी पूरी सेविंग्स लगाकर एक ऐसी स्पोर्ट्स कार खरीदना जिसके लिए आपके शहर में सड़कें ही नहीं बनी हैं। आप बस गैरेज में खड़ी कार को देख सकते हैं उसे चला नहीं सकते।

इनोवेशन वही काम का है जो आपके कस्टमर की लाइफ में कोई वैल्यू ऐड करे और आपके गल्ले में पैसा लाए। अगर आपका नया आईडिया सिर्फ आपकी तारीफ करवा रहा है लेकिन मुनाफा नहीं दे रहा तो वो बिजनेस नहीं बल्कि एक महंगा शौक है। अपनी लिमिट्स को समझिये मार्केट को परखिये और फिर एक नपा तुला कदम उठाइए। जब आप रिस्क और रिवॉर्ड के बीच यह बैलेंस बनाना सीख जाते हैं तब आपका बिजनेस सिर्फ चलता नहीं है बल्कि वो एक ऐसी मशीन बन जाता है जिसे कोई भी मंदी या कोई भी नया कॉम्पिटिटर हिला नहीं सकता।


तो दोस्तों, क्या आप भी बिना सोचे समझे हर नई चीज के पीछे भाग रहे हैं या आपने अपनी कोई ऐसी स्ट्रेंथ पहचानी है जो आपको दूसरों से अलग बनाती है। याद रखिये बिजनेस में जीत उसकी नहीं होती जो सबसे तेज दौड़ता है बल्कि उसकी होती है जो सही दिशा में दौड़ता है। आज ही अपने बिजनेस मॉडल को दोबारा देखिये और सोचिये कि क्या आपका इनोवेशन सच में फिट बैठ रहा है या आप बस भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। अपनी राय नीचे कमेंट्स में जरूर शेयर करें और इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त को भेजें जो हर हफ्ते एक नया 'क्रांतिकारी' बिजनेस आईडिया लेकर आपके पास आता है।

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